आपस में प्रेम करने वाले को समाज सलाम करता है ।

यह संसार एक ऐसी घाटी है यहां जैसी आवाज मुख से निकालेगे वैसी ही आवाज गुंजते हुए लौटकर आपके कानों में सुनाई देगी । अच्छा करने से अच्छा होता है बुरा करने से बुरा होता है । आग लगाने वाले के बाग नही लगा करते, गिराने वाला कभी उन्नति को प्राप्त नही होता और अपनमान करने वालों के सुखों का प्रसाद नहीं मिलता, निराषा परोसने वालों की कभी आषा नहीं बंधती और नफरत फैलाने वाले को प्रेम नहीं मिला करता ।
दर्जी सुई को अपनी टोपी सा कॉलर में लगाकर सुरक्षित रखता है और कैंची को सावधानी से नीचे दबाकर रखता है । किसी व्यक्ति ने उससे पूछा आप ऐसा क्यों करते है? दर्जी ने इस बात का समाधान करते हुए कहां- कैंची एक सुन्दर व मजबूत वस्त्र को काटकर विभाजित करती है उसकी धार तीक्ष्ण होती है, उससे कट जाने का भय है, इसलिए उसे दबाकर रखा जाता है । इसके विपरित कटे हुए टुकडों को आपस में जोडनें का कार्य सुई करती है इसलिए सुई को कॉलर अर्थात् कले या सिर की टोपी में रखा जाता है । इस बात से ज्ञात होता है कि जिसने भी इस समाज में काटने की कोषिष की या कोई काटने का प्रयत्न करता है उसको समाज अपने तलवों के नीचे रौंद देता है । लेकिन जो नफरत से कटे हुए लोगों को प्रेम की माला में पिरोने का कार्य किया तथा टुटे हुए दिलों को जोडने का जिसने प्रयास किया है और जिसने निराष मन में उत्साह भर दिया है, वह समाज में स्वर्ग का प्रतिनिधि बनकर विचरण करता है । ऐसे अनोखे इंसान को समाज सलाम करता हे और अपने गले लगाता है ।
भगवान की पूजा में जो सामग्री उपयोग की जाती है, उसका भी सारगर्भित रहस्य होता है । पूजा में अक्षत् अर्पित किया जाता है । अक्षत् चावल को कहते है । पूजा में ऐसा अक्षत् प्रयोग किया जाता है जो क्षत् न हो अर्थात टुटा हुआ न हो । इसका तात्पर्य है कि है प्रभो! मैं आपके चरणों में समर्पित हॅू । आधा अधूरा मन लेकर भगवान की पूजा नहीं की जाती । श्रद्धा व विष्वास के साथ प्रभु को समर्पण किया जाता है । ठीक इसी प्रकार समाज सेवा आधे अधूरे मन से नही की जाती उसके लिए श्रद्धा व विष्वास के साथ- साथ समर्पण की भी आवष्यकता होती है । नारियल नम्रता का प्रतीक है । उसका आकार हमारे सिर जैसा होता है । नारियल को भी हम भगवान के चरणों में चढातें है इसका मतलब यह है कि हम अपना सिर नम्रता से प्रभु के चरणों नवातें है । अभिप्राय यह है कि अपने अहम भाव को त्यागकर हम नम्रमा को अपनाए । ठीक इसी प्रकार समाज सेवा के लिए व्यक्ति को अपने अहम (अहंकार) को त्यागकर नम्रमा को अपनाना होगा ।
मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी है । मनुश्य समाज के बगैर नहीं रह सकता क्योकिं समाज ही मनुश्य की प्रथम पाठषाला है । मनुश्य समाज के साथ रहकर ही अपना विकास कर सकता है । जब मनुश्य का विकास होगा तब ही समाज का विकास हो पायेगा । मनुुश्य का विकास होगा तब ही समाज का विकास होगा मनुश्य तथा समाज दोनो ही एक दूसरे के पूरक है यानि मनुश्य के बिना समाज नही और समाज के बिना मनुश्य नही । तभी तो मनुश्य सामाजिक प्राणी कहलाता हैं । जिस समाज में व्यक्ति स्वयं के विकास के साथ साथ समाज के उत्थान के प्रति भी सजग है तो उस समाज के विकास को कोई नही रोक सकता और वह समाज निरंतर विकास की और अग्रसर होता रहेगा और अंत में वह समाज एक ऐसा सभ्य समाज बनकर दुनिया के सामने हिमालय की भांति अडिग खडा हो सकेगा जिसे न तो गर्मी पिघाल सकती है और नही कोई तूफान उसे उसके स्थान से हिला सकता है । ऐसे ही मजबूत रैगर समाज का निर्माण हम लोगों को करना होगा । यह तभी सम्भव हो पायेगा जब हमारे अन्दर समाज को मजबूत करने की दृढ इच्छा षक्ति होगी इस इच्छा षक्ति को जागृत करने के लिए हमें अपने भीतर छुपे क्षेत्रवाद रूपी राक्षसों का संहार करना होगा । जब इन राक्षसों का पूर्ण रूप से संहार हो जायेगा तब ही हम लोग एक मंच पर आसीन होकर भावी सभ्य रैगर समाज का निर्माण कर पायेंगें ।
अभी हाल ही में अखिल भारतीय रैगर महासभा के चुनाव सम्पन्न हुए है जिसमें बहुत हि अच्छे, सभ्य व विद्वान लोग निर्वाचित होकर आये है ये सभी लोग अपने अपने क्षैत्र के माहिर लोग है ये लोग पहाडों का सीना चीरकर दूध का दरिया बहाने की क्षमता रखतें है तथा इन लोगों में समाज के सर्वांगीण विकास के प्रति जुनून है । ओर वो ही लोग सफल होते है जो अपने कार्य के प्रति जुनून रखते है । तभी तो समाज ने इन लोगो पर विष्वास व्यक्त करतें हुए इनके मजबूत कंधों पर समाज के विकास का दायित्व डाला है । इन महानुभवों को भी चाहिए की विकास के दायरे को केवल क्षेत्र विषेश तक ही सीमित न रखतें हुए उसे विस्तृत करे । इस संस्था का नाम ही अखिल भारतीय रैगर महासभा है । नाम की सार्थकता तब ही सिद्ध होगी जब नाम के अनुरूप ही इसका कार्यक्षेत्र होगा ।

हो गई है पीर, पर्वत सी पिघलनी चाहिए ।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए । ।
सिर्फ हंगामा खडा करना मंेरा मकसद नही ।
मेरी चाह है कि यह सूरत बदलनी चाहिए । ।
आग मेरे सीने में नही तो तेरे सीनें में ही सही ।
हो आग कही भी मगर आग जलनी चाहिए । ।

 

लेखक

सुरेश खटनावलिया, वरिष्ठ पत्रकार, जोधपुर (राज.)

B.A., BJMC, MJMC

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