दलितो के मसीहा

Dalito ke masiha

जब से यह

जब से यह दुनिया बनी, तब से समय-समय पर कई दलित आंदोलन हुए है जिन्होने दलितो का मार्गदर्शन किया है । जिसमे मुख्यतः ‘‘महात्‍मा बुद्ध, गरू नानकजी ,संत कबीरदास, संत रैदास जी, महात्‍मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरू, छत्रपति साहू जी महाराज, रामास्वामी नायकर, बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर” के नाम प्रमुख है ।

दलित आन्‍दोलन की सशक्त शुरूआत संत शिरोमणी रैदास ने अपने उपदेशों के माध्यम से समाज मे एक नयी रीति विकसित की, तथा ब्राह्मणों के पाखण्‍डों को उजागर किया, उनके उपदेशो मे भगवान बुद्ध का प्रभाव साफ दिखाई देता है ।

उन्नीसवीं शताब्दी मे दलितों के उत्थान के लिए माली जाति मे जन्मे ज्योतिबा फुले ने समाज मे व्याप्त छुआछूत, अंधविश्वास, अमानवीय और धर्म के नाम पर अधर्म व पाखण्ड को समाप्त करने के लिए आजीवन संघर्ष किया व महिला शिक्षा पर विशेष बल दिया तथा सरकारी सेवाओ मे आरक्षण कि वकालत की, जिसे कोल्हापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपनी रियासत मे लागू किया तथा दलितो व पिछड़ों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए अभुतपूर्व कार्य किया और जिसके कारण उन्हे भारत मे आरक्षण का जनक कहा जाता है ।

दलितों को शिक्षित करने तथा उनमे शिक्षा का संचार करने के लिए नारायण गुरू ने ताउम्र प्रयास किये जिसके कारण उन्हे सामाजिक क्रान्ति के अग्रदुत के रूप मे जाना जाता है ।

1930 दक्षिण भारत मे दलित आंदोलन की शुरूआत अच्छे व्यवसायी परिवार मे जन्मे रामास्वामी नायकर पेरियार के द्वारा की गई जिन्हे हम पेरियार के नाम से जानते है । उन्होने देखा कि ब्राहमण द्वारा दलितो का शोषण किया जाता है और उन्हे नारकीय जीवन जीने पर मजबूर किया जाता। दक्षिण मे उनका आंदोलन दलितो को अपने अधिकार दिलाने मे सफल रहा ।

इसी दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक युवा बेरिस्टर का उदय हुआ पहली बार छत्रपति शाहूजी महाराज ने मंच से संबोधित करते हुए ऐलान किया की दलितो को अपना नेता मिल गया है जिसका नाम डॅा. बी. आर. अम्बेडकर है जो आगे चलकर सम्पूर्ण भारत में दलितों के नेता कहलायेंगे ।

डॅा अम्बेडकर ने अंग्रेजी सरकार के सामने दलितो की समस्याओ को प्रमुखता से रखा नतीजा अंग्रेजो द्वारा साम्प्रदायक पंचाक के द्वारा दलितो को पृथक निर्वाचन तथा दो वोट का अधिकार प्रदान किया गया, नतीजा गॉधीजी ने खुलकर इसका विरोध किया और पूना की जेल मे इसके विरूद्ध अनशन किया जिसका प्रभाव डॉ. अम्बेडकर को मजबुर करके पूना पेक्ट समझोता किया, जिसके कारण साम्प्रदायिक पंचाग के द्वारा दलितो को मिले अधिकार से हाथ धोना पड़ा और इसके तहत आरक्षण कि व्यवस्था कि गई, यह आरक्षण, स्वर्णो व दलितो के बीच हुऐ पूना पेक्ट समझौते का परिणाम था ।

दलितो के उत्थान के लिये जो ठोस प्रयास डॅा. बी.आर. अम्बेडकर ने किये जिसके कारण आज छुआछूत जैसी गम्भीर बीमारी जो 4 हजार साल से चल रही थी कुछ हद तक उसे मिटाने मे सफल हुए है । साथ ही आरक्षण की मजबुत व्यवस्था लागू कर दलितो को अपने अधिकार दिलाये । उसी का परिणाम है की आज दलित, आदिवासी, पिछड़े वंचित समाज के लोग कुछ सम्मान से जी रहे है । दलितो व आदिवासियो को सरकारी सेवाओं, तथा राजनैतिक सता मे आरक्षण की व्यवस्था कर उन्हे अपना हक प्रदान किया ।

वही पिछड़ी जातियो के लिए भारतीय संविधान मे अनुच्छेद 340 का प्रावधान कर आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे आगे चलकर ‘‘केलकर कमेटी ‘‘ तथा उसके बाद ‘‘मण्डल कमीशन‘‘ बनाकर उन्हे आरक्षण का लाभ पहुँचाया ।

कानून के विद्धान और बेरिस्टर डॉ. अम्बेडकर पिछड़ी जातियो को आरक्षण देने के लिए अनुच्छेद 340 को लागू करने तथा महिलाओ की स्थिति मे सुधार के लिए हिन्दू कोड बिल पास करने की वकालत के कारण डॉ. अम्बेडकर ने नेहरू मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दिया । जिससे उत्पन्न दबाव के कारण पिछड़ी जातियो के आरक्षण के लिए केलकर कमेटी बनी तथा हिन्दू कोड बिल भी अन्ततः पास किया गया ।

आज जो आरक्षण अन्य पिछड़ी जातियो को मिला है वह डॉ. अम्बेडकर द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के प्रावधान के तहत ही दिया गया है । महिलाओं की स्थिति जो हजारो सालो से दलितो के सम्मान ही थी उसे भी सुधारने के लिए उन्होने हिन्दु कोड बिल बनाया जो आगे चलकर कानून बना, उसी का परिणाम है की आज हमारे समाज मे महिलाओ की भागीदारी कई गुना बढी़ है तथा उनकी स्थिति में अभुतपूर्व सुधार हुआ है । इसलिए डॉ. अम्बेडकर को आधुनिक भारत के संस्थापक पितामह कहा जाता है ।

डॉ. अम्बेडकर चाहते थे की दलितो, आदिवासीयो, पिछड़ों की सत्ता मे भागीदारी हो, उसी कमी को पूरा करने के लिए पूरा जीवन न्योछावर करने वाले, पंजाब के रैदासिया जाति के मान्यवर काशीराम जिन्होने उत्तर भारत मे दलितो के लिए राजनैतिक सत्ता मे भागीदार तय की तथा उन्हे नेृतत्व प्रदान किया, जिसका जिताजागता उदाहरण उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन मायावती है जो आज दलितो कि पहचान है ।

 

कुशालचन्द्र रैगर, एडवोकेट

M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I

mahatma_budha

गौतम बुद्ध का मूल नाम ‘सिद्धार्थ’ था । सिंहली, अनुश्रुति, खारवेल के अभिलेख, अशोक के सिंहासनारोहण की तिथि, कैण्टन के अभिलेख आदि के आधार पर बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध की जन्म तिथि 563 ई.पूर्व स्वीकार की गयी है । इनका जन्म शाक्यवंश के राजा शुद्धोदन की रानी महामाया के गर्भ से लुम्बिनी में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था । शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में उनका जन्म हुआ । इसकी पहचान नेपाल की तराई में स्थित रूमिनदेई नामक ग्राम से की जाती है । सिद्धार्थ की माता मायादेवी उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गई थी । कहा जाता है कि फिर एक ऋषि ने कहा कि वे या तो एक महान राजा बनेंगे, या फिर एक महान साधु । बुद्ध शाक्य गोत्र के थे । बुद्ध को शाक्य मुनि भी कहते हैं । सिद्धार्थ अपने शुरुआती दिनों में रोगी, बूढा और मृत शरीर को देखकर उन्हें वितृष्णा हुई । राजपरिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने जीवन की सारी सुविधाआँ का त्याग कर सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हेतु बोधगया में कठोर तप किया और बुद्ध कहलाए । उनके समकालीन शक्तिशाली मगध साम्राज्य के शासक बिम्बिसार तथा अजातशत्रु ने बुद्ध के संघ का अनुसरण किया । बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, जापान, तिब्बत तथा चीन तक फैलाया । ज्ञान प्राप्ति पश्चात भगवान बुद्ध ने राजगीर, वैशाली, लौरिया तथा सारनाथ में अपना जीवन बिताया । उन्होने सारनाथ में अंतिम उपदेश देकर अपना शरीर त्याग दिया । आज बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
यह विधाता की लीला ही थी कि लुम्बिनी में जन्म लेने वाले बुद्ध को काशी में धर्म प्रवर्त्तन करना पड़ा । बुद्ध (सिद्धार्थ) के जन्म से पहले उनकी माता ने विचित्र सपने देखे थे । पिता शुद्धोदन ने ‘आठ’ भविष्य वक्ताओं से उनका अर्थ पूछा तो सभी ने कहा कि महामाया को अद्भुत पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी । यदि वह घर में रहा तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा और यदि उसने गृह त्याग किया तो संन्यासी बन जाएगा और अपने ज्ञान के प्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित कर देगा । शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा का प्रबंध किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे । अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया । एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर शहर भ्रमण के लिये निकले थे तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली । एक बार एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति को, एक बार एक रोगी को और एक बार एक शव को देख कर वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये । पर एक अन्य अवसर पर उन्होंने एक प्रसन्नचित्त संन्यासी को देखा । उसके चेहरे पर शांति और तेज़ की अपूर्व चमक विराजमान थी । सिद्धार्थ उस दृश्य को देख-कर अत्यधिक प्रभावित हुए ।
बुद्ध को ‘गौतम बुद्ध’, ‘महात्मा बुद्ध’ आदि नामों से भी जाना जाता है । वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं । बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है । इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन आज भी बढ़ रही है । वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे । उनके गुज़रने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया । आज बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं- ‘थेरवाद’, ‘महायान’ और ‘वज्रयान’ । बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
सिद्धार्थ के मन में निवृत्ति मार्ग के प्रति नि:सारता तथा निवृति मर्ण की ओर संतोष भावना उत्पन्न हो गयी । जीवन का यह सत्य सिद्धार्थ के जीवन का दर्शन बन गया । विवाह के दस वर्ष के उपरान्त उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । पुत्र जन्म का समाचार मिलते ही उनके मुँह से सहसा ही निकल पड़ा- ‘राहु’- अर्थात बंधन । उन्होंने पुत्र का नाम ‘राहुल’ रखा । इससे पहले कि सांसारिक बंधन उन्हें छिन्न-विच्छिन्न करें, उन्होंने सांसारिक बंधनों को छिन्न-भिन्न करना प्रारंभ कर दिया और गृहत्याग करने का निश्चय किया । एक महान रात्रि को 29 वर्ष के युवक सिद्धार्थ ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिये घर से बाहर निकल पड़े । कुछ विद्वानों का मत है कि गौतम ने यज्ञों में हो रही हिंसा के कारण गृहत्याग किया । कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार गौतम ने दूसरों के दुख को न सह सकने के कारण घर छोड़ा था ।
गृहत्याग करने के बाद सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में भटकने लगे । बिंबिसार, उद्रक, आलार एवम् कालाम नामक सांख्योपदेशकों से मिलकर वे उरुवेला की रमणीय वनस्थली में जा पहुँचे । वहाँ उन्हें कौंडिल्य आदि पाँच साधक मिले । उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर साधना प्रारंभ कर दी । किंतु उसमें असफल होने पर वे गया के निकट एक वटवृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गये और निश्चय कर लिया कि भले ही प्राण निकल जाए, मैं तब तक समाधिस्त रहूँगा, जब तक ज्ञान न प्राप्त कर लूँ । सात दिन और सात रात्रि व्यतीत होने के बाद, आठवें दिन वैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और उसी दिन वे तथागत हो गये । जिस वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ वह आज भी ‘बोधिवृक्ष’ के नाम से विख्यात है । ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी अवस्था 35 वर्ष थी । ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘तपस्सु’ तथा ‘काल्लिक’ नामक दो शूद्र उनके पास आये । महात्मा बुद्ध नें उन्हें ज्ञान दिया और बौद्ध धर्म का प्रथम अनुयायी बनाया ।
बोधगया से चल कर वे सारनाथ पहुँचे तथा वहाँ अपने पूर्वकाल के पाँच साथियों को उपदेश देकर अपना शिष्य बना दिया । बौद्ध परंपरा में यह उपदेश ‘धर्मचक्र प्रवर्त्तन’ नाम से विख्यात है । महात्मा बुद्ध ने कहा कि इन दो अतियों से सदैव बचना चाहिये-

काम सुखों में अधिक लिप्त होना तथा शरीर से कठोर साधना करना ।

उन्हें छोड़ कर जो मध्यम मार्ग मैंने खोजा है, उसका सेवन करना चाहिये ।

यही उपदेश इनका ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के रूप में पहला उपदेश था । अपने पाँच अनुयाइयों के साथ वे वाराणसी पहुँचे । यहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठि पुत्र को अपना अनुयायी बनाया तथा पूर्णरुप से ‘धर्म प्रवर्त्तन’ में जुट गये । अब तक उत्तर भारत में इनका काफ़ी नाम हो गया था और अनेक अनुयायी बन गये थे । कई वर्षों बाद महाराज शुद्धोदन ने इन्हें देखने के लिये कपिलवस्तु बुलवाना चाहा, लेकिन जो भी इन्हें बुलाने आता वह स्वयं इनके उपदेश सुन कर इनका अनुयायी बन जाता था । इनके शिष्य घूम-घूम कर इनका प्रचार करते थे ।
मनुष्य जिन दु:खों से पीड़ित है, उनमें बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे दु:खों का है, जिन्हें मनुष्य ने अपने अज्ञान, ग़लत ज्ञान या मिथ्या दृष्टियों से पैदा कर लिया हैं उन दु:खों का प्रहाण अपने सही ज्ञान द्वारा ही सम्भव है, किसी के आशीर्वाद या वरदान से उन्हें दूर नहीं किया जा सकता । सत्य या यथार्थता का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है । अत: सत्य की खोज दु:खमोक्ष के लिए परमावश्यक है । खोज अज्ञात सत्य की ही की जा सकती है । यदि सत्य किसी शास्त्र, आगम या उपदेशक द्वारा ज्ञात हो गया है तो उसकी खोज नहीं । अत: बुद्ध ने अपने पूर्ववर्ती लोगों द्वारा या परम्परा द्वारा बताए सत्य को नकार दिया और अपने लिए नए सिरे से उसकी खोज की । बुद्ध स्वयं कहीं प्रतिबद्ध नहीं हुए और न तो अपने शिष्यों को उन्होंने कहीं बांधा । उन्होंने कहा कि मेरी बात को भी इसलिए चुपचाप न मान लो कि उसे बुद्ध ने कही है । उस पर भी सन्देह करो और विविध परीक्षाओं द्वारा उसकी परीक्षा करो । जीवन की कसौटी पर उन्हें परखो, अपने अनुभवों से मिलान करो, यदि तुम्हें सही जान पड़े तो स्वीकार करो, अन्यथा छोड़ दो । यही कारण था कि उनका धर्म रहस्याडम्बरों से मुक्त, मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत एवं हृदय को सीधे स्पर्श करता था ।
भगवान बुद्ध प्रज्ञा व करुणा की मूर्ति थे । ये दोनों गुण उनमें उत्कर्ष की पराकाष्ठा प्राप्त कर समरस होकर स्थित थे । इतना ही नहीं, भगवान बुद्ध अत्यन्त उपायकुशल भी थे । उपाय कौशल बुद्ध का एक विशिष्ट गुण है अर्थात वे विविध प्रकार के विनेय जनों को विविध उपायों से सन्मार्ग पर आरूढ़ करने में अत्यन्त प्रवीण थे । वे यह भलीभाँति जानते थे कि किसे किस उपाय से सन्मार्ग पर आरूढ़ किया जा सकता है । फलत: वे विनेय जनों के विचार, रूचि, अध्याशय, स्वभाव, क्षमता और परिस्थिति के अनुरूप उपदेश दिया करते थे । भगवान बुद्ध की दूसरी विशेषता यह है कि वे सन्मार्ग के उपदेश द्वारा ही अपने जगत्कल्याण के कार्य का सम्पादन करते हैं, न कि वरदान या ऋद्धि के बल से, जैसे कि शिव या विष्णु आदि के बारे में अनेक कथाएँ पुराणों में प्रचलित हैं । उनका कहना है कि तथागत तो मात्र उपदेष्टा हैं, कृत्यसम्पादन तो स्वयं साधक व्यक्ति को ही करना है । वे जिसका कल्याण करना चाहते हैं, उसे धर्मों (पदार्थों) की यथार्थता का उपदेश देते थे । भगवान बुद्ध ने भिन्न-भिन्न समय और भिन्न-भिन्न स्थानों में विनेय जनों को अनन्त उपदेश दिये थे । सबके विषय, प्रयोजन और पात्र भिन्न-भिन्न थे । ऐसा होने पर भी समस्त उपदेशों का अन्तिम लक्ष्य एक ही था और वह था विनेय जनों को दु:खों से मुक्ति की ओर ले जाना । मोक्ष या निर्वाण ही उनके समस्त उपदेशों का एकमात्र रस है ।
बौद्ध धर्म का प्रचार बुद्ध के जीवन काल में ही काफ़ी हो गया था, क्योंकि उन दिनों कर्मकांड का ज़ोर काफ़ी बढ़ चुका था और पशुओं की हत्या बड़ी संख्या में हो रही थी । इन्होंने इस निरर्थक हत्या को रोकने तथा जीव मात्र पर दया करने का उपदेश दिया । प्राय: 44 वर्ष तक बिहार तथा काशी के निकटवर्त्ती प्रांतों में धर्म प्रचार करने के उपरांत अंत में कुशीनगर के निकट एक वन में शाल वृक्ष के नीचे वृद्धावस्था में इनका परिनिर्वाण अर्थात शरीरांत हुआ । मृत्यु से पूर्व उन्होंने कुशीनारा के परिव्राजक सुभच्छ को अपना अन्तिम उपदेश दिया । कुशीनगर बुद्ध के महापरिनिर्वाण का स्थान है । पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले से 51 किमी की दूरी पर स्थित है । बौद्ध ग्रंथ महावंश में कुशीनगर का नाम इसी कारण कुशावती भी कहा गया है । बौद्ध काल में यही नाम कुशीनगर या पाली में कुसीनारा हो गया । एक अन्य बौद्ध किंवदंती के अनुसार तक्षशिला के इक्ष्वाकु वंशी राजा तालेश्वर का पुत्र तक्षशिला से अपनी राजधानी हटाकर कुशीनगर ले आया था । उसकी वंश परम्परा में बारहवें राजा सुदिन्न के समय तक यहाँ राजधानी रही । इनके बीच में कुश और महादर्शन नामक दो प्रतापी राजा हुए जिनका उल्लेख गौतम बुद्ध ने किया था । भगवान बुद्ध ने जो अंतिम शब्द अपने मुख से कहे थे, वे इस प्रकार थे-

“हे भिक्षुओं, इस समय आज तुमसे इतना ही कहता हूँ कि जितने भी संस्कार हैं, सब नाश होने वाले हैं, प्रमाद रहित हो कर अपना कल्याण करो ।”

जब वे अस्सी वर्ष के थे । तब कुशी नगर में 483 ई.पू. में उन्होंने देहोत्सर्ग (महापरिनिर्वाण) किया ।
बुद्ध का उल्लेख इन लेखों में भी है :- बिम्बिसार, बोधगया, मधुवन, पिपरावा एवं पाटलिपुत्र ।
भगवान बुद्ध के अन्य नाम :- विनायक, सुगत, धर्मराज, तथागत, समन्तभद्र, मारजित्, भगवत्, मुनि, लोकजित्, जिन, षडभिज्ञ, दशबल, अद्वयवादिन्, सर्वज्ञ, श्रीघन, शास्तृ, मुनीन्द्र ।

۰̮̑●̮̑۰★⋰⋱☆⋰⋱★⋰⋱☆⋰⋱★⋰⋱☆⋰⋱★۰̮̑●̮̑۰

एक बार विश्व के विभिन्न धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए एक युवा ब्रह्मचारी संसार भ्रमण पर निकला । देश-विदेश का भ्रमण कर और वहां के ग्रंथों का अध्ययन कर जब वह अपने देश लौटा, तो सबके पास इस बात की शेखी बघारने लगा कि उसके समान अधिक ज्ञानी-विद्वान् संसार में और कोई नहीं । जो कोई भी उस व्यक्ति के पास जाता, वह उससे प्रश्न किया करता कि क्या उसने, उससे बढ़कर कोई विद्वान् देखा है?
यह बात भगवान् बुद्ध के कानों में भी जा पहुंची । भगवान् बुद्ध ब्राह्मण-वेश में उस व्यक्ति के पास गये । ब्रह्मचारी ने उनसे प्रश्न किया, ”तुम कौन हो, ब्राह्मण?”
”अपनी देह और मन पर जिसका पूर्ण अधिकार है, मैं ऐसा एक तुच्छ मनुष्य हूं ।” बुद्धदेव ने जवाब दिया ।
”भलीभांति स्पष्ट करो, ब्राह्मण! मेरे तो कुछ भी समझ में न आया ।” वह अहंकारी बोला ।
बुद्धदेव बोले, ”जिस तरह कुम्हार घड़े बनाता है, नाविक नौकाएं चलाता है, धनुर्धारी बाण चलाता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्य बजाता है और विद्वान् वाद-विवाद में भाग लेता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुष स्वयं पर ही शासन करता है ।”
”ज्ञानी पुरुष भला स्वयं पर कैसे शासन करता है?” – ब्रह्मचारी ने पुन: प्रश्न किया ।
”लोगों द्वारा स्तुति-सुमनों की वर्षा किये जाने पर अथवा निंदा के अंगार बरसाने पर भी ज्ञानी पुरुष का मन शांत ही रहता है । उसका मन सदाचार, दया और विश्व-प्रेम पर ही केन्द्रित रहता है, अत: प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई असर नहीं पड़ता । यहीं वजह है कि उसके चित्तसागर में शांति की धारा बहती रहती है ।”
उस ब्रह्मचारी ने जब स्वयं के बारे में सोचा, तो उसे आत्मग्लानि हुई और बुद्धदेव के चरणों पर गिरकर बोला, ”स्वामी, अब तक मैं भूल में था । मैं स्वयं को ही ज्ञानी समझता था, किंतु आज मैंने जाना कि मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है ।”
”हां, ज्ञान का प्रथम पाठ आज ही तुम्हारी समझ में आया है, बंधु! और वह है नम्रता । तुम मेरे साथ आश्रम में चलो और इसके आगे के पाठों का अध्ययन वहीं करना ।”

(संदर्भ- प्रेरक प्रसंग, लेखक- शरद चन्द्र पेंढारकर)

 

۰̮̑●̮̑۰★⋰⋱☆⋰⋱★⋰⋱☆⋰⋱★⋰⋱☆⋰⋱★۰̮̑●̮̑۰

बौद्ध धर्म

 

बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे । वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे । उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला, और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया । आज, बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं: थेरवाद, महायानऔर वज्रयान । बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है ।
“बुद्ध” वे कहलाते हैं, जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो । इस पहचान को बोधि नाम दिया गया है । जो भी “अज्ञानता की नींद” से जागते हैं, वे “बुद्ध” कहलाते हैं । कहा जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं – उनके पहले बहुत सारे थे और भविष्य में और होंगे । उनका कहना था कि कोई भी बुद्ध बन सकता है अगर वह उनके “धर्म” के अनुसार एक धार्मिक जीवन जीए और अपनी बुद्धि को शुद्ध करे । बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है इस दुःख भरी स्थिति का अंत । “मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ – दुःख और दुःख निरोध” (बुद्ध) । बौद्ध धर्म के अनुयायी आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीकर अज्ञानता और दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने की कोशिश करते हैं ।
सिद्धांत
गौतम बुद्ध के गुज़रने के बाद, बौद्ध धर्म के अलग-अलग संप्रदाय उपस्थित हो गये हैं, परंतु इन सब के कुछ सिद्धांत मिलते हैं ।

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि कोई भी घटना केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान होती है । प्राणियों के लिये, इसका अर्थ है कर्म और विपाक (कर्म के परिणाम) के अनुसार अनंत संसार का चक्र । क्योंकि सब कुछ अनित्य और अनात्मं (बिना आत्मा के) होता है, कुछ भी सच में विद्यमान नहीं है । हर घटना मूलतः शुन्य होती है । परंतु, मानव, जिनके पास ज्ञान की शक्ति है, तृष्णा को, जो दुःख का कारण है, त्यागकर, तृष्णा में नष्ट की हुई शक्ति को ज्ञान और ध्यान में बदलकर, निर्वाण पा सकते हैं ।
चार आर्य सत्य
१. दुःख : इस दुनिया में सब कुछ दुःख है । जन्म में, बूढे होने में, बीमारी में, मौत में, प्रियतम से दूर होने में, नापसंद चीज़ों के साथ में, चाहत को न पाने में, सब में दुःख है ।
२. दुःख प्रारंभ : तृष्णा, या चाहत, दुःख का कारण है और फ़िर से सशरीर करके संसार को जारी रखती है ।
३. दुःख निरोध : तृष्णा से मुक्ति पाई जा सकती है ।
४. दुःख निरोध का मार्ग : तृष्णा से मुक्ति आर्य अष्टांग मार्ग के अनुसार जीने से पाई जा सकती है ।
बुद्ध का पहिले धर्मोपदेश, जो उन्होने अपने साथ के कुछ साधुओं को दिया था, इन चार आर्य सत्यों के बारे में था ।

 

आर्य अष्टांग मार्ग

बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य स्त्य का आर्य अष्टाण्ग मार्ग है दुःख निरोध पाने का रास्ता । गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए –
१. सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना ।
२. सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना ।
३. सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूट न बोलना ।
४. सम्यक कर्म : हानिकारक कर्में न करना ।
५. सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना ।
६. सम्यक प्रयास : अपने आप सुधारने की कोशिश करना ।
७. सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना ।
८. सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना ।
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है । और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है । मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शीला, और समाधि ।
बोधि
गौतम बुद्ध से पाई गई ज्ञानता को बोधि कहलाते है । माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है । सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ, और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है । इस समय, लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा, और आत्मां में विश्वास सब गायब हो जाते है । बोधि के तीन स्तर होते है : श्रावकबोधि, प्रत्येकबोधि, और सम्यकसंबोधि । सम्यकसंबोधि बौध धर्म की सबसे उन्नत आदर्श मानी जाती है ।
दर्शन
क्षणिकवाद :- इस दुनिया में सब कुछ क्षणिक है और नश्वर है । कुछ भी स्थायी नहीं । परन्तु वेदिक मत से विरोध है ।
अनात्मवाद :- आत्मा नाम की कोई स्थायी चीज़ नहीं । जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है ।
अनीश्वरवाद :- बुद्ध ईश्वर की सत्ता नहीं मानते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम पर चलती है । पर अन्य जगह बुद्ध ने सर्वोच्च सत्य को अवर्णनीय कहा है । कुछ देवताओं की सत्ता मानी गयी है, पर वो ज़्यादा शक्तिशाली नहीं हैं ।

 

शून्यतावाद :- शून्यता महायान बौद्ध संप्रदाय का प्रधान दर्शन है ।
साम्प्रदाय :- बौद्ध धर्म में दो मुख्य साम्प्रदाय हैं –
थेरवाद – थेरवाद या हीनयान बुद्ध के मौलिक उपदेश ही मानता है ।
महायान – महायान बुद्ध की पूजा करता है । ये थेरावादियों को “हीनयान” (छोटी गाड़ी) कहते हैं ।

(साभार – विकिपीडिया)

Guru_Nanak

 

संत शिरोमणि गुरु नानकदेव सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरु थे । लगभग छियालीस वर्षों तक एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूमकर उन्होंने अपने उपदेशों और संदेशों से लोगों का प्रेम और विश्वास पाया । उनके विचार इतने व्यापक थे कि सभी धर्मों के लोग उनका सम्मान करते थे ।

गुरु नानक देवजी का प्रकाश (जन्म) 15 अप्रैल 1469 ई. (वैशाख सुदी 3, संवत्‌ 1526 विक्रमी) में लाहौर के निकट तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ । यह स्थान अब पाकिस्तान में है और ‘ननकाना साहब’ के नाम से जाना जाता है । तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर जिले से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है । सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है । नानकदेवजी के जन्म के समय प्रसूति गृह अलौकिक ज्योत से भर उठा । शिशु के मस्तक के आसपास तेज आभा फैली हुई थी, चेहरे पर अद्भुत शांति थी । गाँव के पुरोहित पंडित हरदयाल ने जब बालक के बारे में सुना तो उन्हें समझने में देर न लगी कि इसमें जरूर ईश्वर का कोई रहस्य छुपा हुआ है । पिता बाबा कालूचंद्र बेदी और माता त्रिपाता ने बालक का नाम नानक रखा । नानक जी की माँ अत्यंत धार्मिक विचारों की महिला थीं । उनके मन में गरीब और असहाय लोगों के लिए बड़ी सहानुभूति थी । बालक नानक के लालन पालन और शिक्षा-दीक्षा का विशेष ध्यान रखा गया । पंडित गोपाल दास से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद नानक जी ने संस्कृत तथा प्राचीन शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की । उसके बाद मौलवी ने उन्हें फारसी- अरबी और इस्लाम धर्म के सिद्धांतों की शिक्षा दी । बचपन से ही नानक जी विलक्षण प्रतिभा के धनी तथा अत्यंत जिज्ञासु प्रवत्ति के थे । मौलवी या पंडित द्वारा दी जाने वाली शिक्षा को वे बड़ी जल्दी ग्रहण कर लिया करते थे । वे किसी भी बात को पूरी तरह समझे बिना उसे स्वीकार नहीं करते थे ।

एक दिन पंडित गोपालदास ने नानक जी को ‘ॐ’ का उच्चारण करने के लिए कहा । नानकजी ने ‘ॐ’ का उच्चारण करने के बाद उसका अर्थ भी पूछा । अचानक यह प्रश्न सुनकर पंडित गोपालदास चकित रह गए । वे तुरंत कोई उत्तर नहीं दे पाए । बाद में कुछ सोचकर उन्होंने नानकजी को बताया, “ॐ उस परमपिता परमात्मा का नाम है, जो हम सभी को उत्पन्न करता है और सबका पालनहार है ।” यह सुनकर नानकजी ने तुरंत कहा, “मैं उसी परमपिता परमात्मा को ‘सत करतार’ कहता हूँ । वही सिरजनहार है ।” नानकजी के मुँह से इतने विलक्षण ज्ञान की बात सुनकर पंडित गोपालदास के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । नानकजी की विलक्षण प्रतिभा और उनके आध्यात्मिक ज्ञान से वे बड़े प्रभावित हुए । नानकजी को बचपन से ही साधु-सन्यासियों का सानिद्ध्य सुखद लगता था । साधु-सन्यासियों को देखकर वे उनके पास पहुँच जाया करते थे, उनके प्रवचन बड़ी रूचि के साथ सुनते थे और उनसे जीवन-दर्शन, आत्मा-परमात्मा, माया-मुक्ति, पुनर्जन्म आदि दार्शनिक विषयों से संबंधित प्रश्न भी पूछते थे । बीच-बीच में साधु-संतों की संगत में जाते रहने के कारण नानकजी की शिक्षा नियमित रूप से नहीं चल पायी ।

नानकजी को अब सांसारिक मोह-माया के बंधन झूठे लगने लगे । परिवार के लोगों, रिश्तेदारों व मित्रों में वे रूचि नहीं लेते थे । उनका अधिकांश समय साधु-संतों और ग़रीबों की सेवा करने, प्रवचन सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने में व्यतीत होने लगा । ऐसे कार्यों से उन्हें बहुत आनंद और संतोष प्राप्त होता था । नानकजी के पिता को उसके भविष्य की चिंता रहने लगी । वे चाहते थे कि उनका बेटा अच्छी तरह पढ़ लिखकर कोई व्यवसाय करे और अपनी गृहस्थी बसाए । यह सोचकर उन्होंने नानकजी का मन पारिवारिक कार्यों की तरफ मोड़ने का प्रयास शुरू कर दिया । उन्होंने नानकजी को जंगल में पशु चराने का काम सौंप दिया ।

नानकजी एक आज्ञाकारी बालक थे । अतः वे जंगल में पशु चराने के लिए प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गए । जंगल में नानक जी को अपने अनुकूल शांत व स्वच्छ वातावरण मिला । ऐसे में उन्हें एकांत में ‘सत करतार’ का ध्यान लगाने का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ । वे अक्सर जंगल में अपने पशुओं को चरता छोड़कर स्वयं एकांत में बैठकर ध्यान में मग्न हो जाते थे । एक दिन जंगल में पशुओ को चराते समय नानक जी एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए और सत करतार का ध्यान करने लगे । थोड़ी देर बाद उन्हें झपकी आने लगी और वे वहीं सो गए । सोते समय धीरे-धीरे पेड़ की छाया उनके चेहरे से हटने लगी और चेहरे पर धूप पड़ने लगी । तभी अचानक एक सांप वहां आया । उसने अपना फन फैलाकर नानकजी के चेहरे पर छाया कर दी । जब तक नानकजी सोते रहे तब तक वह सांप तेज धूप में अपना फन फैलाकर उनके चेहरे पर छाया किये बैठे रहा । उसके बाद जैसे ही उनकी नींद खुली, सांप शांति से झाड़ियों में चला गया । उस समय नगर का शाशक अपने घोड़े पर सवार होकर उधर से गुजर रहा था । उसने रूककर यह दृश्य अपनी आँखों से देखा तो समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है । धीरे-धीरे यह बात चारों ओर फ़ैल गयी । दूर-दूर के लोग भी नानकजी की विलक्षणता से परिचित होने लगे । अब लोग उन्हें चमत्कारी बालक मानने लगे ।

कुछ दिन बाद नानकजी ने पशुओं को चराने का काम बंद कर दिया और घर ही में रहने लगे । घर में वे अकसर गुमसुम से रहते थे । उनके पिता को यह सब अच्छा नहीं लगता था । वे नानकजी का ध्यान सांसारिक कार्यों में लगाना चाहते थे । यह सोचकर उन्होंने नानकजी को खेती-बाडी के काम में लगाना चाहा; परन्तु इस काम में वे अपनी चिंता छोड़कर दूसरों के बारे में ही सोचा करते थे । उन्हें तो साधु-संतों और दीन-दुखियों की सेवा करने में ही आनंद आता था । एक दिन पिता ने नानकजी को अपने पास बुलाकर समझाया कि इस प्रकार के कार्यों में कोई फायदा नहीं है; तुम कोई व्यापार करो, ताकि कुछ कमाई हो सके । उन्होंने नानकजी को बीस रूपये देते हुए कहा, “ये लो बीस रूपये और इनसे कोई खरा सौदा करके आओ, जिससे अच्छा मुनाफा हो ।” नानकजी मुनाफा देनेवाले व्यापार की तलाश में निकल पड़े । कुछ दूर चलने के बाद मार्ग में उन्हें साधु-फकीरों का एक दल मिल गया । वे साधु कई दिनों से भूखे थे और इस कारण बेहाल हो रहे थे । उन्हें इस स्थिति में देखकर नानकजी को बड़ी दया आयी । उन्होंने सोचा, ‘इन भूखे साधु-फकीरों को भोजन करा दिया जाए तो इससे खरा सौदा और क्या हो सकता है । पिताजी ने भी कोई खरा सौदा करने के लिए ही बीस रूपये दिए हैं ।’ यह सोचकर उन्होंने उन रुपयों से साधु-फकीरों को भोजन करा दिया और प्रसन्न भाव से घर लौट आये । घर पहुँचने पर जब पिताजी ने पूछा तो नानकजी ने सब कुछ सच-सच बता दिया और कहा कि मुझे इससे खरा सौदा दूसरा नहीं सूझा, इसलिए मैंने यही सौदा कर लिया । नानकजी की बात सुनकर उनके पिताजी को गुस्सा आया । अब उन्हें अपने बेटे के भविष्य को लेकर और अधिक चिंता होने लगी ।

जिस समय नानकजी का जन्म हुआ था उस समय हिन्दू और इसलाम धर्मों का पतन हो रहा था । हिन्दू लोग वेदों और उपनिषदों के मार्ग को छोड़कर पाखण्ड का प्रचार कर रहे थे । हिन्दू समाज में वर्ण-व्यवस्था कठोर बन चुकी थी । चारों और जात-पात का भेदभाव फैला हुआ था । जब नानकजी ने देखा कि मनुष्य जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी कर्मकांड से बंधा हुआ है तो उन्हें बहुत दुःख हुआ । उन्होंने उन ब्राह्मणों का विरोध किया जो स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कर्मकांडों का ढोंग करते थे । नानकजी ने समाज में फैले इस प्रकार के आडम्बरों को दूर करने का संकल्प लिया । वे लोगों को प्रेम और भाईचारे का सन्देश देने लगे । उन्होंने लोगों को व्यर्थ के आडम्बरों से ऊपर उठकर सत करतार की उपासना करने के लिए प्रेरित किया ।

नानकजी की साधु-प्रवत्ति से अब उनके पिता बहुत परेशान रहने लगे । नानकजी को सांसारिक बंधन में बांधने का भरपूर प्रयास किया गया । उन्होंने सोचा कि नानकजी गृहस्थी के बंधन में बंधने के बाद अपनी जिम्मेदारियों को शायद समझने लगें । यही सोचकर उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में नानकजी का विवाह कर दिया । नानकजी के दो पुत्र भी हुए । नानकजी का विवाह करके उनके पिता ने सोचा कि अब वे गृहस्थी में फंसकर सांसारिक कार्यों में रूचि लेने लगेंगे; परन्तु वास्तव में नानकजी का जन्म तो मानव जाति के उद्धार के लिए हुआ था । परिवार का मोह भला उन्हें अपने पथ से किस प्रकार विचलित कर सकता था । उनकी जीवनधारा में कोई परिवर्तन नहीं आया । वे निरंतर परम सत्य की खोज के मार्ग पर चलते रहे । धीरे-धीरे उनके साथियों व अनुनायियों की संख्या भी बढ़ने लगी ।

नानकजी ने मनुष्य को अन्याय, अत्याचार और शोषण से बचाने तथा उनके भीतर आध्यात्मिक ज्योति जगाने के लिए लम्बी-लम्बी यात्रायें शुरू कीं । उन्होंने अपने जीवन काल में चार बड़ी यात्रायें की, जिन्हें ‘गुरु नानक की उदासियाँ’ कहा जाता है । वे अपनी यात्रा में लोगों को जात-पात, धर्म, संप्रदाय और ऊंच-नीच के भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम और आपसी भाई-चारे के मार्ग पर चलने का सन्देश देते थे । अब तक वे लोगों के बीच में ‘गुरु नानक’ के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे । गुरु नानकजी ने उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम् तक की यात्रा की । वे अफगानिस्तान, बर्मा, तुर्की और श्रीलंका भी गए । वे जहाँ-जहाँ भी गए वहां-वहां उन्होंने जाति, धर्म और वर्ण की सीमाओं को लांघकर लोगों में परस्पर समन्वय स्थापित किया । उन्होंने राम-रहीम और अल्लाह-ईश्वर के भेद को ‘पाखंड’ और सम्पूर्ण मानव जाति को ‘एक ही परमात्मा की संतान’ बताया ।

गुरु नानक गाँव-देहात घूमते-घूमते लाहौर पहुंचे । वहां दुनीचंद नामक एक प्रसिद्ध व्यापारी ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया । दुनीचंद को अपनी धन-दौलत का बहुत अभिमान था । गुरु नानक के सामने भी वह अपनी धन-दौलत का बखान करने लगा । उसकी बातें सुनकर गुरु नानक ने उसे एक सुई देते हुए कहा, “इसे जरा संभालकर रख लो, परलोक में इसे मुझे लौटा देना ।” उनकी बात सुनकर दुनीचंद ने आश्चर्यचकित होकर कहा, “भला परलोक में इसे कैसे ले जा पाऊंगा!” “जिस तरह तुम अपना सारा धन व दौलत लेकर जाओगे उसी तरह इस सुई को भी लेते जाना ।” गुरु नानक की ज्ञानपूर्ण बात सुनकर दुनीचंद की आँखें खुल गईं । वह उनके चरणों में गिर पड़ा । धन-दौलत का उसे जो अभिमान था, वह एक क्षण में चूर-चूर हो गया । गुरु नानक का मानना था कि अहंकार अनेक प्रकार के बुरे कार्यों को जन्म देता है; इसलिए मनुष्य को इसका त्याग करके सच्चाई, प्रेम और भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए ।

लोगों को सच्चाई, समानता और सहिष्णुता का मार्ग दिखाते हुए एक बार गुरु नानक मदीना गए । वहां एक निश्चित समय पर वे ‘काबा’ की ओर पैर पसारकर सो गए । तभी एक मुसलमान ने आकर उन्हें झकझोरकर जगाया और अपमानित करते हुए कहा, “अँधा है क्या? तुझे इतना भी दिखाई नहीं देता कि उधर ‘काबा’ है, जिधर तू पैर पसारकर सो रहा है!” उसकी बात सुनकर गुरु नानक ने हँसते हुए कहा, “भाई, मुझे तो सब और काबा-ही-काबा दिखाई दे रहा है । तुम्हे जिस ओर काबा न दिखाई दे रहा हो, कृपा करके उधर ही मेरा पैर कर दो ।” गुरु नानक की बात सुनकर वहां उपस्थित सभी मुसलमान एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे । कुछ देर बाद दो मुसलमान आगे बढे और गुरु नानक के पैर घसीटकर विपरीत दिशा में घुमाने लगे । तभी एक चमत्कार हुआ । जिस ओर उनका पैर घुमाया जा रहा था, उसी ओर काबा भी घूम गया । यह देखकर वहां उपस्थित मुसलमान दंग रह गए । गुरु नानक ने उन्हें समझाते हुए कहा, “खुदा तो इस सृष्टि के कण-कण में निवास करता है । वह हर दिशा में है ।”

इस प्रकार स्थान-स्थान पर घूमते हुए और लोगों को उपदेश देते हुए सन १५२१ में गुरु नानक करतारपुर वापस आ गए । उस समय वे बावन वर्ष के थे । अब उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के संबंध में विचार करना शुरू किया । काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने अपने परम-शिष्य ‘भाई लहणा’ को गुरु गद्दी सौंप दी । जब गुरु नानक को अपनी जीवन यात्रा का अंतिम समय निकट आता जान पड़ा तो उन्होंने अपनी सारी संगत को इकट्ठा किया । उन्होंने अपने परम शिष्य भाई लहणा को तिलक लगाकर अपनी गद्दी पर बिठाया और संगत को संबोधित करते हुए कहा, ” भाई लहणा मेरा ही दूसरा रूप है । आज से मैं इसके शरीर के अंगों में वास करूंगा ।” इस प्रकार भाई लहणा गुरु अंगद देव के नाम से सिखों के दूसरे गुरु बन गए । २२ सितम्बर, १५३९ को गुरु नानक देव ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया । गुरु नानक देव ने भटकी हुई मानवता का पथ-प्रदर्शन किया और प्रेम, सच्चाई तथा सत्कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी । उनकी वाणी ‘गुरु ग्रन्थ साहब’ में ‘महला १’ के शीर्षक से दर्ज है ।

 

दस सिद्धांत

गुरूनानक देव जी ने अपने अनु‍यायियों को जीवन के दस सिद्धांत दिए थे । यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है ।

1. ईश्वर एक है ।

2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो ।

3. जगत का कर्ता सब जगह और सब प्राणी मात्र में मौजूद है ।

4. सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता ।

5. ईमानदारी से मेहनत करके उदरपूर्ति करना चाहिए ।

6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएँ ।

7. सदा प्रसन्न रहना चाहिए । ईश्वर से सदा अपने को क्षमाशीलता माँगना चाहिए ।

8. मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए ।

9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं ।

10. भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है ।

 

इनके जीवन से जुड़े प्रमुख गुरुद्वारा साहिब

 

1. गुरुद्वारा कंध साहिब- बटाला (गुरुदासपुर) गुरु नानक का यहाँ बीबी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत्‌ 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ था । यहाँ गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता है ।

2. गुरुद्वारा हाट साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) गुरुनानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ शाही भंडार के देखरेख की नौकरी प्रारंभ की । वे यहाँ पर मोदी बना दिए गए । नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे । यहीं से नानक को ‘तेरा’ शब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था ।

3. गुरुद्वारा गुरु का बाग- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) यह गुरु नानकदेवजी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था ।

4. गुरुद्वारा कोठी साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में ग़ड़बड़ी की आशंका में नानकदेवजी को जेल भिजवा दिया । लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानकदेवजी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया ।

5.गुरुद्वारा बेर साहिब- सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मर्दाना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया । सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतिनाम । गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है ।

6. गुरुद्वारा अचल साहिब- गुरुदासपुर अपनी यात्राओं के दौरान नानकदेव यहाँ रुके और नाथपंथी योगियों के प्रमुख योगी भांगर नाथ के साथ उनका धार्मिक वाद-विवाद यहाँ पर हुआ । योगी सभी प्रकार से परास्त होने पर जादुई प्रदर्शन करने लगे । नानकदेवजी ने उन्हें ईश्वर तक प्रेम के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है, ऐसा बताया ।

7. गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक- गुरुदासपुर जीवनभर धार्मिक यात्राओं के माध्यम से बहुत से लोगों को सिख धर्म का अनुयायी बनाने के बाद नानकदेवजी रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात सन्‌ 1539 ई. में परम ज्योति में विलीन हुए ।

 

जीवन की घटनाएं

भादों की अमावस की धुप अँधेरी रात में बादलों की डरावनी गड़गड़ाहट, बिजली की कौंध और वर्षा के झोंके के बीच जबकि पूरा गाँव नींद में निमग्न था, उस समय एक ही व्यक्ति जाग रहा था, ‘नानक’ । नानक देर रात तक जागते रहे और गाते रहे । आधी रात के बाद माँ ने दस्तक दी और कहा- ‘बेटे, अब सो भी जाओ । रात कितनी बीत गई है ।’

नानक रुके, लेकिन उसी वक्त पपीहे ने शोर मचाना शुरू कर दिया । नानक ने माँ से कहा- ‘माँ अभी तो पपीहा भी चुप नहीं हुआ । यह अब तक अपने प्यारे को पुकार रहा है । मैं कैसे चुप हो जाऊँ जब तक यह गाता रहेगा, तब तक मैं भी अपने प्रिय को पुकारता रहूँगा ।

नानक ने फिर गाना प्रारंभ कर दिया । धीरे-धीरे उनका मन पुनः प्रियतम में लीन हो गया । कौन है ये नानक, क्या केवल सिख धर्म के संस्थापक । नहीं, मानव धर्म के उत्थापक । क्या वे केवल सिखों के आदि गुरु थे? नहीं, वे मानव मात्र के गुरु थे । पाँच सौ वर्षों पूर्व दिए उनके पावन उपदेशों का प्रकाश आज भी मानवता को आलोकित कर रहा है ।

सिखों के दस गुरू हैं ।

 

(साभार – विकिपीडिया)

sant ravi das ji

 

महान संत रविदास भारत के कई संतों ने समाज में भाईचारा बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है । ऐसे संतों में संत कुलभूषण कवि रैदास उन महान् सन्तों में अग्रणी थे । वे बचपन से समाज के बुराइयों को दूर करने के प्रति अग्रसर रहे । उनकी लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग था, जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है । उन्होंने समाज में फैली छुआ-छूत, ऊँच-नीच दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया । इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है । मधुर एवं सहज संत रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।

प्राचीनकाल से ही भारत में विभिन्न धर्मों तथा मतों के अनुयायी निवास करते रहे हैं । इन सब में मेल-जोल और भाईचारा बढ़ाने के लिए सन्तों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है । ऐसे सन्तों में रैदास का नाम अग्रगण्य है । रविदास कबीरदास के समकालीन थे । रविदास भी स्वामी रामानन्द जी के शिष्य थे । रैदास ने अपनी जीविका के लिये पैतृक व्यवसाय को ही अपनाया था । *गुरु ग्रंथ साहिब* में धन्ना भगत को रविदास का समकालीन बताया है । धन्ना ने रविदास को अपना ज्येष्ठ कहा है और आदरपूर्वक उनका उल्लेख किया है । *गुरु ग्रंथ साहिब* में रविदास की वाणियों का भी संकलन है । रविदास ने मथुरा, प्रयाग, वृन्दावन तथा हरिद्वार आदि तीर्थ स्थानों की यात्राएँ की थीं । रविदास की योग्यता एवं महत्ता से प्रभावित होकर मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु स्वीकारा था और उनसे दीक्षा ली । रविदास मूल रूप से एक भक्त और साधक थे । रैदास की वाणियों और पदों में दैन्य भावना शरणागत, ध्यान की तल्लीनता तथा आत्म निवेदन की भावना प्रमुखता से पाई जाती है । भक्ति के सहज एवं सरल मार्ग को इन्होंने अपनाया था । सत्संग को भी इन्होंने महत्त्व दिया है । रविदास ने अपने ज्ञान तथा उच्च विचारों से समाज को लाभान्वित किया ।

 

जीवन

सन्त रविदास (रैदास) का जन्म एक चर्मकार परिवार में माघ पूर्णिमा को काशी के निकट माण्डूर नामक स्थान पर सन् 1398 में हुआ था । उनके पिता का नाम संतो़ख दास (रग्घु), माता का नाम कर्मा देवी तथा पत्नी का नाम लोना बताया जाता है । आज से लगभग छ: सौ पचास वर्ष पहले भारतीय समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था । उसी समय रैदास जैसे समाज-सुधारक संत का जन्‍म इस धरती पर हुआ । रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था । जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया । वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे । उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे । प्रारम्भ से ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था । साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था । वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे । उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे । कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया । रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे ।

 

स्वभाव

उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है । एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे । रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है । यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा । गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है । मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है । कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि –

” मन चंगा तो कठौती में गंगा । ”

वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे । उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं । वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है । उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है । अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया । अपने एक भजन में उन्होंने कहा है-

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै ।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै ।।

उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है । अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है । इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है । रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी । इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था । उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे । उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये । कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं ।

रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया । आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं । उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है । विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं । इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं ।

 

Line

ऐसे महान संत को शत् शत् नमन

 

Line

 

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं ।

तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि ।।

हिन्दु तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा ।

दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा ।।

मुसलमान सो दास्ती हिन्दुअन सो कर प्रीत ।

रैदास जोति सभी राम की सभी हैं अपने मीत ।।

रैदास एक बूंद सो सब ही भयो वित्थार ।

मूरखि है जो करति है, वरन अवरन विचार ।।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात ।

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात ।।

 

Line

 

प्रभुजी तुम चंदन हम पानी ।

जाकी अंग अंग वास समानी ।।

प्रभुजी तुम धनबन हम मोरा ।

जैसे चितवत चन्द्र चकोरा ।।

प्रभुजी तुम दीपक हम बाती ।

जाकी जोति बरै दिन राती ।।

प्रभुजी तुम मोती हम धागा ।

जैसे सोनहि मिलत सुहागा ।।

प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा ।

ऐसी भक्ति करै रैदासा ।।

Sant Kabir Das Saheb

कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे । ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे । कबीर का अर्थ अरबी भाषा में ‘’महान’’ होता है । कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे । भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा, बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी । कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं, ‘कबीर’ भक्ति आन्दोलन के एक उच्च कोटि के कवि, समाज सुधारक एवं संत माने जाते हैं । संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे । वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है । कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक’ के नाम से प्रसिद्ध है । इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और सारवी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है । लोक कल्याण के हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था । कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व – प्रेमी का अनुभव था । कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे । अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है । कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी । समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है ।

 

जीवन

कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं । कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में सन् १३९८ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ । कबीर के माता – पिता के विषय में भी एक राय निश्चित नहीं है । “नीमा’ और “नीरु’ की कोख से यह अनुपम ज्योति पैदा हुई थी, या लहर तालाब के समीप विधवा ब्राह्मणी की पाप – संतान के रुप में आकर यह पतितपावन हुए थे, ठीक तरह से कहा नहीं जा सकता है । कई मत यह है कि नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था । कबीर दास संत रामानंद के शिष्य बने और उनसे शिक्षा प्राप्‍त की । कबीर का विवाह वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या ‘लोई’ के साथ हुआ था । कबीर को कमाल और कमाली नाम की दो संतान भी थी । कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे । हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया । अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयंगम कर लिया । कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी में देखें जा सकते हैं । गुरु ग्रंथ साहब में उनके २०० पद और २५० साखियां हैं । काशी में प्रचलित मान्यता है कि जो यहॉ मरता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है । रूढ़ि के विरोधी कबीर को यह कैसे मान्य होता । काशी छोड़ मगहर चले गये और वहीं देह त्याग किया । मगहर में कबीर की समाधि है जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं । ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था । हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से । इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा । बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने । मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया । मगहर में कबीर की समाधि है । जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु ११९ वर्ष की अवस्था 1448 में मानते हैं । मगहर में कबीर की समाधि है जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं।

हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही संवत् १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रूप में प्रकट हुए थे।

line

कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं ।

धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं ॥

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय ।

जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय ।।

चलती चक्‍की देख कर, दिया कबीरा रोए ।

दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोई ।।

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह ॥

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।

कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

line

कबीर वाणी

माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर ।

कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर ।।

मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला ।

धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला ।।

कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी ।

धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो ।।

आया है किस काम को किया कौन सा काम ।

भूल गए भगवान को कमा रहे धनधाम ।।

कमा रहे धनधाम रोज उठ करत लबारी ।

झूठ कपट कर जोड़ बने तुम माया धारी ।।

कहते दास कबीर साहब की सुरत बिसारी ।

मालिक के दरबार मिलै तुमको दुख भारी ।।

चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय ।

दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय ।।

साबित बचा न कोय लंका को रावण पीसो ।

जिसके थे दस शीश पीस डाले भुज बीसो ।।

कहिते दास कबीर बचो न कोई तपधारी ।

जिन्दा बचे ना कोय पीस डाले संसारी ।।

कबिरा खड़ा बाजार में सबकी मांगे खैर ।

ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर ।।

ना काहू से बैर ज्ञान की अलख जगावे ।

भूला भटका जो होय राह ताही बतलावे ।।

बीच सड़क के मांहि झूठ को फोड़े भंडा ।

बिन पैसे बिन दाम ज्ञान का मारै डंडा ।।

Naryanan_guru

नारायण गुरु का जन्म दक्षिण केरल के एक साधारण परिवार में 1854 में हुआ था । भद्रा देवी के मंदिर के बगल में उनका घर था । एक धार्मिक माहौल उन्हें बचपन में ही मिल गया था । लेकिन एक संत ने उनके घर जन्म ले लिया है, इसका कोई अंदाज उनके माता-पिता को नहीं था । उन्हें नहीं पता था कि उनका बेटा एक दिन अलग तरह के मंदिरों को बनवाएगा । समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाएगा ।

नारायण गुरु भारत के महान संत एवं समाजसुधारक थे । कन्याकुमारी जिले में मारुतवन पहाड़ों की एक गुफा में उन्होंने तपस्या की थी । गौतम बुद्ध को गया में पीपल के पेड़ के नीचे बोधि की प्राप्ति हुई थी । नारायण गुरु को उस परम की प्राप्ति गुफा में हुई । उस परम तत्व को पाने के बाद नारायण गुरु अरुविप्पु…रम आ गये थे । उस समय वहां घना जंगल था । वह कुछ दिनों वहीं जंगल में एकांतवास में रहे । एक दिन एक गढ़रिये ने उन्हें देखा । उसने बाद में लोगों को नारायण गुरु के बारे में बताया । परमेश्वरन पिल्लै उसका नाम था । वही उनका पहला शिष्य भी बना । धीरे-धीरे नारायण गुरु सिद्ध पुरुष के रूप में प्रसिद्ध होने लगे । लोग उनसे आशीर्वाद के लिए आने लगे । तभी गुरुजी को एक मंदिर बनाने का विचार आया । नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे, जिसमें किसी किस्म का कोई भेदभाव न हो । न धर्म का, न जाति का और न ही आदमी और औरत का ।

दक्षिण केरल में नैयर नदी के किनारे एक जगह है अरुविप्पुरम । वह केरल का एक खास तीर्थ है । नारायण गुरु ने यहां एक मंदिर बनाया था । एक नजर में वह मंदिर और मंदिरों जैसा ही लगता है । लेकिन एक समय में उस मंदिर ने इतिहास रचा था । अरुविप्पुरम का मंदिर इस देश का शायद पहला मंदिर है, जहां बिना किसी जातिभेद के कोई भी पूजा कर सकता था । उस समय जाति के बंधनों में जकड़े समाज में हंगामा खड़ा हो गया था । वहां के ब्राह्माणों ने उसे महापाप करार दिया था । तब नारायण गुरु ने कहा था – ईश्वर न तो पुजारी है और न ही किसान । वह सबमें है ।

दरअसल वह एक ऐसे धर्म की खोज में थे, जहां आम से आम आदमी भी जुड़ाव महसूस कर सके । वह नीची जातियों और जाति से बाहर लोगों को स्वाभिमान से जीते देखना चाहते थे । उस समय केरल में लोग ढेरों देवी-देवताओं की पूजा करते थे । नीच और जाति बाहर लोगों के अपने-अपने आदिम देवता थे । ऊंची जाति के लोग उन्हें नफरत से देखते थे । उन्होंने ऐसे देवी-देवताओं की पूजा के लिए लोगों को निरुत्साहित किया । उसकी जगह नारायण गुरु ने कहा कि सभी मनुष्यों के लिए एक ही जाति, एक धर्म और एक ईश्वर होना चाहिए ।

उसी दौर में महात्मा गांधी समाज में दूसरे स्तर पर छुआछूत मिटाने की कोशिश कर रहे थे । वह एक बार नारायण गुरु से मिले भी थे । गुरुजी ने उन्हें आम जन की सेवा के लिए सराहा भी था । नारायण गुरु ने ही गांधीजी से कहा था कि अपने अखबार नवजीवन का नाम बदल कर हरिजन कर लें । गांधीजी ने खट से उनकी बात मान ली थी । नीची जातियों के लिए हरिजन तभी से कहा जाने लगा ।

नारायण गुरु मूर्तिपूजा के विरोधी नहीं थे । लेकिन वह ऐसे मंदिर बनाना चाहते थे, जहां कोई मूर्ति ही न हो । वह राजा राममोहन राय की तरह मूर्तिपूजा का विरोध नहीं कर रहे थे । वह तो अपने ईश्वर को आम आदमी से जोड़ना चाह रहे थे । आम आदमी को एक बिना भेदभाव का ईश्वर देना चाहते थे ।

Mahatma_Phule

जोतिराव गोविंदराव फुले का जन्‍म 11 अप्रेल 1827 को पुणे में महाराष्‍ट्र की एक दलित माली जाति में हुआ । जोतिबा के पिता का नाम गोविन्‍द राव तथा माता का नाम विमला बाई था । एक साल की उम्र में ही जोतिबा फुले की माता का देहान्‍त हो गया । पिता गोविन्‍द राव जी ने आगे चल कर सुगणा बाई नामक विधवा जिसे वे अपनी मुह बोली बहिन मानते थे उन्‍हें बच्‍चों की देख-भाल के लिए रख लिया । जोतिबा को पढ़ाने की ललक से पिता ने उन्‍हें पाठशाला में भेजा था मगर स्‍वर्णों ने उन्‍हें स्‍कूल से वापिस बुलान पर मजबूर कर दिया । अब जोतिबा अपने पिता के साथ माली का कार्य करने लगे । काम के बाद वे आस-पड़ोस के लोगों से देश-दुनिया की बातें करते और किताबें पढ़ते थे । उन्‍होंने मराठी शिक्षा सन् 1831 से 1838 तक प्राप्‍त की । सन् 1840 में तेरह साल की छोटी सी उम्र में ही जोतिबा का विवाह नो वर्षीय सावित्री बाई (1831-1897) से हुआ । आगे जोतिबा का नाम स्‍काटिश मिशन नाम के स्‍कूल (1841-1847) में लिखा दिया गया । जहाँ पर उन्‍होंने थामसपेन की किताब ‘राइट्स ऑफ मेन’ एवं ‘दी एज ऑफ रीजन’ पढ़ी, जिसका उन पर काफी असर पड़ा । स्‍कूल के अपने एक ब्राह्मण मित्र की शादी में एक बार जोतिबा गये थे, तो उन्‍हें वहाँ पर अपमानित होना पड़ा था । बड़े होने पर उन्‍होंने इन रूढ़ियों के प्रतिकार का विचार पक्‍का किया । 1848 में उन्‍होंने अछूतों के‍ लिए पहला स्‍कूल पुणे में खोला । यह भारत के तीन हजार साल के इतिहास में ऐसा पहला स्‍कूल था जो दलितों के लिए था । 1948 में यह स्‍कूल खोल कर महात्‍मा फुले ने उस वक्‍त के समाज के ठकेदारों को नाराज क दिया था । जोतिबा के पिता गोविन्‍द राव जी भी उस वक्‍त के सामंती समाज के बहुत ही महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति थे । इस कारण उनके पिता पर काफी दबाव पड़ा तो उनके पिता ने उनसे आकर कहा कि या तो स्‍कूल बंद करो या घर छोड़ दो । तब जोतिबा फुले एवं उनकी पत्नि ने सन् 1849 में घर छोड़ दिया । उस स्‍कूल में एक ब्राह्मण शिक्षक पढ़ाते थे । उनको भी दबाव में अपना घर छोड़ना पड़ा । सामाजिक बहिष्‍कार का जवाब महात्‍मा फुले ने 1851 में दो और स्‍कूल खोलकर दिया । सन् 1855 में उन्होंने पुणे में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना । जोतिबा ने भारत का पहला लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोला । जिसमें पढ़ाने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ । तो उनकी पत्नी सावित्री ने ही स्‍वयं यह जिम्‍मेदारी उठाकर उस लड़कियों के स्‍कूल मे पढ़ाना आरंभ किया । इस तरह सावीत्री घर से बाहर आ पढ़ाने का काम करने वाली पहली शिक्षिका थीं । उन्हें तंग करने के लिए शुरू में उन पर गोबर और पत्थर फेंके जाते थे । पर वे पीछे नहीं हटी । जब 1868 में उनके पिताजी का देहान्‍त हुआ तो जोतिबा ने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया । मुम्‍बई सरकार के अभिलेखों में जोतिबा फुले द्वारा पुणे एवं उसके आस पास के क्षेत्रों में शुद्र बालक-बालिकाओं के लिए कुल 18 स्‍कूल खोले जाने का उल्‍लेख मिलता है । अपने समाज सुधारों के लिए पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य ने अंग्रेज सरकार के निर्देश पर उन्‍हें पुरस्‍कृत किया और वे चर्चा में आए । इससे चिढ़कर कुछ अछूतों को ही पैसा देकर उनकी हत्‍या कराने की कोशिश की गई पर वे उनके शिष्‍य बन गए । सितम्बर १८७३ में इन्होने महाराष्ट्र में ‘सत्य शोधक समाज’ नामक संस्था का गठन किया । और इसी वर्ष उन‍की पुस्‍तक ‘गुलाम गिरी’ का प्रकाशन हुआ ।

महात्मा फुले एक समता मूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है । पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है । गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया । उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की । जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमद नगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था । इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया । स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे । मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं । लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा । उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया । फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की । प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था ।

आगे स्‍वामी दयानंद ने जब मुम्‍बई में आर्य समाज की स्‍थापना की तो सनातनियों के विरोध को देखते हुए उन्‍हें जोतिबा की मदद लेनी पड़ी । जोतिबा ने शराब बंदी के लिए भी काम किया था । एक गर्भवती ब्राह्मण विधवा को आत्‍म हत्‍या करने से रोक उन्‍होंने उसके बच्‍चे को गोद ले लिया । जिसका नाम यशवंत रखा गया । अपनी वसीयत जोतिबा ने यशवंत के नाम ही की । सन् 1890 में जोतिबा के दांए अंगों को लकवा मार गया । तब वे बाएं हाथ से ही सार्वजानिक सत्‍य धर्म नामक किताब लिखने में लग गये । 28 नवम्बर 1890 में उन्होंने संसार से विदाई ली । इसी साल उनकी मृत्‍यु के बाद यह किताब छपी । महात्मा जोतिबा फुले जी महान विचारक, समाज सेवी तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे । महिलाओं, दलितों एवं शुद्रो के उत्थान के लिय इन्होने अनेक कार्य किए । समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे ।

डॉ. अम्बेडकर तो महात्मा फुले के व्यक्तित्व-कृतित्व से अत्यधिक प्रभावित थे । वे महात्मा फुले को अपने सामाजिक आंदोलन की प्ररेणा का स्त्रोत मनाते थे । 28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुम्बई में भाषण देते हुए उन्होंने महात्मा बुद्ध तथा कबीर के बाद महात्मा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है । डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा (अर्थात् मेरे तृतीय गुरू ज्योतिबा फुले हैं । केवल उन्होंने ही मानवता का पाठ पढाया । प्रारम्भिक राजनीतिक आन्दोलन में हमने ज्योतिबा के पथ का अनुसरण किया, मेरा जीवन उनसे प्रभावित हुआ है ।)

डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘’शूद्र कौन थे ?’’ को 10 अक्टूबर 1946 को महात्मा फुले को समर्पित करते हुए लिखा- ‘‘जिन्होंने हिन्दु समाज की छोटी जातियों को, उच्च वर्णो के प्रति उनकी गुलामी की भावना के सम्बंध में जागृत किया और जिन्होने विदेशी शासन से मुक्ती पाने से भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्पुर्ण है, इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, उस आधुनिक भारत के महान शूद्र महात्मा फुले की स्‍मृति में सादर समर्पित ।

/p>

chatrapati sahu ji maharaj

 

मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के छत्रपति साहूजी महाराज का जन्म 26 जुलाई 1874 में कोल्हापुर के राजमहल में हुआ था । छत्रपति शाहू कोल्हापुर के राजा थे । वह संभाजी के बेटे और के बेटे शिवाजी महान के पौत्र थे । राजा छत्रपति शाहू जी को एक सच्चे प्रजातंत्रवादी और समाज सुधारक के रूप में माना जाता था । वह कोल्हापुर के इतिहास में एक अमूल्य मणि थे ।

छत्रपति शाहू समाज में महिलाओं के लिए शिक्षा सहित कई प्रगतिशील गतिविधियों के साथ जुड़े रहे थे । साहूजी जीवन के शुरुआती दौर में गरीबों के दुख-दर्द को महसूस करने लगे । राज तिलक होते ही उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों, दबे कुचले लोगों को प्रशासन में भागीदारी दी । इतना ही नहीं शासन-प्रशासन, धन, धरती, व्यापार, शिक्षा, संस्कृति व सम्मान प्रतिष्ठा सभी क्षेत्रों में वे अनुपातिक भागीदारी के प्रबल समर्थक थे । उनका नारा था कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ ‘जिनकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ व ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी जिम्मेदारी है ।’ सभा की अध्यक्षता करते हुए जिलाध्यक्ष गुरुपूरन पटेल ने कहा कि राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज एक ऐसे महान समाज सुधारक थे । जिन्होंने अपने राज्य में 50 प्रतिशत का आरक्षण हर क्षेत्रों में देकर समतामूलक समाज के स्थापना की शुरुआत किया, जिन्हें आरक्षण का जनक भी कहा जाता है । साहूजी समाज सुधारक ज्योतिबा फुले के योगदान से काफी प्रभावित थे । उनका जाति और धर्म की परवाह किए बिना दलितों के लिए प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण कदम था । छत्रपति शाहू ने गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया । उन्होंने हमेशा निचली जातियों के विकास और कल्याण पर बल दिया । उन्होंने सभी के लिए शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास किए । शाहूजी महाराज ने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की, हॉस्टल स्थापित किये और बाहरी छात्रों के लिए शरण प्रदान करने के लिए आदेश दिए । छत्रपति शाहू के शासन के दौरान, बाल विवाह पर ईमानदारी से प्रतिबंधित किया गया था । उन्होंने अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज उठाई । उसकी गतिविधियों के लिए, छत्रपति शाहू समाज को कई कोनों से कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा । शाहूजी महाराज ज्योतिबा फुले द्वारा प्रभावित थे और वह लंबे समय सत्य शोधक समाज, फुले द्वारा गठित संस्था के संरक्षण भी रहे । लेकिन, बाद में वह आर्य समाज की ओर चले गए । कुश्ती छत्रपति शाहू के पसंदीदा खेल में से एक था । देश भर से पहलवानों को कोल्हापुर के अपने राज्य के लिए आने के लिए कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था । महान शासक और सामाजिक विचारक, छत्रपति शाहूजी महाराज का 6 मई, 1922 को निधन हो गया ।

Ramaswami Nayker Periyar

 

दक्षिण भारत में दलितों के हकों की रक्षा के लिए जूझने वाले पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर का जन्म १७ नवंबर, १८७९ को पश्चिमी तमिलनाडु स्थित इरोड में एक सम्पन्न, परम्परावादी हिन्दू परिवार में हुआ था । इनका पूरा नाम इरोड वेंकट नायकर रामास्वामी था । इनके पिता वेंकटाप्पा नायकर एक उच्चकुलीन ब्राह्मण थे । १८८५ में उन्होंने एक स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लिया । पर कोई पाँच साल से कम की औपचारिक शिक्षा मिलने के बाद ही उन्हें अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ना पड़ा । उनके घर पर भजन तथा उपदेशों का सिलसिला चलता ही रहता था । बचपन से ही वे इन उपदशों में कही बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे । हिन्दू महाकाव्यों तथा पुराणों में कही बातों की परस्पर विरोधी तथा बेतुकी बातों का माखौल भी वे उड़ाते रहते थे । बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह के विरूद्ध अवधारणा, स्त्रियों तथा दलितों के शोषण के पूर्ण विरोधी थे । उन्होने हिन्दू वर्ण व्यवस्था का भी बहिष्कार किया । उनकी बढ़ती सामाजिकता से चिंतित उनके पिता ने १९ वर्ष की अल्पायु में ही नागअम्भाल नामक १३ वर्षीय लड़की से इनका विवाह कर दिया । उन्होने अपना पत्नी को भी अपने विचारों से ओत प्रोत किया । लेकिन वैवाहिक बंधन भी नायकर को ब्राह्मण विरोध से न रोक सका । अध्ययन पूरा करते ही पेरियार जी जान से सामाजिक सुधारों में जुट गये । अपार वैभव में पले रामास्वामी को किसी तरह की कमी नहीं थी । परंतु कट्टरता के भयानक परिणामों को देख कर बचपन से ही नायकर के मन में हिन्दू रूढ़िवाद के प्रति अक्रोश उत्पन्न होने लगा । तमिल दलितों की पीड़ा का अहसास कर वह क्षुब्ध हो जाते थे । उन्हें लगता था कि उत्तर भारतीय ब्राह्मणों का सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व ही दलितों की पीड़ा का मुख्य कारण है । इन बातों से दुःखी होकर पेरियार ने यह संकल्प लिया कि वह इस अन्याय को मिटा कर रहेंगे । पेरियार के इस निश्चय से ब्राह्मणों के एक बड़े वर्ग में खलबली मच गयी और उन्होंने पेरियार को ब्राह्मण विरोधी व नास्तिक करार दिया ।

कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर पेरियार ने स्वतंत्राता आंदोलनों में भाग लिया और दलितों के हितों की लड़ाई भी लड़ते रहे । 1923 ई. में वायकोम मन्दिरों में हरिजनों के प्रवेश को लेकर इन्होंने ‘आत्म सम्मान’ आन्दोलन चलाया । इन्होंने सामाजिक समानता पर बल दिया, मनुस्मृति को जलाया तथा ब्राह्मणों के बिना विवाह करवाए । इन्होंने ‘कुदी अरासु’ नामक ग्रंथ लिखा । ईश्वर विरोधी समिति के निमंत्रण पर वे रूस गए तथा लौटने के बाद वे काँग्रेस से अलग हो गए एवं द्रविड़ मुनेत्र कडगम की स्थापना की । लेकिन कुछ मतभेदों के चलते बाद में उन्होंने खुद को कांग्रेस से अलग कर लिया । १९२६ में पेरियार ने न्याय पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली । बाद में वे इसके अध्यक्ष भी बने । इस पार्टी के माध्यम से उन्होंने गैर-ब्राह्मणों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की । तमिलनाडु के ९३ प्रतिशत गैर-ब्राह्मणों को सत्ता में स्पष्ट भागीदारी देने के लिए पेरियार ने १९२७ में दलितों के लिए अलग तमिल राज की मांग की । उन्होंने द्रविड़ कड़गम्‌ नाम के राजनैतिक दल का गठन किया ।

रामास्‍वामी पेरियार बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक प्रमुख राजनेता थे । इन्होने जस्टिस पार्टी का गठन किया, जिसका सिद्धान्त रुढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध था । हिन्दी के अनिवार्य शिक्षण का भी उन्होने घोर विरोध किया । भारतीय तथा विशेषकर दक्षिण भारतीय समाज के शोषित वर्ग को लोगों की स्थिति सुधारने में इनका नाम शीर्षस्थ है । 1973 ई. में इनकी मृत्यु हो गई । जाति भेद के विरोध में इनका संघर्ष उल्लेखनीय रहा ।

 

काशी यात्रा और परिणाम – १९०४ में पेरियार ने एक ब्राह्मण, जिसका कि उनके पिता बहुत आदर करते थे, के भाई को गिरफ़्तार किया जा सके न्यायालय के अधिकारियों की मदद की । इसके लिए उनके पिता ने उन्हें लोगों के सामने पीटा । इसके कारण कुछ दिनों के लिए पेरियार को घर छोड़ना पड़ा । पेरियार काशी चले गए । वहां निःशुल्क भोज में जाने की इच्छा होने के बाद उन्हें पता चला कि यह सिर्फ ब्राह्मणों के लिए था । ब्राह्मण नहीं होने के कारण उन्हे इस बात का बहुत दुःख हुआ और उन्होने हिन्दुत्व के विरोध की ठान ली । इसके लिए उन्होने किसी और धर्म को नहीं स्वीकारा और वे हमेशा नास्तिक रहे । इसके बाद उन्होने एक मन्दिर के न्यासी का पदभार संभाला तथा जल्द ही वे अपने शहर के नगरपालिका के प्रमुख बन गए । चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के अनुरोध पर १९१९ में उन्होने कांग्रेस की सदस्यता ली । इसके कुछ दिनों के भीतर ही वे तमिलनाडु इकाई के प्रमुख भी बन गए । केरल के कांग्रेस नेताओं के निवेदन पर उन्होने वाईकॉम आन्दोलन का नेतृत्व भी स्वीकार किया जो मन्दिरों कि ओर जाने वाली सड़कों पर दलितों के चलने की मनाही को हटाने के लिए संघर्षरत था । उनकी पत्नी तथा दोस्तों ने भी इस आंदोलन में उनका साथ दिया ।

 

कांग्रेस का परित्याग – युवाओं के लिए कांग्रेस द्वारा संचालित प्रशिक्षण शिविर में एक ब्राह्मण प्रशिक्षक द्वारा गैर-ब्राह्मण छात्रों के प्रति भेदभाव बरतते देख उनके मन में कांग्रेस के प्रति विरक्ति आ गई । उन्होने कांग्रेस के नेताओं के समक्ष दलितों तथा पीड़ितों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव भी रखा जिसे मंजूरी नहीं मिल सकी । अंततः उन्होने कांग्रेस छोड़ दिया । दलितों के समर्थन में १९२५ में उन्होने एक आंदोलन भी चलाया । सोवियत रूस के दौरे पर जाने पर उन्हें साम्यवाद की सफलता ने बहुत प्रभावित किया । वापस आकर उन्होने आर्थिक नीति को साम्यवादी बनाने की घोषणा की । पर बाद में अपना विचार बदल लिया । फिर इन्होने जस्टिस पार्टी, जिसकी स्थापना कुछ गैर ब्राह्मणों ने की थी, का नेतृत्व संभाला । १९४४ में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविदर कड़गम कर दिया गया । स्वतंत्रता के बाद उन्होने अपने से कोई २० साल छोटी स्त्री से शादी की जिससे उनके समर्थकों में दरार आ गई और इसके फलस्वरूप डी एम के (द्रविड़ मुनेत्र कळगम) पार्टी का उदय हुआ । १९३७ में राजाजी द्वारा तमिलनाडु में आरोपित हिन्दी के अनिवार्य शिक्षण का उन्होने घोर विरोध किया और बहुत लोकप्रिय हुए । उन्होने अपने को सत्ता की राजनीति से अलग रखा तथा आजीवन दलितों तथा स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए प्रयास किया ।

buy Kamagra Soft, generic clomid. बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर : एक जीवन दर्शन

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना उनका मकसद नहीं, उनकी चाह थी कि यह सूरत बदलनी चाहिए ।

       डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर (अंग्रेज़ी: Bhimrao Ramji Ambedkar, जन्म: 14 अप्रैल, 1891 – मृत्यु: 6 दिसंबर, 1956) एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी भी थे । उन्हें बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है । आम्बेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया । हिन्दू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है । उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है । आम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है । अपनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों तथा देश की अमूल्य सेवा के फलस्वरूप डॉ. आम्बेडकर को ‘आधुनिक युग का मनु’ कहकर सम्मानित किया गया । आधुनिक भारत के सामाजिक एवं राजनैतिक चिंतन के इतिहास में डॉ. अम्‍बेडकर एक ऐसे युगपुरूष हैं जिन्होंने अपने विचारों एवं चिन्तन से हिन्दू समाज की बुराइयों को प्रकाश में लाकर उन्हें संकीर्णता के वातावरण से बाहर निकाला है । उन्होंने परम्परागत हिन्दू समाज की अस्पृश्यता एवं छुआछुत की मान्यताओं पर कठोर प्रहार कर हिन्दू समाज की गतिशीलता को पुनस्थापित किया है । हिन्दू समाज एक प्रगतिशील एवं सतत विकासवादी समाज रहा हैं इसलिए सदियों पूर्व उदित होने के बावजूद वर्तमान काल तक उसका अस्तित्व अक्षुण्ण बना रहा है । इसी सतत् विकास को देखकर प्रसिद्ध कवि अल्लमां इकबाल ने कहा था-

युनानों मिश्र रोमं सब मिट गए जहाँ से, मगर अब तक बाकी है नामों निसां हमारा ।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दूश्मन दौरे जहाँ हमारा । ।

जीवन परिचय

भीमराव आम्बेडकर
Dr.Bhimrao Ambedkar
पूरा नाम बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर
अन्य नाम बाबासाहेब
जन्म 14 अप्रैल, 1891
जन्म भूमि मऊ, मध्य प्रदेश
मृत्यु 6 दिसंबर, 1956
मृत्यु स्थान दिल्ली
मृत्यु कारण स्वास्थ्य ख़राब
अविभावक रामजी मालोजी सकपाल, भीमाबाई मुरबादकर
पति/पत्नी रमाबाई
नागरिकता भारतीय
पार्टी स्वतंत्र लेबर पार्टी
पद अध्यक्ष- स्वतंत्र लेबर पार्टी
विद्यालय एलिफिन्सटन कॉलेज, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स
शिक्षा एम.ए. (अर्थशास्त्र), पी एच. डी., एम. एस. सी., बार-एट-लॉ
भाषा हिंदी, अंग्रेज़ी
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न
कार्यक्षेत्र बड़ौदा राज्य के मिलिटरी सेक्रेटरी, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, प्रधानाचार्य
रचनाएँ ‘डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ (अंग्रेज़ी), बाबा साहब डॉक्टर आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय (हिन्दी), जाति के विनाश
अन्य जानकारी आम्बेडकर विधि विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, इतिहास विवेचक और धर्म और दर्शन के विद्वान थे ।

डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में हुआ था । वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14वीं व अंतिम संतान थे । उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले में है, से संबंधित था । अनेक समकालीन राजनीतिज्ञों को देखते हुए उनकी जीवन-अवधि कुछ कम थी । वे महार जाति के थे जो अछूत कहे जाते थे । किन्तु इस अवधी में भी उन्होंने अध्ययन, लेखन, भाषण और संगठन के बहुत से काम किए जिनका प्रभाव उस समय की और बाद की राजनीति पर है । भीमराव आम्बेडकर का जन्म निम्न वर्ण की महार जाति में हुआ था । उस समय अंग्रेज़ निम्न वर्ण की जातियों से नौजवानों को फ़ौज में भर्ती कर रहे थे । आम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और भीमराव के पिता रामजी आम्बेडकर ब्रिटिश फ़ौज में सूबेदार थे और कुछ समय तक एक फ़ौजी स्कूल में अध्यापक भी रहे । उनके पिता ने मराठी और अंग्रेज़ी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी । वह शिक्षा का महत्त्व समझते थे और भीमराव की पढ़ाई लिखाई पर उन्होंने बहुत ध्यान दिया ।

 

शिक्षा

अछूत समझी जाने वाली जाति में जन्म लेने के कारण अपने स्कूली जीवन में आम्बेडकर को अनेक अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा । इन सब स्थितियों का धैर्य और वीरता से सामना करते हुए उन्होंने स्कूली शिक्षा समाप्त की । फिर कॉलेज की पढ़ाई शुरू हुई । इस बीच पिता का हाथ तंग हुआ । खर्चे की कमी हुई । एक मित्र उन्हें बड़ौदा के शासक गायकवाड़ के यहाँ ले गए । गायकवाड़ ने उनके लिए स्कॉलरशिप की व्यवस्था कर दी और आम्बेडकर ने अपनी कॉलेज की शिक्षा पूरी की । 1907 में मैट्रिकुलेशन पास करने के बाद बड़ौदा महाराज की आर्थिक सहायता से वे एलिफिन्सटन कॉलेज से 1912 में ग्रेजुएट हुए ।
1913 और 15 के बीच जब आम्बेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, तब एम.ए. की परीक्षा के एक प्रश्न पत्र के बदले उन्होंने प्राचीन भारतीय व्यापार पर एक शोध प्रबन्ध लिखा था । इस में उन्होंने अन्य देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्धों पर विचार किया है । इन व्यापारिक सम्बन्धों की विवेचना के दौरान भारत के आर्थिक विकास की रूपरेखा भी बन गई है । यह शोध प्रबन्ध रचनावली के 12वें खण्ड में प्रकाशित है ।
कुछ साल बड़ौदा राज्य की सेवा करने के बाद उनको गायकवाड़-स्कालरशिप प्रदान किया गया जिसके सहारे उन्होंने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. (1915) किया । इसी क्रम में वे प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री सेलिगमैन के प्रभाव में आए । सेलिगमैन के मार्गदर्शन में आम्बेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1917 में पी एच. डी. की उपाधी प्राप्त कर ली । उनके शोध का विषय था -‘नेशनल डेवलेपमेंट फॉर इंडिया : ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी’ । इसी वर्ष उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में दाखिला लिया लेकिन साधनाभाव में अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए । कुछ दिनों तक वे बड़ौदा राज्य के मिलिटरी सेक्रेटरी थे । फिर वे बड़ौदा से बम्बई आ गए । कुछ दिनों तक वे सिडेनहैम कॉलेज, बम्बई में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे । डिप्रेस्ड क्लासेज कांफरेंस से भी जुड़े और सक्रिय राजनीति में भागीदारी शुरू की । कुछ समय बाद उन्होंने लंदन जाकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की । इस तरह विपरीत परिस्थिति में पैदा होने के बावजूद अपनी लगन और कर्मठता से उन्होंने एम.ए., पी एच. डी., एम. एस. सी., बार-एट-लॉ की डिग्रियाँ प्राप्त की । इस तरह से वे अपने युग के सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे राजनेता एवं विचारक थे । उनको आधुनिक पश्चिमी समाजों की संरचना की माज-विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं क़ानूनी दृष्टि से व्यवस्थित ज्ञान था । अछूतों के जीवन से उन्हें गहरी सहानुभूति थी । उनके साथ जो भेदभाव बरता जाता था, उसे दूर करने के लिए उन्होंने आन्दोलन किया और उन्हें संगठित किया ।

 

कार्यकारिणी सदस्य

1926 में वह बम्बई की विधान सभा के सदस्य नामित किए गए । उसके बाद वह निर्वाचित भी हुए । क्रमश: ऊपर चढ़ते हुए सन् 42-46 के दौर में वह गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी की सदस्यता तक पहुँचे । भारत के स्वाधीन होने पर जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में विधि मंत्री हुए । बाद में विरोधी दल के सदस्य के रूप में उन्होंने काम किया । भारत के संविधान के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका थी । वह संविधान विशेषज्ञ थे । अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन उन्होंने किया था । भारतीय संविधान का मुख्य निर्माता उन्हीं को माना जाता है । उन्होंने जो कुछ लिखा, उसका गहरा सम्बन्ध आज के भारत और इस देश के इतिहास से है । शूद्रों के उद्धार के लिए उन्होंने जीवन भर काम किया, पर उनका लेखन केवल शूद्रों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है । उन्होंने दर्शन, इतिहास, राजनीति, आर्थिक विकास आदि अनेक समस्याओं पर विचार किया जिनका सम्बन्ध सारे देश की जनता से है । अंग्रेज़ी में उनकी रचनावली ‘डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ नाम से महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित की गई है । हिन्दी में उनकी रचनावली ‘बाबा साहब डॉक्टर आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ के नाम से भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई है ।

 

रचनावली

अंग्रेज़ी में उनकी रचनावली ‘डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ नाम से महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित की गई है । हिन्दी में उनकी रचनावली ‘बाबा साहब डॉक्टर आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय’ के नाम से भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई है । अनेक बड़े विचारकों और विद्वानों की तरह वह समस्याओं पर निरन्तर विचार करते रहते थे । 1946 में शूद्रों पर उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई । शूद्रों के बारे में जो बहुत तरह की धारणाएँ प्रचलित थीं, उनका उचित खण्डन करते हुए आम्बेडकर ने लिखा: शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे, आर्यों के शत्रु थे । आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया । ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ॠषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा क्यों प्रकट करते हैं? शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है । ऐसा था तो शूद्र सुदास ऋग्वेद के मन्त्रों के रचनाकार कैसे हुए? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है । ऐसा था तो सुदास ने अश्वमेध कैसे किया? शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए, इसके लिए शब्द भी बताता है । शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है । यदि आरम्भ से ही ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह सम्पत्ति संग्रह नहीं कर सकता । ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों का उल्लेख कैसे है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता । ऐसा था तो महाभारत में राजाओं के मंत्री शूद्र थे, ऐसा क्यों कहा गया? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है । यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास के उदाहरण से, तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है?उन्होंने कई पुस्तकें लिखने की योजना बनाई थी, पुस्तकों के कुछ अध्याय लिखे थे, कुछ पूरे और कुछ अधूरे । रचनावली के तीसरे खंड में ऐसी कुछ सामग्री पहली बार प्रकाशित हुई है । इस सामग्री के बारे में सम्पादकों ने भूमिका में जो कुछ कहा है, उससे यही पत चलता है कि 1956 में डॉ. आम्बेडकर के निधन से उनका बहुत सा काम अधूरा रह गया ।

 

सामाजिक सुधार

बी. आर. आम्बेडकर के नेतृत्व में उन्होंने अपना संघर्ष तेज़ कर दिया । सामाजिक समानता के लिए वे प्रयत्नशील हो उठे । आम्बेडकर ने ‘ऑल इण्डिया क्लासेस एसोसिएशन’ का संगठन किया । दक्षिण भारत में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में गैर-ब्राह्मणों ने ‘दि सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट’ प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य उन भेदभावों को दूर करना था जिन्हें ब्राह्मणों ने उन पर थोप दिया था । सम्पूर्ण भारत में दलित जाति के लोगों ने उनके मन्दिरों में प्रवेश-निषेध एवं इस तरह के अन्य प्रतिबन्धों के विरुद्ध अनेक आन्दोलनों का सूत्रपात किया । परन्तु विदेशी शासन काल में अस्पृश्यता विरोधी संघर्ष पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया । विदेशी शासकों को इस बात का भय था कि ऐसा होने से समाज का परम्परावादी एवं रूढ़िवादी वर्ग उनका विरोधी हो जाएगा । अत: क्रान्तिकारी समाज-सुधार का कार्य केवल स्वतन्त्र भारत की सरकार ही कर सकती थी । पुन: सामाजिक पुनरुद्वार की समस्या राजनीतिक एवं आर्थिक पुनरुद्वार की समस्याओं के साथ गहरे तौर पर जुड़ी हुई थी । जैसे, दलितों के सामाजिक पुनरुत्थान के लिए उनका आर्थिक पुनरुत्थान आवश्यक था । इसी प्रकार इसके लिए उनके बीच शिक्षा का प्रसार और राजनीतिक अधिकार भी अनिवार्य थे ।

Nobody can remove your grivance as well as you can and you can not remove these unless you get political power into your hands… We must have a government in which men in power will not be afraied to amend the social and economic code of life which the dictates of justice and expendiencey so urgently call for. This role the British Government will never be able to play. It is only a government which is of the people, for the people and by the people, in other words, it is only the ‘Swaraj’ Government that will make it possible.–Dr. B. R. Ambedkar

1950 के संविधान द्वारा ही अन्तिम रूप से अस्पृश्यता को समाप्त किया जा सकता ।

In the constitution of 1950 it has been declared that ‘Untouchability’ is abolished and its practice in any form is forbidden. The endorsment of any disability arising out of ‘Untouchability’ shall be an offence punishable in accordance with Law.

छुआछूत को अवैध घोषित किया गया । अब कुएँ, तालाबों, स्नान घाटों, होटल, सिनेमा आदि पर इस आधार पर प्रतिबन्ध नहीं लगाए जा सकते थे । संविधान में लिखित ‘डायरेक्टिव प्रिंसीपुल्स’ में भी इन बातों पर ज़ोर दिया गया ।

One of the Directive Principles it has laid down for the guidance of future governments says: ‘The state shall strive to promote the welfare of the people by securing and protecting as effectively as it may a social order in which justice, social, economic and political, shall inform all the institutions of the national life.’

दु:ख तो इस बात का है कि इन सबके बावजूद आज भी जाति प्रथा हमारे बीच और विशेष रूप से ग्रामीण समाज में जीवित है और इससे समाज और देश को काफ़ी हानि हो रही है ।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

1920 के दशक में बंबई में एक बार बोलते हुए उन्होंने साफ-साफ कहा था जहाँ मेरे व्यक्तिगत हित और देशहित में टकराव होगा वहाँ मैं देश के हित को प्राथमिकता दूँगा, लेकिन जहाँ दलित जातियों के हित और देश के हित में टकराव होगा, वहाँ मैं दलित जातियों को प्राथमिकता दूँगा । वे अंतिम समय तक दलित-वर्ग के मसीहा थे और उन्होंने जीवनपर्यंत अछूतोद्धार के लिए कार्य किया । जब महात्मा गाँधी ने दलितों को अल्पसंख्यकों की तरह पृथक निर्वाचन मंडल देने के ब्रिटिश नीति के ख़िलाफ़ आमरण अनशन किया । सन् 1927 में उन्होंने हिन्दुओं द्वारा निजी सम्पत्ति घोषित सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के लिए अछूतों को अधिकार दिलाने के लिए एक सत्याग्रह का नेतृत्व किया । उन्होंने सन् 1937 में बंबई उच्च न्यायालय में यह मुक़दमा जीता ।
आम्बेडकर ने ऋग्वेद से उद्धरण देकर दिखाया है कि आर्य गौर वर्ण के और श्याम वर्ण के भी थे । अश्विनी देवों ने श्याव और रुक्षती का विवाह कराया । श्याव श्याम वर्ण का है और रुक्षती गौर वर्ण की है । अश्विनी वंदना की रक्षा करते हैं और वह गौर वर्ण की है । एक प्रार्थना में ॠषि कहते हैं कि उन्हें पिशंग वर्ण अर्थात भूरे रंग का पुत्र प्राप्त हो । आम्बेडकर का निष्कर्ष है: इन उदाहरणों से ज्ञात होता है कि वैदिक आर्यों में रंगभेद की भावना नहीं थी । होती भी कैसे? वे एक रंग के थे ही नहीं । कुछ गोरे थे, कुछ काले थे, कुछ भूरे थे । दशरथ के पुत्र राम श्याम वर्ण के थे । इसी तरह यदुवंशी कृष्ण भी श्याम वर्ण के थे । ऋग्वेद के अनेक मंत्रों के रचनाकार दीर्घतमस हैं । उनके नाम से ही प्रतीत होता है, वे श्याम वर्ण के थे । आर्यों में एक प्रसिद्ध ॠषि कण्व थे । ऋग्वेद में उनका जो विवरण मिलता है, उससे ज्ञात होता है, वे श्याम वर्ण के थे । इसी तरह आम्बेडकर ने इस धारणा का खंडन किया कि आर्य गोरी नस्ल के ही थे ।

आम्बेडकर ने मंदिरों में अछूतों के प्रवेश करने के अधिकार को लेकर भी संघर्ष किया । वह लंदन में हुए गोलमेज़ सम्मेलन के शिष्टमंडल के भी सदस्य थे, जहाँ उन्होंने अछूतों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की मांग की । महात्मा गांधी ने इसे हिन्दू समाज में विभाजक मानते हुए विरोध किया ।
1931 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को सम्बोधित करते हुए आम्बेडकर ने गोलमेज सम्मेलन में कहा: ब्रिटिश पार्लियामेंट और प्रवक्ताओं ने हमेशा यह कहा है कि वे दलित वर्गों के ट्रस्टी हैं । मुझे विश्वास है, कि यह बात सभ्य लोगों की वैसी झूठी बात नहीं है जो आपसी सम्बन्धों को मधुर बनाने के लिए कही जाती है । मेरी राय में किसी भी सरकार का यह निश्चित कर्तव्य होगा कि जो धरोहर उसके पास है, उसे वह गँवा न दे । यदि ब्रिटिश सरकार हमें उन लोगों की दया के भरोसे छोड़ देती है जिन्होंने हमारी खुशहाली की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया, तो यह बहुत बड़ी गद्दारी होगी । हमारी तबाही और बर्बादी की बुनियाद पर ही ये लोग धनीमानी और बड़े बने हैं ।
सन् 1932 में पूना समझौते में गांधी और आम्बेडकर, आपसी विचार–विमर्श के बाद एक मध्यमार्ग पर सहमत हुए । आम्बेडकर ने शीघ्र ही हरिजनों में अपना नेतृत्व स्थापित कर लिया और उनकी ओर से कई पत्रिकाएं निकालीं; वह हरिजनों के लिए सरकारी विधान परिषदों में विशेष प्रतिनिधित्व प्राप्त करने में भी सफल हुए । आम्बेडकर ने हरिजनों का पक्ष लेने के महात्मा गांधी के दावे को चुनौती दी और व्हॉट कांग्रेस ऐंड गांधी हैव डन टु द अनटचेबल्स (सन् 1945) नामक लेख लिखा । सन् 1947 में आम्बेडकर भारत सरकार के क़ानून मंत्री बने । उन्होंने भारत के संविधान की रूपरेखा बनाने में प्रमुख भूमिका निभाई, जिसमें उन्होंने अछूतों के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित किया और चतुराई से इसे संविधान सभा द्वारा पारित कराया । सरकार में अपना प्रभाव घटने से निराश होकर उन्होंने सन् 1951 में त्यागपत्र दे दिया । सन् 1956 में वह नागपुर में एक समारोह में अपने दो लाख अछूत साथियों के साथ हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध बन गए, क्योंकि छुआछूत अब भी हिन्दू धर्म का अंग बनी हुई थी । डॉक्टर आम्बेडकर को सन् 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।

 

राजनीतिक परिचय

येओला नासिक में 13 अक्टूबर 1935 को आम्बेडकर ने एक रैली को संबोधित किया । 13 अक्टूबर 1935 को, आम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होंने दो वर्ष तक कार्य किया । इसके चलते आम्बेडकर बंबई में बस गये, उन्होंने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय में 50000 से अधिक पुस्तकें थीं । इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई । रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर आम्बेडकर ने उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी । आम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दू तीर्थ में जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होंने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही । भले ही अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होंने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया । उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या में हिन्दू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला । 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला में एक सम्मेलन में बोलते हुए आम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की । उन्होंने अपने अनुयायियों से भी हिन्दू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया । उन्होंने अपनी इस बात को भारत भर में कई सार्वजनिक सभाओं में दोहराया भी ।

 

स्वतंत्र लेबर पार्टी

आम्बेडकर ने 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों में 15 सीटें जीती । उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क में लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी । इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक में आम्बेडकर ने हिन्दू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की ज़ोरदार आलोचना की । उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की । आम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे ।
मार्च 1940 में मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में प्रसिद्ध पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया । आम्बेडकर ने तीन साल पहले इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी नाम से एक दल संगठित किया था । उसने पाकिस्तान प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक समिति बनाई । इस समिति के लिए दिसम्बर 1940 तक आम्बेडकर ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली । वह ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ – ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ – नाम से प्रकाशित हुई ।

1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे थॉट्स ऑन पाकिस्तान भी शामिल है, जिसमें उन्होंने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की माँग की आलोचना की । ‘वॉट कॉंग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, आम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होंने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया । उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?( शुद्र कौन थे?)’ के द्वारा हिन्दू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व में आने की व्याख्या की । उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं । आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन में बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने ख़राब प्रदर्शन किया । 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा ‘द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध)’ में आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को लताड़ा । आम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे । उन्होंने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की ।
मेहनत मजदूरी करने वालों को पारिश्रमिक दिया जाता था, यह बड़ा महत्त्वपूर्ण मुद्दा है । शूद्रों की स्थिति का विवेचन करते हुए अक्सर इतिहासकार यही बात भूल जाते हैं । आम्बेडकर का मूल वाक्य अंग्रेज़ी में इस प्रकार है: Besides few slaves there was a considerable amount of free labours paid in money or food.

उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज में तो हिन्दू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें ‘भाईचारे’ जैसे नर्म शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं । उन्होंने मुसलमानों द्वारा अर्ज़ल वर्गों के ख़िलाफ़ भेदभाव जिन्हें ‘निचले दर्जे का’ माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की । उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं में भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है । उन्होंने इस्लाम में कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है । उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है ।
हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत में छोटी जोत की समस्या बुनियादी समस्या नहीं है । बल्कि यह एक मूल समस्या से निकली हुई समस्या है । अर्थात सामाजिक अर्थव्यवस्था में असामंजस्य की समस्या है । इतनी अधिक भूमि में खेती होने के बावजूद उसकी जनसंख्या के अनुपात से बहुत कम भूमि में खेती होती है ।
हालांकि वे मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होंने तर्क दिया कि हिन्दुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योंकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी । उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष में ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया । उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिन्दू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर क़दम से भी मिटाना संभव हो सकता था । उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये । कनाडा जैसे देशों में भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज़ और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिन्दू और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते । उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यन्त कठिनाई भरा होगा । विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी । भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान में रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी ।

 

आम्बेडकर बनाम गाँधी

महात्मा गांधी के विपरीत डॉ. आम्बेडकर गांवों की अपेक्षा नगरों में एवं ग्रामीण शिल्पों या कृषि की व्यवस्था की तुलना में पश्चिमी समाज की औद्योगिक विकास में भारत और दलितों का भविष्य देखते थे । वे मार्क्सवादी समाजवाद की तुलना में बौद्ध मानववाद के समर्थक थे जिसके केन्द्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व की भावना है । आम्बेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे । उनके समकालीनों और आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है ।
1932 में ग्राम पंचायत बिल पर बम्बई की विधान सभा में बोलते हुए आम्बेडकर ने कहा: बहुतों ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन व्यवस्था की बहुत प्रशंसा की है । कुछ लोगों ने उन्हें ग्रामीण प्रजातन्त्र कहा है । इन देहाती प्रजातन्त्रों का गुण जो भी हो, मुझे यह कहने में जरा भी दुविधा नहीं है कि वे भारत में सार्वजनिक जीवन के लिए अभिशाप हैं । यदि भारत राष्ट्रवाद उत्पन्न करने में सफल नहीं हुआ, यदि भारत राष्ट्रीय भावना के निर्माण में सफल नहीं हुआ, तो इसका मुख्य कारण मेरी समझ में ग्राम व्यवस्था का अस्तित्व है । इससे हमारे लोगों में विशिष्ट स्थानीयता की भावना भर गई उससे बड़ी नागरिक भावना के लिए थोड़ी भी जगह न रही । प्राचीन ग्राम पंचायतों की व्यवस्था के अन्तर्गत एकताबद्ध जनता के देश के बदले भारत ग्राम पंचायतों का ढीला-ढाला समुदाय बन गया । वे सब एक ही राजा की प्रजा थे, इसके सिवा उनके बीच और कोई बन्धन नहीं था ।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था, और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होंने उन्हें हरिजन कह कर पुकारा । आम्बेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया । उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया ।

 

धर्म परिवर्तन

डॉ. आम्बेडकर ने धर्मान्तर के लिए 14 अक्टुबर 1956 का दिन निश्चित किया । विजयादशमी के दिन सुबह नौ से ग्यारह बजे के बीच बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने का आहवान किया गया । इसके लिए गोरखपुर जिले के कुसीनारा के महास्थविर चंद्रमणि को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था । भारतीय महाबौधि संस्था के देवप्रिय बालीसिंह को भी आमंत्रित किया । नागपुर में चौदह एकड़ भूमि पर श्वेत वस्त्र से आवृत व्यासपीठ तथा भव्य मण्डप बनाये गये ।
महास्थविर चंद्रमणि व चार अन्य भिक्षुओं ने बाबा साहब आम्बेडकर व उनकी पत्नी को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी उसमें उन्होंने त्रिशरण और पंचशील के अतिरिक्त स्वयं निर्मित बाईस शपथें ली । इसके पंश्चात् उन्होंने अपने तीन लाख अनुयायियों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी ।

 

महापरिनिर्वाण

आम्बेडकर 1948 से मधुमेह से पीड़ित थे । और वो जून से अक्टूबर 1954 तक बहुत बीमार रहे । राजनीतिक मुद्दों से परेशान आम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया । अपनी अंतिम पाण्डुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को आम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर में हो गई । 7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली में अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हज़ारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों भाग लिया । एक स्मारक आम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है । आम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है । अपने अनुयायियों को उनका संदेश था ।

 

उपसंहार

आम्बेडकर विधि विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, इतिहास विवेचक, और धर्म और दर्शन के विद्वान थे । उन्होंने अपने लेखन में अनेक ऐसे सूत्र दिए हैं जिनके आधार पर भारतीय इतिहास को हम पूंजीवादी विवेचकों के दुष्प्रभाव से मुक्त कर सकते हैं । उनकी एक क्रांतिकारी स्थापना यह है कि इंग्लैंड किसी तरह व्यापार में भारत से स्पर्धा न कर सकता था और माल तैयार करने वाले देश के रूप में भारत इंग्लैंड से बढ़ कर था । अंग्रेज़ी शासनतंत्र के विवेचन में आम्बेडकर ने अनेक ऐसे तथ्य दिए हैं जिनसे प्रमाणित होता है, अंग्रेज़ों ने जाति-बिरादरी की प्रथा को और कठोर बनाया, उन्होंने यहाँ का व्यापार नष्ट किया, शहरों के उद्योग-धंधे तबाह किए । लाखों कारीगर शहर छोड़कर देहात में जा बसे, वहां जमींदारों की बेगार करने पर बाध्य हुए ।

‘भारत रत्न’ हुआ गौरवान्वित

       कहते हैं, हर सदी में, हर युग में कुछ अपवाद होते है, औरों से अलग होने की वजह से वे असाधारण होते है । संविधान शिल्पी, दलितों के मसीहा बाबा साहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर ऐसी ही स्वनामधन्य हस्ती थे । उनके जन्म शताब्दी वर्ष में उनके द्वारा किए गए महान् कार्यों के लिए मरणोपरान्त उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया । देर-सबेर भारत सरकार ने अपनी भूल सुधार ली । उनकी ओर से भारत रत्न की उपाधि उनकी पत्नी डॉ. सविता अम्‍बेडकर ने राष्ट्रपति श्री रामास्वामी वेंकटरामन से दिनांक 14 अप्रैल, 1990 को ग्रहण की । सही मायने में यह सम्मान भारत रत्न का था । जिससे भारत रत्न स्वयं गौरवान्वित हुआ ।

फिल्म / नाटक

       जब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी । इसमे आम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी. भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही । यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ. डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है । ए राएज़िग लाइट डॉ. बी आर आम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है ।
राजेश कुमार का भीमराव आम्बेडकर और गांधी नाटक । अरविन्द गौड़ के निर्देशन मे अस्मिता थियेटर ग्रुप द्वारा पूरे देश मे लगातार मन्चन ।

शिक्षित बनो !!!, संगठित रहो!!!, संघर्ष करो !!! ।