रैगर समाज सुधारक

आज हम जिस युग में जी रहे हैं उसकी कल्पना समाज के महापुरुषों के बिना अधूरी है । इतिहास के कई स्वर्णिम पन्नों पर हमें ऐसे महापुरुषों की कहानी पढ़ने को मिलेगी जिन्होंने अपनी क्षमता, दूरदर्शिता और सूझबूझ से देश को नई राह दी । ऐसे ही महापुरुषों में से एक थे राजा राम मोहनराय । राममोहन राय अपनी विलक्षण प्रतिभा से समाज में फैली कुरीतियों के परिष्कारक और ब्रह्म समाज के संस्थापक के रूप में निर्विवाद रूप से प्रतिष्ठित हैं । राजा राममोहन राय सिर्फ सती प्रथा का अंत कराने वाले महान समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक महान दार्शनिक और विद्वान भी थे ।

हम यहाँ जिन सुधारों की बात कर रहे हैं, उनका संबंध किसी दैवीय कानून को बदलने से नहीं बल्कि उन नियमों की पुर्नव्याख्या करने से है, जिन्हें पुराने समय में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में बनाया गया था । दैवीय आदेशों को नए तरीके से समझने की कोशिश को भी हम समाज सुधार की परिभाषा में शामिल करते हैं । जैसा कि ”सुधार” शब्द से ही स्पष्ट है, समाज सुधार का उद्देश्य किसी चीज को पूरी तरह बदलना नहीं है बल्कि उसमें ऐसे परिवर्तन लाना है जिनसे वह वर्तमान काल की चुनौतियों का सक्षमता से मुकाबला कर सके । जाहिर है कि आधारभूत मूल्यों या सिद्धांतों को नहीं बदला जा सकता क्योंकि ऐसा करना ”सुधार” नहीं वरन् ”परिवर्तन” होगा । दरअसल, सुधारों के विरोध के पीछे कई जटिल कारण होते हैं । पहला कारण है, परिवर्तन का डर । परिवर्तन अपने साथ अनिश्चिंतता लाता है और लाता है अज्ञात परिणामों की आशंका, विशेषकर उन लोगों के लिए जो उन परिवर्तनों से लाभान्वित नहीं होने वाले होते हैं । धर्मशास्त्रियों और धार्मिक नेताओं के अलावा, आमजन भी सुधारों से डरते हैं क्योंकि वे अज्ञान और अंधविश्वास के अंधेरे में जीते हैं और परिवर्तन के दौर से गुजरने का उन्हें कोई अनुभव नहीं होता ।

हमारी जाति की पूर्व में स्थिति बहुत ही दयनीय थी । इसके लिये जहां स्‍वर्ण व जागीरदार लोग दोषी थे, वहीं हममें भी कई प्रकार की कमियां होती थी । किन्‍तु अब समय बदल गया है, समाज में शिक्षा का प्रसार भी काफी हो गया है । अन्‍य जातियों के लोग भी अपनी कुरीतियों तथा अन्‍य कमियों को दूरकर समाज में आवश्‍यक सुधार कर रहे है । अत: हमारे समाज में भी प्रगति हेतु आवश्‍यक सुधार कर रहे है । अत: हमारे समाज में भी प्रगति हेतु आवश्‍यक सुधार होने चाहिए ।

स्‍वर्णों, जागीदारों तथा जमींदारों के अमानुषिक अत्‍याचारों तथा अत्‍यधिक दयनीय आर्थिक दशा के कारण दलित समाज की दशा बहुत खराब व निम्‍न स्‍तर की हो रही थी । उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के उत्तरार्द्ध में स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती व आर्य समाज के द्वारा उत्तर भारत में समाज सुधार कार्य आरम्‍भ किये गये थे । फिर महात्‍मा गांधी ने हरिजन आन्‍दोलन आरम्‍भ किया । इसके पश्‍चात् महाराष्‍ट्रमें बाबा साहेब भीमराव अम्‍बेडकर ने दलित समाज में नव-जागृति आरम्‍भ की । इन सुधार कार्यों का सभी प्रदेशों में प्रसार हुआ और दलित समाज में नव चेतना जागृत हुई । इन्‍हीं लोगों के माध्‍यम से हमारे रैगर समाज में भी नव-जागृति का युग आया और अनेक समाज सुधारक, सन्‍त महात्‍मा व समाज के अनेक लोग समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों को दूर करने का प्रयत्‍न करने लगे ।

उन दिनों जगह-जगह पर सत्‍संगों का आयोजन हुआ करता था जिनमें अनेक साधु महात्‍मा व अन्‍य लोग आया करते थे और अपने भजन वाणियों के साथ ही समाज सुधार सम्‍बन्‍धी उपदेश भी दिया करते थे । एक बार जयपुर चाँदपोल बस्‍ती में स्‍वामी मोजीराम जी महाराज जो श्री ब्रह्मानन्‍द जी के शिष्‍य थे पधारे तब विशाल सत्‍संग का आयोजन हुआ उन्‍होंने सत्‍संग के माध्‍यम से अध्‍यात्‍म ज्ञान के साथ-साथ नशा, गंदगी तथा गन्‍दे खान पान जैसी बुराईयों से दूर रहने व शुद्ध एवं सात्विक जीवन यापन करने का उपदेश दिया । उनके साथ-साथ उनके परम शिष्‍य स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी महाराज भी पधारे थे । इस प्रकार सत्‍संग के माध्‍यम से संत महात्‍माओं ने समाज सुधार में विशेष योगदान प्रदान किया ओर समाज में बदलाव लोन का सफल प्रयास किया ।

रैगर धर्म गुरू स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी महाराज के मार्गदर्शन व स्‍वामी आत्‍माराम जी लक्ष्‍य जी के कठोर परिश्रम से प्रथम अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेलन दौसा में सन् 1944 में सम्‍पन्‍न हुआ । इस महा सम्‍मेलन में रैगर समाज व्‍याप्‍त कुरीतियों को दूर करने व शिक्षा एवं समाज सुधार सम्‍बन्‍धी अन्‍य विषयों पर प्रस्‍ताव पारित किये ।

प्रस्‍ताव नम्‍बर 1 पर तो स्‍वर्णों व जागीरदारों द्वारा कोई आपत्ति नहीं हुई, किन्‍तु प्रस्‍ताव नम्‍बर 2 के कारण जब रैगर भाई मुर्दा मवेशी नहीं उठाने लगे तब स्‍वर्णों व जागीरदारों द्वारा इन पर कार्य करने के लिये दबाव डाला गया और नहीं करने पर जगह-जगह रैगरों पर सामूहिक अत्‍याचार होने लगे । कई जगह घर मकान तोड़े गये खेती बड़ी नष्‍ट की, कूओं में कूड़ा कचरा व मल मूत्र डाला गया । कई जगह उन्‍हे गाँव के बाहर नहीं निकलने देते थे । रैगर बन्‍धु फिर भयभीत होकर घबराये हुए जयपुर देहली आदि स्‍थानों पर जाति नेताओं के पास रक्षार्थ जाने लगे । तब जाति बन्‍धुओं पर हो रहे अत्‍याचारों को रोकने के लिये स्‍वामी श्री आत्‍माराम जी लक्ष्‍य तथा देहली, जयपुर व अजमेर, ब्‍यावर के कार्यकर्ता जगह-जगह गये और गाँवों के लोगों को समझाने बुझाने लगे । कई जगह नहीं मानने पर पुलिस व सरकार का सहारा लेकर अनेक स्‍थानों पर शान्ति कायम की गई फिर भी कई जगह संघर्ष चलता रहा । इस प्रकार सजातीय बन्‍धुओं पर बहुत अत्‍याचार हुए इसके लिए अखिल भारतीय रैगर महासभा, राजस्‍थान रैगर सुधार संघ और श्री रैगर सुधारक कार्यकारिणी सभा के सदस्‍यों ने घटना स्‍थल पर जगह-जगह जाकर स्‍वर्णों व रैगर जाति के बन्‍धुओं के बीच समझौता कराया तो कहीं पर उन्‍हे मानेन पर मजबूर किया । कहीं कहीं पर रैगर समाज के बन्‍धुओं ने महासम्‍मेलन में पारित प्रस्‍तावों को नहीं माना तो वहां पर सार्वजनिक पंचायत व मेलों में जाकर उन्‍हे सम्‍बोधित करते हुए समाज सुधार किया ।

जब भी संसार में अनाचार फैलता है, अवांछित तत्वों से साधारण जन परेशान हो जाते हैं, तब समाज को दिशा देने के लिए किसी न किसी महापुरुष का पदार्पण होता है और रैगर समाज के महापुरुष स्‍वामी आत्‍माराम जी लक्ष्‍य जी का जीवन चरित्र देश के महान समाज सुधारकों में एक नायाब नमूना है । इसलिये भक्ति आंदोलन के संत ही नहीं अपितु बाद के समाज सुधारक संतों के लिए वे एक उदाहरण बन गए । उनकी ऐसी विचारधारा के कारण ही वे कई भक्त मालाओं के आदर्श चरित्र पुरुष बन गये । स्‍वामी आत्‍माराम जी ने समाज सुधार समन्वय का अलख जगाने में विलक्षण योगदान दिया । आपके क्रियाकलापों से प्रभावित होकर समाज सुधार की एक महान क्रांति का सूत्रपात हुआ । समाज में कुरीतियों के उन्मूलन के लिए उन्होंने जो भी प्रयास किए उन्हें प्रारंभ में समाज ने स्वीकारा ।

समाज सुधार के कार्यों में विशेष रूप से सर्व श्री स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी महाराज, स्‍वमी रामानन्‍द जी जिज्ञासू, स्‍वामी गोपालराम जी महाराज, स्‍वामी आत्‍माराम जी ‘लक्ष्‍य’, श्री सुखराज सिंह आर्य नोगिया, चौ. कन्‍हैयालाल जी रातावाल, चौ. पदमसिंह सक्‍करवाल, चौ. ग्‍यारसाराम जी चान्‍दोलिया, श्री कँवरसेन मौर्य, श्री नवल प्रभाकर जाजोरिया, श्री प्रभुदयाल जी रातावाल, श्री बिहारीलाल जागृत, श्री शम्‍भूदयाल गाडेगांवलिया, श्री कँवरलाल जेलिया, श्री जयचन्‍द्र मोहिल, श्री सूर्यमल मौर्य, श्री छोगालाल जी कँवरिया व श्री खुशहालचन्‍द्र मोहनपुरिया, श्री लक्ष्‍मी नारायण दौतानिया, श्री दयाराम जलूथरिया, श्री लाला राम जी जलूथरिया, श्री घनश्‍याम सिंह सेवलिया, चौ. तोताराम जी खोरवाल, श्री भोलाराम बन्‍दरवाल, श्री भोलाराम जी तौणगरिया, श्री छोगाराम कँवरिया, श्री रूपचन्‍द जलुथरिया, श्री दौलत राम सबलानिया एवं श्री सोहनलाल सिवांसिया के अलावा अनेक समाज सेवकों ने रैगर समाज के सुधार के लिए कार्य किया । हम सभी आप सभी महानुभावों के विचारक एवं क्रांतिकारी सोच रखते हुए बहुत दूरदर्शी सोच के साथ कार्य कर जाति उत्थान में महत्‍वपूर्ण योगदान निभाया ।

हमारे आसपास तेज़ी से हो रहे परिवर्तनों के मद्देनज़र समाज सुधारों की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता । ऐसे सुधार जितनी जल्दी हो सकें, उतना ही अच्छा होगा । हर कोई आज कल अपना काम दूसरों को सुधारना समझता है । नतीजा यह है कि सब दूसरों को सुधार रहे हैं और खुद को पहले सुधारना है, इसे भुला दिया गया है. समाज सुधार का द्वार आत्म-सुधार है । अत: समाज के सभी युवा व प्रौढ़ बुद्धिजीवियों से मेरा यही आग्रह है कि वर्तमान परिवेश में समाज संगठन के महत्त्व को समझें और संगठित होकर समाज सुधार सम्‍बंधित सभी बातों पर पुरजोर ध्‍यान दें । समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों को दूर करें व प्रगतिशील बातों की ओर ध्‍यान देकर समाज उत्‍थान हेतु उन्‍हें क्रियान्वित करें तभी हमारे समाज की उन्‍नति सम्‍भव है । समाज सुधार कर्तव्‍य कर्म सबसे बढ़ा है । धन्‍यवाद !

 

हम बदलेंगे युग बदलेगा । हम सुधरेंगे युग सुधरेगा ॥

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Sukh Raj Singh Nogia (Arya)

महान समाज सुधारक श्रद्धेय श्री सुखराज सिंह आर्य नोगिया जी का जन्‍म 22 मार्च, 1927 को ग्राम दौरार्इं, जिला अजमेर, राजस्‍थान में हुआ । पिता का नाम भागीरथ जी नोगिया थे जो मूलत: नैनवा जिला, बून्‍दी से आकर ग्राम दौरार्इं में बसे थे । आपकी माता जी का बचपन में ही स्‍वर्गवास हो गया था । आपका विवाह अजमेर निवासी चौ. लादूराम तगाया जी की सुपुत्री सुशीला देवी से से हुआ । श्री आर्य जी की स्‍कूली शिक्षा मीरशाह अली पाठशाला अजमेर में हुई । तत्‍पश्‍चात् आपने बी.ए. कर एल.एल.बी. की शिक्षा आपने पत्राचार से ग्रहण की । आपने शिक्षा ग्रहण करने के पश्‍चात् पोस्‍टमेन, केशियर तथा अध्‍यापक की नौकरी की । बाद में इन सेवाओं को छोड़कर 1943 में अमीन (राजस्‍व निरिक्षक) के पद पर सेवाएं दी । अमीन के रूप में आपका अंतिम पदस्‍थान भिनाई जिला अजमेर में रहा । नौकरी करने की दौरान ही आपका रूझान रैगर समाज की दशा और सामाजिक स्थिति से रूबरू हुए । उस समय अंग्रेजों के शासन काल में राजकीय नौकरी करते हुए राजकीय दौरे पर जाते समय घोड़े पर यात्रा करना होती थी लेकिन रैगर जाति के होने के कारण घोड़े पर बैठने को लेकर आपको जबरदस्‍त विरोध का सामना करना पड़ा ।

दौसा एवम् जयपुर महासम्‍मेलनों में घृणित कार्य नहीं करने सम्‍बन्‍धी पारित प्रस्‍तावों की क्रियान्विति रैगर समाज के प्रत्‍येक गाँव-गाँव में धीरे-धीरे एक लहर के अपनुसर होने लग गई और महासम्‍मेलनों में इसी से बोखलाकर स्‍वर्णों ने रैगर जाति के लोगों पर अत्‍याचार करना प्रारम्‍भ कर दिया । रैगर जाति की समाजिक स्थिति व यह सब देखकर आपका मन द्रवित हो गया तथा आपने समाज सुधार करने के लिए अपनी नौकरी को त्‍याग दिया और मात्र 24-25 वर्ष की उम्र में ही तन-मन-धन से समाज सेवा के कार्य में जूट गए । तथा परिवार के भरणं-पोषण के हेतु अजमेर कचहरी में ही अर्जी नवीसी तथा भूमि सम्‍बन्‍धी छोटे-छोटे मुकदमों की पैरवी करने लगे ।

श्री सुखराज सिंह आर्य जी ने इन विषम परिस्थितियों में अजमेर क्षेत्र में एक नई संस्‍था का गठन किया जिसका नाम ”श्री रैगर सुधारक कार्यकारिणी सभा” था । जोकि एक रजिस्‍टर्ड संस्‍था थी । इस संगठन में 40 समाज सेवी व्‍यक्तियों का था जो गाँव-गाँव जाकर रैगर समाज के सजातीय बन्‍धुओं से चमड़े निकालने का कार्य पूर्ण रूप से बन्‍द करने के लिए समझाते थे तथा यह पुराना काम छोड़ने के लिए सख्‍ती से पेश आते थे । नोगिया जी का प्रथम कार्य महासम्‍मेलन में पारित प्रस्‍ताव नम्‍बर 1, 2 व 3 का पालन कर घृणित कार्य बन्‍द कराना था आपने जयपुर, अजमेर, केकड़ी, ब्‍यावर, भिनाई, देवली, सवाईमाधोपुर, करोली, झालावाड़, बून्‍दी, कोटा, जोधपुर, भीलवाड़ा, नागौर, दूदू, किशनगढ़ आदि क्षेत्रों में जाकर समाज सुधार कार्य किया । इस प्रकार नोगिया जी द्वारा संचालित रैगर सुधारक कार्यकारिणी द्वारा यह कार्यक्रम समाज में व्‍याप्‍त कुरीतियों को दूर करने, समाज सुधार करने तथा स्‍वर्णों के अत्‍याचारों से निबटने का बहुत ही र्स्‍वोत्तम कार्य था । आपके भाषणों से प्रभावित होकर सजा‍तीय बन्‍धुओं ने अपने अधिकांश बच्‍चों को शिक्षा दिलाने लगे तथा नशा व गंदी आदतों को भी छोड़ने लगे । इस तरह स्‍वर्णों के अत्‍याचारों से सुरक्षा भी हुई जिससे लोग राहत की सांस लेने लगे ।

एक समय की बात है जब अजमेर व उसके आस-पास के किसान लोग रैगरों के घृणित काम बन्‍द करने के कारण काफी जले हुये थे । उन्‍होंने गुप्‍त मिटिंग करके रैगरों पर सामूहिक हमले की योजना बनाई । निश्चित तिथि पर एक ही दिन हरमाड़ा सराधना श्रीनगर गोविन्‍दगढ़ आदि सभी 210 गाँवों पर एक साथ हमला हुआ । रैगरों को मारा-पीटा, घर मकान तोड़ दिये व जला दिये गये कूओं को कचरे से भर दिया गया । फसल नष्‍ट कर दी गई व चमड़े के कारखानों को तोड़ दिया गया और भी बहुत नुकसान हो गया । सामूहिक आक्रमण के कारण पूरे अजमेर राज्‍य में त्राहि-त्राहि मच गई । श्री नोगिया जी ने अजमेर राज्‍य व भारत सरकार से सुरक्षा व शान्ति व्‍यवस्‍था कायम करने हेतु कार्यवाही की । तो अजमेर पुलिस ने स्‍वर्णों व किसानों के कहने पर श्री नोगिया एवं उनकी सभा के कार्यकर्ताओं पर ही अशान्ति फैलाने का आरोप लगाया और सी.आई.डी. जाँच चालू करा दी व कुछ लोगों को बन्‍द भी कर दिया । फिर श्री नोगिया जी व उनके साथी (श्री रूपचन्‍द जलुथरिया) बाबा साहेब डाक्‍टर भीमराव अम्‍बेडकर के पास गये । उन्‍होंने इनकी पूरी बात सुनकर सहायता की और भारत सरकार के गृह विभाग से रैगर समाज की सुरक्षा व पूर्ण शान्ति व्‍यवस्‍था कायम करने के आदेश भिजवाये जिसका तत्‍काल पालन किया गया और तब शान्ति कायम हुई ।

सुखराज सिंह नोगिया जी प्रत्‍येक स्‍थान के पूरे कार्यक्रम का लिखित रिकार्ड रखते थे जिसमें सभा में कौन-कौन से कार्यकर्ता स्‍वयम् सेवक पंच प्रतिनिधि आये । सभाध्‍यक्ष कौन था पुलिस की क्‍या व्‍यवस्‍था थी । किन-किन समस्‍याओं का निराकरण हुआ । स्‍वर्णों में किन-किन से भेंट हुई और क्‍या निर्णय हुआ आदि बातों का पूरा विवरण वे रखते थे और हर सभा की अलग से फाइल होती थी ।

रैगर जाति की स्त्रियों को स्‍वर्णों जातियों के बंदीश के कारण पीतल घातु के गहने पहना करती थी आपने रैगर जाति की स्त्रियों को पीतल के गहने पहनना छुडवाकर चाँदी की घातु के गहने पहनने का अधिकार दिलाया । रैगर जाति के बालक-बालिकाओं को शिक्षा दिलाने के लिए पूर्ण रूप से जोर देकर इस पूरे क्षेत्र में जोरदार प्रचार-प्रसार का अभियान चलाया । आपने सन् 1958 तक अपने संगठन को संगठित कर समाज सुधार का कार्य किया तत्‍पश्‍चात् आपने राजस्‍व कानून में वकालत आरम्‍भ की । इसी दौरान जनसंघ पार्टी से जुड़कर गायत्री जी महारानी जयपुर के साथ कार्य किया । आप अंतिम समय तक भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे ।

एक व दो नम्‍बर का काम पूरा हो जाने के पश्‍चात् भी वे रैगर समाज की सामाजिक गतिविधियों से जुडे रहे और उन्‍होंने इस अवधि में पुष्‍कर के गऊघाट(श्री बद्री बाकोलिया निर्मित) पर रैगर जाति का विमान जल जझूलनी ग्‍यारस को भी निकाला जिससे कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति आने पर भी रैगर जाति को सम्‍मानजनक स्‍थान दिलाया । आपके अथक प्रयासों से अजमेर शहर में 20 बीघा जमीर रैगर समाज को शमशान की भूमि के रूप में उपलब्‍ध करवाई । आप समाज सुधार के दौरान तीन बार जेल भी गए ।

श्री आर्य ईमानदार, कठिन परिश्रमी, अच्‍छे वक्‍ता होने के साथ-साथ राजस्‍व कानून के अच्‍छे ज्ञाता भी थे । वर्तमान में आपके परिवार में पत्नि तथा दो पुत्रियां है । बड़ी बेटी ऊषा आर्य तो ब्‍यावर निवासी श्री ओमप्रकाश जी फलवाडिया के साथ ब्‍याही गई जो बड़ौदा बैंक में है तथा छोटी लड़की लीला आर्य देवली निवासी श्री राम निवास जी मोरलिया के साथ ब्‍याही गई जो राजस्‍थान केडर में IAS अधिकारी है ।

श्री सुखराज सिंह आर्य नोगिया जी का स्‍वास्‍थ काफी गिरने के कारण आपको बीमारीयों ने घेर लिया था । फलस्‍वरूप 13 जनवरी 1983 को जाति माता का यह दैदीप्‍यमान सूर्य अस्‍त हो गया और वे हमारा साथ छोड़कर स्‍वर्ग सिधार गये । नोगिया जी के निर्वाण दिवस पर प्रत्‍येक वर्ष अजमेर व जयपुर में आपके स्‍मरण में पुण्‍य तिथि का आयोजन किया जाता है ।

bhola ram ji tongariya

 

जीवन में श्रद्धा व समर्पण के भाव जब जागृत होते है, तो वह प्रबल पुण्योदय का ही संकेत होता हैं । पुण्य जब उदय में आता है, तो इंसान की हर राह मखमली सेज की तरह कोमल बन जाती है । अपने समर्पित पुरुषार्थ से अपार पुण्यार्जन कर जीवन की ऊंचाईयों को छूने वाले पाकिस्तान स्थित सिन्ध हैदराबाद में सरलमान, धर्मनिष्ठ श्री स्व. हीरालालजी तौणगरिया के घर जन्में उदारमान समाज सुधारक स्व. श्री भौलारामजी तौणगरिया समाज सुधार के साथ सन् 1930 में सिन्ध हैदराबाद में म्यूनिसिपल कमिशनर बनकर रैगर समाज का गौरव बढ़ाया ।

स्व. श्री भौलारामजी की प्रारंभिक शिक्षा मैट्रीक तक रही । आपके पिताजी मूल निवासी राजस्थान के लाडनू के रहने वाले थे । आप अखिल भारतीय रैगर महासभा के प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष रहने के साथ रैगर समाज के इतिहास में स्वतन्त्रता से पूर्व सन् 1930 में सिन्ध हैदराबाद में म्यूनिसिपल कमिशनर बनने का गौरव हासिल हुआ और इसी लिए आज रैगर जाति में राजनैतिक पदार्पण के सूत्रधार कहलाते है ।

अखिल भारतीय रैगर महासभा के अध्‍यक्ष के पद पर आपका कार्यकाल सन् 1944 से 1946 का रहा और साथ आपको रैगर समाज की सर्वोच्‍य संस्‍था के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बनने का गौरव प्राइज़ किया । आपके कार्यकाल में सिन्ध हैदराबाद में रैगर समाज के बीच सामाजिक शैक्षिक व धार्मिक कार्यो के उत्थान में धर्मगुरु स्वामी ज्ञानस्वरुपजी महाराज के सानिध्य में सकारात्मक व रचनात्मक रुचि रख कर सामाजिक दायित्व निभाया । सिन्ध हैदराबाद में आप के अखिल भारतीय रैगर महासभा के सूत्रधार स्वामी आत्मराम लक्ष्य के सर्म्पक में आये जिससे समाज सुधार के लिए रुपरेखा तैयार कर समाज में जन चेतना के साथ समाज उत्थान के कार्यो किये ।

स्व. श्री भौलारामजी तौणगरिया के नेतृत्व में दिनांक 2-3-4 नवम्बर 1944 को निश्चित प्रथम अखिल भारतीय रैगर महासम्मेलन के अन्तर्गत होने वाले उपसम्मेलनों में रैगर समाज सम्मेलन हेतु आपको सभापति चुना गया । अपने सभापतिय भाषण में रैगर समाज में शिक्षा के महत्व पर अधिक बल दिया गया । आज रैगर समाज में शिक्षा के अपरिहार्य रुप में अनेकानेक आई.ए.एस., आई.पी.एस., आई.आर.एस., डॉक्टर, ईजीनियर, जज, वकील आदि हमारे समाज की धरोहर है । प्रथम अखिल भारतीय रैगर महासभा में संगठन का महत्व समझते हुये श्री स्वामी आत्मारामजी लक्ष्य ने अखिल भारतीय रैगर महासभा की स्थापना की और स्व. श्री भौलारामजी तौणगरिया को महासभा का प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित होने का गौरव प्राप्त हुआ । आपके अध्ययन काल में रैगर समाज को विषम परिस्थितियों के बावजूद ऐतिहासिक सफलताऐ मिलती रही ।

 

 

(साभार- श्री गोविन्‍द जाटोलिया : सम्‍पादक – मासिक पत्रिका ‘रैगर ज्‍योति’)

 

स्‍व. चौधरी कन्‍हैयालाल जी रातावाल का जन्‍म लगभग सन् 1897 में वाण गंगा, श्‍याम पुरा, मेड़ निवासी श्री भैरू लाल जी रातावाल के यहाँ हुआ । स्‍व. श्री गोदाराम जी रातावाल आप के ज्‍येष्‍ठ भ्राता थे ; जिनके आशिर्वाद, मार्ग-दर्शन व सहयोग से आप निरन्‍तर सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक उत्‍थान के कार्यों में लगे रहते थे । आपके जन्‍म के कुछ काल उपरान्‍त आप के पिता रोजगार हेतु सपरिवार दिल्‍ली आ गए । श्री भेरू लाल जी दुरदृष्‍टा थे । अपने अथक परिश्रम से उन्‍होंने अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया और बच्‍चों को पढ़ाने के लिए घर पर ही शिक्षक नियुक्‍त कर दिया ।

चौ. कन्‍हैयालाल जी कुशाग्र बुद्धि, आदर्शवादी एवं समाज सेवी युवक बने ; जिन्‍होने 1944 में श्री भोलाराम जी तौणगरिया तत्‍कालीन अध्‍यक्ष अखिल भारतीय रैगर महासभा के साथ कन्‍धे से कन्‍धा मिलाकर सामाजिक उत्‍थान में अपने को समर्पित कर दिया ।

अप्रैल 1946 में आप अखिल भारतीय रैगर महासभा के अध्‍यक्ष मनोनीत हुए । आपकी अध्‍यक्षता में 12, 13 अप्रैल को अति सफल जयपुर में सम्‍पन्‍न हुआ समाज में नई चेतना आई; किन्‍तु इस चेतना के साथ-साथ समाज पर घोर अत्‍याचार बढ गए । काराणां, बैतड़, दौसा, निम्‍बाहेड़ा, बलेसर, नरवर, निवाई तथा टौंक काण्‍ड हुए । इन काण्‍डो में अपने पदाधिकारियों व कर्मठ कार्यकर्ताओं के साथ कन्‍हैयालाल जी मौके पर पहुंचते थे एवं पीड़ित लोगों की यथासम्‍भव सहायता करते व करवाते थे ।

जैसे-जैसे समाज कार्य करते गये, वैसे-वैसे दूसरे समाजों के अत्‍याचार और बढ़ गए, यहाँ तक कि पीने के लिए कुओं का पानी आदि भी नहीं दिया जाता था । पीड़ित समाज की दुर्दशा देशकर आप की आत्‍मा रो पड़ी और ‘दौसा’ सम्‍मेलन कर समाज का आह्वान किया और प्रस्‍ताव पारित किए कि जब तक अपने समाज के साथ न्‍याय नहीं होता; तब तक हमारे लोग भी अन्‍य समाजों के लिए किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे । परिणाम स्‍वरूप सजातीय बन्‍धुओं को कुछ राहत हुई । आपने मीलों-मील गाँव-गाँव में जाकर सजातीय बन्‍धुओं में नई चेतना जगाई । शिक्षा को अनिवार्य करने हेतु विशेष कर महिला शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुटे रहे ।

आप समय-समय पर समाज के विभिन्‍न पदों पर रह कर दायित्‍व सम्‍भालते रहे । सरपंच, खजांची का दायित्‍व बहुत ही बखूबी निभाया और साथ अखिल भारतीय रैगर महासभा के अध्‍यक्ष के पद पर 1946-1964 तक रह कर समाज के विकास एवं कल्‍याण में महत्‍वपूर्ण भुमिका निभाई ।

आप आर्य समाज की विचार धारा के सशक्‍त अनुयायी थे । आपके अथक परिश्रम व दानवीरता का ही साकार रूप है कि उस काल में आपने आर्य समाज, करोल बाग, नई दिल्‍ली के मुख्‍य मार्ग पर 532- गज की भूमि नारी शिक्षा हेतु पाठशाला बनवाने के लिए समाज को दान दी । समाज के अन्‍य समाज सेवी बन्‍धुओं के सहयोग से ‘आर्य कन्‍या पाठशाला’ का निर्माण किया गया, जहाँ से आज भी अपने समाज की कन्‍याऍ शिक्षा प्राप्‍त कर रही है और ‘आर्य कन्‍या पाठशाला’ मील का पत्‍थर बन कर आज भी शान से खड़ी अपना उदाहरण आप ही बनी हुई है ।

(साभार : लक्ष्‍य – रक्षक, लेखक – योगेन्‍द्र रातावाल पौत्र)

 

choga lal kanwariya

जन्‍म : श्री छोगा लाल जी कंवरिया जी का जन्‍म 12 अप्रैल, 1922 को ब्‍यावर (अजमेर) में श्री प्रताप मल जी कंवरिया के घर में हुआ । श्री प्रताप मल जी साधारण हिन्‍दी योग्‍यता रखते थे । लोगों को रामायण, गोपीचन्‍द, भरतरी पढ़ कर सुनाया करते थे । एक वर्ष के थे कि पिता का साया सर से उठ गया, जिस कारण उनकी माँ मजदूरी करने को उद्धत हुई; जिससे परिवार का भरण-पोषण हो सके ।

स्‍कूल शिक्षा : माँ ने 5 वर्ष की उम्र में ब्‍यावर के एक स्‍कूल में प्रवेश करा दिया । स्‍कूल में मेघावी छात्रों में गिनती होने लगी । हर वर्ष प्रथम स्‍थान प्राप्‍त करते । सन् 1940 में मैट्रीक परीक्षा प्रथम श्रेणी में विशेष योग्‍यता के साथ उत्तीर्ण की । ब्‍यावर के तीनों र्हा स्‍कूलों में एक मात्र छात्र रहे, जिसको प्रथम श्रेणी मिली थी ।

कॉलेज शिक्षा : उस समय Govt. Collage, Ajmer के प्रोफेसर डॉ. बी.एल. रावत (M.A. Ph.D.) के उत्‍साहवर्धन से Govt. Collage, Ajmer में प्रवेश लिया । संभ्रान्‍त परिवार के बच्‍चों की ट्यूशन कर 60/- रूपये मासिक आय प्राप्‍त कर सके, जिससे कॉलेज का खर्च एवं उसमें से 15/- रूपये मासिक माँ को भी भेजते थे । 1940में बी.एस.सी. की डीग्री प्राप्‍त की । इस बीच 1944 में छोटी उम्र में शादी कर दी गई । एल.एल.बी. की डीग्री राज्‍य सेवा में रहते प्राप्‍त की ।

राज्‍य सेवा : (अ) 1952-54 तक तहसीलदार मजिस्‍ट्रेट द्वितीय श्रेणी, केकड़ी में रहे । उस समय अजमेर राज्‍य के अनुसूचित जाति के प्रथम ग्रेज्‍यूएट एवं प्रथम तहसीलदार थे । (ब) 1955 में प्रथम श्रेणी मजिस्‍ट्रेट अजमेर बनाया गया । (स) 1957-58 अलवर जिले में प्रथम श्रेणी मजिस्‍ट्रेट बनया गया । (द) 1963 तक विकास अधिकारी निम्‍बाहेड़ा जिला चित्तौड़गढ रहे । (य) 1963-1967 सब डिवीजनल मजिस्‍ट्रेट गुलाबपुरा, जिला- भिलवाड़ा रहे । (र) 1967 में एस.डी.एम. सांभर लैक । उसके पश्‍चात् सन् 1977 तक आर.ए.एस के विभिन्‍न पदों डिप्‍टी डायरेक्‍टर, डिप्‍टी कमीशनर, सेल्‍स टैक्‍स इत्‍यादि पदों पर रहे ।

राजनीतिक जीवन : 1977 में सेवा निवृत हुए । उसके पश्‍चात् राजनीति मके प्रवेश किया एवं कांग्रेस (आई.) के कियाशील सदस्‍य बन गये ।

अजमेर जिला देहात के महामंत्री बनाये गये । 1980 में दूदू विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे एवं केबिनेट स्‍तर का चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थय मंत्री बनाया गया । 1980 से 1985 तक विधान सभा के सदस्‍य रहे ।

समाज सेवा : कॉलेज के विद्यार्थी रहते हुए 1942 में एक संस्‍था Depressed Classes Association अजमेर में बनाई, इस संस्‍था के द्वारा पिछड़े वर्ग के मौहल्‍लों में जाकर सभा करते और शिक्षा के लिए लोगों को प्रेरित करते । 1943-1949 तक इस संस्‍था के महामंत्री रहे । 9 फरवरी, 1947 को राजस्‍थान स्‍तर का दलित वर्ग सम्‍मेलन अजमेर में बुलवाया गया जिसमे श्री बाबू जगजीवन राम श्रम मंत्री, भारत सरकार को आमंत्रित किया गया । यह सम्‍मेलन बहुत सफल रहा । राज्‍य सेवा में रहते हुए गुलाबपुरा में लड़कियों के स्‍कूल की बिल्डिंग दानदाताओं के सहयोग से बनवाई । सांभर लेक में डिग्री कॉलेज की स्‍थापना हेतु 10 लाख रूपये का चन्‍दा इकट्ठा करवाने में सहयोग दिया ।

सन् 1964 में अखिल भारतीय रैगर महासभा के अध्‍यक्ष बने; अध्‍यक्ष के पद पर 1977-1984 तक रहे एवं 6-7 अक्‍टूबर 1984 में अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेलन जयपुर में आयोजित करवाने में महत्‍वपूर्ण भुमिका निभाते हुए उस समय देश की प्रधानमंत्री माननीय इन्दिरा गाँधी जी को बतोर मुख्‍य अतिथि के रूप में रैगर समाज के मंच पर बुलवाया । समाज की सेवा करते हुए 24 जुलाई, 1994 को हमसे सदा के लिए विदा हो गए । उनके चरणों में हमारा प्रणाम ।

 

(साभार : लक्ष्‍य रक्षक, लेखक – सुपुत्र चेतन कंवरिया)

 

बहु-आयामी व्‍यक्तित्‍व की धनी मीरा जी का जन्‍म दिल्‍ली के समृद्ध व प्रतिष्ठित ‘रातावाल’ परिवार में सन् 1950 में हुआ । आपको स्‍व. चौ. कन्‍हैयालाल जी की पौत्री व स्‍व. धर्मपाल रातावाल जी की प्रथम संतान होने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ ।

बाल्‍यावस्‍था में ही आप मे विभिन्‍न कार्यों को सीखने व करने की गहरी रूचि रही । इसी रूचि को आपकी माता जी श्रीमती विद्या देवी जी ने कठोर परिश्रम से सजाया व संवारा । उन्‍हीं की प्रेरणा से आप ने न केवल उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त की, अपितु गृह-कार्यों में दक्षता, पारम्‍परिक, सांस्‍कृतिक व सामाजिक दायित्‍व-निर्वाह की समझ को जीवन का अभिन्‍न अंग बना लिया ।

आर्य समाज के सु-संस्‍कार मय वातावरण में आप का लालन-पालन व शिक्षा सम्‍पन्‍न हुई । माँ सरस्‍वती की आपार कृपा से आर्य कन्‍या पाठशाला से आपने अक्षर ज्ञान का श्री गणेश करते हुए, सतभ्रांवा आर्य कन्‍या महाविद्यालय से हायर-सेकंड्री, श्री गुरू तेग बहादुर खालसा कॉलेज से ही हिन्‍दी (आनर्स) सी.आई.र्इ. से बी.एड. व कला संकाय में एम.ए. हिन्‍दी तक की सम्‍पूर्ण शिक्षा दिल्‍ली से ही प्राप्‍त की ।
सन् 1971 में ब्‍यावर निवासी स्‍नेही, सौम्‍य व मधुर-भाषी श्री वासुदेव जी कंवरिया क साथ आपको पणिग्रहण संस्‍कार (विवाह) में एक सहायोगी के रूप में पति की अपेक्षा, सच्‍चे मित्र का साथ मिला । मीरा जी का मानना था कि आज वे जिस सोपान तक पहुँच सकी यह ‘इन्‍ही’ की देन है ।

यह संयोग ही है कि जिस आर्य कन्‍या पाठशाला से आप ने शिक्षार्जन का शुभारम्‍भ किया था, सन् 1973 में यहीं से अध्‍यापन-यात्रा का श्री गणेश किया । रा.व.म. बालिक विद्यालय नम्‍बर 1 टैगोर गार्डन में हिन्‍दी प्राध्‍यापिका पद पर कार्यरत रही । कर्म व श्रम के सामंजस्‍य को अपने अपना लक्ष्‍य बनाते हुए एक ओर शैक्षिक कार्य के अतिरिक्‍त अध्‍यापिका सचिव, विभागाध्‍यक्ष, सदनाध्‍यक्षा के दायित्‍व का कुशलता से संचालन किया तो दूसरी ओर विभिन्‍न सामाजिक, सांस्‍कृतिक सभाओं व संस्‍थाओं के महत्‍वपूर्ण पदो पर निष्‍ठापूर्वक कार्यरत रहीं ।

विभिन्‍न प्रतियोगिताओं में पुरस्‍कृत होने के अतिरिक्‍त ‘महासभा’ की ओर से दिल्‍ली-विज्ञान भवन में आयोजित पंचम अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेलन, 1986 में आपको महामहिम राष्‍ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी द्वारा ‘मातृशक्ति’ अलंकरण से, सूर्य प्रकाशन दिल्‍ली की ओर से 1989 में हिन्‍दी सेवी ‘श्रेष्‍ठ शिक्षक’ पुरस्‍कार से तथा हिन्‍दी अकादमी दिल्‍ली द्वारा 1991 में ‘सर्वश्रेष्‍ठ हिन्‍दी शिक्षक’ सम्‍मान से सम्‍मानित हो चुकी है । 1994 में दिल्‍ली सरकार की ओर से ‘राजकीय पुरस्‍कार’ भी प्राप्‍त किया ।

सन् 1992 से 1997 तक दिल्‍ली में विशेष कर पश्चिमी दिल्‍ली में सम्‍पूर्ण साक्षरता अभियान का संचालन किया । अशिक्षित लोगों के बीच में निरन्‍तर उन्‍हे साक्षकर कर बेहतर जीवन जीने की कला को सिखाने में समर्पित रही, यही कारण है कि वंचित वर्ग के लोग मीरा जी को अपना मानते है ।

1997 में स्‍वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया । राजनीति को जनसेवा का सशक्‍त माध्‍यम बनाकर आपने अपने वार्ड को तो अधिक से अधिक नागरिक सुविधायें तो प्रदान करवाई साथ ही पश्चिमी दिल्‍ली की निगम अध्‍यक्षा के दायित्‍व को वहन कर जिस सक्रियता का परिचय दिया वह स्‍मरणीय है । आप को दिल्‍ली की ‘महापौर’ का दायित्‍व मिलते ही पूरी दिल्‍ली में जो उत्‍साह व उमंग की लहर दौड़ी थी, वह आज भी लोग याद करते है । यद्यपि आपका कार्यकाल केवल छ: माह का ही था तथापि जिस कुशलता से सदन की गरिमा को गौरवमयी बनया, दिल्‍ली में नीतियों का पालन करने में व विशेषकर नेपाल के जनकपुर धाम के विकास में आपका योगदान महत्‍वपूर्ण है । एशिया सर्वे के अन्‍तर्गत दिल्‍ली से आपको ”आऊट स्‍टैंडिग-काऊंसलर” चुना गया जो रैगर समाज की बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

30 अक्‍टुबर, 2000 को जयपुर में अखिल भारतीय रैगर महासभा के सम्‍मेलन में तत्‍कालीन महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष श्री धर्मदास जी शास्‍त्री (पूर्व सांसद) व समाज के अन्‍य बुद्धिजीवी महानुभावों ने श्रीमती मीरा जी को मनोनीत कर ध्‍वनिमत से रैगर समाज की सर्वोच्‍य संस्‍था ‘अखिल भारतीय रैगर महासभा (पंजी.)’ की अध्‍यक्षा चुना गया, न केवल मीरा जी को अध्‍यक्ष चुन कर उनको सम्‍मानित किया गया, अपितु सम्‍पूर्ण मातृशक्ति को सम्‍मानित किया । आपको न केवल राजनैतिक अपितु आपके व्‍यक्तित्‍व, नेतृत्‍व शक्ति, विद्वता व सामाजिक समर्पण की भावना से आत-प्रोत होने के कारण राष्‍ट्रीय अध्‍यक्षा चुना गया । इतिहास इस बात का साक्षी है कि आज तक किसी भी सामाजिक संगठन ने अब तक अपने संगठन की बागडोर मातृशक्ति के हाथों में नहीं सौंपी, यह रैगर समाज के लिए भी गर्व का विषय है कि हमने यह सार्थक पहल की है ।

आप रैगर समाज की अग्रणी व समाज सेवी महिलाओं में से एक है और उनमें से भी आपका स्‍थान अग्रणी है । आप अखिल भारतीय रैगर महासभा के महिला प्रकोष्‍ठ की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्षा रही । आपने अपनी अध्‍यक्षता में महिलाओं के विकास के लिए अनेक सामाजिक, सांस्‍कृतिक व रचनात्‍मक कार्य सम्‍पन्‍न किये । श्रीमती मीरा जी का स्‍वर्गवास को हो गया; जिस मातृशक्ति ने अपने कार्यों से संपूर्ण भारत भर में जागृति पैदा कर दी हो ऐसी मातृशक्ति को हमारा बारंबार प्रणाम है । ओजमयता, उत्‍साह से भरी सहज मिलन सार ऐसी थी आप की मीरा जी ।

 

(साभार : लक्ष्‍य – रक्षक, लेखक – राज कुमार फलवारिया)