आज भी हो रहा है दलि‍तों के अधि‍कारों का हनन

भगवान की बनाई गई इस दुनिया के जीवों में सबसे श्रेष्ठ प्राणी मनुष्‍य है | मनुष्य विवेकशील, प्रज्ञावान और स्वाभाव से हीw मानवता के प्रति संवेदनशील होता है | सारे मनुष्य जन्म से समान होते है ओर मनुष्य समान तरह से जन्म लेते है | समान मानवीय अधिकारों और आदर के हक़दार होते है | मनुष्य होने के नाते इस दुनिया में, सभी को एक समान स्वतंत्रता और समानता का अधिकार होना चाहिए, इस दुनिया मे स्‍वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने का हर व्‍यक्ति को अधिकार है इसे कोई उससे छिन नहीं सकता। मनुष्य स्वयं एक जाति है क्योंकि सारे मनुष्यों की मौलिक क्रिया विधि और वाह्य स्वरुप एक जैसा ही है | अतः जीने के अवसर से लेकर विकास के सारे अवसर एक जैसे ही होने चाहिए | परन्तु दुर्भाग्य है कि आजादी के 60 वर्ष से अधिक हो जाने के बावजुद भी, भारत में ऐसी समानता और विकास का अवसर हमारे देश के सभी लोंगों को नहीं मिल पाया है | भारत में चली आ रही हजारों वर्षों से पीड़ा दायक छुआ-छूत, जाति-पाति, ऊँच-नीच, ईश्‍या की दुर्भावना के कारण समाज का दलि‍त वर्ग सदियों से दबा कुचला रहा है | आज भी दलित (अछूत) मानवीय उत्पीडन के शिकार होते आ रहे है | जाति‍य द्वेश और घ्रणा के कारण अभी भी कथित उच्च वर्ग के लोग दलितों के साथ पशुवत व्यवहार करते है तथा उन पर तरह तरह के अन्याय, जुल्म और हत्याचार करते है | बेचारे दलित उनके उत्पीडन को सहते भी रहते है कानूनी कार्यवाही मात्र कागजों पर चलती रहती है जमीनी तोर पर नहीं |
भारत की आजादी के बाद दलितों पर अत्याचार को रोकने के लिए भारतीय संविधान में उल्लिखित संवंधित अन्नुछेदों के तहत समय-समय पर नियम उपनियम बनाये जाते रहे है | लेकिन भारतीय संविधान में इन नियमों के लागु होने के बावजूद भी दलितों पर अत्याचारों में कोई कमी नहीं आयी है | वर्तमान कानून, सिविल अधिक्रम संरक्षण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता दलितों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों को रोकने में अपर्याप्त सिद्ध हो रहे है और मात्र ये कानून कागजों में सिमटते हुए नजर आ रहे है |
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति पिछड़े वर्ग के लोग विभिन्न प्रकार के अत्याचार के शिकार हो रहे है। कहीं पर दलित को नंगा कर घुमाया जा रहा है तो कही पर दलित का सर मुंडवाया जा रहा है | कहीं पर दलित की पेड़ से बांधकर सरे आम हत्या कर दी जाती है तो कही पर दलित के खाना बनाने से खाना अपवित्र हो रहा है तो कहीं पर दलित का कुत्ता यदि दुसरे के यहाँ चला जाये या कुछ छु ले तो वह अपवित्र हो जाता है | इस प्रकार दलितों का उत्पीड़न घटने के स्थान पर बढ़ता जा रहा है | आज दलितों का मुकद्दमा लिखने से पुलिस भी मना कर रही है | आज आयोग भी सरकार की कठपुतली बनकर नाच रहा है पीड़ित आयोगों से लेकर अधिकारियों  के चौखट तक चक्कर काट काट कर थक रहे है |
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्‍य प्रदेश और पंजाब ऐसे घटनाओं के लिए कुख्यात है जहॉ दलित समुदाय के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करना बेहद आम बात है इनके साथ स्थानीय प्रशासन और न्यायपालिका का व्यवहार बुरा है | अनुसूचित जातियो, अनुसूचित जन जातियो के सदस्य चाहे किसी भी उच्च पद पर आसीन हों उन्हें नजरंदाज किया जाता है उनकी क्षमता पर शक किया जाता है तथा उनकी छोटी सी भूल और गलतियों को गंभीर बना कर प्रचारित किया जाता है क्‍योकि कुछ लोग समझते है इस पद्वी का अधिकारी दलित समाज को नहीं है वे ये समझते है कि जिन दलितों से हमने निम्‍न वर्ग का कार्य करवाया वे आज हमारे साथ या हमसे उपर केसे कार्य कर रहे है। इसी हीन भावना के कारण वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अत्याचार और शोषण के शिकार होते रहते है।
‘दलित’ शब्द का अर्थ यह है कि जिसका दलन और दमन किया गया हो, और जिसे दबाया एवं रौंदा गया हो उसे मसला और कुचला गया हो,  वैसे ‘दलित’ शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में ही हुआ है दलित वर्ग के अंतर्गत अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और अन्य पिछड़ा वर्ग आते हैं।
आज जरूर विज्ञान और मनुष्‍य ने बहुत त‍रक्कि कर ली है विज्ञान की सहायता से आज मानव की पहुच चॉंद सितारों तक हो गई है लेकिन उसकी इतनी तरक्कि के बावजूद भी अपनी सोच में कोई खा़स परिवर्तन नहीं आया है ओर अपनी सोच मे कोई तरक्कि नहीं की है आज भी समाज के उच्‍चवर्ग के लोगों मे दलितों के प्रति छुआछुत, दुशभावना, ईश्‍या फुटकर फुटकर भरी पड़ी है इसमे कुछ लोग ही अपवाद स्‍वरूप देखने को मिलते है। लेकिन समाज के उच्‍च वर्ग के बहुत सारे लोग आज भी विकृत मानसिकता के शिकार है आज जरूर वे कानून के डर से खुलकर सामने नहीं आते पर उनकी मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं आया है आज भी वे अपने मन मे दलित वर्ग के प्रति खटास रखते है तथा समय आने पर वे इसे किसी ना किसी रूप में प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष तरिकें से प्रकट कर ही देते है ओर तो ओर ग्रामिण इलाकों में तो आज भी दलित वर्ग पर हत्‍याचार किया जाता है व मानसिक रूप से प्रताणित किया जाता है ओर दलितों को घ्रणा की दृष्‍टी से देखा जाता है व कभी कभी तो सरे आम लज्‍जीत भी किया जाता है दलितों को आये दिन जागरूकता, सूचना व कानून के ज्ञान के अभाव मे अपमान का सामना करना पडता है तथा मजबुरन उन्‍हे ये अपमान रूपी विष का घूट पीना पडता है। आज हमे मिलकर इस प्रगति के दौर मे अपने इस दलित वर्ग के लिये सकारात्‍म‍क सोच विकसित करनी होगी तथा दलित वर्ग के पूनरत्‍थान के लिये इसे पृष्‍ट भूमि पर सार्थक रूप से उतारना होगा, दलित वर्ग को अपने अधिकारों, योजनाओं, तथा कानून से अवगत कराना होगा तथा उनमे समाज के उच्‍च वर्ग के द्वारा किये जा रहे इन हत्‍याचारों से लड़ने की शक्ति पैदा करनी होगी। इन उद्देश्‍यों के साथ आओ हम एक नारा बुलन्‍द करे ”जागों दलितों जागों”

 

लेखक

ब्रजेश हंजावलिया

मन्‍दसौर (म.प्र.)

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