रैगर महासभा ने मायावती के खिलाफ “राम” की तुलना करने पर किया मुकदमा दर्ज

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नई दिल्‍ली। ऑल इंडिया रैगर महासभा (All India Raiger Mahasabha) की ओर से मायावती के खिलाफ दिल्‍ली के तीस हजारी कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई गई है। महासभा की ओर से दी गई शिकायत में यह कहा गया है कि उनके एक बयान से कथित तौर पर लोगों की भावना आहत हुई है।

चुनाव आयोग के 48 घंटे के बैन के बाद अब मायावती के सामने एक और नई परेशानी खड़ी हो गई है. उनके खिलाफ ऑल इंडिया रैगर महासभा ने दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में  शिकायत दर्ज कराई है. शिकायत में कहा गया है कि कि मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अपनी तुलना भगवान श्री राम से की है. मायावती ने कहा कि अगर राम की मूर्ति सरकारी पैसे से लग सकती है तो उनकी क्यों नहीं?

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती ने मूर्तियों पर पैसे खर्च करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जवाब में दो अप्रैल को हलफनामा दाखिल किया था. उन्होंने अपने हलफनामे में कहा था कि मेरी मूर्तियां जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती हैं. मूर्तियों का निर्माण राज्य विधानसभा में पर्याप्त चर्चा के बाद बजट आवंटित करके किया गया था. कोर्ट विधायकों द्वारा बजट के संबंध में लिए गए निर्णयों पर सवाल नहीं कर सकता.

मायावती ने यह भी कहा था कि मूर्तियां जनता की इच्छा और जनादेश को दर्शाती हैं. विधानसभा के विधायक चाहते थे कि कांशी राम और दलित महिला के रूप में  मायावती के संघर्षों को दर्शाने के लिए मूर्तियां स्थापित की जाएं. मायावती ने हलफनामे में कहा कि अन्य राजनीतिक पार्टियां भी राजनेताओं की मूर्तियां बनवाती हैं. यह उन राजनेताओं के प्रति चाह और समर्थन को दर्शाता है.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा था कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपनी और हाथियों की मूर्तियां बनाने में जितना जनता का पैसा खर्च किया है, उसे वापस करना चाहिए. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में दायर रविकांत और अन्य लोगों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि मायावती को मूर्तियों पर खर्च सभी पैसों को सरकारी खजाने में जमा कराना चाहिए.

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मायावती के वकील को कहा कि अपने क्लाइंट को कह दीजिए कि सबसे वह मूर्तियों पर खर्च हुए पैसों को सरकारी खजाने में जमा कराएं. उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के दौरान लखनऊ विकास प्राधिरकरण के सामने एक रिपोर्ट पेश हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि लखनऊ, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बनाए गए पार्कों पर कुल 5,919 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे.

रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा स्थित दलित प्रेरणा स्थल पर बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की पत्थर की 30 मूर्तियां जबकि कांसे की 22 प्रतिमाएं लगवाई गईं थी. इसमें 685 करोड़ का खर्च आया था. इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इन पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए 5,634 कर्मचारी बहाल किए गए थे.

बता दें कि मायावती ने अप्रैल 2019 को मूर्ति विवाद पर कहा था कि उत्‍तर प्रदेश सरकार अगर सरकारी धन से भगवान राम की मूर्ति बनवा सकती है तो वह अपनी मूर्ति क्‍यों नहीं बनवा सकती ?

मूर्ति पर मायावती का बयान
मायावती ने लखनऊ और नोएडा में स्मारकों में लगी अपनी मूर्तियों को सही ठहराते हुए अप्रैल में कहा था कि ये जनभावना का प्रतीक हैं। उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में वंचित और दलित समुदाय के लिए किए गए उनके काम और त्याग को देखते हुए और दलित महिला नेता होने के नाते उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हुए जनभावना के प्रतीक के तौर पर उनकी मूर्तियां लगाई गई हैं। उन्‍होंने कहा कि कांशीराम की मूर्तियों के साथ उनकी मूर्तियां लगाने की विधानसभा की इच्छा के खिलाफ वह नहीं जा सकती थी। उनकी मूर्तियां लगाया जाना विधानसभा की जनभावनाओं को प्रदर्शित करने की इच्छा का नतीजा हैं।

क्‍या है मूर्ति विवाद
लखनऊ और नोएडा के स्मारकों में लगी मायावती की मूर्तियों पर अक्‍सर दूसरी पार्टियों द्वारा आरोप-प्रत्‍यारोप चलता रहता है। मामला तूल पकड़ने के बाद कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच गया।

अखिल भारतीय रैगर महासभा निर्वाचन प्रोविजनल मतदाता सूची 2019

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अखिल भारतीय रैगर महासभा निर्वाचन प्रोविजनल मतदाता सूची 2019

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Final List Mahasbha-converted Full Final 28 Jan 2019

बी एल जाटोलिया (वर्मा) (आर.ए.एस. सेनि.)
निर्वाचन अधिकारी
मो. 9414009951

निवेदन है कि मतदाता सुची में नाम, पता में अशुद्धि हो, मतदाता स्वर्गवासी हो गया हो, इत्यादि जैसे पता अपूर्ण हो, पिन नम्बर न हो तो शुद्धिकरण हेतु ई मेल [email protected] OR [email protected] पर दिनांक 02.02.2019 तक भेजने का श्रम करें। इस संदर्भ में अधिसूचना दिनांक 07/15.01.2019 का संदर्भ लेवे।

नशा एक अभिशाप !

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नशा एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। नशे के लिए समाज में शराब, गाॅजा, भाॅग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्बाकू और धूम्रपान बीडी, सिगरेट, हुक्का, चिलम सहित सरस, स्मैक, कोकीन, ब्राउन शुगर, जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। इस जहरीले और नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुॅचने के साथ ही इससे सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता है। साथ ही स्वयं और परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को भी बहुत नुकसान पहुॅचाता है। नशा के आदी व्यक्ति को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। नशे करने वाला व्यक्ति परिवार के लिए बोझ स्वरूप हो जाता है। उसकी समाज के लिए उपादेयता शून्य हो जाती है। वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है तथा शान्ति पूर्ण समाज के लिये अभिशाप बन जाता है। नशा एक अन्तर्राष्ट्रीय विकराल समस्या बन गयी है। इस दुव्र्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग और विशेष कर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है। जो इसके चंगुल में फंस गया वह स्वयं तो बर्बाद होता ही है, इसके साथ ही उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है। आज कल देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इसकी चपेट में दिनों दिन आ रहा है, वह तरह-तरह के नशे जैसे तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और शराब के चंगुल में फंसता ही जा रहा है जिसके कारण उसका कैरियर चौपट हो रहा है।

नशा एक अभिशाप है। यह एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। नशे के लिए समाज में शराब, गांजा, भांग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्‍बाकु और धूम्रपान (बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम) सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। इन जहरीले और नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुंचने के साथ ही इससे सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता ही है साथ ही स्‍वयं और परिवार की सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाता है। नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है। नशे करने वाला व्‍यक्ति परिवार के लिए बोझ स्वरुप हो जाता है, उसकी समाज एवं राष्ट्र के लिया उपादेयता शून्य हो जाती है। वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है तथा शांतिपूर्ण समाज के लिए अभिशाप बन जाता है। नशा अब एक अन्तराष्ट्रीय विकराल समस्या बन गयी है। दुर्व्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग और विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे है। इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है। जो इसके चंगुल में फंस गया वह स्वयं तो बर्बाद होता ही है इसके साथ ही साथ उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है। आज कल अक्सर ये देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इसकी चपेट में दिनों-दिन आ रहा है वह तरह-तरह के नशे जैसे- तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और शराब के चंगुल में फंसती जा रही है। जिसके कारण उनका कैरियर चौपट हो रहा है। दुर्भाग्य है कि आजकल नौजवान शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के चक्कर में अपना लेते हैं। इन सभी मादक प्रदार्थों के सेवन का प्रचलन किसी भी स्थिति में किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जनीय होना चाहिए।
जैसा कि हम सभी जानते हैं धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होती है और यह चेतावनी सभी तम्बाकू उत्पादों पर अनिवार्य रूप से लिखी होती है, और लगभग सभी को यह पता भी है। परन्तु लोग फिर भी इसका सेवन बड़े ही चाव से करते हैं। यह मनुष्य की दुर्बलता ही है कि वह उसके सेवन का आरंभ धीरे-धीरे करता है पर कुछ ही दिनों में इसका आदी हो जाता है, एक बार आदी हो जाने के बाद हम उसका सेवन करें, न करें; तलब ही सब कुछ कराती है।
समाज में पनप रहे विभिन्न प्रकार के अपराधों का एक कारण नशा भी है। नशे की प्रवृत्ति में वृध्दि के साथ-साथ अपराधियों की संख्या में भी वृध्दि हो रही है। नशा किसी भी प्रकार का हो उससे शरीर को भारी नुकसान होता है, पर आजकल के नवयुवक शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के लिए उपयोग में ला रहे हैं। यहां तक की दूसरे व्यक्तियों द्वारा ध्रूमपान करने से भी सामने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में कैंसर और अन्य रोग हो सकते हैं। इसलिए न खुद धूम्रपान करें और न ही किसी को करने दें। कोकीन, चरस, अफीम ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिसके प्रभाव में व्यक्ति अपराध कर बैठता है। इनके सेवन से व्यक्ति पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। इसी तरह तंबाखू के सेवन से तपेदिक, निमोनिया और सांस की बीमारियों सहित मुख फेफडे और गुर्दे में कैंसर होने की संभावनाएं रहती हैं। इससे चक्रीय हृदय रोग और उच्च रक्तचाप की शिकायत भी रहती है।
डॉक्टरों का कहना है कि शराब के सेवन से पेट और लीवर खराब होते हैं। इससे मुख में छाले पड़ सकते हैं और पेट का कैंसर हो सकता है। पेट की सतही नलियों और रेशों पर इसका असर होता है, यह पेट की अंतड़ियों को नुकसान पहुंचाती है। इससे अल्सर भी होता है, जिससे गले और पेट को जोड़ने वाली नली में सूजन आ जाती है और बाद में कैंसर भी हो सकता है। इसी तरह गांजा और भांग जैसे पदार्थ इंसान के दिमाग पर बुरा असर डालते हैं। इन सभी मादक द्रव्यों से मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ समाज, परिवार और देश को भी गंभीर हानि सहन करनी पड़ती है। किसी भी देश का विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, लेकिन नशे की बुराई के कारण यदि मानव स्वास्थ्य खराब होगा तो देश का भी विकास नहीं हो सकता। नशा एक ऐसी बुरी आदत है जो व्यक्ति को तन-मन-धन से खोखला कर देता है। इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जाती है। इस बुराई को समाप्त करने के लिए शासन के साथ ही समाज के हर तबके को आगे आना होगा। यह चिंतनीय है कि जबसे बाजार में गुटका पाउच का प्रचलन हुआ है, तबसे नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग भी गुटका पाउच के चपेट में है।

-: जरा इस ओर ध्‍यान देवें :-

:- शराब पीने वाले व्यक्ति का 50/- रु. रोज का खर्च मानकर चलें, तो एक महीने का 1,500/- रु. व सालभर में 18,000/- रु. होते हैं। एक व्यक्ति अपने जीवन भर में 50 वर्ष शराब का सेवन करता है तो 9,00,000/- रु. (नौ लाख) फिजूल खर्च कर देता है।
:- सिर्फ एक साल की बचत 18000/- रु. पोस्ट ऑफिस में फिक्स (किसान विकास-पत्र) जमा कराने से 42 वर्ष, 11 महीने तक रिन्यू कराते रहने पर यह रकम 5,76,000/- रु जमा हो जाती है। जो आपकी जिन्दगी के लिए पेन्शन या बच्चों की शिक्षा के काम आ सकती है।
:- बीड़ी पीने वाले व्यक्ति का बीड़ी व माचिस का कम से कम रोजाना का खर्च 10/- रु माने, तो एक महिने में 300/- रु सालभर में 3,600/- रु होते है। 50 वर्ष का हिसाब लगावें तो 1,80,000/- रु फिजूल खर्च में राख हो जाते है तथा कैंसर को न्योता! देते है।
:- गुजरात में तम्बाकू व गूटखे के सेवन से 32 हजार व्यक्ति हर वर्ष मरते है, कारण है, कैंसर।
:- अकेले भारत में एक दिन में 11 करोड़ की सिगरेट पी जाते है। इस तरह एक वर्ष में 50 अरब रु का धुंआ हो जाता है तथा कैंसर को निमंत्रण !

ये कैसी विडम्बना है कि सामाजिक हितो से सम्बन्धित तमाम मुद्दो व उससे जुड़े नकारात्मक प्रभावो पर हमारी सरकारे व सामाजिक सँगठन बहुत जोर शोर से आवाज उठाते हुए कुछ मसलो पर आन्दोलन तक छेड़ देते है परन्तु आये दिन इस तरह की होने वाली घटनाओ पर कभी भी कोई सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल न आवाज उठाते है और न ही इस गम्भीर समस्या के निदान की ब्रहद स्तर पर कोई पहल करते है। कुछ जागरुक व जिम्मेवार नागरिक स्थानीय स्तर पर कही कही कुछ थोड़े प्रयास जरुर करते रहते है लेकिन वे इस बुराई को जड़ से मिटाने मे कभी भी पूर्ण समर्थ नही हो पाते।
सबसे पहले हमे शराब से होने वाले सामाजिक दुःष्प्रभाव व उससे होने वाले धन जन की हानि के विषय मे विचार करना चाहिए। शराब का सेवन विभिन्न प्रकार से समाज के विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा किया जाता रहा है कुछ लोगों के लिए शराब का सेवन अपनी सोसाइटी मे दिखावे के लिए किया जाता है ऐसे लोग अच्छे ब्राण्ड की शराब का सेवन करते है तथा दिन मे किसी एक समय या फिर कभी कभी कुछ अवसरों पर करते है। आर्थिक रुप से सुद्रढ़ ये वर्ग सिर्फ मौज मस्ती के लिए ऐसा करते है। मध्यमवर्गीय व निम्नवर्गीय लोगों के लिए मधपान करने के अनेको कारण होते है, जिनके विषय मे प्रायः हम सभी जानते है कुछ लोग शौकिया पीने लगते है तो कुछ लोग संगत के असर से। कुछ लोग सीमित व सँतुलित रहते हुए समाज मे अपनी इस आदत को छिपाये रखते है तो कुछ लोग अतिरेकता मे बहकते हुए स्वच्छन्द हो जाते है ऐसे लोग एक बार जब सामाजिक मर्यादा की सीमाओ का उल्लघन कर देते है तो फिर वे समाज की मुख्यधारा से कटते चले जाते है।
शौकिया तौर पर लती हुए लोग जब आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते है तो स्थिति भयावह रुप ले लेती है खुद का रोजगार तो प्रभावित होता ही है प्राइवेट फाइनेन्सरो के जाल मे फँस कर कर्जदार तक हो जाते है और तब उनका ये शराब रुपी नशे का “रोग ” गम, उलझन व परेशानी से मुक्ति पाने की “दवा” भी बन जाता है। इस अवस्था मे ऐसे लोग गहरे अँधियारे मे धँसते चले जाते है। उन्हे शराब मे ही हर समस्या का समाधान दिखायी देता है। ऐसे मुश्किल क्षणो मे जब कोई करीबी उन्हे समझाने बुझाने व सुधारने के अतिरिक्त प्रयास करता है तो अक्सर उन्नाव जैसी घटना हो जाती है।
ऐसे लोगो पर समाज का दखल व असर नही होता क्योकि अक्सर लोगो के समझाने पर ये लोग सिर्फ एक ही जुमले का प्रयोग करते है ,” तुम्हारे बाप का पीते है क्या ” और तब हर स्वाभिमानी व्‍यक्ति ऐसे लोगो से दूर रहने मे ही अपनी भलाई समझता है। इन परिस्थितयो मे भुक्तभोगी परिवार पूरे समाज से अलग थलग पड़ जाता है कोई उनका दुःख सुनने वाला नही होता। निकट रिश्तेदार आखिर कितने दिनो तक करीब रहते हुए उनकी मदद कर सकते है।
सबसे खराब स्थिति उन बच्चो की होती है जो बालिग नही होते, माँ बाप की रोज की किच किच का उनके अर्न्तमन मे बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है ,ऐसे बच्चे मानसिक रुप से अन्य बच्चो की अपेक्षा पिछड़ जाते है घर का अच्छा माहौल न मिलने से उनमे दब्बूपन आ जाता है और वे हमेशा डरे डरे से रहते है अपने सहपाठियो से खुलकर बात नही कर पाते शिक्षक के समक्ष अपरोधबोध से ग्रसित व सहमे सहमे रहते है एक अँजान डर के कारण पढ़ा लिखा कुछ भी पल्ले नही पड़ता, हम हमारा समाज व सरकारे क्या कभी ऐसे लोगो के दुःख दर्द व मानवाधिकार से सम्बन्धित विषयो पर गौर करता है या फिर गौर करेगा ?
मेरा तो शाशन और प्रशाशन से ये अनुरोध है कि आखिर हम पूर्ण शराब बँदी क्यो नही लागू करते, जिस वस्तु से हमारा समाज दिन प्रतिदिन विषैला होता जा रहा हो उसका क्यो न हम पूर्ण तिलाँजलि कर दे कुछ गरीब परिवारो की जड़ो को खोखला करके हम अमीरो को और अमीर करके क्या हासिल करना चाहते है। अमीर व सँम्पन्न लोग ऐसा नशा खुद की कमाई से न करके इधर उधर के पैसो से करते है जब कि आम आदमी अपने खून पसीने के पैसो व उसके पश्चात जर जमीन बेँच कर नशा करते है और जब वह भी नही होता तो आम नागरिको के यहाँ लूटपाट करके समाज मे और विषम स्थिति पैदा करते रहते है।
किसी भी तरह के नशे से मुक्ति के लिए सिर्फ एक ही उपाय है वह है संयम वैसे तो संयम कई समस्याओं का समाधान है लेकिन जहां तक नशामुक्ति का सवाल है संयम से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं है हाँ सेल्फ मोटिवेशन भी नशामुक्ति में बेहद कारगर है या फिर किसी को मोटिवेट करके या किसी के द्वारा मोटिवेट होके भी नशे से मुक्त हुआ जा सकता है लेकिन यदि तम्बाकू का नशा करने वाला यदि संयम अपनाए तो इस पर जीत हासिल कर सकता है जब कभी तम्बाकू का सेवन करने की तीव्र इच्छा हो तो संयम के साथ अपना ध्यान किसी अन्य काम में लगा लें ज़्यादातर तम्बाकू को भुलाने की कोशिश करें वास्तव में यदि व्यक्ति हितों के प्रति जागरुक हैं तो वह किसी भी नशे की चपेट में आ ही नहीं सकता और यदि आ भी जाए तो थोडा सा संयम और सेल्फ मोटिवेशन उसे इस धीमे ज़हर से मुक्त कर सकता है। तम्बाकू और इसके घातक परिणामो से हम अपने करीबी और अपने मित्रों को परिचित करायें यदि कोई आपका करीबी तम्बाकू या किसी नशे की लत का शिकार है तो उसे मोटिवेट करके उसे संयम का रास्ता बताएं और नशे से मुक्त होने में उसकी मदद करें।
व्यसनों से मुक्ति पाने के लिए नशे करने वाले साथियों से अधिक से अधिक दूर रहें।, मेहमानों का स्वागत नशे से न करें। घर में या जेब में बीड़ी-सिगरेट न रखें।, बच्चों के हाथ बाजार से नशीली वस्तुएं न मंगवाएं, स्वयं को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें।, इसके अपने दोस्तों और पारिवारिक डॉक्टर की भी मदद लें।, नशे से जुड़ी चीजों को दूर रखें। सबसे खास़ बात इस धीमे जहर के सेवन न करने के प्रति खुद को मोटिवेट करें।
नशा नाश की जड़ है। नशा हर बुराई की जड़ है। इससे बचकर रहने में ही भलाई है। इन पदार्थों से छुटकारा दिलाने के लिए पीड़ित व्यक्तियों का उपचार आवश्यक है। इस दिशा में शासन के द्वारा जिला स्‍तर पर नशामुक्ति केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में मादक द्रव्य अथवा मादक पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों को छुटकारा दिलाने के लिए नि:शुल्क परामर्श सहित उपचार किए जाते हैं। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न सूचना तंत्रों के माध्यम से नशापान के विरूध्द लोगों में जनजागरूकता लाई जा रही है। राज्य के विभिन्न महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों में नशा करने से होने वाले हानि को प्रदर्शित करते हुए होर्डिंग्स लगाए गए हैं। नशे के दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रदेश में जनसहभागिता से रैली, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और परिचर्चा आदि के आयोजन के साथ ही नशे के दुष्परिणामों को दर्शाने वाली पाम्पलेट, ब्रोसर आदि वितरित किए जा रहे हैं। नशामुक्ति के लिए 30 जनवरी को नशामुक्ति संकल्प और शपथ दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी प्रकार 31 मई अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस’, 2 से 8 अक्टूबर तक मद्यनिषेध सप्ताह और 18 दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर नशे को जड़ से मिटाने के लिए हमें हर दिवस को नशामुक्ति दिवस के रूप में मनाना चाहिए।

नशा करने के नुकसान – After effects of addiction
नशा करने से लाभ कुछ नहीं होता लेकिन इसके नुकसान बहुत ज्यादा है। सिगरेट , बीड़ी , हुक्का , गुटका आदि में तम्बाकू होता है। जिसके उपयोग से क्षणिक फुर्ती व ताजगी का अनुभव होता है। शुरू में नुकसान दिखाई ना पड़ने के कारण इसका उपयोग बढ़ता चला जाता है। तम्बाकू के विषैले तत्व शरीर के लिए बहुत हानिकारक होते है। धीरे धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते है। तम्बाकू के कारण कैंसर जैसा भयानक रोग हो जाता है। कई लोग तम्बाकू से कैंसर होने के कारण बर्बाद हो जाते है। शराब का नशा करना आजकल फैशन सा हो गया है। इसे आवभगत करने का साधन बना लिया गया है। भारत जैसे गर्म प्रदेशों में शराब का उपयोग बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। ज्यादा सर्दी वाले देशों में थोड़ी मात्रा में इसका उपयोग सर्दी से बचाव कर सकता है। शराब का अधिक सेवन या गर्मी के मौसम में इसका उपयोग नुकसान देह ही होता है।
हमारा लीवर शराब को नहीं पचा पाता और रोग ग्रस्त हो जाता है। जिसके कारण बुखार , घबराहट , उल्टी , पेटदर्द हो सकते है। भूख बंद हो जाती है। इसके अलावा शराब से दिमागी शक्ति व स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है । नींद नहीं आती या डिस्टर्ब हो जाती है। शरीर का तापमान बनाये रखने की प्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। शराब से दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है। इससे साँस लेने में तकलीफ व थकान की समस्या भी हो सकती है।
इसी प्रकार हर प्रकार के नशे का शरीर पर बुरा असर ही होता है। नशा करने वाले सभी लोग जानते है की एक दिन नशा करने का गम्भीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। नशा करना छोड़ना भी चाहते है। लेकिन छोड़ नहीं पाते। शारीरिक , मानसिक और आर्थिक रूप से बहुत परेशान होने के कारण नशा जिंदगी का अभिशाप बन जाता है। कुछ लोग तो इसके कारण आत्महत्या जैसा संगीन कदम भी उठा लेते है।

शराब के अन्य घातक प्रभाव
हालांकि शराब आप को खुशी की भावना और होश दे सकता है, दवा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की प्रतिक्रियाओं को धीमा कर सकता है, और अंततः नशे के दौरान मूर्च्छा , एक व्यक्ति का रक्तचाप, नाड़ी, संचार और नर्वस सिस्टम के रूप में और श्वसन में कमी आती है. यदि आप थके हुए हैं और शराब पीते है, तब यह और भी हानिकारक हो सकता है और यह आपकी मौत का कारण भी बन सकता है. इससे शरीर की बीमारी बढ जाती है और बीमारी से लड़ने की क्षमता कमजोर पढ़ जाती है. शराब में अवशोषण और खून में पोषक पदार्थों की कमी हो जाती है. इसलिए हमारा आपको सुझाव है की यदि आपको किसी प्रकार के नशे की आदत है तो तुरंत ही उसे छोड़ दे अन्यथा आप कई और बुरे रोगों में ग्रस्त हो सकते हैं तथा इसकी लत अधिक हो जाने के कारन आपको गुर्दे का कैंसर तथा आपको मौत का सामना भी करना पड़ सकता है! भारी शराब की खपत पर प्रतिकूल अपने शरीर में हर अंग को प्रभावित कर सकते हैं. वहाँ एक बहुत ही बीमारियों और विकारों भारी पीने के साथ जुड़ा की लंबी सूची है, और उनमें से कुछ हैं :

गुप्तांगो से ख़ून का बहाव
उच्च रक्तचाप
हृदय रोग
हैपेटाइटिस
पेट, मुख, स्तन, जिगर आदि का कैंसर
रक्ताल्पता
अस्थि मज्जा दमन
अल्सर
अग्नाशयी
यौन रोग
नींद का न आना

आज हमारे सामने एक सबसे बड़ी सामाजिक समस्या पैदा हो रही है, युवाओं के नशे का शिकार होना. जो कल के होने वाले देश के जांबाज कर्णधार हैं आज वही सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं. जिनको देश की उन्नति में अपनी उर्जा लगानी थी वो आज अपनी अनमोल शारीरिक और मानसिक उर्जा चोरी, लूट-पाट और मर्डर जैसी सामाजिक कुरीतिओं में नष्ट कर रहे है.आज का ९० प्रतिशत युवा नशे का शिकार है. जिस तरह से टेक्नोलाजी विकसित हुई है, ठीक उसी तरह से नशे के सेवन में भी नई टेक्नोलाजी विकसित हुई है.

आज का युवा शराब और हेरोइन जैसे मादक पदार्थो का नशा नहीं बल्कि कुछ दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में कर रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस तरह की दवाएं आसानी से युवाओं की पहुँच में हैं और इनके सेवन से घर या समाज में किसी को एहसास भी नहीं होता कि इस व्यक्ति ने किसी मादक पदार्थ का सेवन किया है. इस बुराई के सबसे बड़े जिम्मेदार सिर्फ हम और आप है. आज की चकाचौंध भरी जिंदगी में हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि हमे यहाँ तक ख्याल नहीं रहता कि हमारा बच्चा किस रास्ते पर जा रहा है, क्या कर रहा है कोई परवाह नहीं. बस बच्चे कि ख्वाहिशें पूरी करते जा रहे हैं.

आज हमे पैसे कि लालच ने इतना अंधा कर दिया है कि हम सामाजिक बुराइयों को जन्म देने में जरा भी नहीं हिचकते. जिस व्यवसाय को लोग समाज में सबसे पूज्यनीय मानते थे वही आज इस बुराई को जन्म दे रहे हैं. जिन दवाओं को बिना डॉक्टर के पर्चे के नहीं मिलना चाहिए आज वही दवाएं धड़ल्ले से बिना पर्चे के और और कई गुना रेट पर मिल रही हैं. यहाँ तक कि ये दवाएं बनिए कि दुकानों पर भी मिल जाती हैं, जिससे युवा आसानी से उसका सेवन करते हैं. समाज के इस सबसे बड़ी बुराई को दूर करने के लिए सबसे पहले हमे जागरूक होना होगा फिर प्रशासन को. हमे लालच जैसी लाइलाज बीमारी को अपने अन्दर से निकल फेकना होगा, नहीं तो यह कुरीति धीरे-धीरे एक दिन हमें हमारे पुरे समाज को फिर हमारे इस पुरे सुन्दर भारत को खा जायेगा फिर हमारा दुनिया में कोई भी अस्तित्व नहीं रह जायेगा.

एक पूर्ण नशामुक्त व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की सर्वाधिक सेवा कर सकता है और राष्ट्र तथा समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अंत में नशा करने वालों से मेरी ये गुजारिश है कि अपने को छोड़कर एक अपने परिवार, माता, पिता, पत्नी और बच्चों का ख्याल रखते हुए ये सोचना होगा कि कल अगर आपको कुछ हो जाता है तो उनको कितना कष्ट होगा जो पूरी तरह आप पर ही आश्रित हैं। अगर आपको उनसे वास्तव में प्यार हैं। तो आपके परिवार वालों को ये न सुनना पड़े कि आप तो कुछ दिन के ही मेहमान हैं। आपका इलाज संभव नहीं है। आपके परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या ऑपरेशन से भी ठीक नहीं होगा ? तो डॉक्टर का जवाब आता है कि कहाँ-कहाँ ऑपरेशन करेंगे पूरा शरीर खोखला हो गया है। आइये प्रण करें कि जहाँ तक संभव होगा लोगों को नशे के सेवन करने से रोकेंगे। केवल और केवल व्‍यसन मुक्‍त व्‍यक्ति ही अच्‍छे समाज की रचना कर सकता है।

धर्म विचारों सज्जनों बनो धर्म के दास।
सच्चे मन से सभी जन त्यागो मदिरा मांस।।

नशा मुक्ति स्लोगन

1. हर दिल की अब ये है चाहत नशा मुक्त हो मेरा भारत।
2. ज्ञान हमें फैलाना है, नशे को मार भगाना है।
3. जब जागेगी ये आत्मा, होगा तभी नशे का खात्मा।
4. नशे को छोड़ो, रिश्ते जोड़ो।
5. नशा जो करता है इंसान कभी न उसका हो कल्याण, उसको त्यागें हैं सब प्राणी जल्द ही मिलता है श्मशान।
6. चारों तरफ है हाहाकार बंद नशे का हो बाजार।
7. ये जो बिगड़ी दिशा दशा है आज, नशे का सारा ये है काज।
8. कहीं न नशेड़ी दिखने पाये, नशा न अब यहाँ टिकने पाये।
9. उम्मीद न कोई आशा है अब चारों और निराशा है, बर्बाद तुम्हें ये कर देगा नशे की यही परिभाषा है।
10. दिल पे नशा ये भारी है, सबसे बड़ी बीमारी है।
11. यही संदेश सुबह और शाम, नशा मुक्त हो अब आवाम।
12. भारत की संस्कृति बचाओ अब तो नशे पर रोक लगाओ।
13. नशे की छोड़ो रीत सभी ख़ुशी के गाओ गीत सभी।
14. घर-घर में सबको जगाना है हमें देश इक नया बनाना है, हो जाये तंदरुस्त अब भारत नशे को दूर भगाना है।
15. नशेड़ियों के नशे भागो, नशेड़ियों को नहीं।
16. कुछ पल का नशा, सारी उम्र की सजा।
17. खुद बिगड़े हो तुम जो अब तो बच्चों को क्या सिखलाओगे, खुद जो करने लगे नशा हो उनको कैसे बचाओगे?
18. देख लो कैसा कलयुग आया माया में ही सब भ्रमित हैं, ऐसी नशे की लत ये देखो विष में दिखता अब अमृत है।
19. परिवार पर अपने दो अब ध्यान, नशे की लत का करो समाधान।
20. नशे की लत जो जारी है ये बहुत ही अत्याचारी है, मेले लगते हैं श्मशानो में आज इसकी तो कल उसकी बारी है।

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दहेज प्रथा एक अभिशाप !

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यूँ तो मानव समाज एवं सभ्यता के समक्ष कई सारी चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ी हैं, परंतु इनमें से एक चुनौती ऐसी है, जिसका कोई भी तोड़ अभी तक समर्थ होता नहीं दिख रहा है। कहना नहीं होगा कि विवाह संस्कार से जुड़ी हुई यह सामाजिक विकृति दहेज प्रथा ही है । दहेज कुप्रथा भारतीय समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप की तरह है । हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का यह एक बड़ा कलंक है। ‘ दहेज ‘ शब्द अरबी भाषा के ‘ जहेज ‘ शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिन्दी में आया है जिसका अर्थ होता है ‘ सौगात ‘। इस भेंट या सौगात की परम्परा भारत में कब से प्रचलित हुई, यह विकासवाद की खोज के साथ जुड़ा हुआ तथ्य है। विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी जाने वाली धन, सम्पत्ति और सामान इत्यादि को ‘दहेज’ कहा जाता है। वर पक्ष विवाह तय करने से पूर्व ही कन्या पक्ष से दहेज में दी जाने वाली राशि एवं सामान के विषय में मांग करता है और मिलने का आश्वासन प्राप्त होने पर ही विवाह पक्का होता है। इस प्रकार लड़कियों को सुखी रखने की भावना से लड़के वालों को खुश करने के लिये लड़की के माता पिता द्वारा दहेज दिया जाता है।

दहेज लेने और देने की प्रथा कोई नयी नहीं है। प्राचीन काल से ही इस प्रथा का चलन है। हमारे यहाँ भारत में कन्यादान को एक पवित्र धार्मिक कार्य माना जाता है। प्राचीन काल में आर्शीवाद स्वरूप माता पिता अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी बेटी को वस्त्र, गहने एवं उसकी नयी घर गृहस्थी का कुछ सामान भेंट करते थे। इसका मूल उदे्दश्य यही था कि वर वधु नयी नयी गृहस्थी सुचारू रूप से चला सकें। लड़की का मान सम्मान सुसराल में उसके द्वारा किये जाने वाले व्यवहार एवं संस्कारों पर निर्भर था, लड़की द्वारा लाये गये दहेज पर नहीं। वर्तमान युग में दहेज प्रथा एक सामाजिक प्रथा के रूप में अ​भिशाप बन गयी है। यह दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है और पूरे समाज को इसकी काली विशैली जीभ लीलती जा रही है।

दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। प्राचीन समय से ही भारतीय समाज में कई प्रकार की प्रथाएं विद्यमान रही हैं जिनमें से अधिकांश परंपराओं का सूत्रपात किसी अच्छे उद्देश्य से किया गया था। इसे शुरू करने के पीछे बहुत अछा मकसद था यह परम्परा सिर्फ हिंदू परम्परा नहीं थी। यह परम्परा बहुत सारे संस्कृतियों में होता था। पहले हमारे समाज में बेटियों को हर जरूरत की चीजें और कुछ पैसे देते थे जिससे वह आर्थिक रूप से कमजोर न रहे व अपने ससुराल में कुछ तकलीफ न हो। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ इन प्रथाओं की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिंह लगता गया जिसके परिणामस्वरूप पारिवारिक और सामाजिक तौर पर ऐसी अनेक मान्यताएं आज अपना औचित्य पूरी तरह गंवा चुकी हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ परंपराएं ऐसी भी हैं जो बदलते समय के साथ-साथ अधिक विकराल ग्रहण करती जा रही हैं। दहेज प्रथा ऐसी ही एक कुरीति बनकर उभरी है जिसने ना जाने कितने ही परिवारों को अपनी चपेट में ले लिया है। इन प्रथाओं का सीधा संबंध पुरुषों को महिलाओं से श्रेष्ठ साबित कर, स्त्रियों को किसी ना किसी रूप में पुरुषों के अधीन रखना था। सती प्रथा हो या फिर बहु विवाह का प्रचलन, परंपराओं का नाम देकर महिलाओं के हितों की आहुति देना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती थी। भले ही वर्तमान समय में ऐसी अमानवीय प्रथाएं अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, लेकिन इन्हीं कुप्रथाओं में से एक दहेज प्रथा आज भी विवाह संबंधी रीति-रिवाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। समय बदलने के साथ-साथ इस प्रथा के स्वरूप में थोड़ी भिन्नता अवश्य आई है लेकिन इसे समाप्त किया जाना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है।

हमारा समाज पुरुष प्रधान है। हर कदम पर केवल पुरुषों को बढ़ावा दिया जाता है। बचपन से ही लड़कियों के मन में ये बातें डाली जाती हैं कि बेटे ही सबकुछ होते हैं और बेटियां तो पराया धन होती हैं। उन्हें दूसरे के पर जाना होता है, इसलिए माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बेटा होता है ना कि बेटियां समाज में सबकी नहीं पर यादातर लोगों के सोच यही होती है कि लड़कियों की पढ़ाई में खर्चा करना बेकार है। उन्हें पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना बेकार है, आखिरकार उन्हें दूसरों के घर जाना है पर यदि बेटा कुछ बनेगा कमाएगा तो माता-पिता का सहारा बनेगा। यही नहीं लड़कों पर खर्च किए हुए पैसे उनकी शादी के बाद दहेज में वापस मिल जाता है। यही कारण है माता-पिता बेटों को कुछ बनाने के लिए कर्ज तक लेने को तैयार हो जाते हैं। पर लड़कियों की हालात हमेशा दयनीय रहती है, उनकी शिक्षा से यादा घर के कामों को महत्व दिया जाता है। इस मानसिकता को हमे परिवर्तित करना होगा। ज्‍यादातर माता-पिता लड़कियों की शिक्षा के विरोध में रहते हैं। वे यही मानते हैं कि लड़कियां पढ़कर क्या करेगी। उन्हें तो घर ही संभालना है। परंतु माता-पिता समझना चाहिए कि  पढऩा-लिखना कितना जरूरी है वो परिवार का केंद्र विंदु होती है। उसके आधार पर पूरे परिवार की नींव होती है। उसकी हर भूमिका चाहे वो बेटी का हो, बहन का हो, पत्नी का हो बहू का हो या फिर सास पुरुषों की जीवन को वही सही मायने में अर्थ देती है।

दहेज प्रथा के अंतर्गत युवती का पिता उसे ससुराल विदा करते समय तोहफे और कुछ धन देता है। इस धन और तोहफों को स्त्रीधन के नाम से भी जाना जाता है। अब यही धन वैवाहिक संबंध तय करने का माध्यम बन गया है। प्राचीन समय में पुरुष अपनी पसंद की स्त्री का हाथ मांगते समय उसके पिता को कुछ तोहफे उपहार में देता था, ससुराल पक्ष इसमें ना तो कोई मांग रखता था और ना ही दहेज को अपनी संपत्ति कह सकता था। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका हैं, और वर पक्ष के लोग मुंहमांगे धन की आशा करने लगे हैं जिसके ना मिलने पर स्त्री का शोषण होना, उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाना कोई बड़ी बात नहीं है। प्राचीन काल में शुरू हुई यह परंपरा आज अपने पूरे विकसित और घृणित रूप में हमारे सामने खड़ी है। यही कारण है कि हर विवाह योग्य युवती के पिता को यही डर सताता रहता है कि अगर उसने दहेज देने योग्य धन संचय नहीं किया तो उसके बेटी के विवाह में परेशानियां तो आएंगी ही, साथ ही ससुराल में भी उसे आदर नहीं मिल पाएगा। दहेज प्रथा के वीभत्स प्रमाण हैं, प्रताड़ना की घटनाएँ, जो अंतत: नवविवाहित वधुओं की ‘दहेज हत्या’ के रूप में परिणता होती हैं। लड़कियों के साथ बुरे बर्ताव, भेदभाव तथा कन्या भ्रूण और कन्या शिशुओं की हत्या जैसे जघन्य कृत्यों के रूप में सामने आने वाले इसके दुष्परिणाम दहेज प्रथा की उस क्रूरता को प्रदर्शित करते हैं, जिसका सामना हमारा समाज आज भी कर रहा है। माता-पिता रिश्‍ता करते समय रूपयों के लालच में करते है वह यह नहीं देखते कि लड़का-लड़की में क्‍या अवगुण है यह नहीं देखते है !

समाज में दहेज प्रथा एक ऐसा सामाजिक अभिशाप बन गया है जो महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों, चाहे वे शा‍रीरिक हों या फिर मानसिक, को बढावा देता है। वर्तमान समय में दहेज व्यवस्था एक ऐसी प्रथा का रूप ग्रहण कर चुकी है जिसके अंतर्गत युवती के माता-पिता और परिवारवालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन-दौलत पर ही निर्भर करता है। वर-पक्ष भी सरेआम अपने बेटे का सौदा करता है। प्राचीन परंपराओं के नाम पर युवती के परिवार वालों पर दबाव डाल उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले लिया है। संपन्न परिवारों को शायद दहेज देने या लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती। क्योंकि उन्हें यह मात्र एक निवेश लगता है। उनका मानना है कि धन और उपहारों के साथ बेटी को विदा करेंगे तो यह उनके मान-सम्मान को बढ़ाने के साथ-साथ बेटी को भी खुशहाल जीवन देगा। लेकिन निर्धन अभिभावकों के लिए बेटी का विवाह करना बहुत भारी पड़ जाता है। वह जानते हैं कि अगर दहेज का प्रबंध नहीं किया गया तो विवाह के पश्चात बेटी का ससुराल में जीना तक दूभर बन जाएगा। परन्‍तु अक्‍सर ऐसा देखने में आया है कि दहेज लेने के पश्‍चात ससुराल पक्ष की मांग ओर बढती जाती है और बेटी का बाप उसकी मांगों को पुरी नहीं कर पाता है तो वे उसे यातना देने लगते है।

हमारा सामाजिक परिवेश कुछ इस प्रकार बन चुका है कि यहां व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके आर्थिक हालातों पर ही निर्भर करती है। जिसके पास जितना धन होता है उसे समाज में उतना ही महत्व और सम्मान दिया जाता है। ऐसे परिदृश्य में लोगों का लालची होना और दहेज की आशा रखना एक स्वाभाविक परिणाम है। आए दिन हमें दहेज हत्याओं या फिर घरेलू हिंसा से जुड़े समाचारों से दो-चार होना पड़ता है। यह मनुष्य के लालच और उसकी आर्थिक आकांक्षाओं से ही जुड़ी है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिसे जितना ज्यादा दहेज मिलता है उसे समाज में उतने ही सम्माननीय नजरों से देखा जाता है।

दहेज के खिलाफ हमारे समाज में कई कानून बने लेकिन इसका कोई विशेष फायदा होता नजर नहीं आता है। जगह-जगह अक्सर यह पढ़ने को तो मिल जाता है ”दहेज लेना या देना अपराध है” परंतु यह पंक्ति केवल विज्ञापनों तक ही सीमित है, आज भी हमारे चरित्र में नहीं उतरी है। दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए अब तक कितने ही नियमों और कानूनों को लागू किया गया हैं, जिनमें से कोई भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। 1961 में सबसे पहले दहेज निरोधक कानून अस्तित्व में आया जिसके अनुसार दहेज देना और लेना दोनों ही गैरकानूनी घोषित किए गए। इसके बाद सन् 1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया था। इन नियमों के अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए। इस सूची में प्रत्येक उपहार, उसका अनुमानित मूल्य, जिसने भी यह उपहार दिया है उसका नाम और संबंधित व्यक्ति से उसके रिश्ते का एक संक्षिप्त विवरण मौजूद होना चाहिए। नियम बना तो दिए जाते हैं लेकिन ऐसे नियमों को शायद ही कभी लागू किया जाता है। 1997 की एक रिपोर्ट में अनुमानित तौर पर यह कहा गया कि प्रत्येक वर्ष 5,000 महिलाएं दहेज हत्या का शिकार होती हैं। उन्हें जिंदा जला दिया जाता है जिन्हें दुल्हन की आहुति के नाम से जाना जाता है। इन सब कानूनों के होने के बावजूद भी व्यावहारिक रूप से बेटीयों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया। इसके विपरीत इसकी लोकप्रियता और चलन दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। अभिभावक बेटी के पैदा होने पर खुशी जाहिर नहीं कर पाते, क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हें यही डर सताता रहता है कि बेटी के विवाह में खर्च होने वाले धन का प्रबंध कहां से होगा। इसके विपरीत परिवार में जब बेटा जन्म लेता है तो वंश बढ़ने के साथ धन आगमन के विषय में भी माता-पिता आश्वस्त हो जाते हैं। यही वजह है कि पिता के घर में भी लड़कियों को महत्व नहीं दिया जाता। बोझ मानकर उनके साथ हमेशा हीन व्यवहार ही किया जाता है। वहीं विवाह के पश्चात दहेज लोभी ससुराल वाले विवाह में मिले दहेज से संतुष्ट नहीं होते बल्कि विवाह के बाद वधू को साधन बनाकर उसके पिता से धन और उपहारों की मांग रखते रहते हैं, जिनके पूरे ना होने पर युवती के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट होना एक आम बात बन गया है। आज भी बिना किसी हिचक के वर-पक्ष दहेज की मांग करता है और ना मिल पाने पर नववधू को उनके कोप का शिकार होना पड़ता है।

इंसान शिक्षा प्राप्त करने के बाद अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख जाता है। शिक्षा बुराईयों को खत्म करने का सबसे कारगर हथियार है। परंतु यही शिक्षा दहेज जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने में असफल साबित हुई है। दूसरे शब्दों में शिक्षित वर्ग में ही यह गंदगी सबसे यादा पाई जाती है। आज हमारे समाज में जितने शिक्षित और सम्पन्न परिवार है, वह उतना अधिक दहेज पाने की लालसा रखता है। इसके पीछे उनका यह मनोरथ होता है कि जितना यादा उनके लड़के को दहेज मिलेगा समाज में उनके मान-सम्मान, इजत, प्रतिष्ठा में उतनी ही चांद लग जाएगी। एक डॉक्टर, इंजीनियर लड़के के घरवाले दहेज के रूप में 15-20 लाख की मांग करते है, ऐसे में एक मजबूर बेटी का बाप क्या करे? बेटी के सुखी जीवन और उसके सुनहरे भविष्य की खातिर वे अपनी उम्र भर की मेहनत की कमाई एक ऐसे इंसान के हाथ में सौंपने के लिए मजबूर हो जाते हैं जो शायद उनके बेटी से यादा उनकी पैसों से शादी कर रहे होते है। इच्छा तो हर ईंसान के मन में पनपती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब। ज्‍यादातर शिक्षित और संपन्न परिवार ही दहेज लेना अपनी परंपरा का एक हिस्सा मानते हैं तो ऐसे में अल्पशिक्षित या अशिक्षित लोगों की बात करना बेमानी है। युवा पीढ़ी, जिसे समाज का भविष्य समझा जाता है, उन्हें इस प्रथा को समाप्त करने के लिए आगे आना होगा ताकि भविष्य में प्रत्येक स्त्री को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले और कोई भी वधू दहेज हत्या की शिकार ना होने पाए। दहेज प्रथा भारतीय समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक है जिसके परिणामस्वरूप ना जाने कितने ही परिवार बर्बाद हो चुके हैं, कितनी महिलाओं ने अपने प्राण गंवा दिए और कितनी ही अपने पति और ससुराल वालों की ज्यादती का शिकार हुई हैं। सरकार ने दहेज प्रथा को रोकने और घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए कई योजनाएं और कानून लागू किए हैं। लेकिन फिर भी दहेज प्रथा को समाप्त कर पाना एक बेहद मुश्किल कार्य है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि भले ही ऊपरी तौर पर इस कुप्रथा का कोई भी पक्षधर ना हो लेकिन अवसर मिलने पर लोग दहेज लेने से नहीं चूकते। अभिभावक भी अपनी बेटी को दहेज देना बड़े गौरव की बात समझते हैं, उनकी यह मानसिकता मिटा पाना लगभग असंभव है।

वास्तव में दहेज प्रथा की वर्तमान विकृती का मुख्य कारण नारी के प्रति हमारा पारंपरिक दष्टिकोण भी है। एक समय था जब बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं माना जाता था। परिवार में कन्या के आवगमन को देवी लक्ष्मी के शुभ पदार्पण का प्रतीक माना जाता था। धीरे-धीरे समाज में नारी के अस्तित्व के संबंध में हमारे समाज की मानसिकता बदलने लगी। कुविचार की काली छाया दिन-ब-दिन भारी और गहरी पड़ती चली गई। परिणामस्वरूप घर की लक्ष्मी तिरस्कार की वस्तु समझी जाने लगी। नौबत यहां तक आ गई कि हम गर्भ में ही उसकी हत्या करने लगे। अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि भ्रूण हत्या भी कहीं न कहीं दहेज का ही कुपरिणाम है। दहेज प्रथा की यह विकृति समाज के सभी वर्गों में समान रूप से घर कर चुकी है। उच्चवर्ग तथा कुछ हद तक निम्नवर्ग इसके परिणामों का वैसा भोगी नहीं है जैसा कि मध्यमवर्ग हो रहा है। इसके कारण पारिवारिक और सामाजिक जीवन में महिलाओं की स्थिती अत्यंत शोचनीय बनती जा रही है। आए दिन ससुराल वालों की ओर से दहेज के कारण जुल्म सहना और अंत में जलाकर उसका मार दिया जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए बड़ी शर्मनाक बात है।

नारी शक्ति का रूप मानी जाती है। लड़की और लड़कों में इतना फर्क क्यों किया जाता है। इतनी असमानता क्यों मानी जाती है। इसका जवाब केवल यह है कि लड़के कुल का दीपक होते हैं और लड़कियां पराया धन। लड़के की शादी में ढेर सारे पैसे मिलते हैं, लड़कियों की शादी में ढेर सारे रुपये खर्च करना पड़ता है। ये जानते हुए कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध है। फिर लोग ये गुनाह करते हुए नहीं हिचकते। जबकि लड़कियों ने हमेशा हर कदम पर खुद को साबित किया है। यदि उन्हें अछी शिक्षा दी जाए तो वे लड़कों से भी यादा बेहतर काम करेंगी। भारत की कई महिलाओं ने भारत का सर गर्व से ऊंचा किया है। ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, बहिन मायावती, सोनिया गांधी, लता मंगेशकर, मदर टेरिसा, कल्‍पना चावला, सानिया मर्जा, सायना नेहवाल, किरण बेदी आदि बहुत सारी महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में देश-विदेश में भारत को अलग पहचान दिलाई।

दहेज प्रथा कैसे रोकें ?

दहेज एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसका परित्याग करना बेहद जरूरी है। दहेज प्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए समाज सुधारकों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण और प्रभावपूर्ण प्रयत्नों के बावजूद इसने अत्यंत भयावह रूप धारण कर लिया है। इसका विकृत रूप मानव समाज को भीतर से खोखला कर रहा है। वर्तमान हालातों के मद्देनजर यह केवल अभिभावकों और जन सामान्य पर निर्भर करता है कि वे दहेज प्रथा के दुष्प्रभावों को समझें। क्योंकि अगर एक के लिए यह अपनी प्रतिष्ठा की बात है तो दूसरे के लिए अपनी इज्जत बचाने की। इसे समाप्त करना पारिवारिक मसला नहीं बल्कि सामूहिक दायित्व बन चुका है। इसके लिए जरूरी है कि आवश्यक और प्रभावी बदलावों के साथ कदम उठाए जाएं और दहेज लेना और देना पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया जाए। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को इस काबिल बनाएं कि वे शिक्षित बन स्वयं अपने हक के लिए आवाज बुलंद करना सीखें। अपने अधिकारों के विषय में जानें उनकी उपयोगिता समझें। क्योंकि जब तक आप ही अपनी बेटी का महत्व नहीं समझेंगे तब तक किसी और को उनकी अहमियत समझाना नामुमकिन है। आवश्यकता है एक ऐसे स्वस्थ सामाजिक वातावरण के निर्माण की जहां नारी अपने आप को बेबस और लाचार नहीं बल्कि गौरव महसूस करे। जहां उसे नारी होने पर अफसोस नहीं गर्व हो। उसे इस बात का एहसास हो कि वह बोझ नहीं सभ्यता निर्माण की प्रमुख कड़ी है। वास्तव में दहेज जैसी लानत को जड़ से खत्म करने के लिए युवाओं को एक सशक्त भूमिका निभाने की जरूरत है। उन्हें समाज को यह संदेश देने की आवष्यकता है कि वह दहेज की लालसा नहीं रखते हैं अपितु वह ऐसा जीवनसाथी चाहते हैं जो पत्नी, प्रेयसी और एक मित्र के रूप में हर कदम पर उसका साथ दे। चाहे वह समाज के किसी भी वर्ग से संबंध रखती हो। दहेज प्रथा के पीछे भी ज्‍यादातर महिलाएं ही होते हैं उन्हें खुद भी दहेज लेना बहुत पसंद है। उन्हें एक महिला की भावना को समझना चाहिए और इस प्रकार की प्रथा का तिरस्कार करना चाहिए। मेरा यह मानना है कि अगर दहेज प्रथा समाज से पूरी तरह समाप्‍त हो जाए तो कन्‍या भ्रूण हत्‍या स्‍वत: ही समाज से समाप्‍त हो जायेगी। आमिर खान के कार्यक्रम “सत्यमेव जयते” का तीसरा एपिसोड दहेज पर था। दहेज की वजह से हमारे देश में हो रही मौतें इस बार के एपिसोड का मुद्दा है। इस प्रकार के कार्यक्रम के माध्‍यम से समाज में जागरूकता पैदा की जा सकती है अत: इस तरह के कार्यक्रमों को नेशनल टी.वी. पर बढावा देना चाहिए और समय समय पर इनका प्रसारण अपनी नैतिक जिम्‍मेदारी को समझते हुए टी.वी. चेनलों को करना चाहिए। क्‍योंकि आज के युवा वर्ग को जेसा हम दिखाएंगे सिखाएंगे और पढ़ाएंगे वो ही जाकर हमारा भविष्‍य बनेंगे। आओ हम सब मिलकर दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाए ओर प्रतिज्ञा ले कि –

“ना दहेज ले और ना हि दहेज दें।”

क्या राजस्थान विधानसभा चुनाव-2018 में रैगर समाज निभाएगा निर्णायक भूमिका

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आगामी दिसम्बर में राजस्थान विधानसभा की 200 सीटो पर चुनाव होने है l  प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ रैगर समाज को छोड़कर अन्य सभी समाज के वोटरों को रिझाने के लिए अपनी-अपनी गोटियां फिट करने में लगी हुई है । जबकि राजस्थान प्रदेश में रैगर जाति अनुसूचित जाति की सबसे बड़ी जाति होते हुए भी प्रदेश में वर्तमान समय में उसका राजनैतिक प्रतिनिधित्व घटता चला जा रहा है अर्थात प्रमुख राजनीतिक पार्टियों द्वारा रैगर जाति को अनदेखा किया जा रहा है, लेकिन अब समाज के लोग राजनीति में अपने हक की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने को तैयार हो गए हैं । सच्चाई ये है कि प्रदेश की सभी सीटो पर रैगर समाज के मतदाता ही उम्मीदवारों की हार-जीत में निर्णायक भूमिका निभाते है l

अखिल भारतीय रैगर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया ने सभी राजनीतिक पार्टियों को चेतावनी देते हुए कहा कि आने वाले विधानसभा चुनाव में अगर राजनीतिक पार्टियों ने रैगर समाज के लोगो को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया तो रैगर समाज 142 सामान्य (जनरल) सीटो पर भी खुद के स्वतंत्र उम्मीदवार खड़े करने से भी पीछे नहीं हटेगा l रैगर समाज के मतदाता ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों की हार-जीत में निर्णायक भूमिका निभाते है l

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आगे कहा कि राजस्थान विधानसभा में 1952 से लेकर 1990 तक चार विधायक रैगर समाज के हुआ करते थे l  आज राजनैतिक दलों की उदासीनता से रैगर समाज के विधायक प्रतिनिधियों की संख्या घट कर काफी कम रह गई । प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरण बहुत महत्त्व रखते हैं। जो राजनैतिक दल रैगर समाज के लोगों को अधिक टिकट देगा, उसी दल को समर्थन किया जाएगा । रैगर समाज की उपेक्षा करने पर उन राजनैतिक दलों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं । इस बार के विधानसभा चुनावो में  रैगर समाज अपनी ताकत दिखाएगा । आज के दौर मे मजबूत लोकतंत्र में परिवार व समाज के सर्वांगीण विकास व संरक्षण के लिए राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व होना आवश्यक हो गया है ।

गुरु का जीवन में महत्व

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प्रस्तावना: गुरु-शिष्य परंपरा सदियों से हमारे देश में चली आ रही है। गुरु शिष्य परम्परा के अंतर्गत गुरु अपने शिष्य को शिक्षा देता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रुप में दूसरों को शिक्षा देता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। अब हम गुरु शब्द का अर्थ जानेंगे।
‘गु’ शब्द का अर्थ होता है अंधकार( अज्ञान) और  ‘रू’ शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान, इस प्रकार अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रहा रूप प्रकाश है, वह गुरु होता है। और गुरु का हमारे जीवन में बहुत महत्व होता है यह सर्वविदित है।

गुरु का हमारे जीवन में महत्व 

गुरु के महत्व के बारे में संत श्री तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है

” गुरु बिन भवनिधि तरही न कोई;
जो बिरंचि संकर सम होई “

अर्थात

भले ही कोई ब्रह्मा, विष्णु, महेश, के समान क्यों ना हो पर वह गुरु के बिना भवसागर पार नहीं कर सकता है जब से धरती बनी है तब से ही गुरु का महत्व इस धरती पर है। वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, गीता, गुरु ग्रंथ, आदि में महान संतों द्वारा गुरु की महिमा का गुणगान किया गया है गुरु शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है। संक्षेप में कहे तो शिक्षक ईश्वर का दिया हुआ वह उपहार है। जो हमेशा से ही बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव रहित व्यवहार से बच्चों को सही गलत और अच्छे बुरे का ज्ञान कराता है। समाज में शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है क्योंकि उन्हीं बच्चों से समाज का निर्माण होता है। और शिक्षक उन्हें समाज में एक अच्छा इंसान बनाने की जिम्मेदारी लेता है माता-पिता के बाद शिक्षक ही होता है जो बच्चों को एक सही रूप में ढालने की नींव रखता है।

शिक्षक दिवस मनाने का दिन: शिक्षक दिवस देश के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के अवसर पर 5 सितंबर 1962, से शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाता है। इस दिन सभी स्कूल संस्थानों में बच्चे और युवा किसी उत्सव के रूप में शिक्षक दिवस मनाते है .आज के दिन बच्चे शिक्षक का रूप धारण करके शिक्षक की भूमिका अदा करते हैं.
‘एक शिक्षक का दिमाग देश में सबसे बेहतर होता है ‘ऐसा माना जाता है एक बार सर्वपल्ली राधा कृष्णन के कुछ छात्रों और दोस्तों ने उनका जन्म दिवस मनाने की इकक्षा ज़ाहिर कि इसके जवाब में डॉक्टर राधाकृष्णन ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से बनाने की बजाय इसे टीचर्स डे के रूप में मनाया जाए तो मुझे बहुत गर्व होगा। इसके बाद से ही पूरे भारत में 5 सितंबर का दिन टीचर्स डे के रूप में मनाया जाता है इस दिन इस महान शिक्षाविद को हम सब याद करते हैं और सभी शिक्षकों का सम्मान पूर्वक धन्यवाद अदा करते हैं जो हमें सदैव हमारे अच्छे बुरे कार्यों की समझ देता है ऐसे शिक्षक को शत-शत नमन है।

शिक्षक दिवस की महत्ता
(1) शिक्षक दिवस विद्यालय के विद्यार्थियों को शिक्षक के प्रति एक सम्मानित भाव पैदा कराता है क्योंकि शिक्षक विद्यार्थी के चरित्र का निर्माण करते हुए उन्हें एक आदर्श नागरिक के आकार में डालने की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

(2) शिक्षक छात्रों को अपनी स्वयं के बच्चों की तरह बड़े ही सावधानी प्यार और गंभीरता से शिक्षित करते हैं जिससे छात्रों में अपनत्व की भावना जागृत होती है।

(3) बच्चे समाज का भविष्य होते है।  और शिक्षक उन्हें निखारने में मदद करते हैं .बिना शिक्षक के कोई भी छात्र अकाउंटेंट ,डॉक्टर, पायलट ,इंजीनियर, वकील, या किसी भी क्षेत्र में नहीं जा सकता है शिक्षक छात्र का भविष्य निर्माणकर्ता होता है।

(4) सभी बच्चों के माता-पिता बच्चों की उसकी जरूरतों को पूरा करने में सहायता करते हैं। परंतु शिक्षक उनके अंदर आत्मविश्वास बढ़ाने में और उनका भविष्य निखारने का कार्य करता है बिना गुरु ज्ञान नहीं है यह कहावत ही नहीं एक सच्चाई भी है।

शिक्षक दिवस कहां-कहां मनाया जाता है?
सभी देशों में शिक्षक दिवस का दिन अलग-अलग है। दुनिया के ऐसे 21 देश है जो शिक्षक दिवस बड़ी धूमधाम से मनाते हैं जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार है जैसे बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, चाइना, जर्मनी, ग्रीस, मलेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका , UK , उ.एस .ए, ईरान, इन देशो के अपने-अपने दिन शिक्षक दिवस मनाने के लिए निर्धार्रित किये गये है। परंतु 5 अक्टूबर को ‘वर्ल्ड टीचर्स टीचर्स डे’ के रूप में मनाया जाता है इसके अलावा 28 फरवरी को दुनिया के 11 देश टीचर्स डे मनाते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते है, कि शिक्षक चाहे किसी भी देश जाति या धर्म का हो जब वो किसी को शिक्षा देते है तो वो किसी भी छात्र के साथ कोई भेदभाव नहीं करते अर्थात गुरु किसी भी रुप में हो गुरु, गुरु ही होता है चाहे वह किसी भी देश का हो।

उपसंहार
इस प्रकार शिक्षक दिवस हमारे देश के अलावा पूरी दुनिया में बहुत महत्व रखता है। और यह परंपरा हजारों साल, गुरु शिष्य के रूप में चली आ रही है और ए यूही फलती-फूलती और आगे बढ़ती रहें। और हर छात्र अपने शिक्षक को इस प्रकार मान सम्मान देता रहे,

” गुरुब्रह्ममा गुरुविष्णुः
गुरु देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात परम ब्रम्ह
तस्मै श्री गुरवे नमः “

हर छात्र के लिए गुरु उसके लिए ब्रह्मा, विष्णु, और महेश की तरह रहे और ऐसे गुरु को वो सर्वदा नमन करते रहे। संक्षेप मे कहे तो शिक्षक ईश्वर का दिया हुआ वह उपहार जो हमेशा से ही बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव रहित व्यवहार से बच्चों को सही गलत और अच्छे बुरे का ज्ञान कराता है समाज में शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है।

गुरु का जीवन में होना विशेष मायने रखता है | गुरु हमारे दुर्गुणों को हटाता है | गुरु के बिना हमारा जीवन अंधकारमय होता है | अँधेरे में जैसे हम कोई चीज टटोलते हैं,नहीं मिलती है वैसे गुरु के बिना टटोलने वाली जिन्दगी बन जाती है जहाँ कुछ भी मिलने वाला नहीं है | जिस व्यक्ति के जीवन में गुरु नहीं मिला उसके जीवन में दुःख ही दुःख रहा | वह एक सहजयुक्त जीवन नहीं जी सका | गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है | हमें जीवन जीने का सहीं रास्ता बताता है जिस रास्ते पर चलकर जीवन को संवारा जा सकता है | एक नई ऊँचाई को छुआ जा सकता है इसलिये गुरू हमारे लिये किसी मूल्यवान वस्तु से कम नहीं | माता पिता तो हर किसी को होते हैं लेकिन गुरू का होना जीवन का मार्ग बदलने की तरह होता है |
गुरु इस संसार का सबसे शक्तिशाली अंग होता है | कोई चीज सीखने के लिये बिना गुरू का अध्ययन नहीं किया जा सकता है | अलग-अलग चीजें सीखने के लिये अलग-अलग गुण के गुरूओं की जरूरत होती है | सिलाई सीखने के लिये सिलाई गुरू का होना जरूरी है | ड्राईवर बनने के लिये ड्राईवर गुरू की जरूरत होती है | डॉक्टर बनने के लिये डॉक्टर गुरू के पास जाना ही पड़ेगा तभी हम इन कला पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा जिन्दगी भर हाथ पाँव चलाते रहिये बिना गुरू के किसी कला को नहीं सीखा जा सकता है | गुरू मिलने मात्र से नहीं होता है | गुरू के प्रति हृदय से श्रध्दा होनी चाहिये जब हृदय से श्रध्दा होगी तो आप उस कार्य की समस्त बारीकियाँ सीख सकते हैं | गुरू पूर्णरूपेण आपको पारंगत कर देगा |
गुरु बहुत ही सीधा सादा होता है | गुरु भले ही लंगड़ा लूला या गरीब है लेकिन गुरु गुरु होता है | वह अपने शिष्य के प्रति कपट व्यवहार नहीं करता है | वह अपने शिष्य को पारंगत कर देना चाहता है | अपने शिष्य को बढ़ते हुये देखना चाहता है | अपने शिष्य का काँट छाँट करता है | उसके प्रत्येक कमी को निकालता है | उसे ठोंक ठोंककर कुम्हार के घड़े की तरह सुंदर बनाता है | अपने शिष्य को संपूर्ण बनाने में समस्त ज्ञान उसके सामने उड़ेल देता है | यही तो सच्चे गुरू का गुणधर्म होता है | कपटी गुरू का गुण किसी काम का नहीं होता है | वह पूरा ज्ञान अपने शिष्य को नहीं देता है | वह ज्ञान न उसके लिये ही लाभदायक होता है न दूसरे के ही जीवन को संवार सकता है | गुरू चुनते समय हमें सच्चे गुरू की तलाश करनी चाहिये | कपटी गुरू से हम सच्चे हुनर को नहीं प्राप्त कर सकते हैं |
गुरु को भी कपटी नहीं होना चाहिये यदि शिष्य पूरी तरह से समर्पित रहता है तो उसे सहज होकर जो विद्या ज्ञान लेना चाहता है | उसे देने में पूर्ण तल्लीन हो जाना चाहिये तभी गुरू शिष्य की परंपरा को जिन्दा रखता जा सकता है | गूरू शिष्य की परंपरा सदियों से चली आ रही है | इस शुध्द परंपरा का पालन करने वाला ही सच्चा गुरू व शिष्य कहलायेगा, तभी जीवन सार्थक हो सकता है, तभी जीवन एक गौरवशाली बन सकता है | गूरू को अपनी मर्यादा पालन करते रहना चाहिये और शिष्य गुरू के प्रति समर्पित होकर शिक्षा लेता है तो वह एक महान लक्ष्य को हासिल कर लेता है | कोई बाधायें उन्हें नहीं रोक सकती है |

शंभूलाल रैगर के चुनाव लड़ने की आहट से फ़ैल गई सनसनी…, यूपी की इस सीट से होगा खड़ा

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नई दिल्ली: 

राजस्थान के राजसमंद में मुस्लिम मज़दूर मोहम्मद अफराजुल को जिन्दा जलाने वाला शंभूलाल रैगर एक बार फिर चर्चा में है. नवनिर्माण सेना ने हत्यारोपी शंभूलाल रैगर को आगरा लोकसभा से अपनी पार्टी के टिकट पर आगामी लोकसभा चुनाव लड़ाने का ऐलान किया है. पार्टी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर चुनाव लड़ रही है. आगरा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित जानी ने आगामी लोक सभा चुनाव लड़ने जा रहे पांच उम्मीवारों की घोषणा की, जिसमें शंभुलाल रैगर का नाम शामिल है.

जानी ने दावा किया कि जोधपुर जेल में बंद शंभुलाल रैगर की जान को खतरा है. हम शभु को बचाएंगे और राजनीतिक आश्वासन देंगे. रैगर के अनुसार, उसने आत्मरक्षा के लिए किया.

जानी ने ‘हिंदुत्व को बचाने’ के प्रयास के लिए रैगर के प्रयास की सराहना की. उन्होंने कहा, ‘ रैगर के पास उनके दृढ़ विश्वास तक चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार है. पार्टी टिकट पर चुनाव के लिए हम हुंदुत्व चेहरे ही चाहते है. रैगर से बेहतर और कोई नहीं है.’

पार्टी फ़िरोज़ाबाद, अलीगढ़, नोएडा से भी चुनावी मैदान में उतरेगी. इन सेटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित किये जाना बाकी है.

नवभारत टाइम्स रिपोर्ट के मुताबिक, जानी काफी दिनों से रैगर के संपर्क में हैं. उन्होंने शंभुलाल रैगर से लोकसभा चुनाव आगरा से लड़ने का आग्रह किया था। जोधपुर जेल से ही रैगर चुनाव लड़ेंगे.

बता दें कि राजस्थान के राजसमंद इलाके में पश्चिम बंगाल के मालदा के रहने वाले 48 वर्षीय मुस्लिम मजदूर मोहम्मद अफराजुल की ‘लव जेहाद’ का बदला लेने के नाम पर नृशंस हत्या कर उसे बुरी तरह से जला दिया था. इस भयावह हत्या के वीडियो को खुद हत्यारोपी ने जारी किया था. पुलिस ने आरोपी शंभूलाल रैगर को गिरफ्तार कर लिया था. रैगर के भतीजे ने ही इस घटना का वीडियो बनाया था. 15 वर्षीय लड़के को बाल कल्याण समिति की दंडाधिकारियों की पीठ के सामने पेश किया गया, जिसने लड़के को किशोर अपराधी मानते हुए राज्य के बाल सुधार गृह भेजने का आदेश दिया.

सन् 1891 जनगणना रिपोर्ट में रैगर जाती को चमार संवर्ग से अलग बताना

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जनगणना के आंकड़े सही होते हैं। जरा आप आगे दिये गये 18 वीं सदी ईस्वी के जनगणना आंकड़ों पर विचार कीजिये। क्योंकि वो आंकड़े सामान्यवर्ग के अधिकारियों और प्रगणकों द्वारा एकत्रित किये गए थे, जिनमें जातिगत ऊँच-नीच की भावना पूर्णतया भरी हुए थी। अतः उनके विरुद्ध यह आरोप नहीं लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा रैगर समुदाय को जान बूझकर महामण्डित किया गया है। बल्कि उनके द्वारा वही लिखा गया है, जो उनके द्वारा देखा गया था।

वस्तुतः उस काल के सामान्यवर्ग के विद्वान और आम लोग चमार शब्द और चमार जाति के अर्थ से भली भांति परिचित थे। वो इस बात को भी अच्छी तरह जानते थे कि रैगर समुदाय तो आनुवंशिक रूप से ही, चमार समुदाय से एक अलग जाति समुदाय है। उनके द्वारा भले ही रैगरों से छुआछात की हो। परन्तु उनके द्वारा रैगर समुदाय को चमार जाति का नहीं कहा गया था । जब उन से जानकारी लेकर, सन् 1951 ईस्वी में राजपूताना की अनुसूचित जाति की अनुसूची तैयार की गयी थी, तब उनके द्वारा रैगर समुदाय को अलग क्रमांक पर अंकित करवाया गया था। लेकिन जब राजस्थान में सन् 1956 ईस्वी में काका कालेलकर आयोग आया तो उसको कुछ लोगों द्वारा गलत सूचना देकर, रैगर शब्द को चमार-संवर्ग के कोष्ठक में अंकित करवा दिया गया। इस पर जयपुर निवासी श्री रूपचन्दजी जलुथरिया द्वारा जीवन पर्यन्त आपत्ति की गयी थी । यह बात उनकी कृति में भी लिखी गयी है। लेकिन स्वार्थी लोगों ने तर्क किया कि रैगर समुदाय को चमार-संवर्ग से निकलवाकर, अलग क्रमांक पर अंकित करवाने से रैगर जाति की स्थिति पर कौनसा असर पड़ जायेगा? लेकिन उन अज्ञानियों को इस बात का ज्ञान नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां टिकिट वितरण के समय इस बात को मानती रही है कि रैगर चमार ही है। अतः किसी भी पार्टी ने रैगर समुदाय को उसकी जनसँख्या के अनुपात में उसके सदस्य को भी, टिकिट देने की बात पर विचार नहीं किया है। जबकि काका कालेलकर आयोग ने बैरवा समुदाय को चमार-संवर्ग से अलग कर, उनके जाति जातिनाम को पृथक क्रमांक पर दर्ज करवाया था। लेकिन इसके लिये उनके नेताओं ने काका कालेलकर आयोग को इस बात से आश्वत किया था कि बैरवा एक गैर-चमार जाति है। आज उसी का परिणाम है कि बैरवा जाति को रैगर समुदाय की तुलना में अधिक राजनैतिक महत्व दिया जाता है। जबकि रैगर जाति कि राजनैतिक ग्रेड तो शून्य के पास ही अटकी हुई है।

वस्तुतः सामान्य वर्ग के लोगों ने तो रैगर समुदाय की सही और सम्मानजनक स्थिति को दर्शाया था। उनके द्वारा तो सन् 1941 ईस्वी में रैगरों को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानने की जनसाधारण से अपील भी की थी । जबकि उनके द्वारा ऐसी अपील किसी चमार संवर्ग की जाति के लिए नहीं की है।

लेकिन एक तरफ तो रैगर बंधुओं ने ही क्षुद्र स्वार्थ में फंसकर, उनके समुदाय को सामाजिक और राजनैतिक नुकसान पंहुचाया है। दूसरी तरफ आज कई रैगरबंधु अम्बेडकरजी के नाम पर सामान्यवर्ग के लोगों से लड़ाई झगड़ा करने से नहीं चुकता है। क्योंकि आज उसी को दलित होने का नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जबकि बैरवा मेघवाल भाई राजनीति से काम लेते हैं। मेरे द्वारा मालूमात करने पर, मुझे किसी भी रैगर भाई ने यह सूचना नहीं दी है कि उनके सामान वे लोग भी सामान्यवर्ग से लड़ाई मोल ले लेते हैं ।

आज भले ही कुछ लोगों द्वारा राजस्थानी रैगर शब्द से चमार शब्द को ढकने का प्रयास किया जा रहा हो, परन्तु इससे रैगर समुदाय की क्षत्रिय आनुवंशिकता समाप्त होने वाली है। रैगर जन्मजात ही चमार-संवर्ग से एक अलग समुदाय है तथा जिस प्रकार से राठौड़ शब्द राट या रट्ट या राष्ट्र शब्द का परिवर्द्धित रूपांतरण है, उसी प्रकार से रैगर शब्द रघु शब्द के अपभ्रंश रग शब्द का परिवर्द्धित रूपांतरण है। दोयम रैगर समुदाय रघुवंशी क्षत्रियों की 15 मुख्य शाखाओं में से एक है।

(1) मरदुमशुमारी रिपोर्ट मारवाड़राज,1891 पृष्ठ संख्या 542
रैगर वैष्णव धर्म को मानते हैं और शालिग्राम की पूजा करते हैं। पूर्व परगने में रैगर जनेऊ पहनते हैं, जो कच्चे सूत के धागे की होती है। इष्टदेवी गंगा को मानते हैं और उसे ही कुलतारण माता मानते हैं। इनके पुरोहित छन्याता ब्राह्मण एवं गौड़ ब्राह्मण होते हैं। वे ही इनके संस्कार, पिण्ड आदि करवाते हैं तथा किसी समय रैगर जाति के लोग सोने का टका देते थे, परन्तु अब इस निर्धन अवस्था में हल्दी में रंगकर टका देते हैं।

(2) The 1891 Indian Census of India
It was conducted by the British and covered India, Pakistan, Bangladesh and Burma…..
The ethnic distribution was as follows:
Class Group Caste Population
All Classes All Groups All Castes 286,912,000
Military & Aristocratic
Rajput
29,393,870
Jat
10,424,346
……….. …………… ………….. ………..
Artisans Total 28,882,551
Goldsmiths
Total 1,661,088
Sonar
1,178,795
Blacksmiths
Total 2,625,103
Lohar
1,869,273

Salt and Lime Total 1,531,130
Lonia
796,080
Uppar 267,715
Agri
241,336
Rehgar
77,856
Others 148,143
………… …………. ………. ………
Untouchables Total 30,795,703
Leather Workers Total 14,003,100
Chamar
11,258,105
Mochi
961,133
Madiga
927,339
Sakilia 445,366
Bambhi
220,596
Others 190,561
……….. …………. ………. ………
Scavengers Total 3,984,303
Mehtar
727,985
Chuhra
1,243,370
Megh
148,210
………… …………. ………. ………
References
Database: General report on the Census of India, 1891, Page 199
2. “R.H.R.; S. de J. (January 1926). “Obituary: Sir Athelstane Baines, C.S.I.”.Journal of the Royal Statistical Society(London: Royal Statistical Society) 89 (1): 182–184.(subscription required)

उक्त जनगणना रिपोर्ट ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, मुस्लिम आदि समुदायों में जन्में जनगणना अधिकारियों द्वारा तैयार की गई थी। चूँकि 18-19 वीं सदी में तो ऊंच-नीच का माहौल यहां तक बढ़ गया था कि महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने छत्रपति शिवाजी को राजतिलक करने से भी मना कर दिया था। अतः उस माहौल में उन अधिकारियों की ऐसी हिम्मत नहीं थी कि वे गलत रिपोर्ट देते।

अतः रैगरों को स्मृतिकालीन शूद्रों से जोड़ना गलत है। हाँ, यह सही है कि 20 वीं सदी में राजपूताना के परम्परागत चमार समुदाय के द्वारा कार्य विशेष छोड़ देने के बाद राजपूताना के उच्चवर्ग के लोगों ने रैगर समुदाय पर जमकर अत्याचार किया था। लेकिन 40 के दशक के आते-आते रैगर समुदाय उग्र हो गया था। अंततः ब्रिटिश सरकार द्वारा जयपुर रियासत के पुलिस विभाग को दी गयी खुपिया रिपोर्ट के बाद रैगरों पर सार्वजानिक रूप से किया जा रहा, अत्याचार बंद हुआ। लेकिन एक बार गिरा रैगर समुदाय पूर्णतः खड़ा नहीं हो पाया है।
आज के रैगर सपूतों की धारणा कैसी भी बन गई है? लेकिन रैगरों के विशाल दौसा सम्मलेन को सफल बनाने में वहां के सामान्यवर्ग का भी हाथ था।

– C.L. Verma R.A.S. rtd.

महात्मा बुद्ध ईश्वर में विश्वास रखने वाले आस्तिक थे ?

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महात्मा बुद्ध को उनके अनुयायी ईश्वर में विश्वास न रखने वाला नास्तिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में आर्यजगत के एक महान विद्वान पं. धर्मदेव विद्यामार्तण्ड अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “बौद्धमत एवं वैदिक धर्म” में लिखते हैं कि आजकल जो लोग अपने को बौद्धमत का अनुयायी कहते हैं उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो ईश्वर और आत्मा की सत्ता से इन्कार करते हैं तथा वेदों की निन्दा करते हैं। माननीय डा. भीमराव अम्बेदकर भी जिस बौद्धमत के प्रचार के लिए प्रयत्नशील थे उसमें भी बौद्धमत का ऐसा ही नास्तिक स्वरूप माना जाता है, किन्तु बौद्ध ग्रन्थों के निष्पक्ष अनुशीलन करने पर वह (पं. धमदेव विद्यामार्तण्ड) इस परिणाम पर पहुंचें हैं कि महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से सर्वथा इनकार करनेवाले और वेदों की निन्दा करने वाले न थे, प्रत्युत आस्तिक थे। एक बड़ी कठिनाई महात्मा बुद्ध के यथार्थ विचार जानने में यह है कि उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा अब दीघनिकाय, मज्झिनिकाय, विनयम पिटक आदि जो भी ग्रन्थ महात्मा बुद्ध के नाम से पाये जाते हैं उनका संकलन उनके निर्वाण की कई शताब्दियों के पश्चात् किया गया जिनमें से बहुत-सी उक्तियां किंवदन्ती के ही रूप में हैं।

 

नास्तिक कौन होता है? इस प्रश्न को उठाकर उसका समाधान करते हुए आर्यविद्वान पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अष्टाध्यायी के ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिं’ इस सुप्रसिद्ध सूत्र के अनुसार जो परलोक और पुनर्जन्म आदि के अस्तित्व को स्वीकार करता है वह आस्तिक है और जो इन्हें नहीं मानता वह नास्तिक कहाता है। महात्मा बुद्ध परलोक और पुनर्जन्म को मानते थे इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसलिये उन्हें सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण देना अनावश्यक है। प्रथम प्रमाण के रूप में धम्मपद के जरावग्गो श्लोक (संख्या 153) ‘अनेक जाति संसारं, सन्धाविस्सं अनिन्विस। गृहकारकं गवेस्संतो दुक्खा जाति पुनप्पुनं।।’ में महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अनेक जन्मों तक मैं संसार में लगातार भटकता रहा। गृह निर्माण करनेवाले की खोज में। बार-बार जन्म दुःखमय हुआ। श्लोक का यह अर्थ महाबोधि सभा, सारनाथ-बनारस द्वारा प्रकाशित श्री अवध किशोर नारायण द्वारा अनुदित धम्मपद के अनुसार है। दूसरा प्रमाण ब्रह्मजाल सुत्त का है जहां महात्मा बुद्ध ने अपने 2 या 4 नहीं अपित लाखों जन्मों के चित्तसमाधि आदि के द्वारा स्मरण का वर्णन किया है। वहां उन्होंने कहा है–भिक्षुओं ! कोई भिक्षु संयम, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रमाद और स्थिर चित्त से उस प्रकार की चित्त समाधि को प्राप्त करता है जिस समाधि को प्राप्त चित्त में अनेक प्रकार के जैसे कि एक सौ, हजार, लाख, अनेक लाख पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है—“मै। इस नाम का, इस गोत्र का, इस रंग का, इस आहार का, इस प्रकार के सुखों और दुःखों का अनुभव करनेवाला और इतनी आयु तक जीनेवाला था। सो मैं वहां मरकर वहां उत्पन्न हुआ। वहां भी मैं इस नाम का था। सो मैं वहां मरकर यहां उत्पन्न हुआ।“ इत्यादि। अगला तीसरा प्रमाण धम्मपद के उपर्युक्त वर्णित श्लोक का अगला श्लोक है जिसमें गृहकारक के रूप में आत्मा का निर्देश किया गया है। श्लोक है- ’गह कारक दिट्ठोऽसि पुन गेहं न काहसि। सब्वा ते फासुका भग्गा गहकूटं विसंखितं। विसंखारगतं चित्तं तण्हर्निं खयमज्झागा।।‘ इस श्लोक के अनुवाद में इसका अर्थ दिया गया है कि हे गृह के निर्माण करनेवाले! मैंने तुम्हें देख लिया है, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कडि़यां सब टूट गईं, गृह का शिखर गिर गया। चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया। इस पर टिप्पणी करते हुए पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि यह मुक्ति अथवा निर्वाण के योग्य अवस्था का वर्णन है। जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती तब तक जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है। इस प्रकार यह सर्वथा स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध परलोक, पुनर्जन्म आदि में विश्वास करने के कारण आस्तिक थे।

 

महात्मा बुद्ध के आस्तिक होने से संबंधित अगला प्रश्न यह है कि क्या वह अनीश्वरवादी अर्थात ईश्वर में विश्वास न रखने वाले थे? इसका समाधान करते हुए पं. धर्मदेव जी लिखते हैं कि नास्तिक शब्द का एक प्रचलित अर्थ ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले का है। क्या महात्मा बुद्ध ईश्वर की सत्ता से इन्कार करनेवाले थे इस विषय में अपने विचार संक्षेप से माननीय डा. अम्बेदकर जी से बात-चीत के प्रसंग में (संदर्भः सार्वदेशिक जुलाई 1951 अंक) प्रकट कर चुका हूं। इस विषय पर कुछ अधिक प्रकाश डालने से पूर्व मैं ‘सन्त सुधा’ के सम्पादक श्री ईश्वरदत्त मेधार्थी अणुभिक्षु बुद्धपुरी कानपुर के लेख से कुछ उद्धरण देना उचित समझता हूं। ‘सन्त सुधा’ के बुद्ध जयन्ती अंक में ‘सन्त सिद्धार्थ’ शीर्षक से महत्वपूर्ण अपने लेख में श्री मेधार्थी ने लिखा है कि ब्रह्म के विषय में भगवान बुद्ध स्वयं कहते हैं—“ब्रह्मभूतो अतितुलो मारसेन प्पमद्दनो। सब्वा मित्ते बसीकत्वा, मोदामि अकुतोभयो।।“  अर्थात् –मैं अब ब्रह्म पद को प्राप्त हुआ हूं, मेरी तुलना अब किसी से नहीं है, मैंने मार (कामदेव) की सेना को मर्दित कर दिया है। अब मैं काम, क्रोध आदि सब अन्तः शत्रुओं को वश में करके निर्भय होकर मस्त हो रहा हूं। विद्वान लेखक पं. धर्मदेव इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि यह एक ही वचन भगवान बुद्ध की आस्तिकता और ब्रह्मपद प्राप्ति के लिये पर्याप्त है। जरा-सी समझने की बात है कि जो स्वयं ब्रह्मविहार करता हो, ब्रह्मचारी हो, ब्रह्मभूत हो (यह सम्भव ही नहीं है कि) वह ब्रह्म को न माने? वास्तव में बौद्ध साहित्य में निर्वाण, ब्रह्म, अमृतपद, परमसुख, उत्तम अर्थ, अनाष्यात, दुलर्भनाथा आदि शब्द एकार्थवाचक हैं।

 

जिज्ञासुओं को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा है–जो नास्तिक हैं उन्हें विनाशोन्मुख समझो। एक बात है–भगवान् बुद्ध आस्तिक तो थे ही, आर्य भी थे। आर्य शब्द से उन्हें बड़ा प्रेम था। चार आर्य सत्य, आर्य, अष्टांगिक मार्ग और आर्यश्रावक तो बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्य शब्द गुणवाची है। आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ। इसलिये श्रेष्ठता, उच्चता, और उत्तमता की भावना के लिये ‘आर्य शब्द’ भगवान बुद्ध ने प्रयोग किया है। इसीलिये बुद्धपरी में आस्तिकता और अहिंसकता की श्रेष्ठ भावना को पुष्ट करने के लिये ‘आर्य बौद्ध’ शब्द का प्रचार किया जाता है। भगवान बुद्ध ने भी धम्मपद में स्वयं कहा है–’न तेन अरियो होति, येन पाणानि हिंसति। अहिंसा सबपाणानं, अरियोति पवुच्चति।।‘ (धम्मपद श्लोक 270, धम्मट्ठवग्गो 15) अर्थात् प्राणियों का हनन कर कोई आर्य नहीं होता, सभी प्राणियों की हिंसा न करने से उसे आर्य कहा जाता है। (सत्नसुधा कानपुर बुद्ध जयन्ती अंक मई 1950 पृष्ठ 10-11)। लेखक महोदय कहते हैं कि आचार्य मेधार्थीजी का उपर्युक्त लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का विशेष अनुशीलन करके उसे लिखा है और वे अपने को आर्य बौद्ध नाम से ही कहते हैं। पत्रिका सन्त-सुधा के मई 1950 अंक में आर्य बौद्ध संघ बुद्धपुरी के कुलगुरू श्री ज्ञानक्षेत्रजी की एक सूक्ति भी प्रस्तुत की गई है। यह सूक्ति है ”You will find so many Bhikshoos coming here (in Buddha Puri). They are the enemies of Om; but you will never leave Om, every thing is in Om, Lord Buddha is also in Om.” अर्थात् यहां बुद्धपुरी में आप कई भिक्षुओं को आते हुए पाते हैं जो ओम् (परमात्मा) के शत्रु या विरोधी हैं sकिन्तु आपको ओम् का परित्याग कभी नहीं करना चाहिये। सब कुछ ओम् में है। बुद्ध भगवान् भी ओम् में हैं।

 

बुद्धत्व की प्राप्ति के पश्चात् अपने प्रथम ही उपदेश में जो सारनाथ में महात्मा बुद्ध जी ने दिया उसमें उन्होंने कहा—“अहं भिक्खवे! तथागत सम्मासम्बुद्धो उदूहथ भिक्खवे। सोतं अमतं अधिगतम् अहमनुसासामि अहं धम्र्मं देसेमि।“ अर्थात् भिक्षुओं ! मैं अब बुद्ध हो गया हूं। मैंने ‘अमृत’ की प्राप्ति कर ली है। अब मैं धर्म का उपदेश करता हूं। पं. धर्मदेव जी कहते हैं कि अमृत नाम वेद और उपनिषदों में ब्रह्म अर्थात् ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ। इसके उदाहरण भी आपने दिये हैं। धम्मपद श्लोक 160 (अत्तवग्गो 4) “अत्ताहि अत्तनो नथो को हि नाथो परो सिया अत्तनां व सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं।।“ में ईश्वर की सत्ता को महात्मा बुद्ध स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हुए कहते हैं कि आत्मा ही आत्मा का नाम है और कौन उस (परमात्मा) से बड़ा नाथ व स्वामी हो सकता है। अच्छी प्रकार आत्मा का दमन कर लेने से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) की प्राप्ति होती है। ‘नाथं लभति दुल्ल्भं’ यह शब्द अत्यन्त स्पष्टरूप से दुर्लभ नाथ (परमात्मा) का निर्देश करते हैं। यद्यपि अनीश्वरवादी आधुनिक बौद्ध इसका अर्थ निर्वाण कर देते हैं जो संगत नहीं होता और जिसमें खींचा-तानी भी बहुत अधिक करनी पड़ती है।

उपर्युक्त विवरण से सिद्ध है कि महात्मा बुद्ध ईश्वर विश्वासी व आस्तिक थे, अनीश्वरवादी नहीं।

सफलता और शांति के लिए अपनाएं गौतम बुद्ध के ये 10 विचार

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माना जाता है कि भगवान गौतम बुद्ध की ज्ञान की खोज उस समय शुरू हुई जब उन्होंने एक ही दिन में तीन दृश्य देखे. पहला- एक रोगी व्यक्ति, दूसरा- एक वृद्ध और तीसरा- एक शव. जीवन का यह रूप देखकर हर तरह की सुख सुविधा से संपन्न जीवन को छोड़कर राजकुमार सिद्धार्थ गौतम जंगल की ओर निकल पड़े थे ज्ञान और बोध की खोज में…

सुख और सुविधाओं से इसी विरक्ति ने उन्हें राजकुमार गौतम से भगवान बुद्ध बनने की राह पर अग्रसर किया. उन्होंने जीवन में ज्ञान प्राप्त किया और इसे सभी मनुष्यों में बांटा भी. पेश हैं भगवान बुद्ध के वह 12 वचन जो अपनाने से आपको जीवन में सफलता और शांति मिलेगी…

  1. किसी जंगली जानवर की अपेक्षा एक कपटी और दुष्ट मित्र से ज्यादा डरना चाहिए, जानवर तो बस आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, पर एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को नुकसान पहुंचा सकता है.
  2. स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन है, वफ़ादारी सबसे बड़ा सम्बन्ध है.
  3. घृणा, घृणा करने से कम नहीं होती, बल्कि प्रेम से घटती है, यही शाश्वत नियम है.
  4. तुम अपने क्रोध के लिए दंड नहीं पाओगे, तुम अपने क्रोध द्वारा दंड पाओगे.
  5. हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये.
  6. सभी गलत कार्य मन से ही उपजाते हैं. अगर मन परिवर्तित हो जाय तो क्या गलत कार्य रह सकता है.
  7. अतीत पर ध्यान केन्द्रित मत करो, भविष्य का सपना भी मत देखो, वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करो.
  8. वह व्यक्ति जो 50 लोगों को प्यार करता है, 50 दुखों से घिरा होता है, जो किसी से भी प्यार नहीं करता है उसे कोई संकट नहीं है.
  9. क्रोधित रहना, किसी और पर फेंकने के इरादे से एक गर्म कोयला अपने हाथ में रखने की तरह है, जो तुम्हीं को जलती है.
  10. अपने शरीर को स्वस्थ रखना भी एक कर्तव्य है, अन्यथा आप अपनी मन और सोच को अच्छा और साफ़ नहीं रख पाएंगे.

 

1 बौद्ध धर्म
विश्व के प्राचीनतम धर्मों में से एक बौद्ध धर्म की स्थापना करने वाले महात्मा बुद्ध का जन्म तो एक राजवंश में हुआ था लेकिन अपने आचार-विचार से वह एक शासक नहीं बल्कि संन्यासी ही थे। विवाह के पश्चात अपने नवजात पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा समेत सारा राजपाट त्यागकर युवावस्था में ही सिद्धार्थ बोध और मोक्ष की तलाश में घर से निकल गए थे।

2 बोध की प्राप्ति
कई वर्षों के कठोर तप और साधना के पश्चात आखिरकार सिद्धार्थ को बिहार स्थित बोधि वृक्ष के नीचे मोक्ष का मार्ग और बोध की प्राप्ति हुई। बोध की प्राप्ति होते ही संन्यासी सिद्धार्थ, महात्मा बुद्ध बन गए।

3 बुद्ध के विचार
महात्मा बुद्ध द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म भारत समेत अलग-अलग देशों में पहुंचा, आज बहुत से ऐसे देश हैं जहां बौद्ध धर्म प्रमुखता के साथ अपनाया जाता है। महात्मा बुद्ध और बौद्ध धर्म के अनुयायी बुद्ध के विचारों और उनके कथनों को अपने जीवन का आदर्श बना चुके हैं। आइए जानते हैं क्या हैं महात्मा बुद्ध के अनमोल विचार:

4 खोखले शब्द
हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाए

5 अनैतिक कार्य
मन की वजह से ही सभी बुरे कार्य उत्पन्न होते हैं। अगर मन को ही परिवर्तित कर दिया जाए तो क्या अनैतिक कार्य रह सकते हैं?

6 बूंद की अहमियत
बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है।

7 वर्तमान क्षण
अतीत पे ध्यान मत दो और ना ही भविष्य के बारे में सोचो। हमेशा अपने मन को वर्तमान क्षण पर ही केन्द्रित रखो।

8 वफादारी
स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन और वफादारी सबसे बड़ा संबंध है.

9 आध्यात्मिक ज्ञान
जिस तरह कोई मोमबत्ती बिना आग के जल ही नहीं सकती, उसी प्रकार मनुष्य भी बिना आध्यात्मिक ज्ञान के जीवन नहीं जी सकता।

10 तीन चीजें
तीन चीजें ज्यादा देर तक नहीं छुप सकतीं, सूरज, चांद और सत्य

11 मोक्ष
मोक्ष पाने के लिए आपको खुद ही मेहनत करनी होगी, दूसरों पर निर्भर मत रहिए।

12 क्रोध
तुम्हें अपने क्रोध के लिए नहीं बल्कि क्रोध की वजह से दंड भुगतना होगा।

13 बुरा मित्र
जंगली जानवर की बजाय एक कपटी और दुष्ट मित्र से ज्यादा डरना चाहिए, जानवर तो बस आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन एक बुरा मित्र आपकी बुद्धि को हानि पहुंचाएगा।

14 शाश्वत सत्य
शाश्वत सत्य यह है कि घृणा का खात्मा घृणा से नहीं अपितु प्रेम से ही संभव है।

15 संकट
वह व्यक्ति जो पचास लोगों से प्रेम करता है वह उसके पास पचास संकट हैं, वो जो किसी से भी प्रेम नहीं करता उसके पास कोई संकट नहीं है।

16 पवित्र शब्द
आप चाहे कितने ही पवित्र शब्द पढ़ लें या बोल लें, जब तक आप इन्हें प्रयोग में नहीं लाएंगे तब तक ये आपका कुछ भला नहीं कर सकते।

17 अभी बाकी है
मैं कभी नहीं देखता की क्या किया जा चुका है, मैं हमेशा देखता हूं कि अभी और क्या किया जाना बाकी है।

18 मौत की छवि
बिना स्वास्थ्य के जीवन बेकार है, वह बस एक पीड़ा की स्थिति और मौत की छवि है।

19 हमारी सोच
हम जो भी सोचते हैं, वही बन जाते हैं।

20 शक करने की आदत
शक करने की आदत से ज्यादा भयावह और कुछ भी नहीं है। शक लोगों को एक-दूसरे से अलग करता है। यह एक ऐसा जहर है जो मित्रता को समाप्त करता है और रिश्तों को तोड़ता है। एक ऐसा कांटा है जो चोटिल करता है, एक ऐसी तलवार है जो वध करती है।