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झगड़ो जाजम रो.....

 

उडे जो, उन्हें भी गिराते हैं, शिकारी लोग पत्थरों से।
धरा तो क्या, खाली नहीं आकाश ठोकरों से।।


Prakash Chohan हमारे सुधी पाठक यह सोच रहे होंगे कि इस लेख का शीर्षक ऐसा क्यों है ?
         यह सत्य है कि पंचायती में जाजम के केन्द्र में और समारोह की अग्रिम पंक्ति में बैठकर अपने आपको समाज का महत्वपूर्ण व्यक्ति बताने की लालसा ही समाज में टांग-खिंचाई का सबसे बडा कारण हैं। यहीं टांग-खिंचाई आपसी वैर-वैमनस्य और समाज को खोखला करने का कार्य कर रही हैं। भवन में नींव का पत्थर सबसे ज्यादा भार सहन करता है और कंगूरा सबसे उपर शोभायमान रहता है। नींव के पत्थर की बजाय कंगूरा बनने की चाह ही है कि कुछ चालाक लोग किसी बडे कार्य में शुरू में मेहनत नहीं करते हैं। जब कार्य असफल होता है, तो इनको टीका-टिप्पणी का मसाला मिल जाता है। जब कार्य सफल होता है, तो ये फुदक कर जाजम के बीच में आ जाते हैं।
         जब मैंने यह सुना कि अहमदाबाद, गुजरात का रैगर समाज श्री सी. एम. चांदोलिया, आई. आर. एस. के संरक्षण में ''रैगर गरिमा'' नाम पुस्तक का प्रकाशन कर रहा है इस विषय पर लेख लिखा जाएं। तो विचार आया कि हमारे समाज की एक बुराई यानि बिना श्रम और योग्यता के अपने आपको मात्र डींगे हांककर श्रेष्ट साबित कर जाजम का हक प्राप्त करने की प्रवृत्ति के कारण ही हमारे समाज का प्रबुद्व एवं शिक्षित वर्ग जाजम पर साथ बैठने से कतराता है। यह जाजम की खींचतान ही रैगर जाति की गरिमा पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। समाज का अधिसंख्यक भाग यह नहीं समझ पाया कि बदलते परिवेश के साथ सभी समाजों ने जाजम का हक शारीरिक, गुट या आर्थिक बल की बजाय बौद्विक बल को दिया है। जब तक समाज के प्रबुद्व वर्ग को अपना उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। समाज को उचित मार्ग-दर्शन नहीं मिल सकता है। हकीकत तो यह है वर्तमान में समाज में जो उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति आ रहे है, उन्हें पद का लालच बिल्कुल नहीं हैं। लेकिन पढे लिखे व्यक्तियों के बारे में जो गलत धारणाएं एवं तानामार प्रवृत्ति है, उसके कारण बुद्विजीवियों को जाजम से डर लगता है। सोचते है कि इनको सुधारने जाओगे तो अपनी ही फजीहत करवाएंगे। ऐसे में हमारा शिक्षित वर्ग स्व-केन्द्रित हो जाता है और समाज विकास की सोचने के बजाय अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या व्यापारी बनाने से आगे की नहीं सोच पाता है। यदि हमें समाज का उत्थान करना है तो हमें जाजम के झगड़े से उपर उठकर सुलझी हुई विचारधारा अपनानी पडेगी। कहते है कि एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा करती हैं। समाज के आम मेहनतकश आदमी को जाजम से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन कुछ व्यक्ति अपने निहित स्वार्थो के कारण हर समय जाजम के केन्द्र में बने रहना चाहते हैं जिसके कारण टांग-खिंचाई बढती है और आम मेहनतकश आदमी जिनके विकास की डींगे हांककर संगठन बनाया जाता है वह अपना दम तोड देता है जो यह समझता है कि धन-बल या गुट बल के कारण जाजम पर मात्र उनका ही हक है, चाहे वे सालो-साल तक समाज के लिए चौधराहट करने के अलावा कोई काम नहीं करें। जब भी कोई अन्य व्यक्ति सच्चे मन से समाज सुधार का कार्य करता है और वह सफल हो जाता है तो उन्हें अपने पैरों से जाजम खिसकती नजर आती है और इस तिलमिलाहट और बौखलाहट में वे आरोपों-प्रत्यारोपों की झडी लगाने लगते हैं, और सफल कार्य को भी असफल सिद्व करने की कोशिश करते हैं। ये लोग अपनी चौधराहट के कायम रखने के लिए समाज के मेहनतकश और अल्पशिक्षित लोगों को झूठी कहानियां मढ-गढकर बताते हैं। असल में इस तरह के लोग समाज सेवी नहीं बल्कि समाज के वायरस होते हैं, जो समाज को जोडने की बजाय जाजम से चिपक कर घुन की तरह समाज को खोखल करने का ही कार्य करते हैं। ऐसे लोगों का मकसद समाज सेवा नहीं होता, बल्कि ये लोग चाहते हैं कि वे अपने धन या गुट के बल पर समाज में अपनी चौधराहट कायम रखें। ऐसे लोगों को दबंग तो कह सकते है, लेकिन समाज सेवी नहीं कह सकते। ऐसे लोगों का अपने आपको जाजम के केन्द्र में बनाये रखने की प्रवृत्ति के कारण समाज सुधार नहीं हो पाता है। समाज में कोई संगठन बनता है तो शुरू में जो निर्विरोध सदस्य चुन लिए जाते हैं वे अपने आपको समाज का ठेकेदार समझने लग जाते हैं और कभी चुनाव नहीं होने देना चाहते, ताकि वे जाजम पर बने रहे। एक बार अध्यक्ष आदि बन जाने पर वे अपने आपको हमेशा के लिए स्वयंभू अध्यक्ष आदि समझने लग जाते हैं। मेरा ऐसे लोगों से निवेदन है कि सामाजिक संस्थाओं का कार्यकाल 3 वर्षो से अधिक नहीं होना चाहिए, और दो बार से अधिक कार्यकाल पर निष्पक्ष रूप से पाबन्दी होनी चाहिए। ताकि परिवर्तन हो और नया आदमी, नये जोश-खरोश से कार्य कर सके। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। भाषण में तो सभी अच्छा-अच्छा बोलेंगे, लेकिन हकीकत के धरातल पर जाजम छोडना किसी को अच्छा नहीं लगता है। जाजम का मोह तो सभी को लुभाता है। जाजम के मोह से गांव के स्तर के संगठन से लेकर अखिल भारतीय रैगर महासभा तक कोई अछूता नहीं रहा हैं। कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, यदि जाजम प्रिय व्यक्ति को समाज का वायरस कहा जाये। ये वायरस समाज संगठन के शरीर से तब तक बाहर नहीं निकलता, जब तक कि उस संगठन के बचे हुए पैसे का पूरा उपयोग (दुरूपयोग) नहीं कर दें। महासभा के संविधान के अनुसार कार्यकारिणी का कार्यकाल 3 वर्ष का होता है। किंतु इस स्तर के संगठनों में लोगो ने 16 वर्ष तक जाजम को नहीं छोडा। फिर चुनाव हुए होते है तो कुछ लोग जाजम से बाहर हो जाते है। लेकिन जाजम प्रिय व्यक्ति का बिना जाजम के काम नहीं चलता। आखिर समाज सेवा के नाम पर चौधराहट कैसे करेंगे। ऐसे लोग अपनी नई जाजम उठा कर ले आते है, अर्थात एक समानान्तर संगठन खडा कर देते है, जिसे मूल नाम से थोडा छेडछाड कर विकासशील, कल्पनाशील या कुछ और शील जोड कर बन जाता हैं। ऐसे में समाज सेवा तो साइड में रह जाती है और अपने आपको समाज का असली ठेकेदार सिद्व करने की होड लग जाती है। ऐसे में मूल संगठन और शील अनुलग्नक वाले संगठन के दो-दो अध्यक्ष समाज के सामने अपना दावा पेश करते हैं और हमारा मेहनतकश समाज ठगा सा देखता रह जाता है।

 

"वाह रे जाजम तेरी माया।"

         क्यो करते है दो अध्यक्ष अपना दावा ऐसा क्या मिलता है उसमें मेवा। अन्तरमन से क्यों नहीं करते समाज सेवा।
         ऐसे दो-दो संगठन होने के कारण जाजम के चक्कर में विकास के लिए विपरीत विनाश का कार्य ही हुआ। राजस्थान प्रान्तीय महासभा के जाजम पर कुछ लोग 15 वर्षो से बैठे हैं और किसी भी तरह का लेखा-जोखा यहां तक कि इसका रजिस्टे्रशन भी शायद निरस्त हो गया है किन्तु अभी भी प्रचार-प्रसार जाजम हेतु कर रहे हैं। कुछ स्वयंभू नेताओं का बरसाती मेंढक की तरह उद्‌भव और विकास होता है और ये लोग चुनावो के नजदीक आते ही बडे सक्रिय हो जाते हैं और फिर लुप्त हो जाते हैं। इनका काम समाज सेवा नही बल्कि चेक करना होता है कि समय-समय पर मेरी जाजम तो सलामत है। ये लोग अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखकर जाजम बचाने और समाज में अपनी पैठ दिखाने के लिए छोटे-मोटे पारितोषिक समारोह या गोठ संगोष्ठी करते हैं और जाजम पर अपने चहेतो को बिठाकर सुशोभित करते हैं। इन संस्थाओं के चुनाव में कुछ लोग जाजम से बाहर हो जाते हैं, तो आपसी टांग-खिंचाई के बाद एक दूसरे का पोल-खोल कार्यक्रम करते हैं। ये पीत-पत्रकारिता के रूप में अशोभनीय लेख और पर्चे इत्यादि निकालते है। ये पर्चे कभी नाम से, कभी गुप्तनाम से, कभी फर्जी नाम से या रैगर बचाव संस्था के नाम से जारी किए जाते हैं।
         उपर के लेख में कहीं आपको समाज सेवा की भावना का अंश नजर आया क्या ? मुझे तो इन संगठनों में जाजम के हक की लडाई छोडकर कुछ नजर नहीं आया। निवेदन है कि हमारे समाज सुधारक संतो ने जो शीर्ष संगठन बनाये हैं, उन्हें जाजम के झगडे से अछूता रखे, समय-समय पर संगठन के संविधान के अनुसार चुनाव करायें, चुनाव हार जाने पर हार सहर्ष स्वीकार करे और अन्य लोगों को जाजम का हक दे, ताकि सामाजिक संस्थाओं में सुखद परिवर्तन आये और टांग-खिंचाई की बजाय नये लोगों को अपने अनुभव का लाभ दे। समाज सेवा का कार्य दिल से अपनी संतुष्टि के लिए करे, न कि जाजम पर अपना स्थान पाने के लिए।
         जाजम का झगडा ऐसा है कि इससे कोई शुभ कार्य पूर्ण नहीं हो पाता हैं। यह शीर्ष से लेकर गांव के स्तर तक है। एक पुराने चबुतरे को तोडकर नया मन्दिर बनाने की बात आई। मूल ढांचा बन गया। बाद का ढांचा कोई अपनी सुविधा तो कोई दूसरे की असुविधा को ध्यान में रखकर बनाना चाहते थे। जो कि जाजम का झगडा अर्थात अपनी बात मनवाने की जिद पर अडे रहकर अपनी प्रमुखता सिद्व करना ही है। मन्दिर में बैठा भगवान जाजम की खींचतान में अपनी दयनीय स्थिति देखकर रो रहा है और मन्दिर कई वर्षो से रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की हालत में है। हमारे समाज के गरीब और मेहनतकश लोगों की गाडी कमाई का पैसा जाजम की खींचतान में कैसे अधरझूल में लटक जाता है ये उसक उदाहरण है। ऐसे उदाहरण अन्य जगह भी है जहां किसी कार्य, समारोह, सामूहिक विवाह आदि के लिए पैसा इकट्‌ठा होता है और बचे हुए पैसों पर अपना कंट्रोल बनाये रखने के लिए मुद्‌दों को विवादास्पद बना दिया जाता है ताकि वो पैसा समाज के कार्य नहीं आए। ऐसे लोगों को समूह कहे या गिरोह, हर जगह पाया जाता है। इनका कार्य मात्र आलोचना करना होता है और जाजम के केन्द्र में नहीं तो जाजम को खींचने वाले कोने पर जरूर बने रहना चाहते हैं। ऐसी आलोचना से बचे हुए पैसे विवादित हो जाते हैं और समाज के किसी काम नहीं आते हैं। फिर कोई ऐसे गिरोह में से ही सलाह देगा कि पैसा किसी काम नहीं आ रहा है चलो समाज के गरीब लोगों को अपना धन्धा चलाने के ब्याज पर दे देते है। अपने लोगों के पैसा काम आ जायेगा और समाज को ब्याज मिल जायेगा। लेकिन सच्चाई बहुत कडवी है। ब्याज आने से ज्यादा पैसा डूबत खाते मे चला जाता है। समाज की जब जरूरत पडती है तब उस पैसे को इकटठा करना बहुत मुश्किल हो जाता है और जिस उद्‌देश्य के लिए पैसा पडा है वह कभी पूर्ण नहीं होता है। इतना जरूर होता है कि जिन चन्द लोगों के हाथों में पेसों की कमान होती है वे जाजम पर अपना हक समझते हैं और पूरे समाज को नचाते है। यहां पर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात है। बुद्वि बल, ज्ञान एवं चातुर्य यहां पर चक्कर खा जाता है। क्या, करें, जाजम का लोभ है ही ऐसा। आपका इसमें कोई दोष नहीं है जाजम का मोह है ही ऐसा। इससे आपको तो क्या संत-महात्माओं तक को नहीं छोडा। कुछ दिन पहले मेरे हाथ में एक पर्चा आया जिसमें हमारे एक समाज सुधारक एवं प्रमुख संत के रामद्वारे एवं उनकी छोडी गई कई बीघा जमीन के मालिकाना हक को लेकर जिक्र है। संत, जिसे सांसारिक मोह-माया से कोई लेना-देना नहीं होता है, कुटिया में रहकर ही अपने ज्ञान के प्रकाश द्वारा समाज का उत्थान कर कर सकते है, जैसा कि उनके गुरूदेव ने किया। लेकिन मालिकाना हक को लेकर कोर्ट में केस चल रहा है। चेलों में वर्चस्व की लडाई पहले से जारी है। यह जाजम की ही माया है कि इसने संतो को अपने लपेटे में ले लिया।
         लगता है कि मैं लिखते-लिखते थक गया हूं क्योंकि जैसे सावन के अधें को हरा ही हरा नजर आता है उसी तरह जब से मेरी जाजम प्रिय व्यक्ति को परखने की दिव्य-दृष्टि खुली, मुझे चारो तरफ नाना प्रकार के अलग-अलग किस्मों के जाजम प्रिय व्यक्ति नजर आते हैं। आखिर किस-किस जाजम प्रिय वेरायटी के बारे में लिखूँ । कम लिखा ज्यादा समझना। आप सभी समझदार है। मेरा इशारा किसी व्यक्ति विशेष की तरफ नहीं है। ये जाजम प्रिय व्यक्ति सभी जगह होते हैं। कभी-कभी तो मुझे अपने आप पर शक होता है कि कहीं मैं भी जाजम प्रिय नहीं हो जाउं। अत: चार्टड अकाउन्टेन्ट से अखिल भारतीय रैगर समाज, अहमदाबाद के खातों की सूक्ष्म जांच करवाकर प्रमाण-पत्र प्राप्त कर इस पुस्तक के प्रकाशन की जिम्मेदारी से मुक्त होते ही अपने पद से त्यागपत्र की अग्रिम घोषण के साथ ही मैं अपना यह लेख यही समाप्त करता हूँ।


raigar writerलेखक

प्रकाश चन्द्र चौहान (गुजरात)

अहमदाबाद (गुजरात)

 

 

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