आज हम क्या पढे?, किस क्षेत्र में जाये?, क्या बने?, और समाज की क्या आवश्यकता है?

यह एक विचित्र प्रश्न है सभी बच्चे आज के समय में वही पढ रहे है उसी क्षेत्र मे जा रहे है जिस क्षेत्र में उनके सीनियर साथी जा चुके है या जा रहे है।
यह बिन्दु बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बिन्दु केवल एक बच्चे का भविष्य तय नहीं करता है अपितु यह एक परिवार, समाज, देश का भविष्य तय करता है।
किसी भी क्षेत्र में जाने से पहले यह जानना आवश्यक है कि हमारे लिए कौन सा क्षेत्र अच्छा है या हमें किसी क्षेत्र में विकास की आवश्यकता है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि आज, आप ओर हम बात करे तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि देश तो आजाद है, पर दलित व गरीब, असहाय लोग आज भी गुलाम है।
इसी दरिद्रता, गरीबी के निवारण के लिए जो ठोस प्रयास डॉ. बी. आर अम्बेडकर ने किया। ऐसा ठोस प्रयास दुनिया के इतिहास में कही नहीं मिलता ओर ऐसे ठोस प्रयास का ही परिणाम है कि आज हम कुछ पढे लिखे व आधारभूत साधन (रोटी, कपडा, मकान) सम्पन्न बने है।
यह जो साधन हमें मिले है यह बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की ही देन है। जिन्होनें अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए देश की व्यवस्था में ऐसा ऐतिहासिक दृढ परिवर्तन कर दिया जिसे आज हम आरक्षण के नाम से जानते है।
आरक्षण का आधार हिन्दू जाति के उच्च वर्गो द्वारा बनाई गई जाति आधारित वर्ण व्यवस्था के कारण एक व्यक्ति का जन्म से ही उसका कार्यक्षेत्र (26 जनवरी 1950 भारत में सविधान लागू होने से पूर्व) तय हो जाता था कौन क्या करेगा, यह पहले से ही तय था।
इसी व्यवस्था को डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर ने तोडा ओर उन दलित गरीब, असहाय, लोगों को अधिकार दिये जिससे वे समाज में सम्मान से जी सके।
यह एक ऐसा ऐतिहासिक परिवर्तन डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ही क्यो कर पाये इस प्रश्न का सीधा सा उत्‍तर यह है कि वे कानूनविद्, बेरिस्टर, विधिवेता थे। यदि डॉक्टर, इंजिनियर, चार्टर्ड एकाउंटेन्ट या कोई सरकारी कर्मचारी जैसे आई.ए.एस. होते तो शायद ऐसी व्यवस्था जो सैकडों सालों से चल रही है उसे बदलने की सोच ही नही सकते थे क्योकि व्यवस्था तभी बदली जाती है जबकि आप उस व्यवस्था के उस प्रारम्भिक बिन्दु पर पहुचे जहां से यह व्यवस्था प्रारम्भ होती है। व्यवस्था बनाने का कार्य वो लोग करते है जिनके हाथों में शासन या व्यवस्था की बागडोर है।
अब यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि दुनिया कैसे चलती है तथा दुनिया में क्या चलता है, मेरा मानना है कि दो ही बाते दुनिया में चलती है। प्रथम राजतंत्र/शासन, द्वितीय विधि/कानून।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि राजतंत्र /शासन को तानाशाही से हासिल किया जा सकता है। लेकिन ऐसे राजतंत्र/शासन को चलाया विधि/कानून के द्वारा ही जाता है।
अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि हमें क्या करना चाहिए आज हमारे देश में लोकतंत्र है वोट का राजतंत्र है। हमारे पिछडेपन या गरीबी, अशिक्षा की वजह से हमें राजतंत्र हासिल करने में कई दशक लग सकते है, लेकिन विधि/कानून का ज्ञान प्राप्त करने में दशक नहीं लगते। इतिहास गवाह है कि देश ओर दुनिया को कानूनविद् ही चलाते है वो ही व्यवस्था के नियम/सिंद्वात बनाते है जिसे हम कानून के नाम से जानते है।
भारत को आजादी दिलाने में इन्हीं कानूनविदों का सर्वोतम योगदान रहा है देश के महान स्वतंत्रता सेनानी अधिकांश कानूनविद् ही रहे है।
आज प्रश्न है यह है कि देश तो आजाद है पर हम आज भी गुलाम है क्योंकि हमें जो अधिकार लाभ, गरीब, पिछडे दलितों को संविधान के द्वारा दिये गये है उनमें अब कटोती होना प्रारम्भ हो गई है।
इसका ज्वलत उदाहरण सुप्रीम कोर्ट द्वारा ’’ पदोन्नति में आरक्षण’’ पर दिया गया निर्णय है ओर इसी निर्णय को आधार रखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के द्वारा जून 2011 में दिये गये अंतरिम आदेश के द्वारा आरक्षित वर्ग का ऑफिसर अपने अधिनस्थ सामान्य वर्ग के कर्मचारी की ए.सी.आर. नहीं भर सकता।
इसका प्रभाव यह होगा कि अधिनस्थ कर्मचारी कानूनी रूप से अपने वरिष्ठ ऑफिसरर्स के अधिकार क्षेत्र में नहीं रहेगा जिससे आरक्षित वर्ग के ऑफिसरर्स की प्रभावशीलता कम होगी तथा उसकी कार्य करने की क्षमता भी प्रभावित होगी।
यह सारा मामला इस बात का संकेत है कि यह आरक्षण को समाप्त करने का प्रथम प्रयास है इसे भी व्यवस्था ने ही प्रारम्भ किया है। आज भी यह व्यवस्था उच्च वर्गो /उच्च जातियों के कानूनविद् लोगों के पास केन्द्रित होकर रह गई है।
अब प्रश्न यह है कि हमें क्या करना चाहिए?
मेरा मानना है कि हमारे गरीब, पिछडे, दलित समाज को कानूनविदो की बडी फौज की आवश्यकता है जो हमारे अधिकारों की सुरक्षा करें तथा उनके लिए लडे़।
अब प्रश्न यह है कि क्या इस पेशा को केवल इसी लिए चुना जाए?

यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार है साथ ही यह एक इकलौता ऐसा पैशा है जिससे देश दुनिया समाज के सभी लोग सीधे उससे जुडे है क्योंकि व्यक्ति व्यवस्था से जुडा है ओर व्यवस्था बनाने का कार्य कानूनविद् करते है।
सरकार कानून बना सकती है लेकिन उसे लागू करने का कार्य इन्हीं व्यवस्था कानूनविद् /न्यायालयों का है।
एक डॉक्टर केवल चिकित्सा क्षेत्र में कार्य कर सकता है एक इंजिनियर केवल अपने तकनीकी क्षेत्र में कार्य कर सकता है एक चाटर्ड एकाउंटेन्ट केवल लेखाकंन के क्षेत्र में कार्य कर सकता है जबकि एक कानूनविद् (एडवोकेट) का कार्य क्षेत्र असीमित होता है जिसमें जन्म से लेकर मृत्यु तक इसका दायरा फैला होता है।
यह इकलौता ऐसा पेशा है जिसमें व्यक्ति की सर्वोधिक प्रभावशीलता होती है और यह समय से साथ साथ बढती जाती है जों व्यक्ति के जीवनकाल तक रहती है
यह एकमात्र ऐसा पेशा है जिसमें व्यक्ति सीधा आम लोगों से जुडा होता है और ऐसा व्यक्ति ही समाज को सुधार सकता है। कोई डॉक्टर, इंजिनियर, चार्टर्ड एकाउंटेन्ट यह कार्य इतना बखूबी अंजाम नहीं दे सकता क्योंकि इनका दायरा उनके क्षेत्र विशेष तक सीमित होता है।
समाज में सुरक्षा का वातावरण डॉक्टर इंजिनियर, चार्टर्ड एकाउंटेन्ट नहीं दे सकता जबकि एडवोकेट समाज में सुरक्षा का वातावरण दे सकता है तथा वह समाज के अधिकारों की सुरक्षा करने में सक्षम हो सकता है। एक व्यक्ति जीवन में तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसके अधिकार सुरक्षित न हो क्योकि अधिकारों की सुरक्षा डॉक्टर इंजिनियर चार्टर्ड एकाउंटेन्ट के हाथों में नहीं होती। यह व्यवस्था के हाथों में होती है ओर व्यवस्था को कानूनविद् चलाते है।
यह आम धारणा है कि कानून/विधि के पेशे में आय के स्त्रोत बहुत कम है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो पेशा व्यवस्था से जुडा हो उसमें आय के स्त्रोत कम हो, ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि व्यवस्था का दायरा असीमित है।
व्यक्ति की दिनचर्या में डॉक्टर इंजिनियर, चार्टर्ड एकाउंटेन्ट नहीं आते है जबकि एडवोकेट आते है चाहे वो जन्म प्रमाण पत्र हो, जाति प्रमाण पत्र हो, विवाह प्रमाण पत्र हो, पासपोर्ट हो, सामाजिक बुराईयों को दूर करने में न्यायालय की भूमिका /समाज सुधार/असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण तथा मृत्यु प्रमाण पत्र इत्यादि अनेक कार्य है जो आप ओर हमारी दिनचर्या का हिस्सा है क्योंकि आज सरकार /व्यवस्था की सभी चीजे औपचारिकताओं से भरी पडी है।
उपरोक्त के अतिरिक्त आज वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट में हमारे पिछडे, गरीब, दलित समाज के लोग वहा नहीं है। उसी का परिणाम है कि सुप्रीम कोर्ट आरक्षण के केस में एसी.एसटी आरक्षण पर अपना निर्णय दिया।
आज भी हाईकोर्ट में अपील सम्बन्धी अनेक मामलों में वकीलों की फीस एक लाख रूपये से प्रारम्भ होती है तथा सुप्रीम कोर्ट में अपील सम्बन्धी मामलों में वकीलों की फीस पांच लाख रूपये से प्रारम्भ होती है जहां आज भी हमारे पिछडे़, गरीब, असहाय, दलित वर्गो के वकील नहीं है।
इस स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि इस पेशे में आय के स्त्रोत कम है।
इस पेशे में सरकारी कर्मचारी मजिस्टेट (आर.जे.एस.) होते है जिनके दायरे में आई.ए.एस अधिकारी तथा सभी नेता आते है जबकि आई.ए.एस. अधिकारी/नेता के दायरे में मजिस्टेट नहीं आते है क्योंकि हमारी शासन व्यवस्था में न्याय क्षेत्र एक स्वतंत्र बोडी है।
समाज सेवा करने वाले लोग कहते है कि समाज में कार्यकर्ताओं की कमी है। समाज सुधार में सबसे महत्वपूर्ण रोल कानूनविद् का होता है। इन्हीं कानूनविदो की कमी के कारण समाज में सामाजिक कार्यकर्ताओं की कमी है।
एक व्यक्ति आई.ए.एस बनकर व्यवस्था को बनाये गये नियमों कानूनों के अनुरूप चलाता है ना कि व्यवस्था के नियमों कानूनों को बनाता है।
एक व्यक्ति सरकारी कर्मचारी, डॉक्टर, इंजिनियर, चार्टर्ड एकाउटेंट, अध्यापक बन कर अपनी निजी आजीविका अच्छी तरह चला सकता है लेकिन वह अपने अधिकारों की रक्षा करने में पूर्ण रूप से कानूनविदो /व्यवस्था चलाने वालों पर निर्भर होता है।
आप चाहते है कि हमारा भविष्य/ आने वाला कल सुरक्षित हो ओर अच्छा वातावरण दे, तो यह बहुत जरूरी है कि भावी पीढी को कानून की शिक्षा दिलाये ताकि वह स्वतंत्र व आत्म विश्वास के साथ जी सके तथा समाज को सुरक्षित वातावरण मिल सके। जिसमें उनके अधिकार सुरक्षित हो।
अन्यथा आज जहां हम डॉक्टर बी.आर अम्बेडकर के प्रयासों से जिस मुकाम पर पहुचे है यह व्यवस्था में उनके द्वारा किये गये ठोस परिवर्तनों की देन ही है यदि हम अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं रहे तो व्यवस्था में ऐसा पुनः परिवर्तन हमें अनेक दशको पीछे ले जाने में देरी नहीं लगायेगा।
मेरा मूल उद्वेश्य अपने विचारों को आप तक पहुचाने का है। इसमें किसी की भावना को ठेस पहुचती है तो क्षमा प्रार्थी हू।

 

लेखक

कुशाल चौहान, एडवोकेट

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

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