समाज के लेखक/ साहित्‍यकार

  handwriting cartoon

 

समाज वही आगे बढ़ता है जिसमें भविष्‍य की सोच हो, चिन्‍तन हो । साहित्‍यकार चिन्‍तनशील होता हैं । इस लिए वह समाज को दिशा देता है । जिस समाज या जाति का साहित्‍य नहीं वह दिशाहीन है । वह भटका हुआ समाज है । साहित्‍य प्रगतिशील समाज की पहचान है । साहित्‍य का महत्‍व- मनुष्‍य के जीवन में साहित्‍य का बहुत बड़ा महत्‍व है । मनुष्‍य के लिए जितना भोजन आवश्‍यक है, साहित्‍य भी उतना ही जरूरी है । साहित्‍य मनुष्‍य के मस्तिष्‍क की खुराक हैं । मनुष्‍य को ज्ञान साहित्‍य से ही प्राप्‍त होता है साहित्‍यकारों ने अनकों लोगों के जीवन को बदला है और जीने की राह दिखाई है । इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितनी भी क्रांतियां हुई है उनके जन्‍मदाता दार्शनिक और साहित्‍यकार ही है । साहित्‍यकारों ने युग की दिशाओं को मोड़ा है । कबीर, रविदास, जोतिबा फुले और डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर ने साहित्‍य के द्वारा ही समाज की मान्‍यताओं तथा व्‍यवस्‍थाओं को बदला है । साहित्‍याकर की कलम में असीम ताकत होती है । जो समाज को उचाईयों तक पहुँचा सकती है । किसी भी समाज के विकास और उन्‍नती में साहित्‍य का अपना महत्‍व होता है । रैगर समाज में भी अनकों साहित्‍यकार हुए है जिन्‍होंने अपनी कला, कार्यकुशलता, लगन, निशकाम सेवा भाव और प्रगतिशील विचार धारा से समाज को नई दिशा दिखाई है । समाज को नई राह दिखाने में हमारे समाज के साहित्‍यकारों ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे समाज में जागरूकता पैदा हुई है । हमारे समाज में साहित्‍यकारों की कोई कमी नहीं है । साहित्‍य के साथ ही समाज का विकास पूर्ण रूप से हो सकता है । इसलिए समाज के हर व्‍यक्ति को चाहिए कि वह साहित्‍य के महत्‍व को समझे ।

Jivanram Gusaiwal

08 सितम्‍बर 1930 में श्री नानक राम गुसांईवाल ग्राम भावपुरा जिला जयपुर (राजस्‍थान) निवासी के यहां माता भूरी देवी के गर्भ से ‘जीवनराम गुसांईवाल’ का जन्‍म हुआ था ।

सन् 1940 में सतगुरू स्‍वामी जीवाराम जी ग्राम भावपुरा निवासी से गुरू दीक्षा (लाहोर, पाकिस्‍तान) में प्राप्‍त की थी ।

शिक्षा- हिन्‍दी में बी.ए. प्रभाकर तथा साहित्‍य रत्‍न की उपाधि से सन् 1950 में अलंकृत किये गए ।

सन् 1955 से पुस्‍तक लेखन तथा सम्‍पादन का कार्य 65, रैगरपुरा करोल बाग दिल्‍ली में प्रारम्‍भ किया गया ।

05-09-1958 से श्री रामजन मण्‍डल 65, रैगरपुरा दिल्‍ली-5 द्वारा प्रसारित पुस्‍तकें देहाती पुस्‍तक भण्‍डार, चावड़ी बाजार, दिल्‍ली-6 से प्रकाकिशत होना प्रारम्‍भ हुई तथा प्रकाशित पुस्‍तकों का भारतीय कापी राईट एक्‍ट सन् 1957 के अधीन भारत सरकार द्वारा रजिस्‍ट्रेशन कराया गया ।

15-08-1965 को दिल्‍ली में ‘श्री रामजन मण्‍डल’ के प्रथम चुनाव में जीवन राम गुसांर्इवाल को रामजन प्रकाशन का मुख्‍य सम्‍पादक नियुक्‍त किया गया ।

सन् 1968 में सन्‍त पीताम्‍बर दास समाधि स्‍थल, ग्राम फागी जिला जयपुर (राजस्‍थान) में गुसांई बाबा स्‍माकर निधि (संस्‍था) की स्‍थापना की थी, यहां सन्‍त पीताम्‍बर दास जी की प्राचीन समाधि बनी हुई प्रत्‍यक्ष-प्रमाण है ।

03-06-1981 में श्री कालू राम आर्य के सम्‍पादन में जयपुर से प्रकाशित रैगर प्रगतिशील पत्रिका तथा राजस्‍थान सम्राट समाचार पत्र के सह सम्‍पादक नियुक्‍त किए गए ।

23-03-1986 को श्री विष्‍णु मन्दिर 18, रैगरपुरा, दिल्‍ली में आयोजित बैठक में जीवनराम गुसांईवाल द्वारा रैगर युवा प्र‍गतिशील संगठन (संस्‍था) की स्‍थापना की गई ।

01-04-1986 को जीवन राम गुसांईवाल द्वारा लिखित रैगर महासभा दिल्‍ली प्रदेश का विधान समाज को समर्पित किया गया ।

27-09-1986 को नई दिल्‍ली के विज्ञान भवन में आयोजित सम्‍मेलन में धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्‍ट योगदान के लिए भारत के राष्‍ट्रपति श्री ज्ञानीजैल सिंह जी द्वारा अलंकृत किय गए ।

07-10-1995 को रैगरपुरा करोल बाग दिल्‍ली में आयोजित स्‍वामी ज्ञान स्‍वरूप जन्‍म शताब्‍दी समारोह में अखिल भारतीय रैगर महासभा के पंचम राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष श्री धर्मदास शास्‍त्री द्वारा सम्‍मानित किए गए ।

इन्‍होंने रैगर समाज को गौरव, गरिमा और ऊचाईयाँ प्रदान की । 30-10-2004 को श्री जीवनराम गुसार्इंवाल जी का निधन को-सी 562 CAMP नम्‍बर 2 नॉगलोई दिल्‍ली 41 में हुआ । रैगर समाज के ऐसे समाज सेवी का नाम रैगर जाति के इतिहास में सदा के लिए अमर रहेगा ।

 

श्री जीवनराम जी गुसार्इंवाल द्वारा लिखित पुस्‍तके-

(1). ब्रहम ज्ञान भक्ति प्रकाश (सचित्र)
(2). सन्‍त वाणी विलास भजन संग्रह
(3). अनुभव प्रकाश
(4). आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्धति
(5). सन्‍यासी चिकित्‍सा शास्‍त्र
(6). प्राचीन वंश प्रदीप
(7). प्राचीन रैगर इतिहास
(8). प्राचीन गौत्र वंशावली
(9). विधान (रैगर महासभा, दिल्‍ली प्रदेश)
(10). संत पीताम्‍बर दास चरित्र
(11). स्‍वामी जीवाराम चरित्र
(12). स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप चरित्र
(13). स्‍वामी आत्‍माराम लक्ष्‍य चरित्र

 

  chiranji Lal ji Bokoliya

 

प्रतिभा किसी परिचय की मौहताज नहीं होती है आदर्श प्रतीभा अपने जीवन की हर सांस से सारे जहां को महका देती है । श्री चिरंजीलाल बोकोलिया का जन्म 15 फरवरी 1940 को करोल बाग दिल्ली निवासी श्री पन्नालाल बोकोलिया के घर हुआ। इनकी माता प्रसिद्ध समाज सेवी श्री कंवर सैन मौर्य की बड़ी बहन थी । आपने 1958 में हायर सैकण्डरी परीक्षा पास की । इसी वर्ष आपका विवाह डीग भरतपुर चौधरी कन्हैयालाल की पौत्री व श्री प्रसादीलाल कांसोटिया की सुपुत्री सावित्री के साथ हुआ । 1958 में आप दिल्ली कार्पोरेशन व अगले वर्ष भारत सरकार के वाणिज्य मन्त्रालय में नौकरी प्रारभ की । नौकरी करते हुए आपने 1959 में पंजाब विश्वविद्यालय से प्रभाकर व 1962 में दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नतक परीक्षा पास की । 1964 में रैगर समाज के पहले अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तत परीक्षा पास की व उस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग द्वारा इनका सहायक पद पर चयन हुआ । 1967 में इन्‍होंने इतिहास में द्वितीय स्नातकोत्तर परीक्षा पास की व इसी वर्ष इनका आई.ए.एस. परीक्षा में चयन हुआ तथा इनको आयकर विभाग आंवटित हुआ । आयकर विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 1996 में इनका चयन भारत सरकार के न्याय व विघि मंत्रालय में आयकर न्यायिक अभिकरण में सदस्य के रुप में हुआ जहां से फरवरी 2002 में सेवा निवृत हुए । आप भारत सरकार के उच्च पदो रह कर व वर्तमान में दिल्ली प्रांतीय रैगर मंदिर प्रबंध समिति के प्रधान पद पर रैगर समाज का गौरव बढ़ाया ।

आपका सामाजिक क्षेत्र में सहरानीय योगदान रहा है 1963 में स्थापित ‘‘रैगर शिक्षित समाज’’ दिल्ली के संस्थापक सदस्य व उसें पहले निर्वाचित प्रधान रहे । 1964 में इन्होने सह लेखक के रुप में ‘‘रैगर कोन और क्या’’ नाम पुस्तक लिखी । 1983 में ‘‘हरीद्वार धर्मशाला’’ की स्थापना प्रधान व मुख्य संचालक की भूमिका निभाई । इसी प्रकार 1984 में ‘‘अखिल भारतीय रैगर महासभा’’ के जयपुर अधिवेशन जिसे भारत की प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा ने सम्बोधित किया व 1986 में विज्ञान भवन में आयोजीत ‘‘रैगर अलंकरण समारोह’’ जिसमें मुख्य अतिथि भारत के राष्ट्रपति स्व. श्री ज्ञानी जैलसिंह थे में एक मुख्य पदाधिकारी के रुप में योगदान दिया । 1998 में ‘‘रैगर विकास संस्था राजस्थान’’ जयपुर की स्थापना की । जिसके यह आजीवन संरक्षक है तथा जिसके तत्वाधान में रैगर जाति में सामुहिक विवाह प्रथा हुई । सामुहिक विवाह पद्धति की सफलता इसी से साबित होती है कि 5 जुलाई 1998 में शुरु हुई प्रयास अब राजस्थान के विभिन्न अचंलो में फैल चुका है दिल्ली में भी इस प्रकार के कई आयोजन हो चुके है ।

आपकी सामाजिक क्षेत्र में लोकप्रियता व कार्यक्षमता को देखते हुए जून 2003 में ‘‘श्री त्रिवेण गंगा मंदिर रैगर धर्मशाला’’ साईवाड़ सीकर राजस्थान का प्रधान चुना गया । 2005 में आप दिल्ली प्र्रांतीय रैगर मन्दिर प्रबन्ध कमेटी के प्रधान चुने गये । अखिल भारतीय रैगर महासभा के अर्न्तगत बनने वाले रैगर छात्रावास जयपुर में भी इनका समर्थन व सहयोग सराहनीय है । आज भी श्री बाकोलिया समाज के उन कतिपय लोगों में से एक है, जिन्होने समाज उत्थान व उन्नती के लिए हर क्षैत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया । उसी का फल कि ‘‘ श्री गुरु रविदास समारोह’’ ठक्कर बापा कॉनोनी चेम्बूर मुम्बई में 1 मार्च 2002 को हुए समारोह के मुख्य अतिथि व अखिल भारतीय रैगर महासभा की बीकानेर इकाई के ‘‘प्रतिभा सम्मान समारोह’’ 31 अगस्त 2003 के अध्यक्ष बनाए गये । इसी तरह समाज के विभिन्न कार्यक्रमों अपना योगदान देकर रैगर समाज का गौरव बढ़ाया । आपके महकते परिवार में तीन पुत्र है जिसमें राजीव सबसे बड़े स्पाइस जेट एयरवेज में मैनेजर के पद पर कार्यरत है । दूसरे पंकज गुड़गांव में प्रोपर्टी डीलर का कार्य कर रहे है सबसे छोटा विशाल आस्ट्रेलिया की नागरिकता ग्रहण कर वहीं के हो गये है ।

 

(साभार- गोविन्‍द जाटोलिया : सम्‍पादक ‘रैगर ज्‍योति’)

 

Shri Chandan mal nawal

श्री चन्‍दनमल नवल का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है । इनका जन्‍म 28 अप्रेल, 1946 को जोधपुर जिले के ग्राम भेटण्‍डा में एक सम्‍पन्‍न परिवार में हुआ । शिक्षा गांव में गुरूजी की पाठशाला से शुरू हुई । साठ के दशक में ग्राम भेटण्‍डा में तालाब के किनारे स्थित शिवजी के मंदिर में सरकारी प्राथमिक स्‍कूल प्रारम्‍भ हुई । उस समय छुआछूत चरम पर था । दलित जातियों के बच्‍चों को शिवजी के मंदिर की सीढ़ियों पर पड़ी स्‍वर्ण जाति के लोगों की जूतियों पर बैठकर पढ़ना पड़ता था । मास्‍टरजी दलित बच्‍चों की पाटियों को पानी का छींटा देकर शुद्ध करने के बाद छूते थे या छड़ी से छूकर ग‍लतियाँ बताते थे । भेटण्‍डा ग्राम विकास की दृष्टि से अतिपिछड़ा हुआ था । इसलिए श्री नवल के पिता श्री मंगाराम आज से लगभग 60 साल पहले जोधपुर जिले के ही ग्राम सतलाना में जाकर बस गये । सतलाना ग्राम रेल्‍वे से जुड़ा हुआ था । मगर सड़क और बिजली की कोई भी सुविधा नहीं थीं । श्री नवल ने सीनियर हायर सैकण्‍ड्री तक शिक्षा लूनी जंक्‍शन से ग्रहण की । सतलाना लूनी जंक्‍शन छ: किलोमीटर दूरी पर है । श्री नवल कक्षा 6 से 11 तक छ: साल प्रतिदिन 12 कि.मी. पैदल गांव से चल कर स्‍कूल जाते थे । :सर्दी, गर्मी और बरसात की कभी परवाह नहीं की । आगे की उच्‍च शिक्षा आपने जोधपुर विश्‍वविद्यालय से ग्रहण की । आप बी.ए. प्रथम वर्ष से लेकर एम.ए. तक समाज कल्‍याण छात्रावास में रहे । वर्ष 1967 में आपने एम.ए. राजनीति विज्ञान में किया और उसी वर्ष राजकीय महाविद्यालय सरदारशहर में अस्‍थाई व्‍याख्‍याता के पद पर नियुक्‍त हुए । श्री नवल ने अपना शैक्षणिक जीवन गांव के मंदिर की सीढ़ियों से शुरू किया और कठोर मेहनत एवं लगन से आगे बढते हुए पुलिस विभाग से अतिरिक्‍त पुलिस अ‍धीक्षक जैसे उच्‍च पदों पर आसीन रह कर कई उपलब्धियों के साथ समाप्‍त किया । आप की शादी जटिया कालोनी जोधपुर में भगवती देवी के साथ सम्‍पन्‍न हुई । आपके दो पुत्रियाँ और दो पुत्र हैं । बड़ी पुत्री माया ने एम.ए. भूगोल प्रथम श्रेणी से जाधपुर विश्‍वविद्यालय से उत्‍तीर्ण किया । दामाद श्री योगेश फुलवारिया निवासी अजमेर डॉक्‍टर हैं । दूसरी पुत्री मधु ने एम.ए. हिन्‍दी में जोधपुर वि.वि. से उत्‍तीर्ण किया । जिसकी शादी बड़ी सादड़ी जिला चित्‍तोड़गढ़ के श्री दुर्गाप्रसाद रेडिया के साथ हुई जो वर्तमान में जे.टी.ओ. के पद पर गावा में नियुक्‍त हैं । बड़े पुत्र मुकेश नवल ने एम.ए. लोक प्रशासन जोधपुर वि.वि. से उत्‍तीर्ण किया । उसका विवाह मुम्‍बई निवासी श्‍यामलालजी सेवलिया की पुत्री सीमा से हुआ है । सीमा ने एम.कॉम. बम्‍बई विश्‍वविद्यालय से किया । छोटा पुत्र विक्रम नवल वर्तमान में ब्रिसबेन (आस्‍ट्रेलिया) में एम.पी.ए. तथा एम.बी.ए. की पढ़ाई कर रहा है । श्री नवल का परिवार एक सुशिक्षित परिवार है । रैगर समाज को इन पर गर्व है ।

श्री नवल सरकारी सेवा में रहते हुए कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े रहे हैं । राजस्‍थान जटिया (रैगर) विकास सभा, जोधपुर के महासचिव पद पर आपने 10 वर्षों तक सराहनीय सेवाएं दी । आप वर्तमान में अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष हैं तथा भारतीय दलित साहित्‍य अकादमी राजस्‍थान प्रदेश के वरिष्‍ठ सलाहकार हैं ।

आपने ‘रैगर जाति का इतिहास’ पुस्‍तक लिखी । इन्‍होंने इस पुस्‍तक मे रैगर जाति को प्रमाणिक, खोजपूर्ण और गौरवशाली इतिहास दिया । पंचम अखिल भारतीय रैगर महा सम्‍मेलन के अवसर पर विज्ञान भवन दिल्‍ली में दिनांक 27 सितम्‍बर, 1986 को भारत के तात्‍कालीन राष्‍ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह के कर-कमलों से इसका विमोचन हुआ । श्री नवल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं । आप एक आदर्श शिक्षक, कुशल प्रचारक, समाज सेवी, प्रख्‍यात लेखक, कवि और विद्वान् हैं । आपने सात साल तक राजस्‍थान में राजकीय महाविद्यालय सरदार शहर, कोटा, नीमकाथाना, कोटपूतली, जैसलमेर तथा बाड़मेर में व्‍याख्‍याता राज‍नीति विज्ञान के पद पर कार्य किया । तीन साल तक शासकीय महाविद्यालय खरगौन (मध्‍य प्रदेश) में व्‍याख्‍याता राजनीति विज्ञान के पद पर नियुक्‍त रहे । वर्ष 1977 में आपका चयन राजस्‍थान पुलिस सेवा में उप अधीक्षक के पद पर हुआ । आप भीम जिला राजसमन्‍द, जालौर, मकराना तथा जोधपुर (यू.आई.टी.) में उप अधीक्षक के पर पर नियुक्‍त रहे । पदौउन्‍नती के बाद आप अतिरिक्‍त पुलिस अधीक्षक सी.आई.डी. बार्डर इन्‍टेलीजेन्‍स जैसलमेर और जयपुर में नियुक्‍त रहे । पुलिस ट्रनिंग सेन्‍टर खेरवाड़ा जिला उदयपुर तथा जोधपुर में कमाण्‍डेन्‍ट के पद पर आपने सराहनीय सेवाएं दी । अतिरिक्‍त पुलिस अधीक्षक जिला जालोर तथा मालपुरा जिला टोंक में पद स्‍थापित रहे । 30 अप्रेल, 2004 को आप 37 वर्षों की प्रशंसनीय सेवाओं के बाद सेवा निवृत हुए । पुलिस विभाग नें नियुक्‍त‍ि के दौरान आपने कई साहसिक और चुनौतीपूर्ण कार्य किए ।

पुलिस जैसे विभाग में व्‍यस्‍त रहते हुए मौलिक ग्रन्‍थों की रचना करना और राष्‍ट्रीय स्‍तर के सर्वोच्‍च पुरस्‍कार प्राप्‍त करना आमतौर पर किसी भी पुलिस अधिकारी के‍लिए सपना है । मगर श्री नवल ने इन सपनों को साकार किया और उच्‍चाईयों को छुआ है । आप द्वारा लिखी गई ‘भारतीय पुलिस’ को पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्‍यूरो, गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा पं. गोविन्‍द वल्‍लभ पंत पुरस्‍कार से नवाजा गया । इसमें आपको प्रशंसा पत्र के साथ भारत सरकार द्वारा 7,000/- (सात हजार रूपया) नकद पुरस्‍कार राशि भी प्रदान की गई । यह पंत पुरस्‍कार पुलिस से सम्‍बन्धित विषयों पर हिन्‍दी में उत्‍कृष्‍ट लेखन के लिए दिया जाने वाल सर्वोच्‍च पुरस्‍कार है । श्री नवल रैगर समाज के पहले ख्‍यातिनाम लेखक है जिन्‍हें पंत पुरस्‍कार मिला है ।

श्री नवल ने ‘रैगर जाति का इतिहास’ और ‘भारतीय पुलिस’ के अलावा ‘मारवाड़ का अमर शहीद राजराम’ ग्रंथ भी लिखा है । यह दलित चेतना पर लिखा गया एक शोधपूर्ण ग्रन्‍थ है । भारतीय दलित साहित्‍य अकादमी, दिल्‍ली ने इस ग्रन्‍थ के लिए श्री नवल को 24 सितम्‍बर, 1994 को तात्‍कालीन समाज कल्‍याण मंत्री भारत सरकार श्री सीताराम केसरी के कर-कमलों से ताल कटोरा इन्‍डोर स्‍टेडियम, दिल्‍ली में दलित साहित्‍य अकादमी के समारोह में ‘डॉ. अम्‍बेडकर राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार’ प्रदान किया गया । इसन ग्रन्‍थों के अलावा श्री नवल के कई शोधपूर्ण लेख विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है । आकाशवाणी से वार्ताएँ भी प्रसारित हुई है । श्री नवलजी के द्वारा किये गए इन गौरवशाली कार्यो के लिए रैगर समाज को इन पर गर्व है ।

 

मुकेश कुमार गाड़ेगावलिया

(पत्रकार एवं कार्यकारिणी सदस्‍य, अ.भा.रै.महासभा, जयपुर)

 

Late Shri Roopchand Jluthariya

श्री रूपचन्‍द जलुथरिया के पूर्वज जयसिंहपुरा खोर जिसे मिर्जा राजा जयसिंह ने बसाया था, में रहते थे । जब सवाई जयसिंह ने जयपुर नगर का निर्माण सन् 1727 ई. में कराया तब इनके पूर्वज जयपुर में चाँदपोल द्वार के पास आकर नई बस्‍ती बना कर रहेन लग गये । तभी से इनका परिवार यहाँ पर रहनता आया है । इनका जन्‍म 25 नवम्‍बर सन् 1930 को हुआ । इनके पिता का श्री जोधालाल जी व दादा चौ. नाथू राम जी जलुथरिया थे । जयपुर में रैगर समाज सुधार कार्य के अग्रणी रहे स्‍व. लालाराम जी जलुथरिया चौ. नाथू राम जी के चचेरे भाई थे ।

मा. रूपचन्‍द जी ने रियासत काल में बड़ी कठिन परिस्थितियों में वर्नाक्‍यूलर फाइनल परिक्षा उत्तीर्ण की, और प्राइमरी स्‍कूल के प्रधानाध्‍यापक पद पर नियुक्‍त हुए । अध्‍यापक रहते हुए इन्‍होंने प्रथमा, विशारद, मैट्रिक, इन्‍टर, बी.ए., एम.ए.(इतिहास) व बी.एड. परीक्षायें उत्तीर्ण की तथा 40 वर्ष तक राजकीय सेवाकार्य करते हुए नरेना (जयपुर) सीनियर सैकण्‍डरी स्‍कूल से प्रधानाचार्य पद से सेवा निवृत हो गये ।

इन्‍होंने अपने पाँच छोटे भाईयों को भी उच्‍च शिक्षा दिलाई । इनके छोटे भाई रामधन जी कृषि विभाग में डिप्‍टी डाइरेक्‍टर पद पर रहते हुए स्‍वर्गवासी हो गये । एक भाई रतिकान्‍त बैंक मैनेजर है । सालिगराम जी शासन सचिवालय में सहायक सचिव पद से सेवा निवृत हो गये । इन्‍होंने बच्चियों की शिक्षा पर भी ध्‍यान दिया । जब जयपुर में हायर सैकेण्‍डरी पास लड़के भी बहुत कम थे तब इनकी बड़ी लड़की सावित्री ने सन् 1976 में एम.ए. पास कर लिया, वह जयपुर सम्‍भाग की पहली एम.ए. छात्रा है । इसके पश्‍चात् विद्या, विमला तथा अंजुरानी ने भी क्रमश: एम.ए., बी.एस.सी. व बी.ए. किया । आज इनकी दो लड़कियाँ राज्‍य सेवा में हैं तथा दोनों पुत्र देवेन्‍द्र कुमार व पवन कुमार को भी इन्‍जीनियरिंग तक‍ शिक्षा दिलवाई ।

इनकी बस्‍ती में समाज के सन्‍त महात्‍मा व समाज सुधारक प्राय: आया करते थे और वे लालाराम जी जलुथरिया के यहीं रूकते थे । उनके सम्‍पर्क के कारण इनकी बचपन से ही समाज सुधार में रूचि हो गई तथा द्वितीय अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेलन जयपुर से ही समाजकार्यों में भाग लेने लग गये थे ।

सम्‍मेलन के पश्‍चात् रैगर बन्‍धुओं द्वारा प्रस्‍ताव नम्‍बर 2 का पालन करने के कारण स्‍थान-स्‍थान पर किसानों, जागीरदारों तथा अन्‍य स्‍वर्णों द्वारा रैगरों पर मार-पीटाई व अन्‍य प्रकार के अत्‍याचार होने लग गये थे । फिर रैगर बन्‍धु भाग कर सुरक्षा हेतु जयपुर आते थे, तब ये उनके साथ पुलिस व अन्‍य अधिकारियों तथा मंत्रियों आदि के पास जाकर सुरक्षा की प्रार्थना करते और भाग दौड़ करते तथा अनेक गाँवों में भी जाते । हम अनेक युवक भी इनके साथ जाते थे ।

हमें अनेक स्‍थानों पर भूखे प्‍यासे ही भागदौड़ करनी पड़ती थी । कई जगह तो जान के भी लाले पड़ जाते थे । इन्‍होंने अखिल भारतीय रैगर महासभा के अधिकांश कार्यक्रमों में भी जगह-जगह भाग लिया तथा स्‍व. सुखराजसिंह जी आर्य नोगिया के साथ भी कंधे से कंधा मिलाकर लगभग सभी कार्यक्रमों में भाग लिया । इसके पश्‍चात् जब तीन नवम्‍बर का कार्य छोड़ने पर 1970 के आसपास अनेक गाँवों में रैगर बंधुओं पर पुन: अत्‍याचार होने लगे और महासभा तथा अन्‍य लोगों का सहयोग प्राप्‍त नहीं हुआ तो जयपुर के तथा बाहर के आये हुए अन्‍य नौकरी पेशा युवकों के सहयोग से राजस्‍थान प्रान्‍तीय रैगर महासभा का गठन कर उसके माध्‍यम से समाज बन्‍धुओं की भरपूर सहायता की और सुधार कार्य किया ।

ये सामाजिक कार्यों के लिये राजस्‍थान के अनेक स्‍थानों में भी गये और प्रान्‍त के बाहर व्‍यक्तिगत तथा सामाजिक कार्य हेतु पंजाब, हरियाणा, मध्‍य प्रदेश, गुजरात, महाराष्‍ट्र आदि प्रान्‍तों में भी अनेक जगह गये । इन्‍होंने समाज के नवयुवकों को शिक्षा प्रसार में भी बहुत सहयोग दिया तथा समाज सुधार सम्‍बंधी अनके कार्य किये । इन्‍होंने समाज में प्रचलित मृत्‍युभोज, गंगभोज, कौंली तथा अन्‍य विशाल भोज बन्‍द कराये व शराब तथा अंधविश्‍वास जैसी बुराईयों को बन्‍द कराने का भरसक प्रयत्‍न किया । जयपुर व आस-पास में जहाँ भी कोई सत्‍संग, पंचायत व सभा आदि होती तो ये अनेक युवाओं के साथ जाते, वहाँ समाज में व्‍याप्‍त कु‍रीतियों का जम कर विरोध करते और समाज सुधार व शिक्षा प्रसार पर बल देते । सत्‍संग में जो भांग, गांजा व सुलफा बाज़ साधु होते उनका विरोध करते और साधु मंडली से उन्‍हें बाहर कराते ।

इनके द्वारा अनेक स्‍थानों के भ्रमण, समाज सुधारकों से सम्‍पर्क तथा समाज की विभिन्‍न प्रकार की जानकारी होने के कारण मैंने तथा अन्‍य बन्‍धुओं ने इनसे समाज का इतिहास लिखने का आग्रह किया, जिसे इन्‍होंने सामाजिक जागृति हेतु स्‍वीकार कर लिया और अनेक प्रकार की खोज आरम्‍भ की ।

अब तक रैगर जाति के इतिहास के सम्‍बंध में जो भी लिखा गया है, उसमें ऐतिहासिक तथ्‍यों की खोज न कर मनगढ़त व काल्‍पनिक व पौराणिक बातों का अतिश्‍योक्तिपूर्ण वर्णन किया गया है । किन्‍तु इन्‍होंने ऐतिहासिक व भौगोलिक आधार द्वारा सही प्रमाण देकर एवं राजस्‍थान सरकार के गजट के आधार पर तथ्‍य जुटा कर रैगर जाति के इतिहास की रचना की है । इन्‍होंने तथ्‍यों की पुष्टि हेतु रैगर समाज की उत्‍पत्ति व विस्‍तार क्षेत्र मानचित्र द्वारा भी दर्शाये हैं ।

रैगर जाति का इतिहास पुस्‍तक आगामी पीढ़ि के लिये प्रेरणा स्‍त्रोंत रहेगी । इनके इस कार्य हेतु समाज बन्‍धु इन्‍हें सदियों तक याद करते रहेंगे । मैं इनके इस कार्य की सहृदय से प्रशंसा करता हूँ ।

इन्‍होंने रैगर समाज को गौरव, गरिमा और ऊचाईयाँ प्रदान की । 06-02-2008 को श्री रूपचन्‍द जलूथरिया जी का निधन हो गया । रैगर समाज के ऐसे समाज सेवी का नाम रैगर जाति के इतिहास में सदा के लिए अमर रहेगा ।

 

(साभार- मोती लाल मंडावरिया, स्‍वतन्‍त्रता सेनानी एंव पूर्व प्रधान घाटगेट रैगर पंचायत, जयपुर)

 

CM Chandoliya

इतिहास उसका बनता है, जो औरों के दिलों को अपनी सौरभ से सुवासित कर दे । जिस के रोम रोम में विकास की धारा एवं प्रगतिशील विचारों का वास हो, वो शख्स हर आम के दिल में राज करता हैं । राजस्थान की गुलाबी नगरी के तहसील विराटनगर के गांव मैड़ में धर्मनिष्ठ, श्रेष्ठीवर्य स्व. श्री मानसिंह चान्दोलिया माता श्रीमती घीसीदेवी के घर 5 जुलाई 1958 को जन्में सरल स्वभावी, मिलनसार श्री सी. एम. चान्दोलिया समाज के हर वर्ग का उत्थान करने के साथ वर्तमान में महानगर कलकत्ता में भारतीय राजस्व सेवा में आयुक्त सीमा शुल्क के उत्पाद शुल्क एवं कर के उच्च पद पर पदासीन होते हुए रैगर समाज का गौरव बढ़ा रहे है।

बचपन से विलक्षण प्रतिभा, सुसंस्कारों व उच्च विचारों से ओत-प्रोत श्री चान्दोलिया की प्राथमिक शिक्षा ग्राम मैड़ में हुई तथा उच्च माध्यमिक शिक्षा शाहपुरा में हुई । परास्नातक वर्ष 1981 में जयपुर से कर आप सरकरी सेवा में व्याख्याता (भूगोल) राजकीय महाविद्यालय प्रतापगढ़, बार, चिमनपुर (जयपुर) के पद पर रहते हुए । आपका 1984 में भारतीय राजस्व सेवा में आई आर. एस. के पद पर चयन हो गया और आप महाराष्ट्र की माया नगरी मुम्बई 1986 में सहायक कमीशन के पद पर रहे । आप मुम्बई से पदोन्नति होकर गुजरात के राजकोट, अहमदाबाद, काण्डला तथा उतरप्रदेश के लखनऊ में उपायुक्त के पद सफलता पूर्वक कार्य करते हुए अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। वर्ष 1997 में अपर आयुक्त के पद पर बिहार के हजारीबाग, पटना रहे । आप 2004 मे पदोन्नति होकर अहमदाबाद में आयुक्त सीमा शुल्क के उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर के पद पर पदासीन रहे । आपका 2011 में स्‍थानांतरण कलकत्ता हो गया और आप यहां पर आसुक्त सीमा शुल्‍क के उत्‍पादन एवं सेवा कर के पद पर पदासीन होकर रैगर समाज की शोभा बढ़ा रहे ।

कुशल प्रशासक, नेतृत्व दक्ष, विकास के आधार पुरुष, निष्काम सेवा भावी समाज को सर्वपरी मानने वाले श्री सी. एम चांदोलिया ने समाज के चहुमुखी विकास के लिए सदैव तत्पर रहते हैं आपने रैगर धर्मशाला हरीद्वार, रामदेवारा, मैड़, रैगर छात्रावास जयपुर में हर संभव आर्थिक सहयोग प्रदान किया । श्री चान्दोलिया समाज के कार्यो में भी पूरी उत्साह एवं समर्पण भाव से काम करते आ रहे है आपने प्रथम चुनाव अधिकारी के रुप सन् 2003 में अखिल भारतीय रैगर महासभा (पंजी.) के विधिवत् चुनाव करवाकर एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी होने का परिचय दिया । आप समाज कई सामुहिक विवाह समारोह महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे आप त्रिवेणीधाम में 2 मई 2007 का आयोजीत सामुहिक विवाह में मुख्य अतिथि के रुप में पधारे, 19 मई 2008 में अपनी जन्म भूमि मैड़ में संरक्षक के रुप 54 जोड़ों का सामुहिक विवाह सम्मेलन करवाया । 13 जून 2009 को नेरहेठ तह थाना गाजी जिला अलवर में भी आप के संरक्षक में सामुहिक विवाह का आयोजन हुआ । 2 दिसम्बर 2009 को गुजरात के अहमदाबाद शहर प्रथम 54 जोड़ों का विशाल सामुहिक विवाह सम्मेलन आपके अथक प्रयासों व आपकी अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ वर्तमान में आप रैगर समाज के इतिहास के शोध में प्रयासरत है आपके अध्‍यक्षता में गुजरात के अहमदाबाद में सम्‍पन्‍न सामुहिक विवाह सम्‍मेलन की स्‍मारिका के तोर पर पुस्तक रैगर गरिमा का सम्पादन कर प्रकाशन किया है । अनुभव के आलोक, आदर्श जीवन की प्रतिभा, धर्मनिष्ठ श्री चांदोलिया अपने जीवन में समाज के विकास, युवा वर्ग को शिक्षा तथा सामाजिक एकता के साथ धार्मिक क्रियाओं, उच्च विचारों, सरलता व सादगी को खास अहमियत देते है ।

श्री सी. एम. चान्दोलिया की धर्मपत्नी श्रीमती बसन्ती चान्दोलिया अपने अच्छे संस्कारों एवं मिलनसार व्यक्तित्व के कारण मैड़ की जनरल सीट पर वर्ष 2004 में सरपंच बनी । अपने कार्य काल में मानव सेवा को सर्वोपरी मानते हुऐ सभी वर्गो के लोगो के लिए हर संभव कार्य किया जो बहुत ही सराहनीय है । संस्कारों के महकता परिवार में श्री चान्दोलिया के एक पुत्र डॉ. वरुन है तथा एक सुपुत्री सुमन जिसकी शादी हो चुकी है आप वर्तमान में ए-163 महेश नगर जयपुर में निवास करते है ।

 

Female Cialis online, cheap lioresal. (साभार- श्री गोविन्‍द जाटोलिया सम्‍पादक – ‘रैगर ज्‍योति’)

 

   sua lal jatoliya

 

धर्मगुरू स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी के कृपा पात्र शिष्‍य श्री सुआलाल जी जोटोलिया (तंवर) का जन्‍म 3 अगस्‍त 1933 ई. केा रैगरान बड़ावास, ब्‍यावर में पिता श्री हंसराज जी जाटोलिया के एक अत्‍यंत साधारण से परिवार में हुआ । इनका जीवन कुसुम कंटकों में विकसित हुआ । इनकी माता श्रीमती बिरजी देवी इनके बाल्‍यावस्‍था में ही इन्‍हें पिता के हवाले कर स्‍वर्ग सिधार गई । पिता का सम्‍बल भी इन्‍हें लम्‍बे समय तक नसीब नहीं हो सका और वे इनकी किशोरावस्‍था में चल बसे, ऐसे में इनका जीवन दूभर हो गया, और शिक्षा अध्‍ययन बीच में ही छोड़ना पड़ा । उन्‍हीं दिनों राष्‍ट्रीयता व प्रगतिशील सामाजिक विचारों के उन्‍नायक इनके शिक्षा गुरू श्री सिद्धेश्‍वर शास्‍त्री के सम्‍पर्क एवं मार्गदर्शन से इनमें न केवल शिक्षा प्राप्ति को जारी रखने का साहस जाग्रत हुआ बल्कि किशोरावस्‍था से ही स्‍वावलम्‍बन व आत्‍मविश्‍वास की भावना का भी विकास हुआ । किसी ने ठीक ही कहा है, ‘निहायत तंगगस्‍ती में जो पढकर थाम ले, मीना उसी का है’ । श्री शास्‍त्री जी के मार्गदर्शन में इन्‍होंने हाई स्‍कूल परीक्षा उत्तीर्ण की और उसी वर्ष बेसिक ट्रेनिंग पास करके ये राजकीय सेवा में अध्‍यापक बने । राजकीय सेवा में रहते हुए ही इन्‍होंने उत्तरोत्तर स्‍नातक, स्‍नातकोत्तर एवं बी.एड. उपाधियां हांसिल की । राजकीय सेवा में व्‍यस्‍त रहते हुए इनकी यह सफलता उनकी व इनके बाद की पीढ़ियों के उन नौजवानों के लिए प्रेरक, मार्गदर्शक उदाहरण है जो अपने कंधों पर बिना किसी खास जिम्‍मेदारी के होते हुए भी विद्यार्जन में ऐसी सफलता हांसिल नहीं कर पाते ।

आपके जीवन में काफी उतार चढ़ाव आये पर दृढ इच्‍छा शक्ति एवं उत्तरोत्तर प्रगतिपथ पर अग्रसर होते हुए कुछ कर गुजरने की धुन के धनी श्री सुआलाल जी के कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । अपने आत्‍मबल, सूझबूझ, साहस दृढ़ता व धैर्य पूर्वक काम करते हुए उन्‍होंने न केवल राजकीय कर्तव्‍यों का निष्‍ठापूर्वक निर्वहन किया बल्कि अपने परिवार जनों में सामाजिक मर्यादा व उत्तम संस्‍कारों का बीजारोपण एवं विकास किया । जैसा कि यह माना जाता है, कि हर सफल व्‍यक्ति की सफलता के पीछे महिला का सहयोग भी महत्‍वर्पण होता है, श्री सुआलाल जी की बहु-आयामी सफलता के पीछे भी इनकी धर्मपत्नि श्रद्धेय श्रीमती गंगा देवी के सहयोग को भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं आंका जा सकता । उन्‍होंने न केवल घर को पूरी तरह सम्‍हाला, अपने पति के अध्‍ययनकाल और फिर बाहरवास के दौरान परिवार की दैनिक जिम्‍मेदारियां बखूबी निभाई अपितु इन्‍हें स्‍वाभाविक तौर पर पढ़ने, सोचने, समझने और प्रगतिपथ पर निरन्‍तर अग्रसरित होते रहने में अनुकरणीय सहयोग दिया जिससे ये इतनी ऊचाईयों को छू सके । अन्‍यथा अधिकांश व्‍यक्ति राजकीय सेवा में अपने कार्य-समय के बाद परिवार के मामूली छोटे-मोटे कार्यों में ही इतने उलझे रह जाते हैं कि कुछ और सोचने और करने के लिए समय ही नहीं बचता ।

अपने सम्‍पूर्ण जीवन काल में आपने अपने व्‍यक्तित्‍व में तुलसी दास के इस कथन को चरितार्थ किया है – ‘सरल सुभाव छुयौ छल नाहीं ।’ वे ‘सादा जीवन और उच्‍च विचार’ सिद्धांत की प्रतिमूर्ति हैं । सरलता, सौम्‍यता और सद्भाव के धनी श्री सुआलाल जी स्‍वभाव से ही सुचिता हैं । आपके व्‍यक्तित्‍व में अध्‍यात्मिक उदात्‍तता और सात्विकता का अनोखा संगम सुदृष्‍य है जो इनके समान स्थिति वाले व्‍यक्तियों में दुर्लभ होता है । उनके व्‍यक्तित्‍व की बात करते समय गीता का यह श्‍लोक याद आता है – सद्भावे साधुवावे च सदित्‍येत प्रयुज्‍यते । आपने सादा जीवन और उच्‍च विचार के सिद्धान्‍त को वास्‍तविक अर्थों में आत्‍मसात किया और अपने सम्‍पर्क में आने वाले अन्‍य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित किया । लम्‍बे समय तक राजकीय सेवा में रहते हुए प्रशासनिक कार्य एवं समाज सेवा में स्‍वार्थ इन्‍हें स्‍पर्श तक नहीं कर पाया । आपने अपने जीवन में अपने कर्तव्‍यों के प्रति सदा समर्पण भाव ही रखा और सरकारी सेवा और समाज में सुस्‍थापित सिद्धांतों के अनुरूप ही कार्य किया और सरकारी सेवा और समाज में सुस्‍थापित सिद्धांतों के अनुरूप ही कार्य किया और अब भी गिरते मानवमूल्‍यों की पुनर्स्‍थापना के प्रयास में जब भी मौका मिलता है, समाज को लाभान्वित करने का अवसर नहीं चूकते ।

राजस्‍थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रधानाध्‍यापक परीक्षा में उत्‍कृष्‍ट परिणाम का दिन इनकी प्रेरणा का श्रोत बना, जिसने इनके जीवन को एक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण मोड़ दिया । शिक्षा विभाग की सेवा में रहते हुए ये सीधे प्रधानाध्‍यापक पद पर नियुक्त हुए, तदन्‍तर पदोन्‍नत्ति पाकर प्राचार्य पद को सुशोभित किया और इसी पद से सेवा निवृत्त हुए । अपने सेवाकाल में अध्‍यापक, प्रधानाध्‍यापक और फिर प्राचार्य पद पर जगह-जगह पदस्‍थापित रहते हुए इन्‍होंने अपनी उत्‍कृष्ठ कार्य प्रणाली, व्‍यवहार कुशलता व वाक्चातुर्य की छाप छोड़ी एवं समाज के विभिन्‍न वर्गों की प्रशंसा एवं विश्‍वास हांसिल करते रहे । इन्‍होंने न केवल अपने सरकारी कर्तव्‍य मात्र की निष्‍ठापूर्वक पालना की अपितु सभी जगह समाज सेवा के क्षेत्र में भी अनेक अविस्‍मरणीय उदाहरण कायम किए ।

श्री सुआलाल जी ने समाज द्वारा सौंपे गये विभिन्‍न पदों पर रहते हुए निष्‍ठापूर्वक समाज की सेवा की । इनकी उत्‍कृष्‍ट योग्‍यता, निष्‍पक्षता, स्‍पष्‍टवादिता को स्‍वीकारते हुए इन्‍हें अखिल भारतीय रैगर महासभा का महामंत्री बनाय गया । समाज की निस्‍वार्थ सेवा, त्‍याग और मानवमूल्‍यों की पुनर्स्‍थापना के प्रति इनके सार्थक प्रयासों एवं इनकी योग्‍यता के सम्‍मान स्‍वरूप भारत के तत्‍कालीन महामहिम राष्‍ट्रपति ज्ञानीजेल सिंह जी ने इन्‍हे ‘रैगर विभूषण’ के आंलकरण से ताम्रपत्र प्रदान कर सम्‍मानित किया ।

समाज में ऐसे व्‍यक्ति विरले ही मिलते हैं जो पूरे समय निष्‍ठा एवं सफलता पूर्वक के राजकीय सेवा से निवृत्त होकर राजनीति में भी उतने ही सफल रहें । अपने जीवन के उत्तरायण में राजकीय सेवा से निवृत्ति के पश्‍चात् श्री सुआलाल जी ब्‍यावर नगर परिषद में पार्षद चुने गये और अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में इन्‍होंने लगभग पूरे वार्ड में स्‍थाई महत्‍व के चिरप्रतीक्षित ऐसे कार्य करवाए जो आज भी इन्‍हें लोगों की प्रसंशा का पात्र बनाए हुए है । विचारशील लोगों ने आगे भी जनसेवा करते रहने का आग्रह किया, परन्‍तु राजनीति में घटते मुल्‍यों और स्‍वस्‍थ परम्‍पराओं के हृास के कारण इन्‍होंने अपने आप को राजनीति से अलग कर लिया और आम जन के हितार्थ, सामाजिक मूल्‍यों की पुनर्स्‍थापना, लोगों में फैले अंध विश्‍वास, समाज में व्‍याप्‍त कुरूतियों के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए अपने आप को सत्‍संग भजन के प्रति समर्पित कर दिया और सत्‍संग के दौरान प्रवचनों को इसका माध्‍यम बनाया ।

इन्‍होंने गुरू महाराज ज्ञानस्‍वरूप जी से बाल्‍यकाल में ही दीक्षा ले ली थी । समय-समय पर स्‍वामी जी से भेंट हुआ करती थी, स्‍वामी जी सुप्रसिद्ध धर्म तत्‍वेत्ता, दार्शनिक, विद्वान, ईश्‍वर भक्त थे । उन्‍होंने श्री सुआलाल जी को तत्‍समय सुशिक्षित नवयुवक पाकर समय-समय पर आध्‍यात्मिक ज्ञान व भजन, सतसंग की ऐसी प्रेरणा दी जो इनके लिए सर्वथा अविस्‍मरणीय है । ”धन्‍य जन्‍म जगतीतल वासु परहित सर्व निछावर जासु” स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी समाज की उन इनी गीनी विभूतियों में से एक थे जिन्‍होंने समाज हित व परहित को अपने जीवन का लक्ष्‍य बनाया । ‘तमसो मां ज्‍योतिर्गमय’ उनका लक्ष्‍य था । उन्‍होंने सम्‍पूर्ण समाज को ज्ञान का प्रकाश दिया ।

स्‍वामी जी ने जीवन के किसी क्षेत्र को नहीं छोड़ा जो उनकी प्रतिभा की पहुँच में था । सौभाग्‍य से ऐसे कर्मयोगी, त्‍यागी महात्‍मा के शिष्‍य रहे श्री सुआलाल जी । यह पूज्‍य स्‍वामी जी के तप:पूत और तेजस्‍वी व्‍यक्तित्‍व के सानिध्‍य का ही परिणाम है कि आपने अपने सेवाकाल में जितनी सफलता और प्रसंशा प्राप्‍त की उससे कहीं अधिक सत्‍संग, प्रवचन, ज्ञानचर्चा, भजनों और वाणियों की आम जन को आसानी से समझ में आने वाली सरल से सरल भाषा में इस प्रकार सहज व्‍याख्‍या की कि ये लम्‍बे समय सन्‍यास ग्रहण किए सन्‍तों के भी प्रशंसा के पात्र हुए । सत्‍संगों में इन्‍हें न केवल गूढार्थ वाली वाणियों की व्‍याख्‍या करने के लिए प्रमुखता से अवसर दिया जाता है बल्कि अपने सरल किन्‍तु प्रभावोत्‍पादक प्रवचनों से ये आम जन के मन को छू लेने वाली बातों के द्वारा समाज सुधार के कार्य में भी अनवरत लगे हुए है । श्री सुआलाल जी ने न केवल टीका के रूप में यह साहित्‍य सृजन किया है, वे संगीत में भी निष्‍णांत हैं । उनकी गायन शैली अत्‍यंत मधुर, स्‍पष्‍ट एवं श्रोताओं को सुग्राह्म है । उन्‍होंने सत्‍संग की शाश्र्वत सार्थकता को हृदयंगम और आत्‍मसात किया और फिर उस शाश्र्वत सत्‍य को हृदय की समग्र निष्‍ठा से इस टिका में प्रस्‍तुत किया है ।

स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप जी द्वारा रचित ज्ञान भजन प्रभाकर में सम्मिलित भजन वाणियों की गहराई प्राय: आम जन की समझ के बाहर है । सुआलाल जी ने इसका सरल भावर्थ करके वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के आध्‍यात्मिक ज्ञानवर्धनक जो प्रयास किया है । बाह्म जगत का अन्‍तर्जगत से सम्‍बंध सत्‍संग के माध्‍यम से ही सम्‍भव है । अनुभूति प्रकाशित होने के लिए अनुभूति मांगती है – इसे ही दैहिक स्‍तर पर अनुभव कहते हैं । और मानसिक स्‍तर पर रचना प्रक्रिया । इस टीका के अध्‍ययन से यह स्‍पष्‍ठ है की श्री सुआलाल जी आध्‍यात्‍म, तत्‍वबोध और सत्‍संग की सार्थकता के पर्याप्‍त अनुभवी है । स्‍वानुभूति के रस में सुग्राह्म शब्‍दों को निमग्‍न कर जिस सरलता से इन्‍होंने यह टीका प्रस्‍तुत की है, वह आमजन के दिलोदिमाग में सत्‍संग की सार्थकता को पुन: प्रमाणित करने के लिए पर्याप्‍त है । मुझे इसमें सबसे बड़ी विशेषता यह लक्षित हुई कि इसमें कहीं भी व्‍यर्थ शबदाडम्‍बर एवम् आत्‍मश्‍लाघ नहीं है । मिश्री के कूंजे की भांति सम्‍पूर्ण टीका अत्‍यंत मधुर और प्रभावक है । यह टीका साहित्‍य, संगीत और अध्‍यात्‍म का ऐसा संगम है जो न केवल साहित्‍यविदों, संतों, चिन्‍तकों, जनसेवकों के लिए सहायक सिद्ध होगी अपितु इसमें जीवन के प्रत्‍येक पक्ष का ऐसा समुज्‍जवल स्‍वरूप प्रस्‍तुत हुआ है कि वह आम जन के लिए प्रेरणा का श्रोत और अपने जीवन को सार्थक बनाने का माध्‍यम बन सकेगी ।

श्री सुआलाल जी के द्वारा यह टीका लिखने का प्रमुख कारण स्‍वामी जी के प्रति आस्‍था समाज कल्‍याण तथा समाज की सुव्‍यवस्‍था के लिए गुरूजनों, अपने बड़ों का आदर, विद्वानों का सम्‍मान, माता-पिता के प्रति श्रद्धा, छोटों के प्रति प्रेम है । श्री सुआलाल जी एक शिक्षक, राजनीतिज्ञ, सत्‍संगी, साहित्‍यकार, उत्‍कृष्‍ट काव्‍यगायक, आध्‍यात्‍म चिन्‍तक, समाज सुधारक के साथ-साथ एक सुहृदय मानुष भी हैं । इतनी विशिष्‍टताएं एक ही व्‍यक्ति में होना उनके लिए सौभाग्‍य की बात है तो हमारे समाज के लिए गर्व की । श्री सुआलाल जी के व्‍यक्तित्‍व और उनके द्वारा इस टीका की आत्‍मविभोर प्रस्‍तुती ने हमारे रैगर समाज को गौरवान्वित किया है । आपकी वृद्धावस्‍था से अप्रभावित रह कर आपकी सृजनशील यात्रा समृद्धतर हो, आप सत्‍संग की सार्थकता को और अधिक अनुप्रमाणित करते रहें, यही मन: कामना है !

महन्‍त सुआलाल तंवर (जाटोलिया) : (सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य)
सुरजपोल गेट, रैगरान बड़ावास, ब्‍यावर, जिला अजमेर, पिन कोड – 305901
मोबाइल नम्बर 07597875327, घर – 01462-251017

 

परिचय अनुवादक
एम.एल. भट्ट,
सेवानिवृत्त आर.ए.एस. अधिकारी,
बी-21, सरस्‍वती नगर, जोधपुर