गांधीवादी अन्ना और अम्बेडकर

अन्ना के पूरे आन्दोलन पर ध्यान दे तो आपको पता चलेगा कि अन्ना, 12 दिन के अनशन में देश के सभी महानेताओं के कार्यो तथा बलिदान को याद करते है । लेकिन डॉ अम्बेडकर के नाम को भूल जाते हैं । अन्ना गरीबों की बात करते है और गरीबों के भगवान को भूल जाते है । अन्ना को 13 वे दिन डॉ. अम्बेडकर की याद तब आती है जबकि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति फेडरेशन के बैनर तले 10,000 से अधिक दलित लोग 12 वें दिन, दिल्ली में अन्ना के विरोध में रैली निकालते है और फिर 13 वें दिन अन्ना, डॉ. अम्बेडकर को याद करते हैं और फिर आनन-फानन में दलित व मुस्लिम बच्चों के द्वारा अनशन तुड़वाया जाता है ।

ये सब क्या है ? इस पूरे घटना क्रम में अन्ना यह बात कहते है कि हमें अनशन का अधिकार, हमें हमारा संविधान देता है । अन्ना संविधान की बात तो करते हैं लेकिन संविधान के निर्माता को भूल जाते हैं । 13 दिन की इस पूरी प्रक्रिया में अन्ना व अन्ना टीम के भाषणों को देखा जाये तो आपको पता चलेगा कि अन्ना व उसकी टीम के किसी भी सदस्य ने 13 दिनों के दौरान एक बार भी यह नही कहा गया कि लोकपाल बिल संविधान के दायरे में बनाया जाना चाहिए ।

अन्ना यह कहते है कि आज भी डॉ. अम्बेडकर का सपना पूरा नही हुआ है । लेकिन अन्ना व उसकी टीम ने एक बार भी यह नही कहा कि लोकपाल बिल में दलितों व पिछड़ों व आदिवासियों की भागीदारी होनी चाहिए और फिर यदि ऐसा नही हुआ तो पूरी लोकपाल बिल की गर्वनिंग बॉडी दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों की खिलाफ काम करेगी । जिससे उनके अधिकारों के हनन से उन्हे कोई नही बचा सकता ।

आज कल जितने भी नये कानून बन रहे है उसमें दलितों व आदिवासियों व पिछड़ों को भागीदारी नही दी गई है । जैसे सरकार द्वारा बीमा क्षेत्र का निजीकरण कर दिया गया है । आज उसमें दलितों की भागीदारी वर्तमान स्थिति में नही के बराबर है तथा भविष्य में केन्द्र सरकार बैंकिंग रेग्यूलेसन एक्ट में संशोधन करके बैंकों को लाईसेन्स जारी कर रही है अर्थात् बैंको का निजीकरण कर रही है । जिसमें यदि दलितों व पिछड़ों की हिस्सेदारी सुनिश्चित नही कि जाती है तो उनका विकास कैसे संभव है ?

इस प्रकार ऐसे अनेक मुद्दे है जिन पर गंभीर रूप से मंथन की आवश्यकता है । यदि सरकारी आंकड़ों पर गौर करे तो पता चलेगा कि वर्ष 1950 से 1989 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट (उच्च न्यायपालिका) में अनुसूचित जाति 2.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति शून्य, तथा अन्य पिछड़ी जातियें 5.2 प्रतिशत, ही भागीदारी थी । ऐसी स्थिति में भागीदारी नही होने का क्या प्रभाव होता है, यह आप उक्त आकड़ों से समझ सकते हैं । हमें इस संदर्भ में विस्तृत गंभीर मंथन की आवश्यकता है ताकि दलितों व पिछड़ों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके ।

 

लेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I,

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

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