गलत इतिहास लेखन के दुष्‍परिणाम !

मनुष्य में अपने पूर्वजों का इतिहास जानने की जिज्ञासा हमेशा रही है । हजारो वर्षों से अपमानित, शोषित एंव उपेक्षित दलित वर्ग की अछूत जातियां अपने वजूद को जलाशती हुई अपनी जाति की उत्पति, मूल स्थान, गौत्र, वशं, साम्राज्य, व्यवसाय, महापुरूषों आदि की खोज में लगी हुई । इसें लिए प्राचीन धार्मिक ग्रन्‍थों, इतिहास, भाषा विज्ञान तथा भौगोलिक परिस्थितियों का सहारा ले रहे हैं । नवम्बर 2011 में प्रकाशित ‘‘क्षत्रिय सरगरा समाज का गौरवशाली इतिहास’’ के लेखन डॉ. आर. डी. सागर ने सरगरा समाज की उत्पति के सम्बन्ध में एक कथा का वर्णन किया है । दैत्य कुल में जन्मे राजाबली ने स्वर्ग का राज्य प्राप्त करने लिए यज्ञ प्रारंभ किया । देवताओं के गुरू वृहस्पति ने इस यज्ञ में एक जीवित मनुष्य की आहुति देने की आज्ञा दी । राजा बलि आहुति के लिए जीवित मनुष्य ढूंढते हुए ऋषि मानश्रृंग के आश्रम में पहुचे । मानश्रृंग ऋषि के 14 वर्षीय पुत्र सर्वजीत को पिता की सहमति से लेकर आए । यज्ञ में आहुति देने से एक दिन पहले सर्वजीत ऋषि वाल्मीकि के पास पहूँचा । ऋषि ने अपने तप के प्रभाव से उसे ऊर्जावान बना दिया । यज्ञ में सर्वजीत की जीवित आहुति दे दी गई । यज्ञ सवा तीन महीने चला । यज्ञ समाप्ति के बाद सर्वजीत यज्ञ की ढेरी से जीवित निकला । ऋषि वाल्मीकि ने सर्वजीत को सात साल पाला-पोषा पढाया । गुरू वाल्मीकि की आज्ञा का पालन करते हुए सर्वजीत ने अवंति के राजा सत्यवीर की पुत्री मधुकंवरी के साथ विवाह किया । उनके तीन पुत्र हुए- 1. सर्गरा 2. सेवक तथा 3.गांछा । इस प्रकार इन तीन जातियों की उत्पति हुई । लेखक यह भी कहते है कि क्षत्रिय सरगरा जाति के लोग राजा बलि की तुलना में महर्षि वाल्मीकि को श्रद्वा से देखते है ।

सम्वत् 2039 में प्रकाशित ‘‘मेघवंश इतिहास’’ के लेखक स्वामी गोकुलदास ने मेघवाल जाति की उत्पति ब्रह्माणी के पुत्र मेघ ऋषि से बताते हुए मेघवालों को ब्रह्म क्षत्रिय प्रमाणित किया है । ब्रह्म क्षत्रिय ब्राह्मणों एंव क्षत्रियो का मिला हुआ रूप है । ‘रेगर जाति का इतिहास’ वर्ष 1986 में प्रकाशित हुआ । लेखक चन्दनमल नवल ने रैगरों को राजा सगर का वंशज बताते हुए सूर्यवंशी क्षत्रिय माना है । चमार जाति के लोग अपना सम्बन्ध रामायण के ‘जटायु’ पक्षी के साथ जोडकर अपने को ‘जाटव’ कहलाने में गौरव महसूस कर रहे हैं । खटीक समाज स्वय को खट्वांग ऋषि की संतान बताकर अन्य अछूत जातियों से अपने को ऊँचा मान रहे हैं । वाल्मीकि को वाल्मीकि (भंगी) समाज अपना आदि पुरुष मानकर उसकी पूजा करता है, उनकी जयन्ती मनाता है । पंजाब के वाल्मीकि जातियों के संगठनों ने जिला कपूरथला स्थित न्यायालय में एक वाद दायर किया था कि वाल्मीकि सफाई करने वाले लोगों की जाति के थे । इनका फैसला अभी वर्ष 2011 में आया है । जिला न्यायालय कपूरथला ने फैसला दिया है कि रामायण के रचियता वाल्मीकि ब्राह्मण थे, वह सॅाई करने वाली जाति के नहीं थे । यह बहुत महत्वपूर्ण फैसला है । इस विषय पर व्यापक बहस करने की आवश्यकता है । वैसे भी भंगियों के वाल्मीकि से सीधे सम्बन्ध होने के कोई प्रमाण भी नहीं हैं । आर्यों को अपना पूर्वज बताने की होड़ केवल अछूत जातियों में ही नहीं है बल्कि इस दौड़ में शूद्र और अन्य पिछड़ा वर्ग भी शामिल है । कायस्थ जो शूद्र है, अपने को चित्रगुप्त का वंशज बताकर अपने लिए ब्राह्मणी व्यवस्था में ऊँचा पद पाने के लिए इलाहबाद और पटना हाई कोर्ट में गए । एक कोर्ट ने इन्हे क्षत्रिय करार दिया तो दूसरे कोर्ट ने शूद्र बताया । महाराष्ट्र के मराठों को शूद्र की गिनती में रखा गया, परन्तु शिवाजी के रक्त सम्बन्धित मराठों को क्षत्रिय मान लिया गया । बंगाल के वैद्य समाज को शूद्र की मान्यता मिली । नाइयों ने ‘न्यायी बामण’ कहलाने में अपने को धन्य समझा । जाट और यादव यदुवंशी श्रीकृष्ण से सीधा सम्बंध जोड़कर क्षत्रिय बनने में लगे हुए है ।

आर्य विदेशी है :- आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व आर्यों का भारत में आगमन हुआ । आर्य विदेशी है । इसका वर्णन भारत एवं विदेशी अनेकों इतिहासकारों ने किया है । आर्यों को विदेशी बताने वाले इतिहासकारों में कई ब्राह्मण भी है । बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों का विदेशी होना स्वीकार किया है । पं. जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिसकवरी आफ इण्डिया’ में आर्यों का बाहर से आना माना है । ज्योतिबा फुले ने उन्हे मध्य एशिया के ईरानी कहा है । स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा प्रो. मेक्समूलर आदि सभी विद्वान इतिहासकार एक मत है कि आर्यों ने भारत में बोल्गा नदी, मध्य ऐशिया, ईरान से प्रवेश किया है । घूमन्तू आर्य जाति के लोग सिन्ध के मैदानी भाग में आकर बस गये । आर्यों तथा यहां के मूल निवासी द्रविड़ों के मध्य लम्बा संघर्ष हुआ । लगभग 1700 वर्ष तक संघर्ष चला । इसका उल्लेख ऋग्वेद तथा पुराणों में देवताओं और असुरों के मध्य हुए संघर्ष में देखा जा सकता है । इसे ब्राह्मणों ने मूल निवासियों की पहचान छुपाने के लिए राक्षसों, दैत्यों, असुरों, दानवों से युद्ध होना बताया है । आर्यों ने मूल निवासियों को संघर्ष में पराजित किया । आर्यों के आक्रमण से भयभीत होकर जो लोग जंगलों की शरण में चले गए उन्हे आदिवासी नाम दिया गया । शेष हारे हुए लोगों को दास बना दिया गया । आर्यों के आगमन से पूर्व भारत में कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी, किन्तु भारत के मूल निवासियों को जीत लिया उस समय तक तीन वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वेश्य का उद्भव हो चुका था ।

डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट :- मानव शरीर में प्रोटिन एक महत्वपूर्ण पदार्थ होता है । इसके दो रुप है आर.एन.ए. (राईबोज न्यूक्लिन एसिड) तथा डी.एन.ए. (डीक्सीरिवों न्यूक्लिन एसिड) डी.एन.ए. अनुवांशिक विन्यास का निर्माण करता है । डी.एन.ए. पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित होता है लेकिन इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं होता है । डी.एन.ए. पुरुषों में ही होता है । स्त्रियों में माइक्रों कोन्ड्रीयल होता है जो महिला से महिला में स्थान्तरित होता है । उताह विश्वविद्यालय, न्यूयोर्क (अमेरिका) के प्रो. माईकल बामदास ने आन्ध्रा विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय तथा केन्द्र सरकार के एन्‍थ्रोपालीजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के सहयोग से भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य के डी.एन.ए. गुणसूत्र का परीक्षण किया । परीक्षण में पाया कि भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य के डा.एन.ए. गुणसूत्रों तथा यूरोप के गोरे लोगों के गुणसूत्रों में औसतन 99.87 प्रतिशत समानता है । इस तरह विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय एवे वैश्य विदेशी लोग है । यह डी.एन.ए. टेस्ट रिपोर्ट 21 मई 2001 में दिल्ली के अंग्रजी अखबार ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित हुई ।

दलित भारत के मूल निवासी :- आर्यों के भारत में आने से पूर्व यहा नेग्रीटो, एरिस्टसे, कोल मंगोल, किरात, सिन्धु घाटी तथा हड़प्पा जैसे द्रविड़ों की समृद्ध सभ्यता रही है । सिन्धु घाटी की सभ्यता के बाद भारत में आर्य संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ । डॉ. भीमराव अम्बेडकर से पहले किसी ने जाति और वर्ण व्यवस्था पर कोई वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं किया था । इस विषय पर उनके तीन शोध ग्रन्थ उपलब्ध है ‘कास्ट दन इण्डिया’ ‘हू वर दा शूद्राज’ और ‘दि अनटचेबल’ पहले ग्रन्थ में भारतीय समाज के वर्ग से जाति में अन्तरण की प्रक्रिया, दूसरे में शूद्र वर्ण के निर्माण और तीसरे ग्रन्था में अछूत वर्ग की उत्पति की परिस्थितियों का अध्ययन है । डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि जाति व्यवस्था को धर्म क बन्धन में जकड़ दिया गया । धर्म ने जाति को प्रतिष्ठित किया और उसे पवित्रता प्रदान की । कालान्तर में जाति और वर्ण व्यवस्था ने शूद्रों के समस्त मानवाधिकार छीन लिए । उनका शोषण करके दीन हीन बना दिया । उन्हे अछूत बनाकर उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया । डॉ. अम्बेडकर का यह मत सही लगता है कि शूद्र यहां के मूल निवासी है । वे इस देश के मालिक है ।

दलित जातियों के गलत इतिहास लिखने के दुष्परिणाम :- संविधान द्वारा प्रदत अधिकारों से दलितों को राजनीतिक समानता प्राप्त हुई है, उनमें स्वाभिमान जगा है । लेकिन सामाजिक समानता के अभाव में वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं वे असमंजस में है कि हजारों सालों के सामाजिक उत्पीड़न तथा अपमान से मुक्ति मिले । इसलिए वे अपनी जातियों का गौरवाशाली इतिहास लिखने में लगे हुए है । वे अपने को ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्यों की संतान बताकर अन्य अछूत जातियों से अपने को उच्च और श्रेष्ठ प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे हैं । इससे दलित जातियों में बिखराव पैदा होगा । दलित संगठन कमजोर होगा । दलितों को समझने की आवश्यकता है कि द्रविड़ या द्रविड़ों के बाद के आर्य हमारे पूर्वज हो ही नहीं सकते है । आर्यों को हमारा पूर्वज मान लेना ऐसा ही है जैसे हमसे बाद की पीढ़ी में पैदा होने वाले दूसरे के बच्चे को ही हम हमारा पूर्वज मान रहे हैं । इसलिए जो अछूत जातियां ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य को अपना पूर्वज प्रमाणित कर रहे हैं या मान रहे हैं वह गलत, निराधार और काल्पनिक है । सत्य से परे और अविश्वसनीय है ।

सबसे अहम बात यह है कि हम अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के वंशज लिख दे या मान ले तो क्या वे हमें स्वीकार का लेगे । वे हमे स्वीकार नहीं कर रहे हैं और न करेगें । इससे हमारी आने वाली पीड़ियों में हीन भावना ही पैदा होगी । यदि वाल्मीकि या वेद व्यास को हम दलित मान भी ले तो उनके चरित्र और चिन्तन में दलित चेतना लायक कुछ भी नहीं है । हमारे प्रेरणा स्त्रोत तो ज्योतिबा फूले, शाहूजी महाराजा तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर ही हो सकते है । उनके द्वारा बताये रास्ते पर चलने से ही हमारा उत्थान हो सकता है । अंत में विनम्र निवेदन है कि दलित एवं अछूत जातियां अपना अलग-अलग इतिहास लिखना बंद करे या सारी दिशा में लिखें । सुबह का भूला शाम को घर लौट आता है तो उसे भूला नहीं कहते हैं ।

 

 

लेखक

चन्दनमल नवल

नागोरी गेट, जोधपुर (राज.)

(साभार :- रैगर ज्‍योति (मासिक पत्रिका), अंक जून 2012, बाड़मेर)

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