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हमारे रैगर समाज की वेबसाईट......

 

         संकलित किये फुल चून-चून कर, आत्‍माराम लक्ष्‍य के सपूतों से ।
         माला बनाई है फूल पिरोकर, बेवसाईट रूपी  धागे से ।।
                      जिसको पहनेंगे रैगर सपूत, वट वक्ष से फेले भारत में ।
                      जिसकी निकली है मजबूत जड़े, राजस्‍थान की माटी से ।।
         आओ हम सब मिल कर बनाये, दीपक की माटी का ।
         उजाला होगा संजोने पर, अंधकार मिटेगा जाति का ।।
                     याद दिलायेंगे गौरव, जाति के सपूत ।
                     इतिहास को आगे बढ़ायेंगे, रैगर राजपूत ।।
        समर्पित है रैगर गौरव गाथा वेबसाईट रूप में ।
        संजोए रखनना इसको आधुनिक युग में ।।

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लेखक

किशन लाल हंजावलिया

मन्‍दसौर (म.प्र.)

 

 

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आपणी रैगर संस्‍कृति बचाओ

 

शहरा में रहबा वाला, मैरा रैगर बीराओं । मिटती जा री छै, आपणी पहचाण बचाओ ।।
सब बाता, आपां नकल पराई कर रहया छा । खुद की अच्‍छी भली पहचाण, खत्‍म कर रहया छा ।।
क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।


      आपणां तो सब रिती-रिवाज़ बुरा लागै छीं । दूसरा का कैसा भी छीं, चोखा लागै छीं ।।
      ढकै कोणी जो बदन, वो कोर्इं को पहणावों । अंग्रेजी फैशन, दे रहयो छै छलावों ।।
      आपां खुद ही खुद सै दगा कर रहया छां । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।


कमाई करबा ही आपां परदेस जावां । पर आपां नै यो हक कोणी, की आपणी, संस्‍कृति भुलावां ।।
पैसा पीछा, इतणा अंधा हो जावां । की आपणी औलाद नै, आपणी संस्‍कृति कोणी दे पावां ।।
छोटा बड़ा रो आदर सत्‍कार मत भूलों । Hello/Hi सीखों, पर राम-राम तो मत भूलों ।।
होड़ करबा सै, कोर्इं कोणी होणो । भूल अपणी पहचाण, और कोर्इं खोणो ?
अपणा महान् रैगर संस्‍कारां नै पहचाणो । अपणा रिती-रिवाज़ पै थे गर्व माणो ।।
पराया नै आपणौ और आपणा नै भुला रहया छां । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।


      मेरी प्‍यारी रैगरी भाषा को मामलो । अगर समझां तो इज्‍जत और आण को मामलो ।।
      थे सौगंध खाण न बोलो, बात अपना मन री । आपणी रैगरी भाषा जैसी मिठास कठे मिल सी ।।
      थे कुछ तो सोचो, अतरी कडवाहट तो मत घोलो । कम सै कम आपस मैं तो अंग्रेजी मत बोलो ।।
      क्‍यू बैठा छी आपां रैगरी नै छोड़ । अपणी माँ नै, आपां माँ कौणी बोलांगा तो बोलेगो कौण ?
      माँ बटा मै फासलो क्‍यूं कर रहया छा । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।


अगर जानै कौणी दूसरी पीढी कुछ भी, ऊपै कोई बस कौणी । माँ-बाप को फर्ज़ छै आपणी औलाद नै बताओ ।।
कोई बताओ ?
बताओ, आपां कुण छी और कठे सै आया । कोई छी आपणा रीति-रिवाज़ और कुण का छी जाया ?
जो बन्‍या फिरै छी जैन्‍टल मैन । बतओ वानै क्‍यूं आत्‍मा राम 'लक्ष्‍य' गाँव-गाँव घुम्‍या ।।
कार्इं छै समाज को आदर्श, कुण छी र्इष्‍ट आपणा । क्‍यूं छै गंगा आपणी 'माई', कुण छी कुल देव आपणा ?
छै मतलब आपणा रिती-रिवाज़ा को कार्इं घर का पितरां, राम पीर, भैरु जी और मालासी नै मनाबा को कार्इं ?
ना बता कै आपां बुरो कर रहया छा । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।


      अगर पहली पीढ़ी दूसरी नै बतावै । जद ही आपणी संस्‍कृति, आपणी पहचान जिन्‍दी रहै पावै ।।
      जो माँ-बाप ही आपणा मै मग्‍न रहैवा । तो बच्‍चां नै कार्इं कहैवा ?
      जो आपां ही टेढा रास्‍ता पै जाएगा । तो भाई, जैसी कोख बच्‍चां भी वैसा ही आएंगा ।।
      आपां या कार्इं कर रहया छा । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।


जो राखांगां आपणा बच्‍चां नै रैगरी से काट कै । तो डुल जाएंगा वो आपणी जड़ां से हट के ।।
भाई, रैगर जात दुनिया का नक्‍सा से मिट जावेगी । आपणा पूर्वज, धर्म गुरू ज्ञानस्‍वरूप जी दिया छा जो शिक्षा वा किताबा मा ही सिमट जावेगी ।।
थानै सौगंध छै थे कुछ तो तरस खाजो । आबा वाली पीढ़ी का दोषी मत कहलाजो ।।
नहीं तो, तीसरी पीढ़ी तक आपणी कहानी खत्‍म हो जावेगी । आपणी रैगर संस्‍कृति ई नया जुग मै खो जावेगी ।।
मुकेश सकरवाल, आपां या बुरो कर रहया छा । क्‍यू आपां आपणी परम्‍परा और संस्‍कृति णै खो रहया छा ।।

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लेखक

मुकेश सकरवाल

 (Liverpool, United Kingdom)

 

 

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स्‍वामी आत्‍माराम 'लक्ष्‍य'

 

        राजस्‍थानियों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी
         खूब किया रैगर जाति का उद्धार, वह तो आत्‍माराम लक्ष्‍य ने ठानी थी
                      ग्राम-ग्राम ले जन जागृति सशाल, जीने का अर्थ समझाया था
                      देह, देवालय अलख का शुभ भक्ति मार्ग समझाया था
        बहुजन, दलित शोषितों को उसने गले लगया था
        राजस्‍थानियों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी
                     खूब किया रैगर जाति का उद्धार, वह तो आत्‍माराम लक्ष्‍य ने ठानी थी
                     विद्या का मार्ग दिखाया, सारे हिन्‍दुस्‍तान में
        नई क्रान्ति का दीप जलाया, दलितां के जहान में
        मृत्‍यु भोज, दहेज, बाल-विवाह, सांस-मदिरा का विरोध किया था
                     शिक्षा, एकता, विधवा-विवाह, समता पर बल दिया था
                     कर सामाजिक परिर्वतन, एक आदर्श जीवन दिया था
        राजस्‍थानियों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी
        खूब किया रैगर जाति का उद्धार, वह तो आत्‍माराम लक्ष्‍य ने ठानी थी
                     मातृ शक्ति का मान बढ़ाने की ठानी थी
                     अनाथों के नाथ, सम्‍मान दिलाने की ठानी थी
        समता मूलक समाज हित, सजा काठ की पाई थी
        रोगी ज़र-ज़र तन हुआ, उम्र की यही अमिट कहानी थी
                     मानवता की लड़ाई लड़ते, जो दी जीवन की कुर्बानी थी
                     मानव नहीं वह अवतारी वह, अनाथों के नाथ बन आया था
        केवल उनतालिस अल्‍पायु में, बहुमुखी ज्ञान कराया था
        दिखा गया पथ सीखा गया, जो सीख सिखानी थी
                     कोटि-कोटि नमन भगवान दास का, जो दलित पीड़ा पाये थी
                     राजस्‍थानियों के मुँह, हमने सुनी कहानी थी
        खूब किया रैगर जाति का उद्धार, वह तो आत्‍माराम लक्ष्‍य ने ठानी थी

 

 

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समझ रैगर जमानो मुश्किल आवे छ:

 

         समझ रघुवंश मणी रैगर जामनो मुश्किल आवे छ: ।

         कुरूतियों के कारण जामारो विरथ जावे छ: ।।

                      बाल विवाह और रूढिवादी में रूचि दिखावे छ: ।

                      दहेजं प्रथा में कमी नहीं, फिर नुकता भावै छ: ।।

         रूढिवाद में तांडव में क्‍यों घर लुटावै छ: ।

         खुद मर जावे ऋण के माहि, संग दो पीढी जावे छ: ।।

                      रूढिवादी के रूढि में ज्‍यों फंसता जावे छ: ।

                      कांई वैज्ञानिक युग के माय नै पिछड़या कहलावे छ: ।।

         कांई सुधार होया देश आजाद बतावै छ: ।

         रैगर न अछूत बताकर मान घटावै छ: ।।

                      छोड़ बुराई, समझ बढ़ावै आगे आवै छ: ।

                      खुद तर जावै, समाज तरावै, मान बढ़ावे छ: ।।

         समझ रघुवंश मणी रैगर जमाना मुश्किल आवै छ: ।

         कुरूतियां के कारण जमारों विरथ जावे छ: ।।

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लेखक

श्री हनुमान प्रसाद जी दुलारिया

गांव बस्‍ती, जयपुर

 

 

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अग्रदूत स्‍वामी आत्‍मा राम लक्ष्‍य

 

         निर्भय वीर सिपाही अविचल, समाज संगठन लहराई ।

         समस्‍त रैगर जाति के ओर छोर में पावन ज्‍योति लक्ष्‍य जगाई ।।

                      रैगर चेतना का था तुमने भरा सभी में अविरल उत्‍साह ।

                      समाज में फैले दुष्‍चक्रो को दूर किया सह उत्‍साह ।।

         तुम ऐसे थे लोह पुरूष, स्‍वयं कौशल से किया निमार्ण ।

         भरां सभी में प्राण विसर्जन, रैगर उत्‍थान को मन में ठाण ।।

                      अंतिम क्षण भी अंत स्‍थल में, छाया केवल रैगर सम्‍मान ।

                      आजीवन पूरे बल से था सींचा, प्‍यारा रैगर महासभा महान ।।

         श्रद्धा के ये भाव पुरूष, श्रद्धा पूरित भाव उल्‍लास ।

         तुम महान हो रैगर गौरव, शक्ति प्रेरणा के नव प्रयास ।।

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लेखक

श्री रामचन्‍द्र खोरवाल

दिल्‍ली

 

 

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तुमने नाम कमाया : जयचन्‍द जी मोहिल

 

         दलितों के नेता, पत्रकार अर स्‍वतंत्रता सैनानी ।

         जयचन्‍द मोहिल याद रहेगी, देश हित तेरी कुर्बानी ।।

                      गांधी-नेहरू के भक्‍त तुने, दलितों का उत्‍थान किया ।

                      मदिरा पान बन्‍द कराया, और उन्‍हें सम्‍मान दिया ।।

         भारत माता की जय बोल, आंदोलन का बिगुल बजाया ।

         लाठी-डंडे पड़े खूब, पर न तनिक भी घबराया ।।

                      सन् 1938 के आन्‍दोलन में, नौकरशाही से टकराया ।

                      6 माह की सजा भोग, सिर ऊँचा कर घर आया ।।

         ऋषि दयानन्‍द पर थी श्रद्धा, आर्य समाज को अपनाया ।

         ठक्‍कर बापा का आशीष मिला हरिजन नेता कहलाया ।।

                      10 वर्ष रहा विधायक, जनता से स्‍नेह बढ़ाया ।

                      सरल स्‍वभावी, सादा जीवन, सेवा पथ अपनाया ।।

         निर्भय लेखनी चली तुम्‍हारी, भ्रष्‍टाचार घबराया ।

         छुआछूत करने वालों को, तुमने मजा चखाया ।।

                      जाओं मोहिला । बिदा तुम्‍हें तुमने नाम कमाया ।

                      सूर्यभानु ने श्रद्धा से, गुणगान तुम्‍हारा गया ।।

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लेखक

सूर्यभानु पोरवाल

(छोटी सादड़ी)

 

 

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प्रेरणा गीत

 

         आगे बढो रैगर समाज के लोगों अब ये युग हमारा है ।
         आगे बढने के सिवाय अब हमारे पास नहीं कोई चारा है ।।
                      हमे रैगर जाति को उचाईयों तक ले जाना है ।
                      रैगर जाति का उजाला सारे जगत मे फेलाना है ।।
         अब नहीं थकना है अब आगे बढते रहना है ।
         अब नहीं रूकना है अब आगे बढते रहना है ।।
                      समाज मे व्‍याप्‍त बुराईयों को अब हमे दुर करना है ।
                      हमारे इस प्‍यारे समाज के लिये अब हमे बहुत कुछ करना है ।।
         अब हमे अपने कदमो को आगे बढाते रहना है ।
         रैगर जाति का विकास हम सबको मिलकर करना है ।।
                      अब उठा तलवार इस दुनिया से हमे लडना है ।
                      उठ जाग रैगर अब केवल आगे बढते रहना है ।।
         उठ जाग रैगर अब चलने की बारी है ।
         अब आगे बढने की हमारी बारी है ।।
                      अब आगे की प्रगति की राह हमारी है ।
                      हमको अपनी रैगर जाति अपनी जान से भी प्‍यारी है ।।
         कुछ कर गुजर ऐसा की हर रैगर तुझे सलाम करें ।
         समाज सदियों तक तेरे नाम को याद करें ।।
                      अब आगे बढो ये युग हमारा है हमारा समाज सबसे न्‍यारा है ।
                      आगे बढो रैगर समाज के लोगों अब ये युग हमारा है ।।

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लेखक

ब्रजेश हंजावलिया

मन्‍दसौर (म.प्र.)

 

 

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रैगर समाज जागो

 

         ऐ वीर रैगर सुन भारत के मूल निवासी ।
         सिन्‍धु सभ्‍यता के जनक, संख्‍या में है बीस । ।
         छल-कपट से लूटा लूटेरों ने तेरा राज सिहासन ।                  
                      कभी दास तो कभी लाचार गुलाम बनाया ।
                      तेरे गले में हांडी, कमर पर झाडू बंधवाया । ।
        कब तक ढोयेगा ये गुलामी और लाचारी ।
        पहचान कौन है जुल्‍मी अन्‍यायी अत्‍याचारी । ।
                     सो लिया तू बहूत हुये वर्ष चार हजार ।
                     अब उठ जरा लगा दे आजादी की ललकार । ।
        क्‍योंकि तुम हो सूर्यवंशी, वीर पुत्रों की संतान ।
        गुलामी से मरना अच्‍छा है, ये हे गुरूओं का आव्‍हान । ।
                     शेरों बगावत करो ये बाबा की है ललकार ।
                     तेरी बगावत से होगा तू आजाद और मनुवादी होगा लाचार । ।

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लेखक

अम्‍बा लाल सेरसीया

बोरखेड़ी, चित्‍तौड़गढ़

 

 

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' रैगर वीर बढे चलो '

 

         शान 'रेगर' अभिमान बचाये रखिये । हरदम सामाजिकता बनाये रखिये॥
         यूँ तो चमकता है हिमालय मगर । 'रेगर वीर' एकता बनाये रखिये ॥
                      भेदभाव के काँटे जहाँ पलते है । उन पेड़ो को जड़ से मिटाये रखिये॥
                      सुलग न जाये आग बँटवारे की । बढ़ने से पहले बझाये रखिये॥
         अँधियारा चाहे हो जाये कितना । मन बाती मे दिया जलाये रखिये॥
        छूट न जाये राहो मे कारवाँ । 'रेगर' विकास की ओर कदम रखिये॥
                     धन-दौलत नहीं भाईचारा बढ़ाइये । होठों पर पावन दुआएँ रखिये॥
                     अपने समाज हित कुछ करना है । रेगर वीर मन को जरा समझाये रखिये ॥

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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' ऐसा कुछ कर जाये याद रखे संसार '

 

         आज नफरत की हम तोड़ दीवारें । आपस मे सब प्यार करे॥
         कभी ना सच से माने हार । ऐसा रैगर सदव्यवहार करे॥
                      झूठ पर कर मनन विचार । आज ही समाजहित बंद करे पापाचार॥                  
                      सभ्य-निर्मल समाज का सपना सलौना । हाथ सभी बढ़ाकर करे साकार॥
         होंसला रख ऐसा कुछ कर जाये । रेगर हित साधना याद रखे घर- संसार॥


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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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' रैगर युवा करे संकल्प '

 

         बदल रही आबो-हवा, नशे के दलदल मे फिसल रहा युवा ।
         हर तरफ हो रहे सस्ते, सामाजिक सरसता भरे रिश्ते ।
                      नशा करने वाले समझते, शान सब मे खुद की दोगुनी ।                   
                      किंतु मायूसी के हालात, समाज मे व्यथा बढ़ रही सौगुनी ।
         मलहम दु:ख-दर्द का और सही, किंतु ना कभी बने नशा विकल्प ।
        आओ सब मिलजुल नशामुक्ति का, रे! संभल रेगर युवा करे संकल्प ।

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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" रैगर सुधार आह्‌वान करे "

 

         रैगर जाति में जन्म लिया, निज समाज विकास में आगे रहेंगे ।
         सामाजिक गौरव का काम करेंगे ।
                      रैगर समरसता हित सब काम करेंगे ।                  
                      स्वजाति उत्थान में समाज बंधु लग जाएँगे ।
         माँ गंगा की संतान, रैगर ज्ञानी और गुणवान ।
        सामाजिक एकता प्यारेँ बंधु मिल जाएँगे ।
                     वीरता, मर्यादा, से लबरेज समाज हमारा ।
                     डूबे ना शान रैगर! समाज खातिर प्राण गवाएंगा ।
        समाज सीख देता सबका सम्मान करे ।
        आओ हाथ मिलाएँ, रैगर जन उत्थान करे ।

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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" रैगर शक्तिशाली बने "

 

         ज्ञान की लौ बिखेरने के लिए रैगर समर्थ हो ।
         एक दूजे का हाथ पकड़ आगे बढ़ने को वचनबद्‌ध हो ।
                      छल-कपट से लूटा लूटेरों ने तेरा राज सिहासन ।                  
                      सब ले रैगर शपथ अँधेरे के आगे ना नतमस्तक हो ।
         धर्मगुरु ज्ञानस्वरूप ने राह दिखाई उसका परिपालन हो ।
        'लक्ष्य' गुरु शिक्षाओ का समाज हित अनुपालन हो ।
                     समाज के नव-निर्माण के लिए सद्‌प्रयास संचालन हो ।
                     अंधियारे से उभरे 'रैगर शक्ति' बने नीतिगत पालन हो ।

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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" रैगर मिलकर हाथ बढ़ाओ "

 

        हमारी उम्मीदेँ खतम हो जाती जहाँ से ।
        रिश्तों में दूरिया बढ़ जाती वहाँ से ।
                     रैगर समाज एकता के लिए, हमें एक मंच पर आना होगा ।                 
                     किसी को भी नहीं कह सकते, हमेशा के लिए अलविदा ।
        सामाजिकता की यह नहीं संविदा ।
        रैगर बंधु ! कुछ ऐसा कर जाए ।
                     समाज शिक्षित, संगठित बन जाए ।
                     मुलाकात के समय हाथ मिलाओ ।

         लौटते वक्त अपना हाथ हिलाओ ।
         पहली बार अपनों से जुड़ने के लिए ।
                      दुबारा कभी ना बिछड़ने के लिए ।

                     आओ पल-भर सबको अपना संग दो ।
        कोई ना रहे पराया, मन रैगर रंग दो ।

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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' रैगर मीत ! आ जाना ।' 

 

         जब सांझ ढले, जब दीप जले। 
         रैगर ! मन के सहचर आ जाना। 
                      नन्हा तारा जब गगन पले। 
                      जब तम रजनी के प्राण छले। 
         तब दुखी समाज को राह दिखाने। 
         गुरु ज्ञान रवि किरण बन आ जाना। 
                      युवकों से छिन जब बल बहे। 
                      और सामाजिकता मंद-मंद चले। 
         गुरु लक्ष्य सीख प्राण वायु बन जाना। 
         जब सांझ ढले, जब दीप जले। 
                      रैगर मन कदम थामे, संभल जाना। 
                      अपना तन-मन आंदोलित कर। 
         नव-निर्माण का शंखनाद कर देना।

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लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

 

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प्रेरणा गीत

 

         जीवन में कुछ करना है तो, मन को मारे मत बैठो ।
         आगे आगे बढना है तो, हिम्‍मत हारे मत बैठो ।।
                      चलने वाला मंजिल पाता, बैठा पीछे रह जाता ।
                      ठहरा पानी सड जाता, बहता पानी निर्मल हो जाता ।।
        पॉव दिये चलने के खातिर, पॉव पसारे मत बैठो ।
        आगे बढना है तो, हिम्‍मत हारे मत बैठो ।।
                     तेज दौडने वाला, कुछ देर खडा रह कर भी हार गया ।
                     धीरे-धीरे चलकर, देखो कछुआ बाजी मार गया ।।
        चलो कदम से कदम मिलाकर, दूर किनारे मत बैठो ।
        आगे आगे बढना है तो, हिम्‍मत हारे मत बैठो ।।
                     धरती चलती तारे चलते, चॉंद रात भर चलता है ।
                     किरणों का उपहार बांटने, सूरज रोज निकलता है ।।
        हवा चले तो महक बिखेरे, तुम भी प्‍यारे मत बैठो ।

         आगे आगे बढना है तो, हिम्‍मत हारे मत बैठो ।।

 

 

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हमारी रैगर जाति महान्

 

         जल में थल में नील गगन में गुंजेगा जय गान।
         हमारी रैगर जाति महान्, हमारी रैगर जाति महान् ।।
                      अटल रहेंगे हम जीवन भर, चाहे आये लाख मुसिबत आये ।
                      फर्क ना पडेगा हमको, चाहे हम रैगर जाति के लिये मर जाये ।।
        चूर-चूर कर देंगे हम दुशमन के अरमान ।
        चमकाएंगे हम जाति को देकर निज बलिदान ।।
                     जग मे कायर बनकर हमको नहीं सुहाता है ।
                     आज हमारे रोम रोम से बस ये ही स्‍वर आता है ।।
        आज जवानी जागी फिर से हर नाविक बलशाली है ।
        अपनी बगीया के फूलों का रखवाला हर माली है ।।
                     जागो जागो सोने वालों मधुर विजय ध्‍वनि आती है ।
                     आज हिमालय के मस्‍तक पर उषा तिलक लगाती है ।।
        एक बार सब मिलकर बोलो, रैगर वीरों की संतान ।
        प्रगति पथ पर फिर से होगा, आज सफल अभियान ।।

                      हमारी रैगर जाति महान्, हमारी रैगर जाति महान्.............

 

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संगठन गीत

 

         संगठन गढे चलो सुपंथ पर बढे चलों ।
         भला हो जिसमे कोम का वो काम सब करे चलों ।।
                      युग के साथ मिलकर सब कदम मिलाना सिख लों ।
                      एकता के स्‍वर के गीत गुन गुनाना सिख लों ।।
        समाज के विकास के रास्‍ते पर सब साथ चले चलों ।
        संगठन गढे चलो सुपंथ पर चढे चलों ।।
                     भूलकर भी मुख में कभी बैर भाव का नाम ना हों ।
                     झूठी शान के लिये न वक्‍त का ये नाश हों ।।
        फूट का भरा घड़ा है, फोडकर चले चलो ।
        संगठन गढे चलो सुपंथ पर चढे चलों ।।
                     आ रही है आज चारों ओर से यही पुकार ।
                     हम करेंगे त्‍याग जाति के लिये अपार ।।
        कष्‍ट जो मिलेंगे मुस्‍करा के सब सहेंगे हम ।
        देश जाति के लिये जियेंगे और मरेंगे हम ।।
                     देश जाति का ही भाग्‍य, अपना भाग्‍य है ये सोच लो ।
                     संगठन गढे चलो सुपंथ पर चढे चलों ।।

        भला हो जिसमें कोम का वो काम सब किये चलो...........

 

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निराश न हो

 

         हे ! प्रिय, निराश न हो,
         समाज व जीवन से ,
                      अपने सुख सपनों से,
                      समाज व अपनों से ,
         हिम्‍मत की तलवार लेकर,
         समाज में फैले अन्‍ध विश्‍वास को,
                      लड़ो लड़ाई भ्रष्‍टाचार से ,
                      शिक्षा देवी हमें पुकारती है,
         हमे पढ़ना है, पढ़ना है,
         अशिक्षा को दूर करना है,
                      समाज की बेड़िया तोड़ना है ।

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लेखक

हीराराम मौलपुरिया

रैगरों का मोहल्‍ला, वि.पो.अ. खीरवर, जिला नागौर (राज.)

 

 

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