सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी सवालों के घेरे में !

आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहे है, जिस पर हमे गम्भीर रूप से मंथन करने की आवश्यकता है, आज हमारे बीच मे अनेक सामाजिक व गैर राजनैतिक संस्थाऐ व संगठन कार्यरत है, जो आज अपने मूल उदेश्यों व कार्यों को पूर्ण करने मे कहा तक सफल हुए है तथा इनके पदाधिकारी अपना कार्य पूर्ण ईमानदारी, क्षमता, योग्यता, स्वतन्त्रता से करने मे कहा तक सक्षम है, आप और हम भली-भॉती जानते है ।

आज जिस प्रकार से इन संस्थाओ की चुनाव प्रणाली सवालो के घेरे मे है, उसी प्रकार इन संस्थाओं के पदाधिकारीयों की कार्य क्षमता और विश्वनीयता पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है, अभी तक अधिकतर दलित व आदिवासी संस्थाऐ व संगठनों को उनके सरकारी सेवानिवृत तथाकथित अधिकारियों ने रबड़ स्टाम्प बना रखा है, इनके कार्यों पर नजर डाले तो हम पाते हैं की यह कार्य तो कम करते हैं, दिखावा ज्यादा करते हैं ।

प्रश्न यह उठता है कि तो अभी तक वर्तमान मे जितने भी दलित -आदिवासी के अधिकारों की रक्षा के लिए जो भी संस्थाऐ व संगठन कार्यरत है, वे सभी सफल क्यो नही हो रही है । प्रथम दृष्टि इन पर नजर डाले तो यह साफ दिखाई देता है कि संस्थाऐ बुरी नही है, संस्थाओं के पदों पर आसीन पदाधिकारी केवल पदों को अपनी व्यक्गित छवि बनाने, अपने खालीपन को भरने तथा सरकार द्वारा उन्हे जबरदस्ती (60 वर्ष) सेवानिवृति करने से उत्पन्न कमी को पूरा करने के लिए इन संस्थाओं के पदाधिकारी बने बैठे है । यदि वास्तव मे देखा जाए तो वर्तमान मे जिस प्रकार दलित आदिवासियों के अधिकारों का हनन हो रहा है, उनके अधिकाश्रज्ञैा मे निरन्तर न्यायालय व राजनैतिक स्तर पर कटोती करने का प्रयास किया जा रहा है, तथा भारतीय समाज मे आज भी दोगला रवैया उनके प्रति अपना रखा है इन सभी से यह संगठन ऐसे अनभिज्ञ है, जैसे कि सब कुछ ठीक चल रहा है ।

हाल के दिनों मे गाँवों मे दलितो का हुक्का पानी बंद करना, राजस्थान हाईकोर्ट जस्टिस भण्डारी द्वारा कांस्टेबल भर्ती 2010 मे आयु सीमा मे छूट प्राप्त अभ्यार्थियों को सामान्य वर्ग से अधिक अंक लाने पर भी आरक्षित वर्ग मे शामिल करने का निर्देश दिया । टेट परिक्षा 2011 मे आरक्षित वर्गो अभ्यार्थियों के लिए भी जिस प्रकार का बखेड़ा खड़ा किया गया, जिसे बड़ी मुश्किल से सरकार ने समेटा है, सभी जानते है, कि पदोन्नती मे आरक्षण के मामले मे उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जिस प्रकार पदोन्नती व ठेके मे आरक्षण को समाप्त किया गया और सुप्रीम कोर्ट ने भी पदोन्नती मे आरक्षण समाप्त करने का आदेश दे दिया तथा राजस्थान मे पदोन्नती मे आरक्षण पर आज भी तलवार लटक रही है और अनेक स्तरो पर केन्द्रिय सरकार की सेवाओं मे भी अब विभागीय स्तर पर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पदोन्नती आरक्षण मे रोड़ा अटकाने का क्रम जारी है । जिसमे सरकार के कई महत्वपूर्ण विभाग है जिसमे आयकर, डाकघर, बैंक आदि अनेक विभाग है जिसमे पदोन्नती किसी न किसी नियम की आड़ लेकर अटका रखी है, जिसकी सूचना आमतोर पर किसी समाचार पत्र मे नही छपती है । ऐसी गम्भीर ज्वलंत समस्याओं पर इन संस्थाओं के पदाधिकारी कहाँ टिकते है । यह आप और हम अच्छी तरह जानते हैं, यह तो खुद अपने आपको बचाने के लिए इन संस्थाओं के पदों की आड़ लिए हुए है और समाज के अधिकारों की रक्षा पर मोन बने हुए है ।

पिछले दिनों जयपुर की हमारी अनूसूचित जाति व जनजाति संस्थाओ के चुनाव हुए, सर्वप्रथम तो उनकी चुनाव प्रणाली पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया । जिसमे 60-60 पदो के एक साथ चुनाव हुऐ और फिर उनके निर्णय कितने सार्थक है । आप सभी जानते है, इसके बाद प्रश्न उत्पन्न होता है कि आज जिस प्रकार की हाई प्रोफाइल समस्याऐ जैसे – आरक्षण कि सुरक्षा, अधिकारों की रक्षा, ऊंच-नीच भेदभाव को मिटाना, दलितो का हुक्का पानी बंद करना और अपने लोगों को एक मजबूत नेतृत्व देने मे इन संगठनो के पदाधिकारी सक्षम है ।

क्या एक आर.ए.एस, या आई.ए.एस. स्तर का अधिकारी सरकार की नौकरी करते हुए, इन संस्थाओं के पदों के साथ न्याय करने मे सक्षम है । क्या वह सरकार को समाज के अधिकारों की रक्षा करने के लिए गुर्जर आंदोलन या अन्य जाट आंदोलन जैसी चुनोती देने मे सक्षम है । जो व्यक्ति सरकार का नोकर हो, क्या वह अपने मालिक की नौकरी करते हुए, अपने समाज के अधिकारों की रक्षा करने मे मालिक को चुनोती देने मे सक्षम हो सकता है । यह अपने आप मे एक हास्यापद बात है । यह उसके पद की कार्य क्षमता पर सवालिया निशान खड़ा करता है, क्‍योंकि किसी भी सरकारी कर्मचारी की ताकत उसकी नौकरी मे होती है, नौकरी के अभाव मे वह अपने आपको असहाय व कमजोर महसूस करता है । क्या ऐसे सरकारी कर्मचारी जो अपने स्थानान्तरण, वेतन वृद्धि, पदोन्नति, सेवा अनुलाभ के लिये हमेशा पीड़ित रहे हो, को इतना होसला है कि वह सरकार के खिलाफ जाकर अपने समाज के अधिकारों की रक्षा कर सके ।

प्रथम तो समाज के अधिकारों की रक्षा कैसे सम्भव है, यदि सम्भव हो तो भी उसे किसी एक पद का त्याग करना होगा, तभी सम्भव है, क्योकि वह एक साथ दो पदो के साथ न्याय नही कर सकता है, तो वह क्या कर रहा है, वह समाज के साथ धोखा कर रहा है । वह समाज को सुरक्षा देने मे सक्षम नही है, क्‍योंकि वह तो स्‍वयं सरकार का नोकर है । वर्तमान मे जिस प्रकार आर.ए.एस, या आई.ए.एस. स्तर के अधिकारियों के पास सरकारी काम का बोझ बना रहता है जिसमे परिवार तक को समय देना भी मुश्किल होता हो, ऐसी विकट परिस्थितियों मे सामाजिक संगठनों के पदों का निर्वाह करना असम्भव सा लगता है ।

ऐसे अधिकारी जब संस्था के सर्वोच्च पर के लिए चुने जाते है तो ऐसी स्थिति मे संस्था कि विश्वनीयता और उसकी क्षमता एक व्यक्ति तक सीमित होकर रह जाती है, तो वह संस्था नही रहती है, वह एक पद की रबड़ स्टाम्प बनकर रह जाती है, जिसका कोई ओचित्य नही । ऐसा लगता है कि इन संस्थाओ को सरकारी कर्मचारियों ने जिसमे कुछ सेवारत और कुछ सेवानिवृत है, हाइजेक कर रखा है, जिससे कुछ उम्मीद करना बेमानी है । तो हमे क्या करने की आवश्यकता है दलित आदिवासियो से सम्बन्धित सारे मामले प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कानून, न्याय व्यवस्था से सम्बन्धित है, जिनके पालन नही होने के कारण या जिन्हे लागू नही करने के कारण या जिनका गलत विश्लेषण के कारण, खड़े हो रहे है जिसका प्रभाव हमे प्राप्त अधिकारों पर पड़ रहा है, ऐसी स्थिती मे हमारा नेतृत्व स्वतन्त्र नेता के हाथो मे होना चाहिये तथा उसके आस-पास युवा व वरिष्ट कानूनविद्धो व प्रशासनिक अधिकारियों की टीम होनी चाहिये क्योकि आज जिस प्रकार की कठिन समस्याऐ और चुनोती हमारे सामने खड़ी है, उससे निपटने के लिए कानून के अनुभवी जानकारों, वकीलों, सेवानिवृत जजो तथा बुंलद प्रशासनिक सेवानिवृत अधिकारियों को टीम मे शामिल किये जाने की आवश्यकता है जो आवश्यकता पड़ने पर तन-मन-धन लगा सके क्‍योंकि ऐसे नेतृत्व को ही जनता अपना समर्थन देती है । जो नेता स्वतंत्र नही होगा, वह सफल नही हो सकता ।

इन सारी असफलता तथा पगुपन के लिए संस्थाऐ और संगठन दोषी नही है इनके पदाधिकारी दोषी है, चाहे कोई माने या माने यह एक कड़वी सच्चाई है ।

 

 

लेखक

कुशाल चन्द्र रैगर, एडवोकेट

M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I,

अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)

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