रैगर समाज की संस्‍कृति

संस्‍कृति किसी भी समाज की श्रेष्‍ठतम धरोहर मानी गई है । रैगर जाति की संस्‍कृति उच्‍चतम आदर्शों और शाश्‍वत् मूल्‍यों से भीर हुई है जिसके आन्‍तरिक और बाह्य दो पक्ष है जो इस कौम की जीवन जीने की शैली को उजागर करते है । जूतियों और मौचड़ियों के चमड़े पर गोटा कारीगरी कर उसे सुन्‍दर बनाना बाह्य संस्‍कृति के प्रतिक मात्र है जबकि इस जाति के चरित्र को संस्‍कृति का आन्‍तरिक पक्ष माना जा सकता है । अभी तक रैगर जाति की संस्‍कृति के आन्‍तरिक बाह्य पक्षों को प्रकाश में लाने का कोई प्रयास नही किया गया है । दुर्भाग्‍य यह रहा है कि रैगर जाति का न तो ठीक ढंग से कोई इतिहास लिखा गया है ओर ना ही इस समाज की परम्‍पराओं का कोई अध्‍ययन किया गया है जबकि रैगर जाति ने हजारों वर्षों तक संघर्ष कर अपने चरित्र की सबलता को बनाये रखा है ।

आंतरिक पक्ष:

शरणागत की रक्षा और उसको सम्‍मान देना रैगर जाति का मुख्‍य गुण रहा है । यह क्षत्रिय गुण ही है । यदि पौराणिक गाथाओं का अध्‍ययन किया जाये तो नरेश शिवि ने अपनी शरण में आये कबूतर की रक्षा के लिये अपने अंग का मांस तक दे दिया था । इसी प्रकार रणथम्‍भौर के राव हम्‍मीर ने दो शरणागत मुसलमानों की रक्षा के लिय अपना पूरा कर्तव्‍य निभाया था ।
अपने धर्म पर टिका रहना भी रैगर जाति का अपना गुण रहा है । इस जाति पर हर प्रकार के अत्‍याचार हुये फिर भी इस जाति के लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया । स्‍वर्ण हिन्‍दुओं ने भी इन पर हजारों सालों तक अत्‍याचार किये परन्‍तु फिर भी ये लोग हिन्‍दू धर्म में ही बने रहे । यहां तक कि इन्‍होंने अपने मौहल्‍ले और बस्तियों में हिन्‍दू देवी देवताओं और गंगा माता को अपने इन मन्दिरों में स्‍थापित कर हिन्‍दू धर्म की परम्‍पराओं को निभाया । इन्‍होंने गंगा जल उठकर यदि कोई कसम ले ली तो यह मान लिया गया कि गंगा जल उठाने वाला व्‍यक्ति शाश्‍वत सत्‍य बोल रहा है ।
रैगर जाति एक ईमानदार जाति रही है और वह अपनी मेहनत की कमाई खाना ही अपने जीवन का लक्ष्‍य समझती रही है । यहां तक कि इस जाति के लोग चमड़े की रंगत का कार्य भी ईमानदारी से करते रहे हैं । इस जाति के लोग आपराधिक प्रवृत्ति के नही रहे हैं बल्कि अपने वचन पर कायम रहकर जीवन जीने में माहिर रहे हैं । इनका जीवन अभावों और संघर्षों की जीती जागती मिसाल रहा है परन्‍तु फिर भी इन्‍होंने धोखा देकर अपनी ठगी करके धन उपार्जित नहीं किया है । वास्‍तव में रैगर जाति के लाग भोले लोग है । यह इनकी आन्‍तरिक शक्ति का प्रतीक है ।
इस कौम में अतिथि सत्‍कार भी ऐसा आदर्श रहा है कि जिसमें अतिथि को भगवान के रूप में देखा गया है । व्‍यवसायिक ईमानदारी और पारस्‍परिक सहयोग का सांस्‍कृतिक गुण भी रैगर जाति के लागों में रहा है ।

बाह्य पक्ष:

रैगर संस्‍कृति के बाह्य पक्ष के कई आयाम है जिनमें इनके द्वारा चमड़े की जूतियों पर कारीगरी करना, शादी में ‘टूंटया’ करना और खुशी के मौके पर नृत्‍य करना आते है । लोकगीत तथा मुहावरे, लोरियां, भजन, हरजस आदि इस जाति का लोक साहित्‍य है । तीज, गणगौर, दशहरा, होली, दीपावली आदि उत्‍सव ये बड़े हर्षों-उल्‍लास से मनाते है । धार्मिक आस्‍थाओं मे रामदेव बाबा (रूणिचा रे श्‍याम) जैसे धार्मिक मेले आते हैं । इस जाति मे लोकजीवन के अनेकों आदर्शों पर चलने की जीवन शैली विद्यमान है ।
रैगर जाति का लोक साहित्‍य: लोक गीतों के अतिरिक्‍त कथायें, मुहावरें, कहावतें, पहेलियां, लोरियां, सबद, हरजस, भजन, प्रवाद, चुटकुलें, गाथायें आदि भी लोक साहित्‍य के विशिष्‍ट अंग है । रैगर समाज में अन्‍य समाजों की तरफ इनकी जाति के लोक कथाओं में इन लोगों के अनुभव, ज्ञान और कल्‍पना का निचोड़ है । इन कथाओं में समाज के प्रत्‍येक वर्ग के लिए पृथक-पृथक कथायें है । बालोपयोगी कथाओं की मनोवैज्ञानिक प्रस्‍तुति प्रंशसनीय कही जा सकती है । इनमें परियों की कहानियां, बाल कल्‍पना को जागृत करने के लिये रची गई विलक्षण कथायें, पशु पक्षियों की नीति संबंधी कथायें और इसी प्रकार की बालकों के कोमल मन को सही दिशा में प्रेरित और प्रवाहित करने वाली कथायें आती है । प्रौढों के लिये नीति, भूत-प्रेत, चोरी-धाड़ा, हास्‍य व्‍यंग्‍य, विभिन्‍न जातियों के गुण दोष आदि विभिन्‍न प्रकार की कथाओं के अतिरिक्‍त ऐतिहासिक और रूमानी कथायें भी प्रचूर परिमाण में उपलब्‍ध है । ऐतिहासिक कथाओं का प्रचलन जो बहुत कुछ प्रवादात्‍मक होती है, समाज के बड़े बूढों द्वारा कहे सुने जाने से होता है । वास्‍तक में रैगर समाज की गतिविधियां जितनी विविधता लिये हुये है वही लोक कथाओं में भी प्रतिबिम्बित होती है ।
रैगर जाति में लोक कथाओं के कहने का अपना एक विशिष्‍ट ढंग होता है और कई लोग इस कला में बड़े ही प्रवीण होते है । ऐसी कथायें एक बार में पूरी न की जाकर अनेक बार में सम्‍पूर्ण होती है । इन कथाओं को सुनने वाला व्‍यक्ति हुंकारे भरता रहता है जिससे कि सुनाने वाले को यह मालूम पड़ता रहे कि सुनने वाला व्‍यक्ति नींद में तो नहीं आ गया है । लोक कथायें रात को ही साधारणतया सुनाई और सुनी जाती है । रैगर जाति में प्रचलित लोक कथाओं और साहित्‍य को निम्‍नलिखित भागों में प्रस्‍तुत किया जा सकता है :-

प्रवाद: यह भी एक प्रकार की ऐतिहासिक कथा होती है जो आकार में छोटी और घटना विशेष पर ही कही जाती है । प्रवाद ऐतिहासिक और काल्‍पनिक दोनों ही प्रकार की होती है । अनेक प्रवादों की कहावतें भी प्रचलित है और उनमें कथा सूत्र का संकेत भी रहता है । प्रवादों की यह परम्‍परा सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही है । इन प्रवादों में रैगर जाति के बुजुर्ग पुरूष और महिलायें अपने गोत्र की उत्‍पत्ति और गोत्र में उत्‍पन्‍न महान व्‍यक्तियों व उनके द्वारा किये गये कार्यों के वर्णन के अलावा रैगर जाति पर हुये अत्‍याचारों का भी वर्णन किया करते है ।

कहावतें व मुहावरें : कहावतें और मुहावरे लोक भाषा के विभिन्‍न अंग समझे जाते है । मुहावरों से भाषा में एक जीवन्‍तता और विलक्षणता आती है । जातियों, त्‍यौहारों, स्त्रियों, खानपान, शिक्षा, धर्म, लोक विश्‍वास, जीवन दर्शन, शगुन और जातिगत भेदभावों से सम्बिन्धित कहावते ही रैगर समाज में प्रचलित रही है ।

पहेलियां : प्राय: बच्‍चों के मनोरंजन और युवा प्रेमियों तथा सखी स‍हेलियों के हास-परिहास के रूप में इनका प्रयोग किया जाता है । ससुराल में दूल्‍हे को पूछी जाने वाली पहेलियां उसकी बुद्धि परीक्षा के लिये ही प्रयुक्‍त होती है ।
लोरियां: रैगर समाज में वास्तिविक लोरियां भी मिलती है । इन लोरियों को महिलायें जच्‍चा के गीतों में ही परिणित कर लेती है । लोरियों का उपयोग रोते हुये बच्‍चों को सुलाने और रिझाने के कारण ही प्रधानत: किया जाता है ।

हरजस: भगवान के गुणगान से संबंधित भक्ति पूर्ण पद हरजस कहलाते हैं । इन्‍हें प्राय: बड़ी बूढी स्त्रियां प्रभातकाल में चक्कियों पर आटा पीसते तथा अन्‍य दैनिक कार्य करते हुये अथवा विश्राम के क्षणों में गाती है । रैगर जाति में विवाह अथवा अन्‍य कोई शुभ कार्य पर ‘राती जगा’ के समय भी हरजस गाने का रिवाज़ है । इसमें ‘भौमिया’ का गीत गाते हुये उसके बस्‍ती अर्थात मौहल्‍ले और परिवर के सभी सदस्‍यों की रक्षा की विनती की जाती है । इसके बोल इस प्रकार से है- ‘बस्‍ती की रक्षा करो रे भौमिया, थे गुवाड़ी की रक्षा करो रे भौमियां, बहनों की रक्षा करो रे भोमियां………. ‘ इस प्रकार से कई कड़िया हरजस में जुड़ती जाती है ।

रैगर संस्‍कृति में चित्रकला :

प्राय: रैगर जाति के घरों में चित्रकला को कहीं न कहीं स्‍थान अवश्‍य मिला है । ये चित्र या तो भित्तियों पर बने होतु है या फिर चौक एवं द्वार पदों पर । विवाह के समय तोरण माने से पहले वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा आटे से ‘चौर परूने’ की रस्‍म करना भी चित्रकला की एक शैली ही मानी जा सकती है । इसके अलावा विवाह के समय दीवार पर खड़िया मिट्टी अथवा लाल रंग से अपने देवी देवताओं की निशानी बनाना भी चित्रकला का ही एक भाग है । हथेलियों पर ‘मेहन्‍दी’ द्वारा सुन्‍दर अलंकरण, चौकों में ‘मांडणे’ के विविध नमूने एवं शुभ अवसरों व त्‍योहारों पर मंगल-चित्र रैगर जाति की लोककला के विशेष स्‍वरूप है ।
रैगर जाति में चित्रकला वास्‍तव में स्‍त्री-कला ही है जिसमें रैगर महिलाओं की वह कला सम्मिलित है जिसके द्वारा वे अपने घरों को और स्‍वयं अपने हाथ-पैरों को सजाती है और जिसको ‘माण्‍डणा’ अथवा ‘मेहन्‍दी लगाना’ कहा जाता है । माण्‍डणा का अभिप्राय है कि घरों को सजाना और मेहन्‍दी लगाने का मतलब है हाथ-पैरों को सजाने के लिय जिस कला का उपयोग किया जाता है वह ज्‍यामितीय प्रतीक प्रधान होती है । इसमें आकृतियां प्राय: सभी प्रकार जैसे त्रिकोण, चतुष्‍कोण, षड्भुज, व्रत्त, स्‍वास्तिक, सर्वतोभद्र आदि होती है । माण्‍डणा मांढने और महन्‍दी लगाने की क्रिया मांगलिक अवसरों अथवा त्‍यौहारों पर ही की जाती है ।

रैगर जाति की हस्‍तशिल्‍प कला :

रैगर जाति चमड़े की रंगत के अलावा जूतियां बनाने का भी कार्य करती रही है । इनकी कलात्‍मक अभिरूचि विभिन्‍न प्रकार की जूतियां बनाने तथा अन्‍य हस्‍तशिल्‍पों में प्रदर्शित होती है । ये पुराने जमाने में लाव-चड़स बनाने में भी बड़ा ही हुनर रखते थे । इनकी लगन, निष्‍ठा और श्रम से तैयार की गई जूतियां केवल कुछ लोगों के मन बहलाव अथवा वैभव के प्रतीक न बनकर जन-जन के उपयोग के लिये बन गई है । ये कशीदाकारी जूतियां अत्‍यंत लुभावनी होती है । इन जूतियों के ऊपर प्राय: फूलपत्तियां मोर आदि कलात्‍मक रूप से बनाई जाती है । यह कशीदाकारी रैगर जाति की स्त्रियां ही चमड़े पर किया करती है । आजकल रैगर जाति के लोग कालीन भी बनाते है जो अत्‍यंत ही कलात्‍मक होते है । हालांकि इस काम में छोटे-छोटे बच्‍चे ही कार्य करते हैं जो अत्‍यंत दुख का विषय है ।
पहले के समय में रैगर जाति की महिलायें ‘कांचली’ पहना करती थी जो विभिन्‍न रंगों के के कपड़ों के टुकड़ों को कलात्‍मक रूप से सुई से सिलकर बनाई जाती थी । इनमें रैगर जाति की महिलाओं की कलात्‍मक कल्‍पना स्‍पष्‍ट झलकती है । इसी प्रकार पहले विभिन्‍न रंगों के कपड़ों के टुकड़ों को जोड़ कर ‘कौथली’ भी बनाई जाती थी । इस ‘कौथली’ में विभिन्‍न प्रकार की वस्‍तुयें रखी जाती थी । ‘कौथली’ रैगर जाति की महिलाओं की कपड़े पर उभारी गई कला को बताती है ।

नृत्‍य कला :

रैगर जाति की महिलाओं में नृत्‍य कला का भी गुण विद्यमान है । रैगर जाति संघर्षशील जाति रही है फिर भी इस जाति के लोगों में जीवन जीने की कला सीख ली है । इस जाति की महिलायें नृत्‍य सीखने के लिय किसी प्रकार का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया करती है । अधिकतर नृत्‍य उत्‍सवों, त्‍यौहारों और ऋतुओं से सम्‍बन्‍ध रखते है । इनमें विवाह आदि पर नाचे गाये जाने वाले नृत्‍य, महिलाओं द्वारा विवाह के अवसर पर कुम्‍हार के यहां ‘चाक’ पुजते समय गीत गाने, बारात रवाना होने के बाद दुल्‍हे के घर की स्त्रियों द्वारा किये जाने वाले ‘टूंटिया’ नृत्‍य, होली आदि त्‍यौहारों पर किये जाने वाले नृत्‍य आदि सम्मिलित है ।

रैगर जाति के खेलकूद :

पुराने समय में रैगर जाति में खेलकूद दो प्राकर के होते थे एक तो बैठ-बैठ के खेल और दूसरे भागदौड़ के खेल । पहली तरह के खेलों में चौपड़, शतरंज, चौरस आदि खेल उल्‍लेखनिय है । बालिकाओं द्वारा गट्टे खेलना, वर्षा में गीली मिट्टी से घर बनाना भी प्रसिद्ध रहे है । उछल-कूद के खेलों में लुका-छिपी, मारदड़ी, कच्‍छी घोड़ी, लूण-क्‍यार, सितोलिया आदि कुछ खेल है ।

रैगरों का पारम्‍परिक धंधा चमड़े की रंगाई करना है । उनका चमड़े रंगने का धंधा पीढ़ि दर चला आ रहा है । चमड़े की रंगाई अभी भी देशी तरिके से ही करते आ रहे हैं । रैगरों ने अभी भी चमड़े की रंगाई में आधुनिक तकनिक को नहीं अपनाया है । इसलिए उनका यह व्‍यवसाय भी पिछड़ गया है । सरकार ने भी इसकी तरफ विशेष ध्‍यान नहीं दिया । लाखों लोगों के भरण-पोषण का यह धंधा खत्‍म होता जा रहा है । देशी तरीके से रंगाई करने में देशी बबूल या आंवल की छाल (रांग), धमासा, नमक तथा तेजाब वगैरा काम में लिए जाते हैं । चमड़ा आज महंगा होते हुए भी घृणित समझा जाता है । इसलिए आज की पीढ़ि के रैगर नवयुवक इस धंधे को छोड़कर सरकारी नौकरियों में या अन्‍य व्‍यवसायों में जा रहे हैं । चमड़ा रंगाई का कार्य रैगर जाति में धीरे-धीरे समाप्‍त होता जा रहा है । इस व्‍यवसाय का कोई भविष्‍य नहीं है ।

रैगर चमड़े रंगने के अलावा चमड़े की जूतियें तथा चप्‍पल बाने का कार्य भी करते हैं । चमड़े की जूतियें बनाने का कार्य प्राय: ग्रामीण इलाकों में किया जाता है । शहरों में चप्‍पलें बनाने का काम रैगर बड़े स्‍तर पर करते हैं । दिल्‍ली, मुम्‍बई, अहमदाबाद तथा जोधपुर वगैरा में रैगर चप्‍पलें बनाने का कार्य करते हैं । इनकी बनाई हुई चप्‍पलें विदेशें तक जाती है । इस व्‍यवसाय में भी बिचोलिये मुनाफा ज्‍यादा कताते हैं और रैगरों को अपनी मेहनत का पूरा पैसा नहीं मिल पाता ।

रैगर खेती का काम भी करते हैं । आजादी से पहले इन्‍होंने जमीन और खेती की तरफ ध्‍यान नहीं दिया मगर बाद में इनका ध्‍यान इस धंधे की तरफ गया । अभी भी इनके पास कृषि के लिए पर्याप्‍त जमीन नहीं है । उपलब्‍ध जमीन पर खेती करके अपना भरण पोषण करते हैं । फिर भी यह कौम खेतीहर कौम नहीं कही जा सकती क्‍योंकि इनका मुख्‍य धंधा खेती करना नहीं है ।

शहरों में बारदानें का व्‍यवसाय भी रैगर लोग करते हैं । इस व्‍यवसाय में लगे अधिकांश रैगर दैनिक मजदूरी पर जाते हैं । कुछ लोगों की अपनी निजी दुकानें भी हैं । इस व्‍यवसाय में लाखों रूपयों की जरूरत होती है । पैसों के अभाव में ये लोग स्‍वयं का धंधा चलाने में सक्षम नहीं हैं । कई लोग दिन में दुकानों, फेक्ट्रियों, सरकारी कार्यालयों वगैरा में घूम-घूम कर फैरी का काम भी करते हैं । जिससे दिन भर में गुजारे लायक कमा लेते हैं ।

शहरों में रैगरों की औरतें बीड़ियें बनाने तथा खजूर की पंखियें बनाने का काम भी करती हैं । इस कार्य में औरतें अच्‍छा पैसा कमा लेती है । और अपना घर खर्च आसानी से चला लेती है ।

आज कल रैगर सभी तरह के व्‍यवसायों में प्रवेश कर चुके हैं । दुकानें, कारखानें, बस, ट्रक आपरेटर, ठेकेदारी, वगैरा सफलता पूर्वक कर रहे हैं । रैगर प्रमुख रूप से व्‍यवसायिक कौम है । इसलिए वायदे और वचन के पक्‍के होते हैं । हजारों रूपयों के सौदे बिना लिखा पढ़ी के हो जाते हैं मगर बात में कभी अंतर नहीं डालते हैं । इसलिए रैगरों की अच्‍छी साख है ।

शिक्षित रैगर सरकारी नौकरियों में आ रहे हैं और अच्‍छे पदों पर नियुक्‍त है । भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, राजस्‍थान प्रशासनिक सेवा, राजस्‍थान पुलिस सेवा, डॉक्‍टर, इंजिनियर तथा बैंको आदि में महत्‍वपूर्ण पदों पर नियुक्‍त हैं और सफलता पूर्वक अपना दायित्‍व निभा रहें हैं ।

समाज के उच्‍च वर्ग के लागों ने, जो कार्य कला का था, कौशल का था, उसे नफरत का आवरण पहना दिया । यह कैसी विडम्‍बना है कि जब यही कार्य विप्र वर्ग अपने हाथों से करते थे, चमड़ा अपने घर ले जाते थे और उसे साफ करके उपयोग में लाते थे, त‍ब किसी प्रकार का भेदभाव की कल्‍पना नहीं की जा सकती थी, परन्‍तु कालान्‍तर में जब चमड़ा घरेलू उपयोग में कम हो गया, तब यह काम चौथे वर्ग (शूद्र) के इस क्षेत्र में प्रवीण लोगों को सौंप दिया गया, तो यह कार्य और उसके करने वाले घृणा के पात्र समझे जाने लगे और हजारों वर्षों की अवधि बीत जाने के बाद भी उनकी स्थिति में कोई विशेष अन्‍तर नहीं आया ।

रैगरों का पारम्‍परिक धंधा चमड़े की रंगाई करना है जो आधुनिक तकनिक से नहीं किया जाने से इसमें मजदूरी के अलावा कुछ नहीं मिलता । वैज्ञानिक तरीके से चमड़े की जो रंगाई होती है उसकी तुलना में देशी रंगाई का कोई स्‍थान नहीं रह गया है । इसलिए रैगरों का पारम्‍परिक धंधा स्‍वत: समाप्‍त हो जाएगा । पढ़े लिखे रैगर नवयुवकों को उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करके ऊची सरकारी नौकरियों में पहुंचाना चाहिए तभी रैगर जाति की प्रगति हो सकेगी ।

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

पुराने समय में रैगर जाति के लोगों का पहनावा उन के संधर्षमय व अभावपूर्ण जीवन में उन्हें फटेहाल कपड़े पहनने को मजबूर करता था फिर भी इनकी गरीबी व साधारण जिन्दगी में शालीनता स्पष्ट झलकती थी क्योंकि रैगर जाति चमड़ा रंगने का काम करती थी इसलिये पुरूषों के वस्त्रों में रंगत के रंग और बदबू को स्पष्ट देखा जा सकता था । त्यौहार, शादी या किसी खास मौके पर साफ कपड़े पहने जाते थे । राजपूतों के शासन में किसी रैगर पुरूष और महिला को चाँदी के जेवर नहीं पहनने दिया जाता था । महिलायें केवल पीतल के जेवर ही पहन सकती थी । आजादी के बाद में रैगर पुरूष कानों में मुरकियां, लोंग, झाले तथा अंगूठी आदि पहनने लग गये और महिलायें भी चाँदी व सोने के जेवर पहनने लग गई । साधारणतया पुरूष लोग सादा पेचों की पगड़िया ही पहनते थे । धोतियां भी घुटनों तक ही पहनते थे, जिस पर कुर्ता पहना होता था । मूछें नीचे की ओर झुकी हुई हुआ करती थी ।

पुरूषों का पहनावा

रैगर समाज के पुरूष धोती कमीज पहनते थे । कमीज के बदले ‘बन्ड़ी‘ अथवा ‘अंगरखी‘ पहनने का भी रिवाज़ था । ‘बन्ड़ी‘ में बाकयदा अन्दर की तरफ जेबें होती थी । कई पुरूष सिर पर साफा अथवा पगड़ी पहना करते थे । ‘पगड़ी‘ में कपड़ा काफी ज्यादा लगता था तथा ‘साफे‘ में कपड़ा कम लगता था । ये सूती कपड़े ही हुआ करते थे । कई पुरूष देशी चमड़े की जूती जिसे ‘जोड़ी‘ भी कहा जाता था पहना करते थे । धीरे – धीरे ही चप्पल – जूते पहनने का रिवाज़ आया था । आजादी के बाद के युग में पुरूष वर्ग कानों में सोने की ‘मुर्की‘ और ‘बटन‘ पहना करते थे । कई पुरूष अपनी अंगुली में ‘अगुठी‘ भी पहना करते थे । बाद के समय में कई नवयुवकों में गले में सोने की चेन पहनने लगे ।

इतिहास के पन्नों को देखा गया तो यह पाया गया कि दिल्ली में एक ऐसा दौर भी आया था जब आर्य समाज रैगर जाति में काफी लोकप्रिय हो गया था । आर्य समाज में विश्वास रखने वाले नवयुवक वर्ग कुर्ता और पायजामा पहनने लगे थे जिसका सनातनी रैगरों ने काफी विरोध किया । इन दोनों के बीच झगड़े भी हुये । सनातनियों द्वारा कुर्ता और पायजामा पहनने वालो का असामाजिक तत्व माना जाता था । बाद के सालों में कुर्ता और पायजामा पहनने का रिवाज़ समाज में स्वीकार हो गया और नवयुवक वर्ग द्वारा सिर पर साफा पहनना भी बन्द हो गया । आजकल तो अन्य नागरिकों की तरह कमीज – पेन्ट, सूट आदि पहना जाता है जो बिल्कुल ठीक है क्योंकि समाज पहनावे में अन्य समाजों से अलग नहीं दिख सकता । आजकल का पहनावा विश्वास और जागृति का प्रतीक है ।

1.1 फैंटा: सिर पर सफेद या पीले रंग का मोटे सूत में रैगर समाज के बुजर्गों द्वारा फैंटा पहना जाता था । फैंटा, साफा और पगड़ी में अन्तर होता है । फैंटा दो हाथ लम्बा होता है । जबकि साफा नौ मीटर लम्बा होता है । पगड़ी प्रायः ऊंची जाति के लोग ही पहना करते थे जो विभिन्न रंगो और प्रकारों जैसे पंचरगी पगड़ी, लहरिया पगड़ी केसरिया पगड़ी आदि की हुआ करती है । सिर पर बांधे गये फैंटे, साफे और पगड़ी से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और जाति का पता लग जाता था । इनको सिर पर पहनने से तत्कालीन राजपुताने में किस क्षेत्र का व्यक्ति है, इसका भी पता पड़ जाता था । पगड़ी के रंग से व्यक्ति की मानसिक स्थिति का भी पता लग जाता था । चमकीली रंग बिरंगी पगड़ी से किसी त्यौहार और अच्छे समय का भी अंदाज लगाया जा सकता था जबकि गहरे रंग जैसे मैरून और खाखी रंग साधारण पहनावे के समय को ही बताती है । खाखी रंग की पगड़ी आमतौर से राजपूत ही पहना करते है । मेवाड़ी पगड़ी को बांधने का तरीका मारवाड़ी पगड़ी से अलग होता था । इसी प्रकार से शेखावाटी क्षेत्र में पगड़ी से अलग किस्म से बांधी जाती थी । रैगर समाज के व्यक्ति प्रायः दो रंग के ही फैंटे पहनते थे अर्थात पीले और सफेद । यह माना जाता था कि जिसके पिता का स्वर्गवास हो गया हैं वह सफेद रंग का और जिसका पिता जीवित है वह पीले रंग का साफा या फैंटा पहना करता था । प्रायः रैगर नवयुवक फैंटा या साफा नही पहनते हैं केवल अधेंड और बुजुर्ग ही अपने सिर पर फैंटा पहना करते है । इसके अलावा रैगर समाज के व्यक्ति को साफा और पगड़ी पहनने की तत्कालीन रियासतों के राजपूत राजाओं और ठिकानेदारों द्वारा मनाही हुआ करती थी ।

1.2 पग, साफा और पगड़ी के प्रकार: वास्तव में पगड़ी पहनने का रिवाज राजपूतों द्वारा प्रारम्भ किया गया था । उदयपुर की उमराव पगड़ी, जयपुर रियासत का शाही साफा, जोधपुर का शाही जसवन्त पेच, सामौद, टोंकी, धोलपुरी, जालोरी ,और मालानी पगड़िया राजस्थान की संस्कृति को बताती है । चन्देरी, लहरिया, मोठड़ा, पंचरगा और सतंरगा से विभिन्न प्रकार की पगड़ियों का पता पड़ता है । जयपुर के शाही परिवार में पाग लफदार और शाहीगढ पाग आज भी प्रसिद्ध पगड़ी है । जोधपुर में दुल्हा शादी के लिये घोड़े पर बैठते समय साफा पहनता है जो 27 फीट लम्बा ओर 41 इंच चौड़ा होता है । जब लडा़ई के लिये योद्वा जाते थे तो उनके साफे को ‘अमशाही साफा‘ कहा जाता था । रैगर समाज के व्यक्तियों को इनको पहनने की राज के द्वारा सख्त मनाही थी परन्तु आज के युग में किसी मेहमान, नेता अथवा विशेष व्यक्ति को पगड़ी या साफा पहनाकर उसका स्वागत किया जाता है ।

1.3 पगड़ी और साफा में अन्तर: पगड़ी और साफा बाधने बहुत अन्तर है । साफा दस गज लम्बा और साफा सवा गज अर्थात 1.25 गज चौड़ा होता है जबकि पगड़ी बीस गज लम्बी और सात इंच चौड़े कपड़े की होती है ।

1.4 पगड़ी की रस्‍म का महत्‍व : रैगर जाति में पगड़ी की रस्‍म उस समय होती है जब किसी व्‍यक्ति के पिता का देहांत हो जाता है ओर उस घर का सबसे बड़ा बेटा परिवार की सारी जिम्‍मेदारियों को निभाने के लिये समाज के सभी व्‍यक्तियों के सम्‍मुख ‘पाटे’ पर बैठकर अपने रिश्‍तेदारों की ओर से पहनाई गई पगड़ी को अपने सिर पर पहनता है । इस प्रकार की पगड़ी सफेद रंग की ही हुआ करती है । यह पगड़ी की रस्‍म अपने दिवंगत पिता के प्रति आस्‍था, इज्‍जत, व्‍यक्तिगत विश्‍वास और परिवार की जिम्‍मेदारियों को निभाने का फेसला, साहस और आत्मिक शक्ति को प्रदर्शित करता है । यह रस्‍म आज भी रैगर समाज में किसी के पिता के स्‍वर्गवास होने पर निभाई जाती है ।

1.5 धोती : पुराने समय में रैगर समाज के लोग घुंडीदार अंगरखी और धोती पहना करते थे । धोती प्राय: सूती लठ्ठे की हुआ करती है । उस समय निर्धनता थी अत: लम्‍बी पूरी धोती नहीं पहनकर उसके दो टुकड़े कर लिया करते थे । इस प्रकार एक धोती प्राय: तीन-चार फुट की बांधने हेतु हो जाया करती थी । इस प्रकार आम रैगर का अपना जीवन बसर आसानी से हो जाया करता था ।

महिलाओं का पहनावा

रैगर जाति की महिलाओं की वेशभूषा बड़ी कलामय और रंगीन होती है । ये घेरदार घाघरा पहनती है ओर इस पर लूगड़ी या ओढनी ओढती है । लाल लूगड़ी को पहले ‘टूल’ भी कहा जाता था । विवाह में लाल उभरते हुए रंगा का ‘घाघरा’ दिया जाता था । महिलायें ‘कब्‍जा’ भी पहना करती थी जो मूलत: महिलाओं की कमीज़ ही हुआ करती थी । शरीर पर अंगिया पहनी जाती थी जिसे कांचली भी कहते थे जो केवल स्‍तनों और आधी बाहों को ढकती थी । बाद के वर्षों में लहंगों, ओढनियों, अंगियों तथा कांचलियों को गोटा किनारी लगाकर सजाया जाता रहा है । आजकल रैगर जाति की स्त्रियों व बालिकाओं की वेशभूषा में साड़ियां, सलवार व कमीज़ का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है । पुराने दौर में महिलाओं के कपड़े सूत के और मोटे कपड़े के ही हुआ करते थे । राजस्‍थान में महिलाओं चमड़े पर हाथ से रंग बिरंगें सूत से ‘सूअे’ द्वारा कढ़ाई की हुई पांव की जूतियां पहना करती थी । वे हाथों में लाख का चूड़ा पहना करती थी । बाद के सालों में शीशे की चूड़ियां भी पहनी जाने लगी ।

रैगर महिलाओं द्वारा शरीर पर गुदवाने की प्रथा (Tatoo Marks):- प्राचीनकाल में शरीर पर गुदवाने की प्रथा रैगर महिलाओं में प्राय: आम हुआ करती थी । यह माना जाता था कि इससे रैगर महिला की सुंदरता में निखार आयेगा और उसका स्‍वास्‍थय भी ठीक रहेगा । यह भी माना जाता था कि शरीर पर गुदवाये गये निशान मृत्‍यु उपरांत भी मौजूद रहते हैं । रैगर महिलायें अपनी हाथ या बाजू पर पति का नाम गुदवाती थी और बार फूल, बिच्‍छू, किसी देवी देवता का चित्र आदि भी बाहों पर गुदवाया करती थी जिससे प्रतीत होता कि यह समाज जनजाति के रूप में भी विकसित हुआ था । पति का नाम गुदवाने से और महिलायें पति के प्रति उनके प्रेम को बताना चाहती थी । बिन्‍दियों का गुच्‍छा कमल और चक्र का प्रतीक माना जाता था । स्‍वास्तिक का चिन्‍ह सूर्य देवता का चिन्‍ह हुआ करता था । वास्‍तव में शरीर पर मांढने गुदवाना अत्‍यंत पीड़ामय हुआ करता था और कई बार तो गुदवाने की पैनी सूई से खून काफी बह जाया करता था । गुदवाने के उपरान्‍त पिसी हुई हल्‍दी लगाई जाती थी ।

मेहन्‍दी लगाने की प्रथा :- रैगर समाज की महिलायें विवाह जैसे शुभ अवसरों पर मेहन्‍दी लगाना कभी नहीं भूलती है । विवाह के अपसर पर दुल्हिन के हाथों पर मेहन्‍दी लगाने की प्रथा बहुत ही आम बात हुआ करती है । मेहन्‍दी में विभिन्‍न डिजायन जैसे ‘बीजणी’ लहरिया आदि बनाये जाते है । मेहंदी कड़वा चौथ, रक्षा बंधन, तीज आदि त्‍यौहारों पर भी हाथों पर रचाई जाती है । पहले यह मान्‍यता थी कि सोजत जो पाली जिले में है वहां की मेहन्‍दी बहुत अधिक रचती है अत: मेहन्‍दी खरीदने से पहले यह पूछ लिया जाता था कि मेहन्‍दी सोजत की है अथवा नहीं ? पहले माचिस की तीलियों से ही मेहन्‍दी के मांढने, मांढे का चलन था परन्‍तु आजकल प्‍लास्टिक के कोन से मेहन्‍दी के मांढने मांढे जाते है । रैगर महिलाओं मे यह माना जाता था कि जितनी ज्‍यादा मेहन्‍दी हाथों में रचेगी अर्थात काली पड़ जायेगी उससे यह बात साफ हो जायेगी कि उसका पति उसे कितना प्‍यार करता है । मेहन्‍दी लगाने के बाद हाथों पर तेल लगाने के बाद उसे सूर्य की धूप में रखा जाता था जिससे वह गहरी रच जाये । मेहन्‍दी को सुहाग का चिन्‍ह माना जाता है । मेहन्‍दी लगाने की परम्‍परा आज भी समाज की महिलाओं में विद्यमान है ।

रैगर जाति की महिलाओं के गहने:- राजपुताना में राजाओं और ठाकुरों का राज हुआ करता था । रैगर जाति की महिलाओं को सोन या चांदी के जेवर के बदले पीतल के जेवर को पहनने का ही अधिकार था । हाथों में पहने जाने वाले पीतल के गहने को ‘कांकणी’ कहा जाता था । गरीब महिलायें लाल अथवा हरे रंग के नकली मूंगे जैसे पत्‍थर की ‘कंठी’ गले में पहना करती थी । आजादी के कई सालों बाद कई गांवों में वे चांदी के हाथ के कड़े, कमर में ‘करधनी’, गले में कंठी अथवा लम्‍बी ‘तगड़ी’, पांवों में चांदी की कड़िया पहनने लगी थी । उस दौर में चांदी के जेवन रैगरों की मुख्‍य: सम्‍पत्ति हुआ करती थी क्‍योंकि इनके मौहल्‍ले के मकानों में चमड़े रंगने का कार्य होने के कारण कोई अन्‍य जाति का व्‍यक्ति इनको मकानों को नहीं खरिदा करता था इसलियें चां‍दी के जवरों को बुरे समय में गिरवी रखकर अथवा बेचकर रूपये लिये जा सकते थे । कई महिलायें अपने शरीर के विभिन्‍न भागों पर मांढने, फूल, पति का नाम आदि गुदवाया लिया करती थी जो उनकी सुन्‍दरता को निखारा करता था । ‘धनासा’ से महिला के हौंठ लाल हो जाया करते थे । दिल्‍ली में रहने के कारण इनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हो गया और रैगर महिलायें सोने और चांदी के आकर्षक जेवर, श्रंगार स्‍वरूप माथे पर बिंदी, आंखों में काजल या सुरमा, हाथों में मेहंदी और हाथों व पांव के नाखुनों पर नेल पालिश लगाने लग गयी । रैगर जाति की महिलाओं के सोहल श्रृंगार के आभूषणों में बंगड़ी, हथफूल, बोरला, रखड़ी, गोखरू, बाजूबन्‍द, कड़े आदि प्रमुख है । रैगर जाति की महिलायें बोरले और लाख की चूड़िया को सुहाग का प्रतीक मानती थी । पुराने दौर में निम्‍नलिखित गहने और जेवर रैगर महिलाओं द्वारा पहने जाते थे :-

1. बोरला: सिर पर ललाट के थोड़े से भाग तक दिखता हुआ सोने अथवा चांदी का ‘बोरला’ पहना जाता था । सम्‍पन्‍न महिलायें सोने का और गरीब महिलायें चांदी का बोरला पहना करती थी । सोने या चांदी की परत को सांचे में ढालकर गोल आकार में अन्‍दर लाख भर कर इसे बनाया जाता था जो काली डोरी में पिरोकर सिर की चोटी से बांध दिया जाता था । वृद्ध सुहागिन महिलायें छोटा ‘बोरला’ पहना करती थी जिसे ‘बोरली’ भी कहा जाता था । बाद के सालों में ‘बोरला’ के साथ पर ‘टीका’ पहने जाने लेगा ।
2. लौंग: पहले रैगर बालिकाओं की बायीं तरु की नाक बचपन में ही छिदवा दी जाती थी जिससे वह नाक में ‘लौंग’ पहन सके । सोने अथवा चांदी की ‘नथ’ रैगर महिलायें कभी नहीं पहनती थी । दिल्‍ली में रैगर महिलायें रोजमर्रा के जीवन में नाक में जवार के दाने के समान सोने की ‘लौंग’ पहना करती थी और विवाह और खुशी के अवसरों पर विभिन्‍न प्रकार के जेवर भी पहना करती थी । बाद के सालों में ‘लौंग’ के डिजाइनों में काफी बदलाव आता रहा । आजकल रैगर महिलायें सोने में मढ़ी हीरे की लौंग पहनती है । भिन्‍न -भिन्‍न किस्‍म की नथ पहनने का प्रचलन भी समय के अनुसार महिलाओं में आ गया है ।
3. ‘बाटा’, ‘बाळी’ और ‘झूमर’ : रैगर बालिकाओं के दोनों कानों के नीचे के भाग को छिदवा कर कानों के गहने पहनाये जाते थे । पहले के समय में कानों में बाळी अथवा ‘बाटा’ पहना जाता था ‘बाटा’ सांचे में ढला हुआ गोल हुआ करता था जो सम्‍पन्‍नता के अनुसार सोने या चांदी के हुआ करते थे । आज के ‘झूमर’ इन्‍हीं का बदला हुआ रूप है । कान में ‘टॉप्‍स’ भी पहने जाते रहे हैं ।
4. बाळी व लौंगे : कान की लौर अर्थात कान के ऊपर के हिस्‍से में ‘बाली’ पहनने के लिये कई रैगर महिलायें कान छिदवा लिया करती थी । प्राय: सम्‍पन्‍न परिवार की महिलायें ही सोने की ‘बाली’ पहना करती थी । आजकल की कई लड़कियां कान के इस भाग को दो या तीन स्‍थानों पर छिदवा कर कान की साइट को लाईन में ‘लौंगे’ पहनती है ।
5. ‘हंसली’, ‘हमेल’, ‘तलड़ी’, ‘कंठी’, ‘ढौलना’ और ‘टेवटा’ : रैगर महिलाओं द्वारा गले में ‘हंसली’, ‘हमेल’, ‘तलड़ी’, ‘कंठी’, ‘ढौलना’ और ‘टेवटा’ पहना जाता था । ‘हंसली’ चांद के आकार का काफी भारी जेवर हुआ करता था जिसका डिजाइन इस तरह का होता था कि आगे का भाग थोड़ा मोटा और घड़ाई किया होता था और पीछे का भाग पतला होता था । इसके पीछे के दोनों मुंह मुड़े हुये होते थे जिनमें काला डोरा पिरोकर गले में इसे पहना जाता था । सम्‍पन्‍नता दिखाती हुई पाव भर से लेकर एक सैर वजन तक की चांदी की ‘हंसली’ रैगर महिलाओं का इच्छित आभूषण होता था । उस समय विक्‍टोरिया और जार्ज पंचम के चांदी के रूपयों का प्रचलन था । हमेल में इन चांदी के रूपयों पर चांदी की ही ‘पकड़’ लगा दी जाती थी । ‘हमेल’ को जरी लगे धागों में इस तरह से पिरोया जाता था कि जब यह पहनी जाये तो गले के दोनों तरफ चांदी के सिक्‍के बराबर ही दिखते रहे । ‘तलड़ी’ गले में पहने जाने वाली वक्ष से नीचे तक लम्‍बी चेन ही हुआ करती थी । प्राय: यह चांदी की ही हुआ करती थी । ‘कंठी’ सोने की हुआ करती थी । इसके बीच में तीन फूल होते थे । यह सोने के खोखले मोतियों में गुथी होती थी । यह गले के कंठ तक पहनी जाती थी इसीलिये इसे ‘कंठी’ कहा जाता था । ‘ढौलना’ प्राय: सोने का ही हुआ करता था । यह गोलाई में लम्‍बे रूप में होता था जिसके भीतर लाख भरी होती थी और इसके दोनों मुहों को सुन्‍दर रूप में मौड़ते हुये इन पर बाजरे के दाने के समान सोने की गोलियां लगाकर बंद किया होता था । यह काले डौरे में पिरोया होता था । ‘टेवटा’ महिला के परिवार की कहा जाता था । ‘सोने का टवटा’ गले को लगभग ढक लिया करता था । इसके नीचे के हिस्‍से में सोने के मोतियों की झालर लटकती होती थी और इसके बीच में उभरते हुये गोल फूल खिलते से नजर आते थे तथा ऊपर के हिस्‍से में सोने की कलाकारी की हुई एक परत हुआ करती थी । ‘टेवटा’ कई तरह के डिजायनों में बनता था । यह छोटे-छोटे हरे रंगों के मोतियों की लड़ियों में पिरोया होने के कारण गले का सुन्‍दर जेवर होता था ।
6. ‘बठन’ : पहले रैगर महिलाओं द्वारा ब्‍लाऊज के बदले प्राय: ढीला कमीज या कुर्ती पहना जाता था । कमीज पर बटन चांदी या सोने के लगाये जाते थे जो आमतौर से तीन या चार ही हुआ करते थे । ये बटन अलग-अलग रूप से कमीज के काजों पर लगे होते थे और कई बार इन्‍हें चेन में पिरोकर भी कमीज़ पर बटन के रूप में पहना जाता था ।
7. ‘बल्‍ले’, कड़े बंगडी व कांकण : रैगर महिलाओं में हाथों में कोहनी के ऊपर सोने या चांदी की गहने पहने जाते थे । दो या तीन ‘बळ’ खाये होने के कारण इसे ‘बळा’ कहा जाता था । हाथ की कोहनी के नीचे के भाग में ‘कड़े’, ‘बंगड़ी’ और ‘कांकण’ पहने जाते थे । चूड़ियां पहनने के कारण हाथों के बाजू में पहने गये गड़े कड़े घिस जाते थे परन्‍तु बिना ‘कड़ो’ के पहने कोई रैगर महिला नहीं रहती थी । ‘कड़े’ प्राय: गोल आकार में होते थे जिनके दोनों मुहों पर डिजाइन बनाये होते थे । ‘बंगड़ी’ चूड़ियों के बाद में पहनी जाती थी । ये उभरती हुई गोल आकार में होती थी । इनके ऊपर गोल-गोल रूप में कंगारे निकले होते थे जो इसे अलग ही छटा दिया करते थे । इसे बन्‍द करने के लिये घुमाऊ पेज लगे होते थे । ‘कांकण’ बड़ा ही सुन्‍दर उभरा हुआ रैगर महिलाओं का जेवर होता था । इन गहनों को हाथों में पहनने का तरीका इस प्रकार से था कि पहले ‘कड़े’, बाद में चूड़िया जो प्राय: लाख की हुआ करती थी, उसके बाद ‘बंगड़ी’ पहनी जाती थी । ‘बंगड़ी’ के ऊपर ‘कांकण’ पहने जाते थे । इस प्रकार हाथ का पूरा श्रृंगार किया जाता था ।
8. ‘हथफूल’ व ‘छल्‍ले’ : हाथों की अंगुलियों में ‘हथफूल’ पहनने के बाद अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थी । अंगूठों में ‘छल्‍ले’ भी पीने जाते थे । ‘छल्‍ले’ प्राय: घुमावदार ही हुआ करते थे ।
9. ‘कमरबन्‍द’ व ‘तागड़ी’ : कमर में ‘कमरबन्‍द’ या ‘तागड़ी’ पहनी जाती थी ।
10. ‘गुच्‍छा’ : साड़ी या घाघरे पर चांदी में चाबियों का घूंघरूदार गुच्‍छा लगाया जाता था ।
11. ‘कड़िया’, ‘नेवरी’, ‘छैलकड़ा’ और ‘टनका’ : चांदी की ‘कड़िया’, ‘नेवरी’, ‘छैलकड़ा’ और ‘टनका’ जैसे सुन्‍दर गहने पांवों में पहने जाते थे । पहले के दौर में विवाहित महिलाओं द्वारा ही वजनी चांदी की ‘कड़िया’ पहनी जाती थी जिन्‍हें जीवन में एक बार पहनने के बाद इनको आमतौर से नहीं निकाला जाता था ।
12. ‘पाजेब’, ‘बिछिया’ व ‘छल्‍ले’ : पांव में चांदी की पाजेब पहनी जाती थी । इसके अलावा पांव की अंगुलियों में ‘बिछियां’ तथा पांव के अंगूठे में ‘छल्‍ले’ पहने जाते थे । चांदी की पाजेब ही पहनने का रिवाज़ होता था । इसका मुख्‍य कारण यह भी हो सकता है कि सोने को पहनने की राजस्‍थान में राजपूतों द्वारा मनाही थी अत: सोने की पाजेब को पहनना अशुभ माना जाता था ।

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

रैगर जाति का रहन सहन, पुराना व्‍यवसाय व खान पान

1. रैगर जाति का रहन सहन :

1.1 साधारणजन का रहन सहन :- स्‍वतंत्रता से पहले रैगर जाति के पूर्वजों को काफी कष्‍ट झेलने पड़े थे इसीलिये मैंने उनके उस समय के जीवन के बारे में लिखना उचित समझा है । वास्‍तव में उस समय उनकी दशा बड़ी ही दयनीय थी । उनके सारे कपड़े, हाथ-पैर और नाखून चमड़े को रंगने के कारण बदबूदार और लाल से ही रहते थे । घरों के बीच में ‘कूण्‍डे’ व ‘भवणिया’ होती थी । घरों के पास में कच्‍ची गीली बड़े जानवरों की खालों के साथ-साथ वहां अन्‍य प्रकार की गंदगी फैली रहा करती थी जिसके कारण रैगर बस्‍ती में काफी बदबू रहा करती थी । घरों में सींगों की खूंटियां होती थी जिन पर मर्दों और स्त्रियों के कपड़े टांगे जाते थे । स्त्रियों के पीतल के जेवर होते थे और उनके कपड़े भी गंदे होते थे । सफाई का लोग कतई ध्‍यान नहीं रखते थे ।

1.2 आवास व्‍यवस्‍था :- प्राय: रैगर जाति के लोगों के मकान कच्‍ची ईटों और गारे के बने हुये होते थे जो घास फूस के छप्‍परों से ढके रहते है । पुरूष वर्ग के बैठने-उठने, बकरी व अन्‍य पालतु पशुओं के बांधन और चारा लकड़ी आदि के संग्रह के लिये खुले छप्‍परों का प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार प्रारम्‍भ में राजस्‍थान में रैगर समाज के कच्‍चे घर हुआ करते थे जिन पर ‘छान’ पड़ी होती थी कच्‍चे घर का अभिप्राय है कि इनके मकान पक्‍की ईटों के नहीं हुआ करते थे । इक्‍का-दुक्‍का ही किसी गांव में किसी का पक्‍का मकान होता भी था तो उसे बहुत धनवान मानते थे । उस दौर में कई घरों में कोई अलग से ड्राईंग रूम या बैठक आदि नहीं हुआ करती थी । उस दौर में कई घरों में ‘साल’ भी हुआ करती थी जो प्राय: छोटी ही हुआ करती थी । जब रैगर समाज के लोग राजस्‍थान से दिल्‍ली आये तो भी इनकी कच्‍ची झोपड़िया ही थी । राजस्‍थान में रैगर समाज के मुकाबले में राजपूतों के पास गढ किले और सेठों के पास हवेलिया होती थी । गांव के निर्जन स्‍थान को शौचालय के रूप में उपयोग में लाया जाता था जिसे ‘जंगल जाना’ भी कहा जाता था । प्राय: इनकी रसोई अलग से घर के बाहर बनाई जाती थी जिसमें मिट्टी का चूल्‍हा बनाया जाता था । चूल्‍हे की राख से पीतल कांसे के बर्तन साफ किये जाते थे । इनके बर्तनों में कांसे की थाली और लोटे का बहुत महत्‍व व उपयोग होता था । गिलास पीतल के ही होते थे । खाना कांसे के ‘कचोळे’ या ‘कचोळी’ में खाना अच्‍छा माना जाता था । हर घर में ‘परिन्‍डा’ बना होता था जिस पर पानी के घड़े और मटके रखे जाते थे । इन मटकों को महिलायें ही गावं में रैगर जाति के कुआ से पानी भरकर लाती थी क्‍योंकि हर जाति का अपना अलग कुआ हुआ करता था । घर के अन्‍दर ‘मूंज’ अर्थात ‘सन्‍न’ से बुना हुआ पलंग हुआ करता था जिस पर ‘गूदड़ी’ बिछाकर सो जाया करते थे । घर के बाहर क्षाअ या मचला बिछाकर आराम कर लिया जाता था ।
जहां तक घरों में रौशनी करने का प्रश्‍न है, उस जमाने में ‘दीया’ ही जलाया जाता था जिसमें तिल का तेल डला होता था । ‘कंटीले’ के बीज को ‘तावड़ा’ अर्थात धूप में सुखा कर पीसा जाता था । बाद में उसे कपड़े में रखकर निचोड़ लिया जाता था । कंटीले के बीज प्राय: जंगल में ही मिला करते थे अत: इनको लेने के लिये महिलायें बहुत दूर तक जंगल में जाया करती थी । कंटीले का तेल चमड़े को रंगने के बाद उसे चमकाने के भी काम में लिया जाता था । बाद के वर्षों में रोशनी के लिए मिट्टी का तेल प्रयोग में लाया जाने लगा ।

1.3 कोठयार या ओबरी :- यह मुख्‍यत: अनाज रखने के लिये मिट्टी में गोबर मिलाकर चौकोरनुमा बनाया जाता था । इसकी लम्‍बाई-चौड़ाई घर के जिस कमरे में इसे रखा जाना होता था उस कमरे की लम्‍बाई-चौड़ाई पर ही इसका निर्माण निर्भर होता था । इसमें मजबूती आ जाये इसलिये कई बार भूसा भी मिट्टी ओर गोबर में मिला लिया जाता था । बड़े साईज के बने हुए ओर जिसमे ज्‍यादा सामान आ जाये उसे ‘कोठयार’ कहा जाता था । छोटे साईज वाले को ‘ओबरी’ कहा जाता था । इसमे अनाज के अलावा किमती सामानऔर गहने आदि भी छुपा कर रखे जाते थे । ‘कोठयार’ एवं ‘ओबरी’ बनाने का मुख्‍य कारण यह था कि उस दौर में आसानी से अनाज नहीं मिला करता था तथा कई बार बारिश के नहीं होने के कारण अकाल का सामना भी करना पड़ता था इसलिये यह आवश्‍यक था कि अनाज को बचा कर रखा जाये । इसके अलावा रैगर समाज के पास खेती की जमीन भी नहीं हुआ करती थी क्‍योंकि मूलत: यह कौम खेतीहर कौम नही थीं । अपने खाने के अनाज प्राप्‍त करने के लिये महिलायें प्राय: जमीदारों के यहां ‘लावणी’ करने जाया करती थी जिसके एवज में जमीदार उन्‍हें कुछ अनाज दे दिया करता था जिससे उनका गुजर बसर हो जाये । इसके अलावा गांव के ठाकुरों अैर जमीदारों द्वारा बलपूर्वक ‘बेगार’ भी करवाई जाती थी । इस ‘बेगार’ के एवज में इन्‍हें ज्‍वार या बाजरा पेट भरने को मिल जाया करता था । इस मौटे अनाज में जो कुछ भी बच जाता उसे ‘कोठयार’ या ‘ओबरी’ में बुरे समय में बच्‍चों का पेट पालने के लिये रख लिया जाता था । उस समय में गरीबी बहुत अधिक थी इसलिये इनके पास संदूक अथवा अलमारी होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता । मैंने रैगर समाज के कई पुराने घरों में ‘कोठयार’ और ‘ओबरी’ बनी हुई देखी है । आजकल के जमाने में न तो कोर्इ इन्‍हें बनाता क्‍योंकि इनके बनाने में काफी मेहनत लगती है । इसके अलावा आसानी से हर जगह पर लोहे की संदूक या अलमारी मिल जाती है । अनाज का मिलना भी आसान हो गया है ।

2. रैगर जाति का पुराना व्‍यवसाय :

2.1 रंगत :- पुराने समय में चमड़े को रंगने का ही मुख्‍य कार्य होता था । बड़े जानवर की खाल को ही ‘आढ़े’ में रंगा जाता था । यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें बड़े जानवर की कच्‍ची खाल को पहले तो बड़े ‘सूये’ द्वारा सूत या सन्‍न से चारों त‍रफ सिल लिया जाता था । फिर उसमें पानी भरकर ‘कीकर’ के पेड़ की कुछ कुटी हुई छाल चमड़े को रंगने के लिये डाल दी जाती थी । कीकर के पेड़ को ‘बोळी’ को पेड़ भी कहा जाता था । इसकी छाल को पहले सुखाया जाता था । बाद में ही इसे चमड़ा रंगने के काम में लिया जाता था । कई बार खाल में बाजरे की थोड़ी सी लेई भी छाल के साथ चमड़े में डाल दी जाती थी जिससे कि छाल का रंग पक्‍की तरह से चमड़े पर आ जाये । इसमें चूना भी इसलिए डाला जाता था कि चमड़ा जल्‍दी से रंग जाये । ‘आढा’ शब्‍द ‘आढे’ से आया है जिसका अभिप्राय है कि खड़े के बदले लटकाकर टांकना । ‘आढा’ पक्‍की चुनाई कर करीबन बारह-पंद्रह फीट लम्‍बा और आठ फिट चौड़ा छोटा सा तालाबनूमा शकल का होता था जिसके दोनों तरफ लकड़ी के ठुंठ गाढे हुये रहते थे जिससे कि इनके दोनों तरफ के ठुंठो पर पानी और कीकर की कुटी हुई छाल से से भरी सन्‍न से सिली हुई बड़े जानवर की खाल को आढी लकड़ी में फंसाकर रंगने के लिए टांग दिया जाता था । चमड़ा रंगने की प्रक्रिया में खाल से बदबूदार पानी इस ‘आढे’ में गिरता रहता था । एक जानवर की खाल को रंगने करीबन एक महिना लग जाता था । चमड़ा रंगने के बाद इसे ‘आढे’ के दोनों किनारों पर लगे ठूंठों के बीच की लकड़ी में टांगी गई खाल के पानी और छाल को निकालकर सन्‍न की सिलाई को हटाकर धूप में सूखा दिया जाता था जिससे रंगे हुए चमड़े की जूतियां और चड़स बनाया जा सके । चमड़ा रंगने की प्रक्रिया बड़ी ही कठीन और असहनीय होती थी ।

2.2 गांठना :- आजकल की तरह अंग्रेजी किस्‍म के जूते नहीं हुआ करते थे । उस जमाने में जूतियां ही हुआ करती थी जो कच्‍चे चमड़े को रैगर जाति द्वारा रंगने के बाद बनाई जाती थी । गांवों में नई जूतियां जिन्‍हें ‘जोड़ी’ कहा जाता था रैगर जाति द्वारा ही बनाई जाती थी । औरतों की जूतियों पर विशेष प्रकार की कढाई रैगर महिलाओं द्वारा ही की जाती थी जिससे वे बड़ी ही आकर्षक लगा करती थी । पुरानी अर्थात पांव में पहनकर पुरानी हुई जूतियों को सही करना ‘गांठना’ कहलाया करता था जिसका काम रैगर जाति के लोग ही किया करते थे ।

2.3 ‘लाव-चड़स’ :- जब राजस्‍थान के गांवों में बिजली नहीं हुआ करती थी तो खेतों में लाव-चड़स के माध्‍यम से जमीदार लोग पानी दिया करते थे । इसमें दो बैलों की जोड़ी हुआ करती थी । उनके कंधे अर्थात उभरी हुई थौर पर एक लकड़ी रख दी जाती थी । इसके बीच की ‘कीली’ में लाव-चर्खी फंसा दी जाती थी । यह ‘कीली’ भी लकड़ी ही हुआ करती थी । लाव सन्‍न की हुआ करती थी जो चड़स से बंधी होती थी । चड़स से पानी निकालने के लिये एक व्‍यक्ति कुंअे की मुंडेर पर खड़ा रहता था । इस जगह को ‘ढाणा’ भी कहा जाता था । दूसरा व्‍यक्ति कुअे के ‘ढाणे’ की सीध में जमीन पर बैलों के चलने के लिए बनाई गई गलीनूमा जगह में खड़ा रहता था । ‘चड़स’ चमड़े की ढोलनुमा बनी होती थी जिसमें कुअे से पानी भरकर ऊपर आता था और लाव को खल देने पर कुअे के पास बनाई गई पानी की नाली में चड़स को उढेल दिया जाता था जो खेतों की क्‍यारियों में होता हुआ सारे खेत में पहुंच जाता था । रैगर जाति के लोग ‘चड़स’ को बनाने और ‘चड़स’ की मरम्‍मत करने में माहिर हुआ करते थे इसलिये हमारे समाज को विशेष सम्‍मान भी दिया जाता था ।

3. रैगर समाज का खान पान

3.1. ‘बड़ी’ :- सर्दी में बांस पर कच्‍चे मांस के लम्‍बे टुकड़ो को छांव में सूखा दिया जाता था जिसे ‘बड़ी’ कहा जाता था । गर्मी के मौसम में चने की सूखी कोंपलों जिन्‍हें ये हरी भाजी कहते हैं अथवा सूखी ग्‍वांर फली या चने की दाल आदि में ‘बड़ी’ को बर्तन में डालकर चूल्‍हे पर एक मांसाहारी सब्‍जी की तरह खाने को पकाते थे । बारिश के मौसम में ‘बड़ी’ जो मूलत: खूखा हुआ मांस ही था को नहीं खाया करते थे क्‍योंकि बारिश के मौसम में मांस बदबूदार और किटाणु युक्‍त हो जाता है । इसके अलावा ‘बड़ी’ को चूल्‍हे की आग पर सेक कर भी खाया करते थे ।

3.2 ‘छाछ’ ‘राबड़ी’ :- मक्‍का, जौ, बाजरा को धीमी आंच में पकाकर राबड़ी बनाई जाती थी । उस जमाने में ‘छीना’ जो अकाल के समय का अनाज माना जाता था और मोटे अनाज की श्रेणी में आता था उसकी भी ‘राबड़ी’ बनाई जाती थी । यह पौधा करीबन दो-ढाई फिट ऊंचा होता था । आजकल इसे कोई नहीं बोता और न ही इस्‍तेमाल करता है क्‍योंकि देश में हर प्रकार का अनाज गावं में आसानी में मिल जाता है । राबड़ी में ताजा छाछ डालकर सुबह-सुबह ‘कलेवा’ किया जाता था । यदि किसी के कोई मेहमान आ भी जाता था तो उसे कलेवे में छाछ राबड़ी ही दी जाती थी । कलेवा सुबह के नाश्‍ते को कहा जाता था । उस जमाने में चाय का बिल्‍कुल भी रिवाज नहीं था । चाय का प्रचलन तो आजादी के बाद में आया है ।

3.3 सीरा और लापसी :- मक्‍का अथवा ज्‍वार की गुड़ डाल कर लापसी बनाई जाती थी । गेंहू और गुड़ को कड़ावे में पकाकर सीरा बनाया जाता था । सीरा मृत्‍यु भोज जिसे नुक्‍ता भी कहा जाता है के समय बनाकर मेहमानों को खिलाया जाता था । पैसे वाले लोग नुक्‍ते पर ‘पुआ’ भी बनाया करते थे । ‘पुआ’ मूलत: गुड़ मे गेहूं के आटे के घोल को मिलाकर तेल में तल कर बनाया जाता था । पहले के जमाने में घी के बदले तेल में ही पूरी, साग, मालपुए आदि बनाया करते थे । विवाह के अवसर पर भी मीठा सीरा परोसने का रिवाज़ होता था । सीरा ही मिठाई के बतौर काम में लिया जाता था । इसका मुख्‍य कारण निर्धनता ही था । नुक्‍ता और विवाह के समय में सीरा का कांसा भरने का भी रिवाज़ था । पैसे वाले लोग अपनी लड़कियों के विवाह में तलड़ी अर्थात तराजू से तोलकर सवा सेर का कांसा अपने सगे सम्‍बन्धियों और बस्‍ती में भेजा करते थे ।

3.4 तिल्‍ली का तेल :- पहले रैगर समाज के लोग तिल्‍ली का तेल का ही अधिक प्रयोग किया करते थे । राजस्‍थान से दिलली आने के उपरान्‍त भी काफी समय तक तिल्‍ली के तेल का ही खाने में प्रयोग किया जाता रहा था । यहां तक की सर्दियों में तिल्‍ली के तेल को चूल्‍हे की मोटी रोटियों में डालकर भी खाया जाता रहा था । इसका मुख्‍य कारण यह रहा था कि देसी घी प्राय: हरेक को आसानी से नहीं मिलता था जबकि घानी से निकला तिल्‍ली का तेल आसानी से मिल जाता था जो देसी घी से भी सस्‍ता हुआ करता था । इसके अलावा तिल्‍ली का तेल खाने में स्‍वादिष्‍ट होता था जिसकी तासीर गर्म हुआ करती थी ।

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

रैगर जाति का उद्गम मूलत: राजस्‍थान से ही हुआ है अत: इस जाति के लोगों की बोली भी राजस्‍थान के विभिन्‍न प्रान्‍तों से ही सम्‍बन्‍ध रखती है । राजस्‍थानी भाषा का उद्गम संस्‍कृत, प्राकृत और अपभ्रश के विकास क्रम से हुआ है । आभरी अपभ्रंश राजस्‍थानी की जन्‍मदात्री है क्‍योंकि शूरसेन प्रदेश जो मथुरा के इर्द-गिर्द था उसमें शौरसेनी बोली ही बोली जाती थी । आभारी लोग रामायण के समय से ही पश्चिमी राजस्‍थान में बसे हुए थे और धीरे-धीरे समूचे गुजरात व आंध्रप्रदेश तक इनका विस्‍तार हो गया था । वास्‍तव में राजस्‍थानी के उद्गम व विकास पर विस्‍तृत शोध की आवयश्‍कता है फिर भी विस्‍तृत अध्‍ययन करने के बाद मेरी राय में बारहवीं शताब्‍दी ई. के अंतिम चरण को राजस्‍थानी का उत्‍पत्ति काल माना जा सकता है । पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी के बाद राजस्‍थानी साहित्‍य में लौकिक शैली के साथ-साथ डिंगल नामक शैली का जन्‍म हुआ जो प्रधानत: चारण कवियों द्वारा इस शैली में शब्‍दों के मन चाहे अनपढ़ रूप अपनाने व निरन्‍तर प्रयोग के कारण इनमें एक अद्भूत ओज और माधुर्य की सृष्टि हुई । डिंगल के समानान्‍तर ‘पिंगल’ नामक शैली आई जिसके आविष्‍कार्त्ता भाट लोग रहे जिन्‍हें राव, भट्ट, बम्‍भ, बरदाई आदि अनेक नामों से अभिहित किया गया । डिंगल साहित्‍य का अध्‍ययन करने पर मैंने यह पाया कि इस साहित्यिक शैली के दोहों, सोरठो, गीतों, कवित्तों, छन्‍दों और काव्‍य ग्रंथों में रैगर जाति के सम्‍बन्‍ध में चारणों द्वारा कुछ नहीं लिखा गया है । रैगर जाति के अपने राव, राणा, भाट आदि थे और आज भी है जो अपने रैगर ‘जजमानों’ का प्रशस्ति गायन कर अपनी जीविका उपार्जन करते हैं, अत: इस जाति द्वारा विभिन्‍न रैगर परिवारों, गोत्रों, व्‍यक्तियों, दानवीरों, शूरवीरों आदि का भाट बहियों में विस्‍तृत विवरण पिंगल साहित्‍य में किया गया है जिस पर शोध करना अत्‍यावश्‍यक है । मेरी यह भी दृढ़ मान्‍यता है कि समय में तेज गति और आर्थिक युग के कारण रैगर जाति संबंधी भाट-बहियां और भाटों द्वारा रैगर प्रशस्ति गायन का लोक साहित्‍य भी समाप्‍त हो जायेगा अत: ”रैगर शोध संग्रहालय” बनाकर इनका संरक्षण अत्‍यावश्‍यक है ।

रैगर जाति की बोलियो का वर्गीकरण निम्‍न प्रकार से किया जा सकता है :-

(क). राजस्‍थान में
(अ). पश्चिमी राजस्‍थानी-
1. मारवाड़ी (जटिया रैगर)
2. मेवाड़ी (बोळा रैगर)
3. शेखावटी (सीकर, झुंझुनूं व शेखावाटी के रैगर)

(ब). पूर्वी राजस्‍थान
1. ढूढांड़ी (जयपुर, दौसा, किशनगढ़, टोंक, सवाई माधोपुर, अजमेर मेरवाड़ा के रैगर)
2. हाड़ोती (कोटा, बूंदी, झालावाड़ के रैगर)
3. मेवाती (पूर्वातन राजस्‍थान मे अलवर, भरतपुर की कामा, डीज तथा नगर तहसील हरियाणा का गुड़गावं, उत्तर प्रदेश के कोसी व मथुरा के रैगर)
4. अहीरवाटी – यह बागरू (हरियाणवी) और मेवाती के मध्‍य अधिनस्‍थ की बोली है जो राजस्‍थान के जिला अलवर की तहसील बहरोड़, मुण्‍डावर, बानसूर तथा किशनगढ़ का पश्चिमी भाग, जिला जयपुर की तहसील, कोटपूतली का उत्तरी भाग के रैगरों द्वारा बोली जाती है ।

(ख) दिल्‍ली: यहां प्राय: रैगर घरों व सामाजिक अवसरों पर ढूढाड़ी राजस्‍थानी बोली जाती है परन्‍तु नई पीढ़ी अब हिन्‍दी बोलने लगी है । दिल्‍ली के कई रैगर अब घर के बाहर पंजाबी भी बोलने लगे है ।

(ग) पंजाब, गुजरात, मध्‍य प्रदेश व अन्‍य राज्‍य: रैगर जाति राजस्‍थानी के साथ-साथ पंजाब में पंजाबी, गुजरात में गुजराती, मध्‍य प्रदेश में मालवी तथा अन्‍य प्रदेशों में उस प्रदेश की बोली भी बोलते हैं । हिन्‍दी भाषा प्राय: अधिकतर प्रयोग में लाई जाती है ।

रैगर जाति की बोलियों की विशेषताएँ :

जटिया रैगर की मारवाड़ी बोली की विशेषताएँ : –
1. सम्‍बंध कारक में रो, रा, री प्रत्‍यय का प्रयोग ।
2. उत्तम एवं मध्‍यम पुरूष वाचक सर्वनामों के लिए म्‍हारो, थारो व बहुवचन रूपों के लिए ‘म्‍हे’, ‘म्‍हां’ का प्रयोग ।
3. वर्तमान के लिए है, छै, भूतकाल के लिए ‘हो’ तथा भविष्‍यत काल के लिए ‘स्‍यु’ आदि रूपों का प्रयोग ।
4. सम्‍प्रदान के लिए ‘नै’ अपादान के लिए ‘सूं’, ‘ऊं’ रूप प्रचलित है ।
5. ‘न’ का ‘ण’ तथा ‘ल’ का ‘ल’ ध्‍वनि रूपों का प्रयोग । रैगर जाति की ढूढाडी बोली में वर्तमान के लिए ‘छै’ एवं भूतकाल के लिए ‘छी’ ‘छो’ का प्रयोग होता है । सर्वनाम के तिर्यक रूप में एक वचन में ऊ, ई, दूरवाचक ओ, यो, वे तथा स्‍त्री रूप आ या वा का प्रयोग होता है । जब, कब व तब के लिए ‘जद’, ‘तद’ तथा ‘कद’ रूपों का व्‍यवहार दृष्‍टव्‍य है । रैगर जाति की मेवाती बोली में कर्मकार में ‘लू’ विभक्ति एवं भूतकाल में हो, हो, ही सहायक क्रिया का प्रयोग विशेष उल्‍लेखनीय है ।

अहीवाटी में बसने वाले रैगर जाति की बोली की विशेषताएँ :-
1. पश्चिमी राजस्‍थानी के प्रभाव से ‘न’ को ‘ण’ बोला जाता है ।
2. वर्तमान में सहायक क्रिया के सूं, सां, सै, भूतकाल में थो, था, थी एवं भविष्‍यत् काल में गो, गा, गी रूप प्रयुक्‍त होते हैं ।
3. असमायिका क्रिया के लिए ‘कै’ रूप का प्रयोग होता है जैसे जाके-जाकर के, खाकै-खाकर के आदि ।
4. ‘वाला’ अर्थ- धोतन के लिए ‘णो’ प्रत्‍यय का प्रयोग होता है ।

रैगर जाति की बोलियों का संक्षेप में परिचय दिया है । ध्‍वनि भेद व भाषा विज्ञान के मापदण्‍डों पर रैगर जाति की बोलियों पर विस्‍तृत बोध एवं शोध की आवश्‍यकता है ।

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

वैसे तो दीपावली, रक्षा-बंधन, रामनवमी, दशहरा और होली के त्‍यौहार रैगर जाति के लोग बड़ी उमंग से मनाते हैं लेकिन कुछ ऐसे त्‍यौहार है जो रैगर जाति के लोगों के लिये विशेष रूप से महत्‍व रखते हैं हालांकि रैगर जाति के लोग जहां भी जाकर बस गये उस क्षेत्र के त्‍यौहारों को भी अपने जीवन में रमा लिये जैसे कि पंजाब में ”लौड़ी” का त्‍यौहार आदि । रैगर जाति के कुछ महत्‍वपूर्ण व्रत और त्‍यौहार इस प्रकार है –

चैत्र माह के त्‍यौहार:
1. नवरात्रा: चैत्र सुदी एकम् से नवरात्रा प्रारम्‍भ हो जाता है । इस प्रकार यह चैत्र शुक्‍ल की प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक मनाया जाता है । प्रतिपदा के दिन घट-स्‍थापना एवं जौ बोने की क्रिया की जाती है । नवरात्रा में नौ दिन तक रैगर जाति के कई लोग मांस मदिरा का सेवन भी नहीं करते और सात्विक जीवन जीते हैं ।
2. दुर्गा अष्‍टमी: यह चैत्र मास की शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी को मनाया जाता है । इस दिन कुमारियां तथा सुहागने पार्वती जी की गोबर से निर्मित प्रतिमा का पूजन करती है । रैगर अष्‍टमी के दिन कढ़ाई का भोग लगाया करते थे अर्थात ‘पूआ’ और ‘पड़ी’ का खाना बनाया करते थे । कढ़ाई में बचे हुये तेल से लापसी बनाया करते थे । ये लोग मांसाहारी भोजन भी बनाया करते थे । इस दिन देवी की पूजा के लिये दीपक के सामने ‘जागते’ अर्थात् आग का अंगारे के उपर बकरे का कलेजा, पूआ, पूड़ी एवं लापसी तथा दारू का भोग लगाया करते थे । आग में बकरे के कलेजे को सेकने को ‘सूले’ कहा जाता था । आजकल यह प्रथा बिल्‍कुल बन्‍द हो गई है ।
3. रामनवमी: रैगर जाति मूलत: हिन्‍दू धर्म को मानने के कारण रामनवमी को एक महत्‍वपूर्ण मानती है । चैत्र शुक्‍ल को नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्‍न में कौशल्‍या माता से पुरूषोत्तम भगवान राम का जन्‍म हुआ था । वे इस दिन नयी बही प्रारम्‍भ करते हैं ।

बैसाख माह के त्‍यौहार:
4. शीतलाष्‍टमी अर्थात बसोड़ा: होली के आठवें दिन ‘बसोड़ा’ या ‘बासेड़ा’ का त्‍यौहार आता है । जिसका अर्थ है बासी भोजन । इस दिन पिछले दिन तैयार किये हुए भोजन का शीतला माता को भोग लगाकर ठण्‍डा भोजन ही किया जाता है । रैगर जाति में यह माता, चेचक, बोदरी आदि की देवी के रूप में ही पूजी जाती है ।
5. आखा तीज़ अर्थात् अक्षय तृतीया: इस दिन रैगर जाति के लोग अपने बच्‍चों का विवाह करते है । आखा तीज़ को बिना कोई मुहुर्त निकाले शुभ दिन माना जाता है । इस त्‍यौहार के दिन मारवाड़ क्षेत्र के रैगर जाति के लोग गेहूँ का खींज तैयार करते है और अतिथियों को भोजन के लिये आंमत्रित करते हैं ।

ज्‍येष्‍ठ माह के त्‍यौहार:
6. गंगा दशहरा: गंगा दशहरा का पर्व ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है । ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल दशमी को सोमवार तथा हस्‍त-नक्षत्र होन पर यह तिथि घोर पापों को नष्‍ट करने वाली मानी गई है । हस्‍त नक्षत्र में बुधवार के दिन गंगावतार हुआ था इसलिये रैगर जाति के लिये यह तिथि अधिक महत्‍वपूर्ण है । इस तिथि में स्‍नान, दान, तर्पण से दस पापों का नाश होता है इसलिये इसे दशहरा कहते हैं । इस दिन गंगा में स्‍नान का रैगर जाति के लिये विशेष महत्‍व है । गंगा स्‍नान से व्‍यक्ति के सारे पापों का नाश हो जाता है । इस दिन जल को वर्ष भर रखने पर भी सड़ता नहीं है । दिल्‍ली में रैगर जाति के लोग यमुना नदी में स्‍नान किया करते थे ।
रैगर जाति के लोगों द्वारा गंगा की पूजा की जाती है इसलिये गंगा दशहरा के विषय में प्रचलित कथा को देखे तो यह पाते हैं कि प्राचीनकाल में अयोध्‍या में सगर नाम के राजा राज किया करते थे । उनके केशिनी तथा सुमति नामक दो रानियां थी । केशिनी से अंशुमान नामक पुत्र हुआ तथा सुमति के साठ हजार पुत्र थे । एक बार राजा सगर ने अश्‍वमेघ यज्ञ किया । यज्ञ की पूर्ति के लिये एक घोड़ा छोड़ा । इन्‍द्र यज्ञ को भंग करने हेतु घोड़े को चुराकर कपिल मुनिक के आश्रम में बांध आये । राजा ने यज्ञ के घोड़े को खोजने के लिये अपने साठ हजार पुत्रों को भेजा । घोड़े को खोजते-खोजते वे कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे तो उन्‍होंने यज्ञ के घोड़े को वहां बंधा पाया । उस समय कपिल मुनि तपस्‍या कर रहे थे । राज के पुत्रों ने कपिल मुनि को चोर-चोर कह कर पुकाना शुरू कर दिया । कपिल मुनि की तपस्‍या भंग हो गई । इस पर राजा के पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि में जलकर भस्‍म हो गये ।
अंशुमान पिता की आज्ञा पाकर अपने भाइयों को खोजता हुआ जब मुनि के आश्रम पहुंचा तो महात्‍मा गरूड़ ने उसके भाईयों के भस्‍म होने का सारा वृतान्‍त सुनाया । गरूड़ जी ने अंशुमान को यह भी बताया कि यदि इनकी मुक्ति चाहते हो तो गंगा जी को स्‍वर्ग से धरती पर लाना होगा । इस समय अश्‍व को ले जाकर अपने पिता के यज्ञ को पूर्ण कराओ । इसके बाद गंगा को पृथ्‍वी पर लाने का कार्य करना । अंशुमान ने घोड़े सहित यज्ञ मंडम में पहुंचकर राजा सगर से सब वृतान्‍त कह सुनाया । महाराजा सगर की मृत्‍यु के पश्‍चात अंशुमान ने गंगा जी को पृथ्‍वी पर लाने के लिये तप किया परन्‍तु वह असफल रहे । इसके बाद उनके पुत्र दिलीप ने भी तपस्‍या की परन्‍तु वह भी असफल रहे ।
अन्‍त में दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गंगा जी को पृथ्‍वी पर लाने के लिये गोकर्ण तीर्थ में जाकर कठोर तपस्‍या की । तपस्‍या करते-करते कई वर्ष बीत गये, तब ब्रह्मा जी पसन्‍न हुये तथा गंगा जी को पृथ्‍वी लोक पर ले जाने का वरदान दिया । अब समस्‍या यह थी कि ब्रह्मा जी ने तबाया कि भूलोक में भगवान शंकर के अतिरिक्‍त किसी में यह शक्ति नहीं है जो गंगा के वेग को संभाल सके इसलिये उचित यह है कि गंगा का वेग संभालने के लिये भगवान शिव से अनुग्रह किया जावे । महाराज भागीरथ एक अंगूठे पर खड़े होकर भगवान शंकर की आराधना करने लगे । उनकी कठोर तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर शिव जी गंगा को अपनी जटाओं में संभालने के लिये तैयार हो गये । गंगा जी जब देवलोक से पृथ्‍वी की ओर बढ़ी तो शिव जी ने गंगा जी की धारा को अपनी जटाओं में समेट लिया । कई वर्षों तक गंगा जी को जटाओं से बाहर निकालने का पथ न मिल सका ।
भागीरथी ने पुन: अननय-विनय करने पर शिव जी गंगा को अपनी जटाओं से मुक्‍त करने के लिये तैयार हुये । इस प्रकार शिव की जटाओं से छूटकर गंगा जी हिमालय की घाटियों में कलकल निनाद कर के मैदान की ओर बढ़ी । जिस रास्‍ते से गंगा जी जा रही थी उसी मार्ग में ऋषि जंहु का आश्रम था । तपस्‍या में विघ्‍न समझकर वे गंगा जी को पी गये । भगीरथी के प्रार्थना करने पर उन्‍हें पुन: जांघ से निकाल दिया । तभी से गंगा जंहु पुत्री या जाह्मवी कहलाई । इस प्रकार अनेक स्‍थलों को पार करती हुई जाह्मवी ने कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचकर सगर के साठ हजार पुत्रों के अमर होने का वर दिया तथा घोषित किया कि तुम्‍हारे नाम पर गंगा जी का नाम भागीरथी होगा । अब तुम जाकर अयोध्‍या का राज संभालो । ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अन्‍तर्यान हो गये ।
7. निर्जला ग्‍यारस: ज्‍येष्‍ठ मास की शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को निर्जला ग्‍यारस या एकादशी कहते हैं । इस व्रत में पानी पीना भी वर्जित है इसलिये इसे निर्जला एकादशी कहते हैं । वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में से ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल एकादशी सर्वोत्तम मानी गई है । इसका व्रत रखने से सारी एकादशीयों के व्रतों का फल मिल जाता है । रैगर समाज के लोग आम तौर से इस त्‍यौहार को नहीं मनाते परन्‍तु उनके लिये यह अबुझ ब्‍याह का सावा है ।

आषाढ माह के पर्व :
8. देव सौनी ग्‍यारस अर्थात देवशयनी एकादशी: आषाढ शुक्‍ल एकादशी को देव सौनी ग्‍यारस अर्थात देवशयनी एकादशी कहते हैं । इस दिन देव सौ जाते है । पुराणों में उल्‍लेख आया है कि इस दिन भगवान विष्‍णु चार मास तक पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की एकादशी का प्रस्‍थान करते हैं । इसी कारण इसे देवशयनी एकादशी तथा कार्तिक मास वाली एकादशी को देव उठनी ग्‍यारस अर्थात देवोत्‍थानी एकादशी कहते है । आषाढ मास से कार्तिक मास तक के समय को चातुर्मास्‍य कहते हैं । इन चार महीनों में भगवान क्षीर सागर की अनन्‍त शैया पर शयन करते है । इसीलिये रैगर जाति के लोग इन चार महिनों में विवाह, नये घर में ग्रह प्रवेश आदि का कोई शुभ कार्य नहीं करते हैं । इन‍ दिनों में साधू लोग एक ही स्‍थान पर रह कर तपस्‍या करते हैं ।
9. गुरू पूण्‍यू अर्थात गुरू पूर्णिमा: आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं । प्राचीनकाल में विद्यार्थी गुरूकुलों में शिक्षा प्राप्‍त करने जाते थे । छात्र इस दिन श्रृधा भाव से प्रेरित अपने गुरू का पूजनकर के अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देकर गुरू जी को प्रसन्‍न करते थे । रैगर जाति के लोग इस त्‍यौहार को अपना नहीं मानते थे क्‍योंकि रैगर समाज के लोगों का पहले के समय में कोई गुरू बनना पसंद नहीं करता था, लेकिन आज कल रैगर बंधुओं के अपने समाज के ही गुरूओं तथा अन्‍य समाज के गुरूओं से गुरू शिष्‍य का संबंध बन गया है ओर अब इस त्‍यौहार को हर्सोउल्‍लास के साथ मनाया जाता है ।

श्रावण माह के पर्व:
10. शिवजी के व्रत: सावन माह के समस्‍त सोमवारों को यह व्रत रखा जाता है । इस व्रत में शिव, पार्वती, गणेश तथा नन्‍दी की पूजा की जाती है । पूजन के बाद केवल एक बार भोजन करने का विधान है ।
11. श्रावण शुक्‍ल तीज अर्थात तीजों का त्‍यौहार: श्रृंगार की भावनाओं का यह त्‍यौहार सावन-भादों की मनोरम ऋतु शुरू होने के समय श्रावण मास के शुक्‍ल पक्ष की तीज को पड़ता है । इस समय सावन की फुहारों से धरती की तपन दूर हो चुकी होती है और नये अंकुरण से धरती हरियाली चादर ओढ़ लेती है । यह त्‍यौहार नीरस ग्रीष्‍म ऋतु के बाद आने वाले त्‍यौहारों की कड़ी का पहला त्‍यौहार है । इस‍लीये कहा गया है- ‘तीज त्‍यौहार बावड़ी’ ले डूबी गणगौर’ अर्थात तीज त्‍यौहारों को लेकर आती है, जिनको गणगौर अपने साथ वापिस ले जाती है ।
इस त्‍यौहार के दिन रैगर जाति की महिलायें हाथों में मेहंदी रचाये, आभूषण पहने बड़े उत्‍साह से पार्वती का प्रतीक ‘तीज’ की पूजा करती है और अपने सुहाग की मंगलकामना करती है । पहले इस दिन को बालक-बालिकायें और महिलायें झुला झुलाती थी परन्‍तु अब शहरीकरण के कारण यह सम्‍भव नहीं होता है । कहते हैं कि इस दिन गौरा विरहाग्नि में तप कर शिव से मिली थी ।
12. गणगौर: राजस्‍थान में रैगर जाति के लोगों के लिये यह पर्व बसंती पर्वों की समापन वेला का पर्व होता है । पहले दिल्‍ली में भी इस पर्व को बड़े ही उत्‍साह के साथ मनाया जाता था जिसका मूल कारण यह था कि दिल्‍ली रैगर जाति के लोग राजस्‍थान से ही आकर बसे थे । अविवाहित युवतियां मनोवांछित वर प्राप्‍त करने के लिये तथा सौभाग्‍यवती महिलायें अपने सुहाग की दीर्धायु के लिये गणगौर पूज करती है । गणगौर शब्‍द में ‘गण’ महादेव और ‘गौर’ गौरी पार्वती का प्रतीक है ।
13 सिंधारा: सावन में स्‍वादिष्‍ट पकवान जैसे गंजिया, घेवर, फैनी आदि बेटियों को सिंधारा भेजा जाता है । बायना छूकर सासू जी को भेजा या दिया जाता है । राजस्‍थान में रैगर जाति में बहिन बेटियों को घर पर बुलाकर मेहन्‍दी रचवाने का भी रिवाज़ है ।
14. राखी अर्थात रक्षा बंधन: यह त्‍यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । यह त्‍यौहार मुख्‍य रूप से भाई बहन के स्‍नेह का त्‍यौहार है । इस दिन बहन-भाई के हाथ पर राखी बांधती है और माथे पर तिलक लगाती है । भाई प्रतिज्ञा करता है कि यथाशक्ति में अपनी बहन की रक्षा करूंगा ।
एक बार भगवान कृष्‍ण के हाथ में चोट लगने से रक्‍त बहने लगा था तो द्रोपदी ने अपनी साड़ी फाड़ कर उनके हाथ में बांध दी थी । इसी बंधन से ऋणी श्रीकृष्‍ण ने दु:शासन द्वारा चीर हरण के समय द्रोपदी की लाज बचायी थी । मध्‍यकालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है जिसमें चित्तौड़ की रानी कर्मवती ने दिल्‍ली के मुगल बादशाह हुमायूं के पास राखी भेजकर अपना भाई बनाया । हुमायूं ने राखी की इज्‍जत की और उसके सम्‍मान की रक्षा के लिये गुजरात के बादशाह से युद्ध किया । रैगर जाति में राखी का त्‍यौहार बड़े ही हर्षोउल्‍लास से मनाया जाता है ।

भाद्रपद अर्थात भाद्रवा के पर्व:
15. श्री कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी: भाद्रपद कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल में वासुदेव जी की पत्‍नी देवी देवकी के गर्भ से सोलह कलाओं से युक्‍त भगवान श्री कृष्‍ण का जन्‍म हुआ था । इसी तिथि को रोहिणी नक्षत्र का विशेष माहात्‍म्‍य है । इस दिन देश के समस्‍त मन्दिरों में श्रृंगार किया जाता है । कृष्‍णावतार के उपलक्ष में झांकियां सजायी जाती है । रैगर जाति में स्‍त्री-पुरूष रात के बारह बजे तक व्रत रखते हैं । रात का बारह बजे शंख तथा घंटों की आवाज से श्रीकृष्‍ण के जन्‍म की खबर चारों दिशाओं में गूंज उठती है । भगवान कृष्‍ण की आरती उतारी जाती है और प्रसाद वितरण किया जाता है । प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही रैगर जाति के लोग अपना व्रत खोलते हैं ।
16. गणेश चतुर्थी: भाद्रपद माह की शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है । इस दिन रैगर समाज के कई लोग गणेश जी की पूजा करते हैं ।
17. रामदेव जी की जात: रैगर जाति के लोग रामदेव जी की पूजा करते हैं । भादुवा सुदी दशमी को रामदेव जी की जात लगाते हैं । राजस्‍थान में जैसलमेर जिले के पोकरण कस्‍बे के निकट रामदेव जी का मेला भरता है जिसमें रैगर जाति के लोग पूजा करने के लिये जाते हैं । रामदेव जी को अपने देवता के रूप में भी स्‍वीकार करते हैं । यदि मौहल्‍ले में रामदेव जी का कोई मन्दिर होता है तो वे इस दिन वहां जाकर पूजा करते हैं । रामदेव जी को जल, मौली, रोली, चावल, फुल से पूजा करते हैं और चूरमा व नारियल दक्षिणा में देते हैं । उसके बाद रामदेव जी की मूर्ति के आगे सिर झुकाते हैं ।
आश्विन अर्थात आस्‍योज माह के पर्व:
18. श्राद्ध: भाद्रपद की पूर्णिमा एवं आश्विन मास के कृष्‍ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस तक समय ‘पितृ पक्ष’ कहलाता है । रैगर समाज द्वारा इस पक्ष में मृतक पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है । श्राद्ध के भोजन में खीर पूड़ी होती है । पितृ पक्ष में पितरों की मरण तिथि को ही उसका श्राद्ध किया जाता है ।
19. न्‍योयत्रा अर्थात नवरात्र आरम्‍भ: आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपक्ष से नवमी तक को नवरात्र कहते हैं और रैगर समाज बखूबी निभाता है ।
20. दुर्गा अष्‍टमी: यह पर्व दिल्‍ली व पंजाब के रैगर समाज में अधिक प्रचलित है । आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी को दुर्गा अष्‍टमी के रूप में रैगर मनाते हैं । इस दिन दुर्गा की पूजा का विधान है । भगवती को उबले हुये चनै, हलवा, पूड़ी, खीर आदि का भोग लगाया जाता है ।
21. दशहरा अर्थात विजया दशमी: यह आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है । इस पर्व को भगवती के ‘विजया’ नाम पर विजया दशमी कहते हैं । इस दिन भगवान रामचन्‍द्र जी ने लंका पर विजय प्राप्‍त की थी इसलिये भी पर्व को विजया दशमी कहा जाता है । ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्‍ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक काल होता है । यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है । क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व माना जाता है । रैगर जाति एक क्षत्रिय जाति रही है इसलिये रैगर समाज के लिये यह पर्व बहुत महत्त्वपूर्ण पर्व है ।

कार्तिक महा के पर्व
22. करवा चौथ: कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है । यह रैगर जाति की महिलाओं का मुख्‍य त्‍यौहार है । सुहागिन स्त्रियां अपेन पति की दीर्घायु के लिये यह व्रत करती है । इस दिन निर्जल व्रत किया जाता है । चन्‍द्रमा को देखकर अर्घ्‍य देती है फिर वे भोजन करते हैं ।
23. धनतेरस अर्थात धन त्रयोदशी: कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी धन त्रयोदशी के रूप में मनाई जाती है । यह दीपावली के आने की शुभ सूचना है । इस दिन धन्‍वंतरी के पूजन का विधान है । कहते हैं कि इस दिन धन्‍वंतरी वैद्य संमुद्र से अमृत कलश लेकर आये थे इसलिये धनतेरस को ‘धन्‍वंतरी जयंती’ भी कहते हैं । रैगर जाति के लोग इस दिन घर के टूटे-फूटे पुराने बर्तनों के बदले नये बर्तन खरीदते हैं । इस दिन चांदी के बर्तन खरीदना अत्‍यधिक शुभ माना जाता है ।
25. दीपावली: कार्तिक मास की अमावस्‍या को दीपावली का पर्व रैगर जाति के लोगों द्वारा मनाया जाता है । इस दिन लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न करने के लिये पहले से घरों की पुताई करके साफ सुथरा कर लिया जाता है । रैगर जाति में यह मान्‍यता है कि कार्तिक अमावस्‍या को भगवान श्री रामचन्‍द्र जी चौदह वर्ष का वनवास काटकर रावण को मार कर अयाध्‍या लौटे थे । अयोध्‍यावासियों ने श्री रामचन्‍द्र जी के लौटने की खुशी में दीप मालायें जलाकर महोत्‍सव मनाया था । इस दिन उज्‍जैन सम्राट विक्रमादित्‍य का राजतिलक भी हुआ था । विक्रमी संवत् का आरम्‍भ तभी से माना जाता है अत: यह नर्व वर्ष का प्रथम दिन भी है ।
एक जमाना था जब रैगर समाज में दीपावली से पूर्व बालकों के हाथों में दीपक लेकर हीड़ गाते हुए घरों के आगे चक्‍कर लगाते थे । दीपावली पर घरों को चमकाने व माण्‍डने बनाने के लिए पहले गेरू और खड़ी का उपयोग होता था । घर की और घरों के बाहर बने माण्‍डणों पर दीपक रखा जाता था । रैगर बालिकायें अपने सिर पर छिद्रयुक्‍त मटकी सा हाथ में छिद्रयुक्‍त कुल्‍हड़ लेकर और उसमें दीपक जलाकर रैगर मौहल्‍ले के घर घर गायन करने जाती थी । इसके अलावा लक्ष्‍मी पूजा के साथ गाय की पूजा की जाती थी । आजकल रैगर समाज में इस दिन बाजार में मिलने वाले लक्ष्‍मी जी की तस्‍वीर को दीवार पर चस्‍पाकर लेते हैं । या दीवार पर गेरूआ रंग से गणेश लक्ष्‍मी की मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं । गणेश लक्ष्‍मी की मिट्टी की प्रतिमा या चांदी की प्रतिमा बाजार से लाकर दीवार पर रखी लक्ष्‍मी गणेश के चित्र के सामने रखकर पूजा करते हैं । थाली में दीपक रखकर उन्‍हें प्रज्‍जवलित करने के बाद जल, रोली, खील बताशे, चावल, गुड़, अबीर, धूप आदि से पूजनकर टीका लगाते हैं । इस दिन रैगर जाति के लोगों के घरों में चावल व हरा मूंग उबालकर बनाते हैं । उसमें मीठी बुरा अर्थात पिसी हुई चीनी और देसी घी डालकर लक्ष्‍मी ली को इसका भोग लगाने के बाद यह भी प्रसाद के रूप में खाया जाता है । स्त्रियां चावलों का बायना निकालकर उस पर रूपये रखकर अपनी सास के चरण स्‍पर्श करती है और आशीर्वाद प्राप्‍त करती है पूजा करने के बाद दीपकों को घर में जगह-जगह पर रख देते हैं । एक बड़ा अर्थात चौमुखा दीपक गणेश लक्ष्‍मी जी के पास रख देते हैं । पूजा करने के बाद सभी स्त्रियां और पुरूष अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने के लिये मौहल्‍ले में निकल जाते हैं । सभी स्त्रियां और पुरूष सजधज कर आशीर्वाद लेने की क्रिया में सम्मिलित होते हैं । दूसरे दिन प्रात: चार बजे पुराने छाज में कुड़ा रखकर कूड़े को दूर फेंकने के लिये ले जाते हैं ।
26. गोवर्धन पूजा: कार्तिक मास की शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्‍सव मनाया जाता है । रैगर जाति की महिलायें गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल, दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते है तथा प्ररिक्रमा करते हैं ।
27. भाई दुज: रैगर जाति में भाई बहन की अमर प्रेम के दो त्‍यौहार आते हैं- एक रक्षा बंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है जिसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है । दूसरा भाई दूज का त्‍यौहार आता है जिसमें बहन भाई की लम्‍बी आयु की प्रार्थना करती है । भाई दूज का त्‍यौहार कार्तिक मास को द्वितीया को मनाया जाता है । इस‍ दिन बहने बेरी-पूजन भी करती है । इस दिन बहन भाई को भोजन कराकर तिलक लगाकर नारियल का गोला देती है । इस दिन बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्‍व है ।
28. देव उठनी ग्‍यारस अर्थात देवात्‍थान एकादशी: कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की एकादशी देवोत्‍थान के रूप में मानाई जाती है । मांगलिक कार्य शुरू किये जाते हैं । इस दिन को रैगर जाति के लोग अनबुझा विवाह का दिन मानते हुए अपने बच्‍ची का विवाह सम्‍पन्‍न करते हैं ।
पौष माह के पर्व:
29. मकर संक्रान्ति: पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर होता है तभी मकर संक्रान्ति होती है । अंग्रेजी कलेण्‍डर के अनुसार मकर संक्रान्ति हमेशा 14 जनवरी को होती है । दक्षिण भारत में इसको पोंगल कहा जाता है ।
रैगर समाज के लोग इस दिन तिल के लड्डू गुड़ के अन्‍दर बनाते हैं । चीटियों को आटे में गुड़ मिलाकर डालते हैं और गायों को चारा खिलाते हैं । शाम को बहन बेटियों को खाने पर आमंत्रित करते हैं और चूरमा दाल बाटी अथवा स्‍वादिष्‍ट भोजन बनाते हैं । रैगर जाति में यह भी मान्‍यता है कि ससुराल के काले तिल नहीं खाना चाहिये अन्‍यथा उसे चुकाना पड़ता है । इस दिन राजस्‍थान में पतगें भी उड़ाई जाती है ।

माघ माह के पर्व:
30. गणेश चतुर्थी: गणेश चतुर्थी का व्रत माघ मास की कृष्‍ण पक्ष कर चतुर्थी को रखा जाता है । जिसे रैगर समाज भी मानता है।
31. बसंत पंचमी: माघ मास की शुक्‍ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी के रूप में रैगर समाज मनाता है । यह दिन ऋतुराज बसन्‍त के आगमन की सूचना देता है । रैगर इस दिन शुभ कार्य जैसे गृह निर्माण, विवाह आदि भी करते हैं ।
फालगुन मास के पर्व:
32. महाशिव रात्रि: महाशिव रात्रि व्रत फाल्‍गुन मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है । प्राय: रैगर महिलायें शिवजी का व्रत रखकर भगवान शिव को जल चढ़ाकर फल आदि ग्रहण करती है । भरकर रोली, मोली, चावल, दूध, घी, बेल पत्र आदि का प्रसाद शिव को अर्पित करते हैं ।
33. होली का बड़ कुल्‍ला: रैगर जाति के लोग होली से पन्‍द्रह दिन पहले किसी शुभ दिन गाय के गोबर से सात बड़कुल्‍ला बनाते हैं । फाल्‍गुन शुक्‍ल एकादशी को गोबर की पांच ढाल, एक तलवार, एक चांद सूरज, आधी रोटी, एक होलिका भाई और एक पान बनाते हैं । बड़कुल्‍ला को माला में पिरोते हैं ।
34. होली: होली का पर्व फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । होली के आठ दिन पहले से होलाष्‍टक प्रारम्‍भ होता है । रैगर जाति के लोग इसे ‘होली का डांडा’ रोपना भी कहते हैं । होली का डांडा रोपने के बाद जब तक होली नहीं जलती तब तक कोई भी शुभ कार्य करना रैगर समाज में वर्जित माना जाता है । इस दिन सायंकाल के बाद भद्रा रहित लग्‍न में कच्‍चे सूत की लड़ी, जल का लोटा, बूट अर्थात कच्‍चे चने की डाली आदि से पूजा करने के बाद होलिका दहन किया जाता है । होली दहन के दूसरे दिन होलिका के उत्‍सव पर एक दूसरे के गुलाल और रंग लगाकर प्रेम व भाई चारे का उदाहरण प्रस्‍तुत करते हैं ।
अन्‍य प्रमुख व्रत और त्‍यौहार
35. सोमवती अमावस्‍या: जो अमावस्‍या सोमवार को पड़ती है उसे सोमवती अमावस्‍या कहते हैं । सोमवार चन्‍द्रमा का दिन है । इस दिन सूर्य तथा चन्‍द्रमा एक सीध में स्थित रहते हैं इसलिये यह पर्व विशेष पुण्‍य फल वाला माना जाता है । रैगर महिलायें इस दिन व्रत रखकर अच्‍छे भविष्‍य की कामना करती है ।
36. मल मास: जिस मास में सूर्य संक्रान्ति नहीं होती उसे अधिमास अर्थात मल मास कहते हैं । अधिमास 32 मास 16 दिन तथा चार घड़ी के अन्‍तर से आता है । अधिमास में अर्थात मल के महिने में रैगर जाति के लोग कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं ।
37. पीपल पुण्‍यू: रैगर जाति में इस दिन बिना किसी पंडित से पूछे विवाह सम्‍पन्‍न किये जाते हैं ।

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

Mangnikkarप्राचीन काल से कुछ ऐसी जातियां चली आ रही है जिनके सहयोग के बिना एकाएक किसी जाति का कार्य नहीं चल पाता । उनके सहयोग के बिना, विवाह तथा मृत्‍यु जैसे संस्‍कार पूर्ण नहीं हो सकते थे । रैगर जाति के साथ भी कुछ ऐसी जातियां लग गई जिनका सहयोग जन्‍म, विवाह तथा मृत्‍यु संस्‍कार में लिया जाता था । ऐसी जातियां मंगणियार जातियां कहलाती है ।

ये जातियां रैगर जाति से मांग कर ही अपना भरण पोषण करती थी । ये रैगर जाति के अलावा किसी अन्‍य जाति से नहीं मांगते थे । रैगर जाति पर ही ये जातियां आश्रित थी । रैगरों की मंगणियार जातियां जैसे- बहीभाट, राणा, ढाडी, नट, नाथ तथा जालाणी है । बही भाटों के अलावा आज इन जातियों की रैगर समाज के लिए कोई उपयोगिता नहीं रह गई है । इसलिए इन मंगणियार जातियों का पारम्‍परिक धन्‍धा स्‍वत: समाप्‍त हो गया है । बही भाटों की रैगर जाति के लिए आज भी उतनी ही उपयोगिता है जितनी पहले थी । रैगर जाति का प्राचीन इतिहास बहीभाटों की पोथियों में ही है । उनके द्वारा लिखा गया सत प्रतिशत सही नहीं माना जा सकता मगर उनका लिखा हुआ सम्‍पूर्ण झूठ भी नहीं कहा जा सकता । उनकी पोथियों को समझने की आवश्‍यकता है । बहीभाटों की पोथियों पर शोध किया जाय तो रैगर जाति के इतिहास सम्‍बंधी कही महत्‍वपूर्ण तथ्‍य उजागर हो सकते है। उनकी पोथियों को महत्‍व दिया जाना चाहिए ।
रैगर जाति की मंगणियार जातियों का विस्‍तृत विवरण दिया जा रहा है-

बही भाट

इनको राव और जागा भी कहते हैं । जागा इस लिए कहते हैं कि ये प्रात: काल में उठकर यजमानों की गाथा गा कर उन्‍हें जगाते हैं । इनका मुख्‍य धन्‍धा यजमानों की वंशावली तैयार करना था तथा यजमानों को पढ़कर सुनाना है । यह काम पीढ़ि दर पीढ़ि चला आ रहा है । ये लोग पी‍ढ़ियों से यजमानों की वंशावली का लेखा-जोखा रखते हैं । भाटों की बहियां इतिहास के महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज है । बही लिखने में ये लोग एक विशेष प्रकार की लिपि का प्रयोग करते हैं । इनकी लिपि में कम से कम मात्रा का प्रयोग होता है । बल्‍कि यों कहना चाहिए कि ये बिना मात्रा के अक्षरों की विशेष बनावट को काम में लेते हैं । इनकी भाषा और लिपि को हर आदमी न तो समझ सकता है और ना ही पढ़ सकता है । ये स्‍वयं ही पढ़ सकते है और समझ सकते हैं । मैने रामचन्‍द्र आत्‍मज नाथूराम बही भाट निवासी माहोला जिला भिलवाड़ा से साक्षात्‍कार किया । श्री रामचन्‍द्र भाट के पास नौ सौ वर्ष पुराना रिकार्ड है जिसका वजन लगभग 11.5 मन है ।
बही भाट चार प्रकार के होते हैं जैसे – बागौरा, छंडीसा, भूंणा तथा केदारा । इनमें आपस में बेटी व्‍यवहार नहीं होता है । चारों ही प्रकार के बही भाट चित्‍तौड़गढ़ जिले के अपने नाम से सम्‍बंधित गाँवों से उठे हुए है । बागौरा भाट चित्‍तौड़गढ़ जिले के बागौर गाँव से उठे हुए है । बागौरा भाटों मे 52 गोत्र है । जो 52 जातियों को मानते हैं । बागौर भाटों में सौलंकी गोत्र ही रैगरों को मांगती है । सौलंकी भाट अजमेर, आम्‍बा, सूरजपुरा, माहोला, कुराबड़, कपासन, फागी वगैरा में फैले हुए है । ये रैगरों को मांगने के अलावा खेतीबाड़ी का धन्‍धा भी करते हैं । शहरों में मजदूरी और अन्‍य धन्‍धे भी करने लगे है । बही भाटों में नौजवान पढ़ लिखकर छोटी-मोटी नौकरियों में भी लग गये हैं । पुरानी पीढ़ि के बही भाट अभी भी यजमानों की वंशावली पढ़ने का धन्‍धा कर रहे हैं । नियमानुसार तीन साल में एक बार जाकर वंशावली तैयार करनी चाहिए मगर पॉच-सात साल में एक बार जा पाते हैं । बही भाट रैगरों के घरों में बना हुआ भोजन नहीं करते हैं । मगर उनके घरों से आटा, दाल, घी, तेल आदि ले लेते हैं । अपने हाथ से बना हुआ भोजन खाते हैं । बही भाट स्‍वयं यह मानते हैं कि पहले रैगरों के घरों में बना हुआ भोजन करते थे मगर बाद में त्‍याग दिया गया आधुनिक पीढ़ि के कई लोग इसलिए आज भाटो का विरोध करते है । यदि भाटों ने रैगर जाति में आना बन्‍द कर दिया तो रैगर जाति को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा क्‍योंकि बही भाटो के अलावा रैगर जाति का कही भी लिखित में इतिहास नहीं है ।

राणा

विभिन्‍न जगहों में इन्‍हें विभिन्‍न नामों से पुकारा जाता है । जयपुर और दिल्‍ली में राणा, मारवाड़ मे ढाडी, मेवाड़ में ढोई, बीकानेर डिवीजन में बारेट, पंजाब में भाट, उत्‍तर प्रदेश में चारण तथा कशमीर में इन्‍हें ब्रह्मभाट कहते हैं । ढाडी मुसलमान होते हैं शेष सभी हिन्‍दू हाते हैं । राणा हिन्‍दू होने से रैगरों के घरों में बना खाना खाने से परहेज नहीं करते हैं । राणा लोग अपनी उत्‍पत्ति मथुरा वृन्‍दावन से मानते हैं । राणों में जीरोतिया, डागर, कालेट, बमणावत, झाड़फड़, दशाग बिलोणिया, ऊछरीवाल तथा दुरबड़िया वगैरा गोत्र हैं । इन सभी में आपस में खान-पान तथा बेटी व्‍यवहार होता है । इनमें जीरोतिया गोत्र ही मूल गोत्र हैं । पहले जीरोतिया गोत्र के राणा ही पूरी रैगर जाति को मांगते थे मगर दूसरी गोत्रों ने जीरोतियों से बेटी व्‍यवहार किया तब उन्‍हें रैगरों की कुछ गोत्र तथा बहियाँ उनको दे दी । उदाहरण के लिए दशाग बिलोणिया पहले जाटों को मांगते थे मगर जीरोतियों से जब बेटी त्‍यवहार किया तब जीरोतियों ने इन्‍हें रैगरों की बिलोणिया गोत्र तथा उनकी वंशावली की बहियाँ दे दी । इसी तरह दशाग बिलोणियों ने जाटों को त्‍याग कर बिलोणिया गोत्र के रैगरों को मांगना शुरू कर दिया । यही स्थिति डागर, कालेट, बमणावत, झाड़फड़, ऊछरीवाल तथा दुरबड़िया गोत्रों की रही । ये पहले तेली, गूजर वगैरा विभिन्‍न जातियों को मांगते थे मबर जीरोतियों से बेटी व्‍यवहार करने पर उन्‍हें छोड़कर रैगरों को मानने लग गये । इन्‍होंने आपस में रैगरों की गोत्रें बांट रखी है । जीरोतिया रैगरों 24 गोत्रों को मांगते हैं, कालेट 8 गोत्र, डगर 4 गोत्र, बमणावत 4 गोत्र, उछरीवाल 4 गोत्र, झाड़फड़1 गोत्र-जलुथरिया, दशाग बिलोणाया 1 गोत्र बिलाणिया, दुरबड़िया 1 गोत्र-मोहनपुरिया को मांगते है । दशाग बिलोणिया बस्‍सी जिला जयपुर के अलावा कहीं नहीं है । कालेट-नाटाणियों का बाजार जयपुर, दढवाणा, बेराड़ा आदि स्‍थानों में बसे हुए हैं । बमणावत धीरोड़ा तथा झोटवाड़ा (जयपुर) में निवास करते हैं । झाड़फड़-झोटवाड़ा में है । ऊछरीवाल हरनेर जिला अलवर तथा दुर‍बड़िया कुचामन में बसे हुए है । इनका परम्‍परागत धन्‍धा रैगरों की विरदावली (प्रशंसा) बोलना है । अपने यजमानों को खुश करने के लिए उनकी अधिक से अधिक प्रशंसा करते हैं । विरदावली मौखिक और पद्य में बोलते हैं । अपनी याददास्‍त के लिए अपने घरों में यजमानों के वंशावलियों की पोथियें भी रखते है । मगर बही भाटों की तरह पोथियों यजमानों के घर ले जाकर नहीं बांचते है । राणा लोग भी बही भाटों की तरह बिना मात्रा की लिपि का प्रयोग करते हुए बहियें लिखते हैं । बही भाटों की पोथियों में वंशावलियों का विस्‍तृत वर्णन रहता है जबकि राणा लोग केवल अपनी याददास्‍त के लिए संक्षिप्‍त में ही वर्णन लिखते हैं । राणा लोगों की वर्तमान पीढ़ि के कई नौजवान पढ़-लिखकर नौकरियों में लग गये हैं, कई लोग व्‍यापार और दुकानदारी करने लग गये हैं, कई लोग रिक्‍शा तथा टैक्‍सी चलाने लग गये हैं । इस तरह अब ये लोग अपना परम्‍परागत धन्‍धा छोड़ते जा रहे हैं ।

ढाडी

ये मुसलमान होते हैं मगर इनके नाम हिन्‍दुओं की तरह मोहनराम, मांगीलाल, पांचू, वेला, हजारी वगैरा है । मुसलमान धर्म के कारण ये रैगरों के घरों में बना हुआ खाना नहीं खाते है । इनका काम भी राणा की तरह अपने यजमानों की विरदावली बोलना है । ढाडियों की 10 गोत्र हैं- जीरोतिया, दुरबड़िया, कालेट, डागर, सोलोट, खंडाड़ा, सुकल, जंवड़ा, नालोत तथा अड़ामार । इनकी कई गोत्रों के नाम जैसे जीरोतिया, दुरबड़िया, कालेट, डागर वगैरा राणों के गोत्रों के सामन है । इनकी सभी गोत्रों में आपस में खान-पान और बेटी व्‍यवहार होता है । इनमें रैगरों की गोत्रें निम्‍नानुसार बटीं हुई हैं और उन्‍हीं को मांगते हैं-

नालात- रैगरों की 12 गोत्रों को मांगते हैं जिनमे सिंगाड़िया, तुंणगरिया वगैरा हैं ।
अड़ामार- ये भी 12 गोत्रों को मांगते है जिनमें मोरिया, नारेलिया, मण्‍डोलिया वगैरा है ।
दुरबड़िया- ये दो गोत्रों सुंकरिया और मुण्‍डोतिया को मांगते है ।
जीरोतिया- ये खटनावलिया और जाटोलिया गोत्र को मांगते है ।
डागर- ये भी दो गोत्रों बालोटिया और बोरा को मांगते है ।
कालेट- ये एक ही गोत्र उजिरपुरिया को मांगते है ।
जंवड़ा- ये एक ही गोत्र फुलवाड़िया को मांगते है ।
सोलोट- ये कंवरिया गोत्र को मांगते है ।
खंडाड़ा- ये गुसाईंवाल को मांगते है ।
सुकल- ये सवांसिया गोत्र को मांगते है ।

ढाडी केवल मारवाड़ में ही है । अजमेर जिले में इनकी आबादी सर्वाधिक है । इसे अलावा नागौर, पाली, जयपुर, सवाई माधोपुर आदि जिलों में भी बसे हुए हैं ।आजकल ढाडी मकानों की चुनाई, ऊंट घोड़ों का व्‍यापार, मजदूरी वगैरा करते है । इस जाति में शिक्षा का अभाव है । समय के साथ इनका परम्‍परागत धन्‍धा स्‍वत: समाप्‍त होता जा रहा है ।

नट

नट सात तरह के होते है –
1. गुजराती नट- ये किसी जाति विशेष के नट नहीं हैं । तमाशे दिखाना इनका मुख्‍य पेशा है । ये लाव पर चढ़कर खेल दिखाते हैं । ये नटों में सबसे श्रेष्‍ठ नट माने जाते है ।
2. राज नट- इनको भांतु भी कहते हैं । ये लड़कियों को खरीद कर उनसे वेश्‍यावृत्ति का पेशा करवाते हैं ।
3. भ्रेच्‍या नट- ये नट भी किसी जाति विशेष को नहीं मांगते हैं । ये बहुरुपिये का काम करके अपना गुजारा करते हैं ।
4. नट कंजर- ये गुर्जरों के नट हैं । गुर्जर जाति के अलावा किसी को नहीं मांगते हैं ।
5. चमारों के नट- इस को चौरास्‍या नट भी कहते हैं । ये केवल चमारों को ही मांगते हैं । इनकी उत्‍पत्ति ढोली जाति से होना बताया जाता है ।
6. मल्‍ल नट- ये मुसलमान होते हैं । ये भी खेल दिखाते है । ये पत्‍थर को मुक्‍के से तोड़ना, पत्‍थर उछालकर भुजा पर झेलना, मूछों तथा सिर के बालों से बांधकर ट्रक खींचना एवम् बालों से पत्‍थर उठाना आदि खेल दिखाते हैं ।
7. रैगरों के नट- इनको नौलखिया नट भी कहते है । ये केवल रैगर जाति को ही मांगते है । चाकसू से इनकी उत्‍पत्ति बताई जाती है । इनके 14 गोत्र है । कालेट, ढावसी, उड़ानसी, भाण्‍ड, जागा, चारण, परपड़, कण्‍डारा, पारदा, धनावत, राणियावत, धोंकरवाल, नारोलिया तथा खोलवाल है । इन सब में आपस में खान-पान तथा बेटी व्‍यवहार होता है । इनकी आबादी राजस्‍थान तथा दिल्‍ली के अलावा कहीं नहीं है । ये खास तौर से चाकसू तहसील में आबाद है । चाकसू के अलावा जमुआ रामगढ़, जयपुर, चित्तौड़गढ़, बेगलियावास, ब्‍यावर, फूलिया, जहाजपुर, सिंगोली, सांवता वगैरा में भी बसे हुए हैं । इनका परम्‍परागत धन्‍धा दोहे और कविताओं में यजमानों की विरदावली बोलना है तथा मनोरंजन के लिए खेल करना आदि है । पहले शादि विवाह में नटों के नेक चुकाये जाते थे । आजकल रैगरों के नटों ने बैण्‍ड, शहनाई, नगाड़े बजाना, खेल पार्टी (नौटंकी), मजदूरी तथा ऊंट घोड़ो के व्‍यापार आदि करना शुरू कर दिया है । इनमें शिक्षा का अभाव है । इनका परम्‍परागत धन्‍धा समाप्‍त होता जा रहा है ।

नाथ

इनको जोगी भी कहते है । इनको अजमेर क्षेत्र में जागी तथा अन्‍य जगहों पर नाथ कह कर पुकारा जाता है । ये जोधपुर, अजमेर, कोटा, जयपुर, दिल्‍ली, मुम्‍बई वगैरा में फैले हुए हैं । पंच पंचायती में नाथ पंचों की तरह से फैसले सुनाता है । विवाह का लग्‍न देने जाना, यजमानों के कहे अनुसार मोहल्‍लों में न्‍यौता देना तथा बुलाना आदि काम करते हैं । शादी विवाह में इनका नेक चुकाया जाता है । साल में एक बार फेरी पर आते है, उस समय यजमान श्रद्धा अनुसार इनको पैसे देते हैं । आज कल नाथों ने व्‍यापार, मजदूरी आदि धन्‍धे अपना लिए हैं । इनका परम्‍परागत धन्‍धा समाप्‍त होता जा रहा है ।

जालाणी

जालाणी कोई जाति नहीं है बल्कि यह एक धूंणी, गादी, पंथ या सम्‍प्रदाय है । धूंणी या गादी 4 प्रकार की है- जालाणी, मालाणी, हरनिवाणी तथा हरचंदवाणी ।
मालाणी- ये गुर्जरों के भोपे होते हैं तथा गुर्जर जाति के अलावा किसी भी जाति को नहीं मांगते है ।
हरनिवाणी- ये बलाइयों के कामड़ होते है जो तेरह ताल बजाते हैं और बाबा रामदेव के जमा जगाते है ।
हरचन्‍दवाणी- ये पूंगी बजाने वाले कालबेलिये होते हैं ।
जलाणी- ये रैगरों के क्रियाकर्म करते है । जलाणी रैगर जाति के अलावा किसी दूसरी जाति को नहीं मांगते हैं । जालाणी धूंणी, गादी या पंथ के संस्‍थापक जालापीर थे । हींगलाज में जालापीर की मुख्‍य धूंणी या गादी है । जालाणियों को वहीं से भेख (भगवां चोला) दिया जाता था तभी जालाणी पंथ के अनुयायी माने जाते थे । अनुसूचित जाति में एक जाति खंगार है । खंगार अपनी उत्‍पत्ति खंगारोत राजपूतों से बताते हैं । खंगार जाति के जिन लोगों ने रैगरों के क्रियाकर्म का पेशा अपनाया वे जालाणी कहलाए । खंगार जाति के दूसरे लोग जालाणियों के साथ खान-पान तथा बेटी व्‍यवहार नहीं करते हैं । जालाणियों को निम्‍न समझते है । खंगार अपने नाम के पीछे राजपूतों की तरह ‘सिंह’ लगाते हैं मगर जालाणियों में अपने नाम के पीछे ना‍थ लगाने की परम्‍परा है । कई जालाणी नाम के पीछे दास भी लगाते हैं । जालाणियों का मुख्‍य पारम्‍परिक धन्‍धा रैगरों के क्रियाकर्म करना है । ये रैगरों के दाह संस्‍कार में नहीं जाते है । यदि जाते भी है तो मानवता के नाते अन्‍य आम आ‍दमी की तरह जाते हैं तथा वहां अंतिम संस्‍कार सम्‍बंधी कोई कार्य नहीं करते हैं । इनका कार्य मृतक के मरने के तेरहवें दिन की रात को होता है । मृतक के परिवार से सूचना मिलने पर जालाणी क्रियाकर्म के लिए उसके घर जाते हैं । क्रियाकर्म रात को ही होता है । क्रियाकर्म के पिछे धारणा यह है कि मृतक की आत्‍मा भटकती रहती है । क्रियाकर्म करवाने से ही उसको मोक्ष की प्राप्‍ति होती है । क्रियाकर्म शुरू करवान से पहले मृतक के घर की लिपाई-पुताई करवाकर साफ सुथरा करवाते है । घर में जिस स्‍थान पर पाठ (मंत्र) पढ़ने का कार्य होना होता है वहां चारों तरु दीवारों पर नये या साफ कपड़ों के पर्दे लगवाते हैं और मंदिर की तरह सजाते है । चार कोनों में चार दीपक रखते हैं तथा बीच में एक बड़ा दीपक रखते हैं, जिसे जोत कहते हैं । क्रियाकर्म की अन्‍य सामग्री भी रखदी जाती है । प्रारम्‍भ में मृतक के परिवार के सदस्‍यों को चेला मूण्‍डते हैं । चेला मूण्‍डन में चेले के कान पर चाकू रखकर कान में मंत्र फूंक दिया जाता है । चेला मूण्‍डन के बाद क्रियाकर्म की कार्यवाही में मंत्रों के जप करना शुरू करते हैं । 360 शब्‍द (मंत्र) होते हैं उनका रात भर जप चलता रहता है । मंत्रों के जप के दौरान काली मिट्टी की एक कुण्‍डी मँगवा कर उसमें कच्‍चा दूध डालते हैं । मृतक का डाब (घास) का एक पुतला बनाकर उस पर मृतक यदि पुरूष है तो सफेद कपड़ा तथा स्‍त्री है तो लाल कपड़ा ओढ़ा कर पुतले को कच्‍चे दूध में नहलाया जाता है । इसके बाद पीपल के पेड़ की लकड़ी या कपास के पौधे की लकड़ी से सीढ़ी बनाते हैं । यजमान की सामर्थ्‍य हो तो चांदी की सीढ़ी भी बनवाते है । सीढ़ी के सात खण्‍ड होते हैं । हर खण्‍ड के अलग-अलग मंत्र हैं तथा हर सीढ़ी के अलग-अलग दान हैं । सात खण्‍ड़ों के सात दान होते है । दान में गाय, कपड़े, लोटा, अन्‍न, रूई वगैरा देते हैं । इस तरह यजमान अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार सातों दान देता है । यह क्रियाकर्म सम्‍बंधी सम्‍पर्ण कार्यवाही सूर्यास्‍त के बाद शुरू होकर सूर्योदय के पहले अनिवार्य रूप से समाप्‍त हो जाती है । यह धारणा है कि क्रियाकर्म करवाए बिना मृतक की आत्‍मा को मोक्ष नहीं मिलती है ।
जालाणी दिल्‍ली तथा राजस्‍थान में बसे हुए हैं । राजस्‍थान में बूंदी, कोटा, डीग, उदयपुरया, निवाई, बगड़ी, देवड़ास, टोडारायसिंह, पीपलदा, छीनोद, श्‍योपुर कला (म.प्र.), डिगीमालपुरा, पचेवर, अराई, मोरला, गणेती, नासिरदा तथा हनुतिया वगैरा स्‍थानों में फैले हुए है । जालाणियों की जनसंख्‍या बहुत ही कम है । जालाणियों का परारम्‍परिक धन्‍धा समाप्‍त होता जा रहा है क्‍योंकि रैगर जाति में शिक्षा का काफी प्रसार हुआ है तथा कई रैगर स्‍वयं भी क्रियाकर्म कर लेते हैं । इसलिए जालाणी अब अपने पारम्‍परिक धन्‍धे के अलावा खेती, मजदूरी, सिलाई, नौकरी आदि करने लग गये हैं ।
क्रियाकर्म करने या करवाने से मृतक की आत्‍मा को मोक्ष की प्राप्ति सम्‍बंधी यह धारणा रैगर जाति के पिछड़ेपन की निशानी है । जो समाज जितना पिछड़ा हुआ है, वो उतने ही अन्‍ध विश्‍वासों में फंसा हुआ होता है । क्रियाकर्म की धारणा घोर अन्‍ध विश्‍वास तथा ढकोसलेबाजी है । अज के वैज्ञानिक युग में एक तरफ दनिया चाँद पर पहुँच चुकी है, दूसरी तरफ रैगर जाति अभी तक अन्‍ध विश्‍वास के घेरे में फंसी हुई है । इस पोंगापंथी को त्‍यागना ही रैगर जाति के हित में है । यह सर्व मान्‍य तथ्‍य है कि व्‍यक्ति का अपने जीवन में सदकर्म करने से मोक्ष मिलती है, क्रियाकर्म करवाने से नहीं ।

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत ‘रैगरजाति : इतिहास एवं संस्‍कृति’)

रैगर जाति का विस्‍तार पूरे राजस्‍थान में है । इसके अतिरिक्‍त यहीं से गये हुये लोग देहली, पंजाब, हरियाणा, जम्‍मू, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश व उत्‍तर प्रदेश में बहुतायात में बसे हुए है । इनके सामाजिक रीति-रिवाज भी सभी जगह एक से ही है । रैगर समाज में गोत्र भी लगभग 350 से भी अधिक ही है जबकि अग्रवाल समाज में तो मात्र 17 गोत्र ही है । अत: हमारे समाज में वैवाहिक सम्‍बंध जोड़ने में कहीं भी कोई परेशानी नहीं आती । अब हम हमारी जाति के विभिन्‍न रिश्‍तों सम्‍बंधी कुछ विशेष बातों की ओर भी कुछ प्रकाश डालना चाहते है –

गोत्र मिलान :- समाज में लड़के-लड़कियों के सम्‍बंध निश्चित करने से पूर्व पहले आपसी स्‍तर पर गोत्र मिलाये जाते है फिर पंचों के मध्‍य दोनों पक्षों के गोत्र मिलाये जाते है और गोत्र नहीं टकराने की स्थिति में ही पंचों की सहमति के पश्‍चात् रिश्‍ता तय किया जाता है ।

हमारे समाज में मुख्‍य रूप से लड़के व लड़की दोनों ही पक्ष के चार-चार गोत्र मिलाये जाते है । इनमें दो पित्र पक्ष के अर्थात् खुद (दादा) का व दादी का तथा दो गोत्र मातृ पक्ष के अर्थात् माँ का व नानी का गोत्र मिलाया जाता है । इसके अतिरिक्‍त माँ व दादी दो-तीन भी आई हो अथवा पिता कही गोद गया हो व पगड़ी बंधी हो उनका गोत्र भी टाला जाता है, इन बातों का स्‍पष्‍ट मिलान किया जाता है । किन्‍तु यदि कहीं जाने अनजाने गोत्र बताना रह गया तो कई बार बने बनाये रिश्‍ते टूट जाते है । यदि शादी भी हो गई हो तो सम्‍बन्‍ध विच्‍छेद भी देखे है किन्‍तु आज इनमें कई स्‍थानों पर थोड़ी शिथिलता आने लग गई है और लोग कुछ अनदेखी करने लग गये है जबकि अब तो समाज में उपयुक्‍त लड़के-लड़कियों की कमी नहीं है तथा रिश्‍ते भी अब लोग दूर-दूर तक करने लग गये है । समाज का विस्‍तार होने के कारण अब रिश्‍ता मिलने में कोई परेशानी नहीं होती है ।

कुछ स्‍थानों का विशेषकर अजमेर क्षेत्र में कहीं-कहीं नानी के गोत्र की अनदेखी होती है और नानी कानी कह देते है । इस विषय में थोड़ा विचार करना बहुत ही आवश्‍यक है ।

अब स्‍त्री एवम् पुरूष दोनों को समान अधिकार है । अत: पुरूष की माँ का गोत्र टाला जाता है तो स्‍त्री की माँ का गोत्र भी टालना भी न्‍यायोचित है इसमें भेदभाव करना उचित नहीं है । नानी, दादी से कम स्‍नेह नहीं रखती ।

वैसे जैविक विज्ञान की दृष्टि से भी देखा जाये और यह मान लें कि सन्‍तानोत्‍पत्ति में पुरूष का अंश 60% तथा स्‍त्री का 40% हो तो दोनों पी‍ढ़ियों का प्रतिशत निकालने पर पुत्रजन्‍म में दादी व नानी दोनों का ही अंश 24, 24 प्रतिशत होगा किन्‍तु पुत्री जन्‍म में पुरूष का 40% और स्‍त्री का 60% अंश माना जाये तो उसमें तो दादी का अंश मात्र 16 और नानी का 36 अंश प्रतिशत होगा । अत: सन्‍तान का रिश्‍ता कायम करते समय दोनों ही पक्ष के गोत्रों को समान रूप से मानकर मातृ व पितृ पक्ष के दो-दो गोत्र ही टालना उचित व न्‍याय संगत होगा । यह भी देखा गया है कि नानी दादी से अधिक प्‍यार व स्‍नेह रखती है वह दोहिते को तो गोद में रखती है और पोते को अंगुली पकड़ाकर ही चलती देखी जाती है । अपराधी को भी यही कहते है कि चोर को क्‍यो मारो, चोर की नानी को मारो । कठिन काम पड़ने पर भी लोग क‍हते है कि अब नानी याद आ जायेगी । अत: नानी के गोत्र की अनदेखी उचित नहीं है । उसका गोत्र अवश्‍य टाला जाए ।

इसके अतिरिक्‍त हमारे समाज के पूर्वजों का पारस्‍परिक रिश्‍तों के सम्‍बंध में बहुत ही अच्‍छा दृष्टिकोण रहा है जिसकी अत्‍यधिक प्रशंसा की जानी चाहिए । हमारे ये विचार व दृष्टिकोण व अन्‍य अनेक हिन्‍दू जातियों से सर्वोत्तम है । इस विषय में नई पी‍ढ़ि को तथा बोलचाल व व्‍यवहार में रिश्‍तों की अनेदखी करने वाले लोगों को, इस विषय की जानकारी देना आवश्‍यक है ।

साली का रिश्‍ता :- हम बड़े भाई को पिता के समान व छोटे भाई को पुत्रवत् मानते है इसी प्रकार महिलायें भी बड़ी बहिन को मातृवत व छोटी को पुत्री समान मानती है । इसी प्रकार अपनी अर्धांगिनी की छोटी बहिन को भी पुत्रीवत् व बड़ी बहन को बड़ सास यानी सासवत् मानते है ऐसी ही पत्‍नी भी जेष्‍ठ को पिता समान व देवर को पुत्रवत् ही मानते है रामचरित्र मानस में गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है कि-

                                ”तात तुम्‍हारि मातु वैदेही, पिता राम सब भाँति स्‍नेही ।”

इसी प्रकार फिर कहा है कि –

                                अनुज बधु भगिनी सुतनारी, सुनहू सठ कन्‍या समचारी ।

                                इनही कुदृष्टि विलाकत सोई, ताहि बधे कछु पाप न होई ।।

इसलिये घर परिवार में किसी काम काज के समय साली को बुलाते है तथा उसको बहिन की तरह ही कपड़े देते है, कई लोग तो पूरी पहरावणी भी देते है, बल्कि मजबूरी में आवश्‍यकता होने पर कई लोगों ने तो अपने स्‍वयम् के खर्चें पर अपने घर पर साली का ब्‍याह रचा कर विदा भी किया है ।

इसलिए उक्‍त मर्यादा का पालन करते हुये हमारे समाज में साली से पुनर्विवाह नहीं करते । यदि किसी ने किया हो तो वह अनुचित व निन्‍दनीय है ।

भौजाई (भाभी) से रिश्‍ता :- हम लोग इसी प्रकार भौजाई को भी माँ के समान ही मानते है । यदि किसी लड़के के विवाह पूर्व उसकी माँ का स्‍वर्गवास हो चुका हो तो दुल्‍हे की बारात रवाना होने से पूर्व माँ के स्‍थान पर अपनी भौजाई का आंचल मुँह में लेकर आगे बढ़ता है । हमारे यहाँ बड़े भाई की मृत्‍यु हो जाने पर यह देखा गया है कि भौजाई को पत्‍नी रूप में स्‍वीकार नहीं करते उसे मातृवत् ही मानते है । यदि वह ससुराल में रहे तो उसको ससम्‍मान रखा जाता है और यदि वह पुर्नविवाह करना चाहे तो उसे पूरी छूट होती है किन्‍तु नाता या स्‍त्री का पुर्नविवाह करने वाली अनेक जातियों में तो देखने में आया है कि बड़े भाई की मृत्‍यु होने पर छोटा भाई हो तो भौजाई को देवर की चूड़ी पहनाकर पत्‍नी बना दी जाती है । कई देवर तो शादीशुदा भी ऐसा कर लेते है । कई जगह तो देवर भाभी की आयु में बहुत ज्‍यादा अन्‍तर होने पर भी रिश्‍ता कर देते है । यह बहुत ही अनुचित व निन्‍दनीय है । किन्‍तु हमारे समाज मे ऐसा रिश्‍ता नहीं करते । हमारे समाज में तो पूर्व रिश्‍ते की पवित्रता को बनाये रखते है जो बहुत ही उत्‍तम व प्रशंसनीय है ।

ब्‍याण-ब्‍याई बुढ़ा-बुढी का रिश्‍ता :- हमारे यहाँ से रिश्‍ते भी बहुत ही आदर्श रूप में कहने चाहिये । लड़के व लड़की के माता-पिता, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ-फूफा, मौसा-मौसी तथा मामा-मामी आदि एक पक्ष के दूसरे पक्ष को ब्‍याई व ब्‍याण यानी समधी जी व समधिन जी कहते है । यह समधी, समधिन समान रिश्‍ते होने पर ही बोलते है असमानता पर नहीं । अन्‍य सभी हिन्‍दू जातियों में ऐसा नहीं कहते है वे समान रिश्‍तों व असमान रिश्‍तों सभी में समधी समधिन ही कहते है ।

हमारे यहाँ रिश्‍तों के स्‍तर में यदि समानता नहीं हो तो बोलचाल व व्‍यवहार मे अन्‍तर किया जाता है जैसे लड़के व लड़की के सभी रिश्‍तों के बहिन भाई, विपरीत रिश्‍ते के बुजुर्गों को यानी उनके बहिन भाई के सास-ससुर व उनके समान रिश्‍तेदारों को बुढ़ाजी व बुढ़ीजी ही कहते है जबकि अन्‍य लोग ब्‍याई जी ही बोलते है । हमारे वे बुजुर्ग भी उन्‍हें पुत्र व पुत्री समान ही मानते है इसी तरह लड़की की ननद व देवरानी जिठानी केा भी पुत्री बतौर व जेठ देवर ननदोई को पुत्र व दामाद के समकक्ष मानते है । इसी प्रकार लड़के की साली व बड़मास को पुत्री समान व उसके साढू को पुत्रवत् मानते है । इसके विपरीत कई अन्‍य समाजों मे लड़के की साली व सालाहेली को भी ब्‍याण जी और वह भी उन्‍हें ब्‍याई जी ही कहते है, जबकि दोनों रिश्‍तों के स्‍तर में तो अन्‍तर होता ही है उम्र में भी चाहे चालीस-पचास वर्ष का अन्‍तर हो वे आपस में ब्‍याई-ब्‍याण ही कहते हैं । यह ठीक नहीं । हमारे यहां रिश्‍तों की समानता रखते हुये बुढ़ा-बुढ़ी कहना बहुत ही उत्तम व श्रेष्‍ठ बात है । इसमें स्‍वयं तथा बड़ों का पूर्ण सम्‍मान का ध्‍यान भी रखा गया है । इसी प्रकार ”साख में साढू व भोजन में लाडू” कहकर इस रिश्‍ते को बहुत ही मधुर सम्‍बंध बना दिया है । एक साढू दूसरे साढू को भार्इ-भाई के समान मानते है । साढू के माँ-बाप को माता-पिता और वे भी उसे पुत्रवत् मानते है । साढू के भाई-बहिन को वह भी भाई बहिन तथा भाभी को भाभी ही मानता है ।

अन्‍य रिश्‍ते :- चाचा-ताऊ के लड़के-लड़की तो आपस में बहिन-भाई होते ही है किन्‍तु बहन-भाई, बहन-बहन, व मामा-बुआ के लड़के भी आपस में बहन-भाई ही होते है और उनमें सगे बहिन-भाईयों जैसी ही आत्‍मीयता व मधुरता होती है । इसी प्रकार चाची-ताई की बहिन मौसी तथा उनके भाई-भौजाई भी मामा-मामी व भुआ की ननद व देवर आदि भी बुआ व फूफा ही माने जाते हैं । इनमें भी वैसी ही मधुरता व प्‍यार होता है और इसी प्रकार पारस्‍परिक व्‍यवहार में प्रेम व्‍यवहार होता रहता है ।

(साभार- श्री रूपचन्‍द्र जलुथरिया कृत ‘रैगर जाति का इतिहास’)

भारत में यदि जाति प्रथा नहीं होती और उनमें चली आ रही पीढ़ि दर पीढ़ि परम्‍पराएं और रीति-रिवाज नहीं होते तो भारतीय संस्‍कृति का नामों निशान कभी का मिट गया होता । जातियों के रीति-रिवाजों ने भारतीय संस्‍कृति को जिन्‍दा रखा । हर जाति के सगाई (मंगनी), विवाह, गोंणा तथा अन्‍य रीति-रिवाज भिन्‍न-भिन्‍न हैं । ये रीति-रिवाज और परम्‍पराएं ही प्रत्‍येक जाति की पृथक् पहि‍चान बनाये हए हैं । रैगर जाति की भी अपनी परम्‍पराएं और रीति-रिवाज है । आज की युवा पीढ़ि कुछ प्राचीन परम्‍पराओं और रीति रिवाजों को स्‍वीकार नहीं कर, वर्तमान परिस्‍थ‍ितियों के अनुरूप चलना चाहती है । यह कोई आलोचना का विषय नहीं है बल्‍कि ऐसा परिवर्तन समय और परिस्थितियों के अनुसार स्‍वाभाविक रूप से होता आया है । रैगर जाति में प्रचलित रीति-रिवाज और परम्‍पराओं का विस्‍‍तृत विवरण दिया जा रहा है ।

नामकरण – बच्‍चा जन्‍म लेने के बाद ब्राह्मण को पूछकर बच्‍चे का नामकरण किया जाता है ।

सूर्य पूजा – ब्राह्मण से सूर्य पूजा का मुहूर्त पूछते हैं । फिर सूर्य पूजा के दिन बच्‍चे की माँ नहा धोकर तैयार होती है और नये कपड़े पहिनती है । घर के चौक में चौका लगाकर माँ अपने बच्‍चे को गोद में लेकर सूर्य की तरफ मुंह करके पाट पर बैठती है । मीठा खाना बनाया जाता है जिससे सूर्य पूजन करते हैं । पूजा के वक्‍त पाट के सामने अनाज की ढेरी पर पानी से भरा कलश रखा जाता है तथा कलश में नीम का झंवरा (टहनी) रखा जाता है ।

जलवा पूजन – बच्‍चा पैदा होने के महीने सवा महीने बाद अच्‍छा वार देखकर माँ जलवा पूजन करती है । जब तक जलवा पूजन नहीं होता है, तब तक स्‍त्री न तो पीने के पानी के मटके के पास जाती है और न रसोई में प्रवेश करती है । जलवा पूजन करने के लिए स्‍त्री नये कपड़े पहिन कर कलश और चरवी सिर पर रखकर चरवी में नीम का झंवरा डालकर अन्‍य औरतों के साथ तालाब पर जाती है । वहाँ जल की पूजा करती है । स्‍त्री अपना कलश और चरवी पानी में भरकर घर लाती है । जलवा पूजन के बाद ही स्‍त्री पानी और रसोई संबंधी कार्य करती है ।

ढूंढ – बच्‍चे पैदा होने के बाद पहली होली पर ढूंढ की जाती है । ढूंढ लड़का और लड़की दोनों की एक समान होती है । होली के दूसरे दिन प्रात: मोहल्‍ले के सब लोग इकट्ठे होकर जिसके घर बच्‍चा पैदा हुआ है, उसके घर जा‍ते हैं । घर के चौक में पाटे पर बच्‍चे का नजदीकी रिश्‍तेदार बच्‍चे को गोद में लेकर बैठता है । एक बांस लेकर दो आदमी दोनों सिरों को पकड़ कर खड़े हो जाते हैं । दूसरे सभी आदमीयों के हाथों में लकड़ीयें होती है जिनसे बांस पर हल्‍की चोट मारते जा‍ते हैं और निम्‍न गीत गाते जाते हैं-

      हरि हरि रे हरिया दे, जीमणे हाथ सबड़को ले ।

      डावे हाथ चंवर डुला, जिण घर जितरी डिकरियां ।

      उण घर उतरा डीकरा, गेरियों री पूरी आश । ।

अंत में बांस को हाथों में ऊपर उठाते हुए कामना करते हैं कि बच्‍चा बांस से भी ज्‍यादा लम्‍बा बढ़े । बच्‍चे का बाप ढूंढ करने वालो को एक नारियल तथा गुड़ देता है यदि प्रथम लड़के की ढूंढ है तो खुशी से शराब भी पिलाते हैं । मोहल्‍ले की ढूंढ पूरी हो जाती है तब सब जगह से इकट्ठे हुए नारियल और गुड़ को मोहल्‍ले में बांट देते हैं ।

बच्‍चे की बुआ ढूंढ के मौके पर ढूंढेकड़ा लाती है जिसमें बच्‍चे के कपड़े, जेवर तथा खिलौनें लाती है । खर्चा अपनी क्षमता के अनुसार किया जाता है मगर बच्‍चे का बाप अपनी बहिन जितना खर्चा करती है उससे ज्‍यादा ही खर्चा करता है । ढूंढेकड़ा लड़का होने पर ले जाया जाता है, लड़की पैदा होने पर नहीं ।

सगाई – इसे सगपण, संबंध, मगनी या रिशता तय करना भी कहते है । दूसरी जातियों की तरह रैगर जाति में भी सम गोत्र में सगाई नहीं होती है । सगाई करते चक्‍त मां, बाप, दादी तथा नानी की गोत्र टालते है । लड़का-लड़कियों की सगाई प्राय: छोटी उम्र में ही तय कर दी जाती है क्‍योंकि लड़की बड़ी होने पर योग्‍य लड़का मिलने कि समस्‍या रहती है । रिश्‍ते की बात प्राय: तीसरे आदमी के जरिये शुरू करवाई जाती है । संबंध करने में लड़का-लड़की की बात बहुत कम ध्‍यान में रखी जाती है । मां बाप ही फैसला करते है । दानों पार्टियें रिता करना चाहती है तो लड़का-लड़की को एक दूसरी पार्टी उनके घर जाकर देख लेती है । लड़का-लड़की एक-दूसरी पार्टी को पसंद है तो लड़की का बाप बेटे के बाप और उसके आदमियों को रिश्‍ता पक्‍का करने के लिए अपने घर बुलाता है । अच्‍छा वार देखकर सगाई की जाती है । सगाई के वक्‍त मोहल्‍ले के ं को बुलाया जाता है । इन सबके सामने सगाई की रस्‍म होती है । लड़की का बाप एक थाली में नारियल, गुड़ तथा समधण के ब्‍याउज का का कपड़ा लाकर रख देता है । लड़के का बाप दूसरी थाली में एक खोपरा लाकर रख देता है । लड़का-लड़की का बाप आमने-सामने बैठ जाते है और थालियों की अदला-बदली करते हैं । थाली अदला-बदली में लड़के के बाप की थाली ऊपर तथा लड़की के बाप की थाली नीचे रखी जाती है । थाली अदला-बदली करने से पहले लड़की का बाप लड़के का नाम पूछता है तथा लड़के का बाप लड़की का नाम पूछता है । थाली अदला-बदली के बाद दोनों समधी आपस में एक दूसरे के मुंह में गुड़ देते हैं । मोहल्‍ले के पंच लड़के के बाप से सवा दो रूपया पिलाई (शराब पिलाने) का तथा एक रूपया कम्‍बल छपाई का लेते है । पिलाई के पैसे पंचों के पा रहते हैं । तथा एक रूपया कम्‍बल छपाई का बेटी की मां को देते हैं । अलग-अलग जगहों पर यह लागभाग अलग-अलग होती है । आजकल की पीढ़ि इस लागभाग में विश्‍वास नहीं करती है । सगाई की रस्‍म के आखिर में लड़की का बाप केसरिया या गुलाबी रंग लाकर सगे संबंधियों के कपड़ों पर डालता है । रंग डालने से यह बात पक्‍की हो जाती है कि सगाई पक्‍की हो गई है । सगाई के समय या बाद में रैगर जाति में दहेज न तो मांगा जाता है और न तय किया जाता है । रैगर जाति में टीके का रिवाज बहुत कम है ।

रीत – सगाई के चार छ: महिने बाद बेटी का बाप बेटे के बाप से रीत मंगवाता है जिसमें बच्‍ची के जेवर तथा कपड़े, चूडि़याँ, रिबन वगैरा मंगवा लेते है । जेवर में चांदी 40 तोले से 80 तोले तक मंगवा लेते है । अधिकतर लोग बच्‍ची के केवल कपड़े मंगवाते है, जेवर नहीं मंगवाते है । बच्‍ची का बाप इस मौके पर बेटे के बाप और उसके परिवार को कपड़े करता है ।

लग्‍न – लड़का-लड़की विवाह योग्‍य हो जाते है तो बात-चीत के जरिये विवाह का अनुमानित समय तय कर लिया जाता है । पण्डित से विवाह का लग्‍न निकलवाया जाता है । लड़की का बाप पण्डित से लग्‍न लिखवाता है जिसमें एक कागज पर विवाह की तिथि तथा समय आदि लिखा जाता है । लग्‍न में पीले चावल, सुपारी, कुंमकुम तथा एक रूपया डालकर कुंमकुंम के छीटे डाले जाते है । चोटी वाले नारियल के साथ लग्‍न तथा अन्‍य सामग्री को मोली (कच्‍चे सूत) से बांध देते हैं । इस लग्‍न और नारियल को बेटी का बाप नाई, ढाडी, नाथ या अपने किसी आदमी के साथ बेटे के बाप के घर भेज देता है । बेटे का बाप अपने नजदीकि रिश्‍तेदारों या मोहल्‍ले वालों को इकट्ठा कर लग्‍न ले लेता है । लड़के का बाप लग्‍न लोन वाले को अपनी इच्‍छानुसार भेंट देकर वापस रवाना कर देता है ।

पाट बिठाना – लग्‍न लाने के बाद लड़का और लड़की को विवाह के सप्‍ताह-दस दिन पहले पाट बिठाते हैं । इस रस्‍म को फूल पहिनाना भी कहते है । मारवाड़ में वान बिठाना भी कहते हैं । अच्‍छा वार देखकर पाट बिठाया जाता है । पाट बिठाते है तब मोहल्‍ले के आ‍दमियों और औरतों को बुलाते हैं । औरतें गीत गाती हैं । लड़का या लड़की जिसकी शादी होनी होती है उसको चौक में पाट (बाजोट) रख कर उस पर बिठाते हैं, तिलक करते हैं । तिलक मां, भोजाई या बहिन करती है । कटोरी में घी डालकर पाट पर बैठे को ही पिलाते हैा तथा मुंह में गुड़ देते हैं । गले में फूलों या रेशम की माला पहिनाते हैं । हाथ में कटारी या तलवार इी जाती है जो फेरे होने तक उनके पास ही रहती है । सोने चांदी के जेवर भी पहिनाते हैं । दुलहा या दुलहन को पाट बिठाने के बाद शाम को रोजाना मोहल्‍ले की औरतें इकट्ठी होकर गीत गाती है । पाट बिठाने के बाद रोजाना घी पिलाते हैं तथा अच्‍छे से अच्‍छा खाना खिलाते हैं ।

बंदौला – पाट बिठाने वाले दिन मोहल्‍ले के सब लोग विवाह वाले के घर बुलाने प इकट्ठे होते हैं । जहां बड़े माहल्‍ले होते हैं वहाँ धड़े होते है । एक मोहल्‍ले में कई धड़े हो सकते हैं । अपने अपने धड़े के लोग ही शादी विवाह में आते हैं । पाट बिठाने वाले रोज दुलहा हो या दुलहन का बाप मोहल्‍ले या अपने धड़े के घरों में गुड़ बांटता है । सगे भाइयों को एक-एक किलों तथा दूसरों को आधा-आधा किलों गुड़ देते हैं । गुड़ लेने वाले को बन्‍दौला देना पड़ता है । बन्‍दौले में दलहा हो या दुलहन को एक समय का खाना खिलाने से पहले घी जितना पी सकता हो पीलाते हैं । खाने में विशष भौजन बनाया जाता है । बंदौला खाने जाते हैं तब दुलहा या दुलहन अपने साथ चार छ: आदमी तक ले जाते हैं । सगे भाई बंदौला देते हैं उसमें सभी सगे भाइयों के पूरे परिवार को खाने पर बुलाते हैं । इसे सीगरी न्‍यौता कहते हैं ।

विनायक पूजा – पण्डित को पूछकर शा‍दी के पांच या सात दिन पहले विनायक(गणेशजी) लाते हैं । दुलहा हो या दुलहन के घरवाले मोहल्‍ले या धड़े की औरतों को इकट्ठा करते हैं और सभी औरतें गीत गाती हुई कुम्‍हार के घर विनायक लाने जाती है । दुलहा दुलहन की मां विनायक लाने जाते समय थाल में गेहूं, गुड़, कुंमकुंम, लाल कपड़ा तथा कच्‍चे सूत की माला ले जाती है । गेहूं और गुड़ कुम्‍हार को दे देते हैं । कुम्‍हार मिट्टी का बना हुआ विनायक देता है । जिसके कुंमकुंम का टीका लगाकर, लाल कपड़ा ओढ़ा कर गले में कच्‍चे सूत की माला डालकर थाल में बिठा कर औरतें विनायकजी के गीत गाती हुई घर लाती है । विनायक के साथ एक बड़वेला भी लाते हैं । विनायक की रस्‍म लड़का या लड़की की शादी में एक समान है । विनायक लाकर घर में गेहूं की ढेरी पर बिठा देते हैं और वहां रंग के मांडणें जिसमें दुलहा-दुलहन के चित्र वगैरा विभिन्‍न रंगों से बनाते हैं । उस स्‍थान पर मेहन्‍दी तथा कुंमकुंम की सात-सात टिकियाँ अंकित कर देते हैं । शाम को परिवार तथा मोहल्‍ले वाले विनायक पूजन करते हैं । मीठा खाना बनाते हैं जिससे विनायक पूजते हैं । बारी-बारी से आदमी और औरतें हाते हैं और विनायक पूजा करके इच्‍छानुसार रूपये पैसे विनायकजी के सामने डाल देते हैं । विनायक पूजा में जितने भी पैसे आते हैं उसको बहिन बेटियाँ आपस में बांट लेती हैं । विनायक लाने के बाद रोजाना सुबह भी गीत गाना शुरू कर दिया जाता है । दुलहा या दुलहन के रोजाना मेहन्‍दी लगाना भी शुरू कर दिया जाता है । विनायक लाने के बाद रोजाना शाम को पीठी (उबटन) करना भी शुरू कर देते हैं ।

पीठी (उबटन) – जौ का आटा तथा हल्‍दी मिलाकर पीठी बनाई जाती है । विनायक लाने के बाद हर रोज शाम को दुलहा हो या दुलहन के पीठी की जाती है । पीठी करते वक्‍त घर के चौक में पाट रखकर दुलहा या दुलहन को बिठाया जाता है । पीठी करने से पहले तेल चढ़ाया जाता है । तेल हम उम्र का चढ़ाता है । दुलहन के तेल कुंवारी लड़की तथा दुलहे के कुंवारा लड़का चढ़ाता है । तेल चढ़ाने वाला अपने दोनों हाथों के अंगूठों को तेल में डूवोकर पांवों के नाखूनों से शुरू करके शरीर के जोड़ों की जगह- टखना, घुटने, कमर, कन्‍धों तथा सिर पर अंगूठे रखते हुए चढ़ाता है । विनायक लाने वाले दिन एक बार, दूसरे दिन दो बार, तीसरे दिन तीन बार, चौथे दिन चार बार तथा पांचवें दिन पांच बार तेल चढ़ाया जाता है । जि‍तनी बार तेल चढ़ाया जाता है फेरों वाले दिन उतनी ही बार घी से उलटा उतारा जाता है । घी से उलटा उतारने में सिर से शुरू करके कन्‍धे, कमर, घुटनों, टखनों से पांवों के नाखूनों पर उतारा जाता है । तेल चढ़ाने के बाद ही पीठी शुरू की जाती है । पीठी पूरे शरीर पर की जाती है । दुलहन के पीठी उसकी सहेलियाँ तथा दुलहे के अपने साथी पीठी करते हैं । पीठी करते वक्‍त औरतें गीत गाती रहती है । पीठी से शरी सुन्‍दर और कोमल बनता है ।

नेत (न्‍यौत) – बड़ी बंदौली के दिन सारे मेहमान आ जाते हैं । और असी दिन नेत लिया जाता है । लड़की की शादी हो तो बड़ी बंदौली के दिन या फेरों के दिन भी नेत ली जा सकती है । अपने भाई, रितेदार या विशेष तालुकात वाले लोग नेत डालते हैं । हर घर में नेत की बही रहती है जिसमें शादी की तिथि वगैरा लिखी जाती है । बही में लिखना शुरू करने से पहले कुंमकुंम का स्‍वास्‍तिक (साखिया) बनाकर कुंमकुंम के छीटे डाले जाते हैं । स्‍वास्‍तिक के ऊपर गणेश जी का नाम जरूर लिखते हैं । दुलहा या दुलहन को पाट पर बिठाया जाता है । एक थाल में कुंमकुंम, चावल वगैरा रख दिया जाता है । नेत लेना शुरू करने से पहले नाथ, ढाडी या किसी आदमी को भेजकर मोहल्‍ले वालो को सूचित करवा दिया जाता है । जब सब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब नेत लेना शुरू किया जाता है । औरतें गीत गाती रहती है । नेत लेने में सबसे पहले भाइयों तथा बाद में रिश्‍तेदारों और मोहल्‍ले वालों का लिया जाता है । नेत में नेत लेने वाले ने जितने पैसे डाल रखे हैं उससे दुगना करके वापस डाला जाता है । उदाहरण के लिए दुलहन या दुलहे के बाप ने पचास रूपये डाले थे तो अब नेत डालने वाला वापस एक सौ रूपये डाल देते हैं । नेत के बाद पंच लोग पैसे की गिनती करते हैं । रिवाज यह है कि नेत में जितनी रकम आती है वो सारी थाल में रखकर दुलहा या दुलहन के सामने रखी जाती है और उसे कहा जाता है कि अपनी मुठ्ठी में जितने उठा सकते हैं, उठा लें । इसे मूंठ भरवाना कहते हैं ।

बंदौली – जिस दिन विनायक घर लाया जाता है उसी दिन से शाम को रोजाना बंदौली निकाली जाती है । बंदौली पीठी करने के बाद नया औरना (साड़ी) या कपड़े का पर्दा तानते हैं । कपड़े को चारों कोनों से चार औरतें पकड़ती हैं और दुलहा या दुलहन को बीच में खड़ा कर देते हैं । यदि दुलहा है तो तलवार से पर्दे को थोड़ा ऊपर उठा लेता है । दुलहा या दुलहन की बहिन या बुआ एक थाल में चावल, कुंमकुं, गुड़, जलता हुआ दीपक, जल से भरा कलश, खड़ा नमक, कपास तथा पीठी की चार गोलियाँ डाल कर दुलहा या दुलहन के पीछे चलती रहती है । बंदौली जैसे ही शुरू होती है, ढोल बजना शुरू हो जाता है । बंदौली घर के दरवाजे से शुरू होकर देवस्‍थान या फलसे तक बहुत ही धीमी चाल से जाती है । औरतें गीत गाते चलती है । देवस्‍थान या फलसे पर जाकर बंदौली रूकती है तो बहिन या बुआ दुलहा या दुलहन के सामने आकर खड़ी हो जाती है । थाल उसके हाथ में पकड़ा देती है । दोनों हाथें से थाल में से पीठी की गोलियें उठाकर उसके शरीर के जोड़ों से अर्थात् नाखून, टखनों, घुटनों, कमर, कन्‍धों तथा सिर से ऊपर होते हुए चारों दिशाओं में फैंक देती है । आरती उतारकर बंदौली वापस मुड़ती है । जिस चाल और रीति से बंदौली जाती है असी तरह से वापस लौटती है । फैरों के पहले रोज बड़ी बंदौली निकाली जाती है । बड़ी बंदौली की रात रातीजबा किया जाता है ।

बेहमाट – यदि लड़की की शादी है तो फैरों के दिन औरतें गीत गाती हुई कुम्‍हार के घर जाती है और बेहमाट लाती है । पांच मटकों का बेहमाट लाती है । कम ज्‍यादा माटों का भी लाया जा सकता है । एक जोड़ी बेहमाट लाया जाता है जो दरवाजे के दोनों तरफ रखे जाते हैं । बेहमाट के साथ बड़बेला भी लाया जाता है जो बेहमाट पर लाल और सफेद रंग की लकीरें डालकर सुन्‍दर बनाया जाता है । बेहमाट कुम्‍हार को पूरी कीमत देकर लाया जाता है । पहले कुम्‍हार को बेहमाट की कीमत नहीं दी जाती थी और कुम्‍हार का नेक होता था जिसमें शादी के बाद उसे दलिया, गुड़, घी तथा कपड़े दिये जाते थे । मगर अब यह प्रथा समाप्‍त हो गई है ।

थाम्‍भ – लड़की की शादी पर तोरण और थाम्‍भ की व्‍यवस्‍था किया जाना अनिवार्य होता है । थाम्‍भ लकड़ी का बना होता है । एक लम्‍बी लकड़ी पर चार खुटियें लगी होती है । ये लाल या गुलाबी रंग से रंगी हुई होती है । इन खुंटियों के बीच एक बड़बेला रखा जाता है और उसके ऊपर नया लाल कपड़ा लपेटा जाता है । इनको मूंज की नई रस्‍सी से बांध दिया जाता है । इस थाम्‍भ को चंवरी में अगनी कुण्‍ड के पास ही जमीन में गाड़कर खड़ा किया जाता है । दुलहा-दुलहन इस थाम्‍भ के चारों तरफ फेरे लेते हैं । शादी के बाद बरात जब वापस रवाना होती है तब दुलहा जाकर थाम्‍भ पर बंधी मूंज को खोलता है । इसे जूंण खोलना कहते हैं । उस वक्‍त दुलहे को उसकी सासु मुजरा करने में पैसे या जेवर देती है ।

तोरण – यह भी लकड़ी का बना हुआ सुथार के घर से कीमत देकर लाते हैं । आज कल तोरण कई तरह के बनाये जाते हैं । तोरण में पांच चिड़ियें बनाई हुई होती है । दुलहा जब शादी करने आता है तब तलवार से इसे वांदता है । तोरण पर तलवार से दुलहा जब हल्‍की चोट मारता है तो इस रस्‍म को तोरण वांदना कहते हैं । तोरण घर के दरवाजे के ठीक ऊपर लगाया जाता है ।

बरात – यदि लड़के की शादी है तो नेत लेने के बाद मोहल्‍ले के सभी को दुलहे का बाप बरात में चलने का व्‍यक्तिगत रूप से निवदन करता है । फरे के रोज बरात चढ़ती है, मगर दूर का मामला है तो पहले भी बरात को रवाना होना पड़ता है । मेहमानों तथा बरात में चलने वालों को बरात रवाना होने से पहले दुलहे का बाप अपने घर खाना खिलाता है । हलवा, लापसी या विशेष भोजन खिलाया जाता है । बारात चढ़ने से पहले दुलहे को चौक में पाट पर बिठाया जाता है । औरतें गीत गाती हैं । दुलहे के ऊपर नये कपड़े के चारों कोनों में मूंग, दूब, लाख तथा गुड़ डालते है तथा कपड़े के चारों तरफ कच्‍चा सूत लपेटते हैं । दुलहे के घी उतारा जाता है । घी उतारने में सिर से शुरू करके कन्‍धे, कमर, घुटनों, टखनों से पांवों के नाखूनों पर उतारा जाता है । घी उतारने के बाद पीठी की जाती है । पीठी करने के बाद स्‍नान करवाते हैं । स्‍नान सबसे पहले मां करवाती है । स्‍नान करवाने के बाद कच्‍चे सूत के धागों को हल्‍दी में रंग कर दुलहे को जनेऊ पहनाई जाती है । जनेऊ पहिनने के बाद दुलहा सांस, मदिरा का तब तक त्‍याग करता है जब तक शादी करके आने के बाद जनेऊ उतार नहीं लेता । शादी विवाह में जनऊ पहिनने का रिवाज रैगरों के अलावा राजपूत जाति में ही है अन्‍य जातियों में नहीं है । रैगरों का क्षत्रिय होने का यह एक पुखता प्रमाण है । ब्राह्मणों में जनेऊ पहिनना उनका जाति धर्म है । जनेऊ पहिनने के बाद दुलहे का सगा बड़ा जीजा दुले को हाथों में उठाकर विनायकजी के सामने लाकर बिठाता है । फिर दुलहे को शादी कपड़े पहिनाए जाते हैं । दुलहे के शादी के कपड़ों को वरी कहते हैं । पहले यह रिवाज था कि वरी लाने के लिए दुलहे का बाप अपने नजदीकि एक दो बुजुर्गों को लेकर बाजार या पास के शहर में जाकर खरीदते थे । दुलहे के साफा पहिनने का रिवाज है । साफ केसरिया या मोड़िया रंग का राजपूतों की तरह तीखा बांधा जाता है । दुलहा सफेद धोती और किसी रंग का कमीज पहिन सकता है । साफे पर पुर्रियें तथा कलंगियें लगाते हैं । दुलहा कपड़े पहिन कर तैयार हो जाता है तब पहले देवताओं को उनके स्‍थानों पर जाकर नारियल चढ़ाता है । देवत धोकने का यह रिवाज अब लगभग टूट चुका है मगर अपने इष्‍ट देव को नारियल आज भी चढ़ाते हैं । बारात चढ़ती है तब औरतें गीत गाती हैं और कपड़े का पर्दा तान कर दुलहे को घर से बाहर लाती है । ढोल बजता है । जब दुलहा रवाना होता है तब मां दुलहे को स्‍तनपान कराती है । यदि मां जीवित नहीं है तो दुलहे की बड़ी भोजाई स्‍तनपान कराती हैा इससे दो बाते स्‍पष्‍ट होती है । मां का स्‍पनपान कराने का आशय यह है कि बेटा मां का दूध लजा कर मत आना । बड़ी भोजाई का स्‍तनपान कराने का आशय यह है कि बड़ी भोजाई को मां के बराबर दर्जा दिया जाता है । दुलहा बैलगाड़ी, बस, ट्रेक्‍टर में बैठन के लिए चढ़ता है तो पांव के नीचे नारियल रख कर चढ़ता है । बरात चढ़ते वक्‍त बंदूकों से धमाके किए जाते हैं । बारात चढ़ते वक्‍त यह दृष्‍य ऐसा होता है जैसे कोई फौज हमला करने के लिए चढ़ाई कर रही हो । दुलहा बस या गाड़ी में चढ़ते वक्‍त जो नारियल पांवों के नीचे रखकर तोड़ता है उस नारियल के टुकडे़ बारात गंतव्‍य स्‍थान तक पहुंचाती है उसके बीच जहाँ-जहाँ चौराये या नदी नाले आते हैं वहाँ फेंकते जाते हैं । बारात दुलहन के गांव में पहुच जाती है और किसी मंदिर या सार्वजनिक स्‍थान पर जाकर ठहर जाति है । बारात में से एक आदमी दुलहन के घर पहुचकर बारात के आने की बधाई देता है । उससे बधूकड़िया कहते हैं । बधूकड़िये को दुलहन का बाप नारियल देता है । शाम को बारात का स्‍वागत करने की तैयार कर दी जाती है । दुलहा और बाराती सज धज कर तैयार होते हैं । दुलहन का बाप मोहल्‍ले या धड़े वालो को इकट्ठा करता है । दुलहन पक्ष के लोग जिनकों मांड कहते है बारात का स्‍वागत करने के लिए रवाना होते हैं । आगे-आगे ढ़ोल बजता चलता है । पीछे औरतें गीत गाती चलती है । दुलहन पक्ष के लोग बारात के सामने पहुचते हैं । सबसे पहले दोनौं समधी गले मिलते हैं । इसे मिलनी कहते हैं । मिलनी में दुलहन का बाप अपने समधी को चारदर ओढ़ाता है तथा सामर्थ्‍य के अनुसार पैसे देता है । सुपारी, इलायची से बरातियों का सत्‍कार किया जाता है । बारातियों पर गुलाब डालते हैं । दुलहे की सास एक थाल मं जलता हुआ दीपक, काजल, कुंमकुंम, गुड़, एक रूपया कलदार तथा पानी का भरा कलश रखकर दुलहे को टीकने जाती है । सास कलदार रूपये से कुंमकुंम का दुलहे की ललाट पर टीका लगाती है । दुलहे के मुंह में गुड़ देती है और कलश से आरती उतारती है । सास थाल दुलहे के सामने छोड़ आती है । दुलहा थाल में सवा रूपया डालता है और थाल वापस लोटा दिया जाता है । इस समय औरतें अपने सगों और बारातियों को गीतों के जरिये मीठी गालियाँ सुनाती हैं । थाल लौटाने के बाद औरतें दुलहन के घर के दरवाजें पर पहुँच जाती है । दुलहा अपने जीजा के साथ तोरण पर जाता है । सबसे आगे एक कुंवारी लड़की बड़बेला सिर पर उठाए खड़ी होती है । उसमे दुलहा सवा रूपया डालता है । इसके बाद दुलहा तलवार से तोरण वांदता है । औरतें गीत गाती हैं । तोरण वांदने की रस्‍म पूरी होने के बाद औरतें घर में चली जाती है और दुलहा वापस अपनी बारात में जाकर बैठ जाता है । दुलहन पक्ष के पंच बारात के सामने बैठ कर लागभाग देते लेते हैं । पहले बेटी का बाप बेटे के बाप से पैसे लेता था । जिसे व्‍यवहार लेना कहते थे, मगर अब यह रिवाज उठ गया है । अब बेटी का बाप बिना पैसे लिए बेटी का विवाह करता है जिसे धर्म विवाह कहते हैं । रैगरों में धर्म विवाह की प्रथा है । लागभाग का लेन देन पूरा होने के बाद बारात को ढ़ोल बजाते हुए दुलहन का बाप अपने घर लाता है । दुलहन का बाप बारत वालों को उनके ठहरने का स्‍थान बता देता है जिसे जनवासा या डेरा कहते हैं । बारात दुलहन के घर पहुँचते ही बारातियों का खाना खिला दिया जाता है । दुलहा भी खाना खा लेता हैं । खाना खाकर बाराती जनवासा चले जाते हैं । वहाँ उनके ठहरने की व्‍यवस्‍था होती है ।

कनाल – मांड में दुलहन के सगे भाई, बहिन, माँ, बाप, मामा, मामी, बुआ वगैरा फेरे होने के बाद खाना खाते हैं । इस रस्‍म को कनाल कहते हैं ।

पडला – बारात के खाना खाने के बाद दुलहन पक्ष वाले पडला मांगते है । फेरों के वक्‍त दुलहे के घर से लाये कपड़ों को पहिन कर ही दुलहन फेरे लेती है । पडले में दुलहन के कपड़े – लहंगा, ब्‍लाउज, ओरना (साड़ी) एवम् श्रृंगार का सामान – कांच, कंगा, टीकी, नेल-पोलिस, लिपस्टिक, काजल की डिब्‍बी, रिबन वगैरा एक थाल में भरे पतासे और खारकों के उपर रखे जाते हैं । दुलहन के बांधने का मोड़ तथा पावभर मूंग भी रखे जाते हैं । इसके अलावा बबूल की छाल, लकड़ी की दो डिब्बियाँ, खजड़ी के गटुकडें तथा आंधा झाड़ा के सीकें भी रखी जाती है । पडला दुलहन के घर पहुँचते ही दुलहन को तैयार करते हैं । सबसे पहले घी उतारते हैं । घी उतारने का वही तरिका है जो दुलहे का होता है । घी उतारने के बाद पीठी करके स्‍नान करवाया जाता है । दुलहन पडले में लाये कपड़े पहिन कर श्रृंगार करती है । तैयार होकर दुलहन विनायकजी के सामने बैठ जाती है । मोड़ बांध दिया जाता है । दुलहा आता है और दुलहन के दायीं तरफ बैठ जाता है । दुलहे का जीजा या दुलहन की बहिन पल्‍ला छेड़ी बांध देते हैं । पल्‍ला छेड़ी एक लम्‍बा सफेद कपड़ा होता है जो दुल्‍हे के घर से लाया जाता है । इस कपडे़ के दोनों सिरों को हल्‍दी से पीला रंगा जाता है । दुलहे का जीजा दुलहे की पीठ पर हल्‍की-सी थपकी मारता है । यह उठकर खड़े होने का संकेत होता है । दुलहा खड़ा हो जाता है । दुलहन भी खड़ी जाती है । दुलहा आगे तथा दुलहन पीछे धीरे-धीर चलकर चंवरी में आकर बैठ जाते हैं । दुलहन-दुलहे के बाये तरफ बैठती है ।

फेरे – फेरे लगने से पहले दुलहन का मामा एक सफेद कपड़ा लाकर दुलहन को ओढ़ाता है । चंवरी में हवन कुण्‍ड बना हुआ होता है । हवन कुण्‍ड के चारों कोनों में गलाबी रंग की चार खुंटियाँ लगी हुई होती है और उनके चारों तरफ मोली (कच्‍चा सूत) लपेटी होती है । थाम्‍भ चंवरी के पास खड़ा किया जाता है । ब्राह्मण दुलहा-दुलहन से हवन करवाता है । रैगरों में विवाह गौड़ ब्राह्मण करवाते हैं जो भाकरोटा जिला जयपुर से आते हैं । विवाह में पहले दुलहन का बाप दुलहे के दायीं हाथ की हथेली में मेंहन्‍दी लगाकर हाथ पीले करता है फिर हाथ पीले करने के बाद ब्राह्मण हथलेवा जुड़वाता है । हथलेवा में दुलहा दुलहन के मेंहन्‍दी लगे दायें हाथों की हथेलियों को एक-दूसरे के उपर रखकर रूमाल या कपड़े से बांध देता है । हथलेवा में दुलहे का हाथ उपर तथा दुलहन का हाथ नीचे रखा जाता हैं । फिर दुलहा दुलहन को खड़ा कर ब्राह्मण फेरे दिलवाता है । औरतें फेरों के गीत गाती है । फेरे थाम्‍भ और हवन कुण्‍ड के चारों तरफ दिलवाये जाते हैं । फेरों में पहले दुल्‍हन आगे रहकर चार फेरे लेती है । दुल्‍हन के चार फेरे पूरे होते ही दुल्‍हे को आगे करके तीन फेरे और दिलवाये जाते हैं । इस तरह रैगरों में सात फेरों से अग्नि की साक्षी में विवाह होता है । फेरे खत्‍म होते ही दुलहा-दुलहन को वापस चंवरी में बिठा दिया जाता है और ब्राह्मण हथलेवा खोल देता है । दुलहन का बाप श्रद्धानुसार ब्राह्मण को हथलेवा खोलने का दान देता है । इसके बाद दुलहा-दुलहन को देवस्‍थान के सामने ले जाकर बिठा दिया जाता है । पल्‍ला छेड़ी खोल दी जाती है । पल्‍ला छेड़ी दुलहन की बहिन या दुलहे का जीजा खोलता है । इसके बाद कांसा पलटने की रस्‍म होती है । दो कांसी की थालियों में भोजन परोस कर लाते हैं । एक थाली दुलहन के सामने तथा दूसरी दुलहे के सामने रखी जाती है । रस्‍म के अनुसार दुलहा अपने सामने की थाली दुलहन के सामने तथा दुलहन अपने सामने की थाली दुलहे के सामने रखती है । इसे कांसा पलटना कहते हैं । दुलहा-दुलहन देव स्‍थान के सामने से उठ जाते हैं । घर के चौक में दोनों दूरी पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो जाते है और दोनों के बीच कपड़े का पर्दा खींच दिया जाता है । दुलहा तथा दुलहन अपने हाथों में आका मूंग लेकर एक-दूसरे पर जोर से फैंकते है । फिर दुलहा जनवासा चला जाता है ।

पग धोवाई – दहेज देने की रस्‍म को पग धोवाई कहते हैं । रैगर जाति में दुलहे का बाप दहेज के लिए न तो पहले से ही कोई शर्तें रखता है और न दहेज मांगता है । दुलहन का बाप अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार दहेज देता है । इतना अवश्‍य है कि हर बेटी का बाप अपनी सामर्थ्‍य से भी ज्‍यादा दहेज देने की कोशिश करता है । इस रस्‍म में दुलहे को बुलाकर दुलहन के साथ पल्‍ला छेड़ी बांध कर खाट पर बिठा दिया जाता है । दुलहे को उसी खाट पर बिठाया जाता है जिस खाट को दहेज में दिया जाता है । दुलहन को खाट के पास रखे पाट पर बिठाया जाता है । दुलहन दुलहे के बायीं तरफ बैठती है । बैठने के बाद दुलहन के मामा का दिया हुआ एक सफेद कपड़ा दुलहा और दुलहन दोनों के पांवों पर डाल देते हैं । मिट्टी या पीतल के एक बर्तन में पानी डालकर उसमें हल्‍दी डाली जाती है । उसमें नीम की एक छोटी-सी टहनी रखी जाती है । दुलहन का बाप दुलहन को दिया जाने वाला सोने-चांदी का जेवर एक थाल में डालकर दलहे के हाथ में रख देता है । थाल में जवर के अलावा कुंमकुंम तथा दहेज में दिया जाने वाला लोटा रखा जाता है । दुलहन के नजदीकी रिश्‍तेदार बारी-बारी से आते हैं और दहेज में जेवर या पैसे देने होते हैं वो थाली में डालते जाते हैं तथा थाली में रखे कुंमकुंम से दुलहे के ललाट पर टीका तथा दुलहन के मोंड़ पर तिलक करते हुए नीम के झवरे (टहनी) से दुलहा तथा दुलहन के पांवों पर हल्‍दी के पीले पानी से छींटे डालते हैं । दुलहन के सभी रिश्‍तेदार पग धोवाई कर लेने के बाद दुलहन का जीजा दुलहे के हाथ में रखी थाली को लाकर पंचों के सामने रखता है । दुलहा दुलहन उठ कर जनवासा चले जाते हैं । ढोल बजता है तथा औरतें गीत गाती हुई दुलहा दुलहन को जनवासा पहुंचाती है । पंच दहेज में दिए गए सोना, चांदी के जेवर, फर्निचर, कपड़ों, बर्तनों आदि तमाम चीजों की कीमत आंकते हैं । फिर थाली जनवासा पहुंचा दी जाती है । थाली दुलहन का जीजा पहुंचाता है । बरात वाले दहेज की कीमत आंकते हैं । जनवासा में नाचगान होने के बाद दुलहन औरतों के साथ वापस अपने घर आ जाती है ।

जान पछेवड़ी – इसे जान पहरानी या जान ओडाणी भी कहते है । पगधोवाई के बाद दुलहन का बाप बरातियों को अपने घर बुलाकर जान पछेवड़ी करता है । दुलहन का बाप प्रत्‍येक बराती को अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े, बर्तन या पैसे देता है । इस समय दुलहा एवम् उसके पिता व परिवार के सदस्‍यों को दूसरे बरातियों की तुलना में अच्‍छे कपड़े करने का रिवाज है । जान पछेवड़ी के बाद दुलहन का बाप अपनी बेटी को विदा कर देता है । औरतें बिदाई के गीत गाती हैं । बरात की विदाई के वक्‍त दुलहन के बाप के घर से केसरिया या गुलाबी रंग सभी बारातियों पर डालते हैं । बरात दुलहन को लेकर अपने घर पहुँचती है । बराती सभी अपने घरों में चले जाते हैं । मगर दुलहा और दुलहन अपने मोहल्‍ले में बने मंदिर या पड़ौस के घर में जाकर बैठ जाते हैं । दुलहे के घर से औरतें ढोल ढमाके के साथ गीत गाती हुई आती है । दुलहे की मां एक थाल में पानी भरा कलश, कुंमकुंम, गुड़, चावल, कलदार रूपया लेकर जाती है । दुलहा-दुलहन पल्‍ला-छेड़ी बांधे हुए खड़े होते हैं । दुलहे की मां अपने लाडले बेटे को कलदार रूपये से कुंमकुंम का टीका लगाती है तथा दुलहा व दुलहन के मुंह में गुड़ देती है । कलश से दोनों की आरती उतारती है । ढोल बजाते हुए नाच गानों के साथ दुलहा-दुलहन को अपने घर लाते हैं ।

बार रूकवाई – रस्‍म रिवाज के अनुसार घर के चौक में चौका देकर गेरूं तथा चुना व कली से स्‍वास्‍तिक बनाया है । दुलहा दुलहन के पांव बनाये जाते हैं । इन पांवों पर दुलहा दुलहन को खड़ा किया जाता है । दुलहन दुलहे के बायीं तरफ खड़ी रहती है । दुलहे की बहिनें तथा बुआ वगैरा उनके सामने खड़ी होकर शादि के बाद प्रथम बार घर में प्रवेश करने की खुशी के उपलक्ष्‍य में पैसों की मांग करती है । दुलहे का बाप अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार पैसे देता है तब दुलहा दुलहन को घर में जाने देते हैं । इस रस्‍म को बार रूकवाई कहते है । दुलहा दुलहन विनायकजी के सामने जाकर बेठ जाते हैं तथा पल्‍ला-छेड़ी खोल देते हैं । दुलहा दुलहन अपने से बड़ो के चरण स्‍पर्ष कर आर्शिवाद लेते हैं । रात को रातिजगा होता है जिसमें मोहल्‍ले की सारी औरतें इकट्ठी होकर पूरी रात गीत गाती है । रातिजगा में रात भर दीपक जलाया जाता है । दूसरे दिन सुबह मोहल्‍ले की औरतों के साथ दुलहा दुलहन देवत धोकने जाते है । इसे जातें देना भी कहते हैं । आजकल यह रिवाज प्राय: खत्‍म हो गया है । इसके बाद अन्‍य जातियों की तरह सुहागरात की रस्‍म होती है ।

गोणा – इसे मुकलावा भी कहते हैं । विवाह के एक साल बाद गोणा किया जाता है । लड़का लड़की बड़ी हो तो साल भर से भी पहले गोणा कर दिया जाता है । गोणा में पति अपने एक दो साथियों के साथ ससुराल जाता है । शादि के बाद प्रथम बार दुलहे का ससुराल जाना होता है । ससुराल वाले अपने दामाद तथा उसके परिवार वालो को अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े देते हैं । पति अपनी पत्‍नि को लेकर घर आ जाता है ।

जांमणा – लड़की का बाप चाहे कितना ही गरीब हो मगर अपनी लड़की की पहली डीलिवरी अपने घर पर ही लाकर करवाता है । इसका सारा खर्चा लड़की का बाप ही उठाता है । पहला बच्‍चा होने के बाद पति अपनी पत्नि को लेने ससुराल आता है तब ससुर अपने दामाद तथा संमधी वगैरा को कपड़े करता है । जांमणा में लड़की का बाप अपनी लड़की को कपड़े तथा बच्‍चे को पालना तथा छोटा मोटा सोने-चांदी का जेवर पहिनाता है । यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्‍लेखनिय है कि पहला बच्‍चा होने के बाद लड़की अपने ससुराल आती है तब अपनी सास, ननद, जेठाणियों तथा देराणियों के लिए सूंठ के लड्डू जो स्‍वयं ने जापे में खाये हैं उसी में से बचाकर लाकर बांटती है ।

मायरा – इस रस्‍म को मामेरा भी कहते हैं । भाई अपनी बहिन की लड़की (भांजी) के विवाह के मोके पर मायरा लाता है । अपनी लड़़की की शादी के मोके पर बहिन अपने भाई को देने के लिए शादी की पत्रिका (कार्ड) के साथ गुड़ की एक भेली ले जाती है । इस रस्‍म को बत्‍तीसी लाना कहते हैं । बहिन बत्‍तीसी लाती है तब भाई मोहल्‍ले के को इकट्ठा करके गुड़ की भेली ले लेता है । इसका स्‍पष्‍ट संकेत होता है कि भाई मायरा जरूर लायेगा । बहिन बत्‍तीसी लाती है और भाई लेने की स्‍थ‍िति में नहीं होता है तो इंकार कर देता है । बहिन अपने भाई को मायरा लाने के लिए अपने मुंह से कभी नहीं कहती है मगर विवाह में आने का निमंत्रय अवश्‍य देती है । बत्‍तीसी लेने के बाद मामा अपनी भांजी के विवाह के रोज अपने नजदीक रिश्‍तेदारों के साथ वहाँ पहुँच जाता है । मायरा में औरते जरूर आती है । औरतें मायरा के गीत गाती हुई जाती है । ये वहाँ पहुँच कर मोहल्‍ले के मंदिर या फलसे पर जाकर बैठ जाते हैं । बहिन को सूचना मिलने पर मोहल्‍ले के आदमियों और औरतों के साथ ढोल बजाते हुए, गीत गाते हुए स्‍वागत के लिए जाती है । ब‍हनोई (बहिन का पति) एक परात में गेहूँ का दलिया जिस पर गुड़ की एक भेली रखकर ले जाता है तथा बहिन एक थाल में कुंमकुंम, चावल, गुड़ तथा पानी से भरा कलश ले जाती है । बहिन अपने भाई तथा उसके साथ आने वालों के कुंमकुंम से तिलक करती है । बहनोई दलिया व गुड़ से भरी परात मायरा वालों को सोंप देता है । इसे वापस बहनोई के घर पहुँचा दी जाती है । बहिन बाप व भाईयों के मुंह में गुड़ देती है तथा आरती उतरती है । मायरा में आने वालों को बहिन की तरफ से प्रत्‍येक को एक एक चोटी वाला नारियल दिया जाता है । इस मौके पर भाई अपनी बहिन तथा बहनोई को सामर्थ्‍य के अनुसार कपड़े और पैसे देता है । बहिन अपनी माँ तथा अन्‍य औरतों के गले मिलती है । फिर ढोल बजाते हुए मायरा वालों को बहिन अपने घर लाती है । बहिन के घर से थाल मंगवाकर भाई उसमें पैसे तथा जेवर रखता है । पंच लोग उसकी कीमत आंकते हैं । पैसों व जेवर सहित थाल बहिन के परिवार वालों को सोंप दिया जाता है । बहिन के सास, ससुर तथा उसके परिवार को कपड़े ओडाये जाते हैं । मायरा ओडने के बाद बहिन एक समय का भाई को खाना खिलाती है जिसे मामा भात कहते हैं । बारात जाने के बाद मायरा को भी रवाना कर दिया जाता है ।

गंगा प्रसादी – इसे मृत्‍यु भोज भी कहते हैं । मरने के 12 दिन के अंदर मृतक की ओलाद अपने पूर्वजों की अस्थियें लेकर हरिद्वार जाकर प्रवाहित करता है । तथा वापस आते समय गंगा जल की झारी लाता है । मुंडन करवा कर आते हैं । गले में गंगा जी की माला पहिन कर आता है तथा हाथ में बेत की लाठी लाता है । हरिद्वार से वापस आने पर गंगा जल को ढोल बजाकर गीत गाते हुए घर लाते हैं । उस रात रातिजगा होता है जिसे ‘रात डांगड़ी’ कहते हैं । दूसरे दिन औरतें गंगा जल की झारी सिर पर उठाकर ढोल ढमाके के साथ पथवारी पर जाती है । हरिद्वार जाते वक्‍त अनाज के दाने मिट्टी की कुंडियों में डालकर जाते है जो वापस आने तक उग जाते है । इसे पथवारी कहते हैं । पथवारी घर से थोड़ा दूर पिपल, बड़ या नीम के पेड़ के नीचे बनाई जाती है । पथवारी की पूजा करके उस पर एक लाल कपड़ा डाल देते हैं । पथवारी पूजन करके वापस आकर हवन कुंड जो घर के चौक में या बाहर बना हुआ होता है, उसके पास बैठ जाते हैं । ब्राह्मण हवन करवाता है । हवन में मृतक के बेटे, पोते सपत्निक बैठते हैं । हवन के बाद गंगा जल की झारी ब्राह्मण खोलता है । उस समय सभी उपस्थित लोग गंगा माता की जय जय कार करते हैं । ब्राह्मण पवित्र गंगा जल को उपस्थित सभी पर फैंकता है । गंगा प्रसादी के मौके पर मृतक के सभी रिश्‍तेदार आते हैं । हरिद्वार से कंठी मखाणा लाते हैं । जिसे प्रसाद के रूप में सभी रिश्‍तेदारों तथा मोहल्‍ले वालों में बांटते हैं । मृतक के रिश्‍तेदार कपड़े लाते हैं । जो संबंधित को ओडाकर चले जाते हैं ।

मृत्‍यु संसकार – पहले जालाणी जाति रैगरों के मृत्‍यु संसकार करवाती थी मगर अब उन्‍होंने अपना परम्‍परागत धंधा छोड़ दिया है । रैगरों में भी मृत्‍यु संसकार अन्‍य हिन्‍दु जातियों की तरह ही होता है । रैगरों में शव को जलाने की प्रथा है ।

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत ‘रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति’)

1. गीतों का वर्गीकरण :- रैगर जाति के गीत त्‍यौहारों और पर्वों से जुड़ी कथाओं की अभिव्‍यक्ति है । ये गीत ‘रजवाड़ों के गीत’ नहीं है इसलिये ये गीत महलो, हवेलियों, किलों की चारदिवारियों में नहीं पनपे । ये गीत हंसी-खुशी, क्रोध-करूणा, मिलन-बिछोह जैसी भावनाओं को स्‍पष्‍ट बताते है । रैगर जाति में गाये जाने वाले लोकगीतों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है । पहले भाग में ऐसे गीत है जिनका मूल तत्‍व भक्ति रस है । इस वर्ग में राम, कृष्‍ण, शंकर, हनुमान, गणेश तथा अन्‍य लोकप्रिय देवी देवताओं जैसे भैरू जी, भेमिया जी, रामदेव जी के कीर्तिमान सम्‍बन्‍धी और कबीर, मीरा आदि संतों की छाप के लोकभजन गाये जाते है जैसे- ‘रींगस का भैरू लाडला, म्‍हारी अरज सुनलो कांइ रे’ तथा ‘हेलो म्‍हारे सुनियो रे बाबा रूणीचे रा नाथ, हुकम देवो तो धणी रे आउंला दरबार, म्‍हारो हेलो सुणो जी रामा पीर’ ।

दूसरे भाग में वे गीत आते हैं जो रैगर जाति की जीवन क्रियाओं, प्रणय, ऋतुओं, पर्वों, त्‍यौहारों आदि विषयों पर आधारित होते हैं । सास-बहु, समधी-समधन, ननद-भौजाई, ननदोई-देवर, भाभी, बड़सासू के रिशतों पर गाये जाने वाले गीत भी इसके अंतर्गत आते हैं जैसे – ‘तीन पाव का चांवल-रांद्या, बांदरा खागा, तो सूं भाग्‍यों जाय तो भाग, घर में बांदरा आगा, रे बैरी पावणा आगा’ । तथा ‘भाया की बड़ सासू रै, दो दन रहजा पावणी, थारे कड्यां घड़ा द्यू रे ।’ इस भाग में संस्‍कारों के गीत भी सम्मिलित किये जा सकते हैं । जन्‍म-मरण व लौकिक 16 संस्‍कारों पर ये गीत जैसे तेल, हल्‍दात, घोड़ी, बन्‍ना-बन्‍नी, मेहंदी, पीला उढाना, कामण, तो‍रणियों, बधावा इसी वर्ग में आते हैं । ये सभी गीत संस्‍कारों के गीतों की श्रेणी में आते हैं जैसे – ‘उंचलिये मंगरे री मेंहदी, जैसाणे री ढेल, म्‍हारी मेहंदी रंगी राचणी ।’ तथा ‘खातीडा रा बेटा चतुर सुजान, तोरणियां घड़ल्‍या द, महाने चंदन कके रे रूख रो हो राज ।’ ये गीत जिन रागों पर आ‍धारित होते हैं उनमें पहाड़ी, दुर्गा, भूपाली, सारंग, पीलू, गारा, झिझोटी देश, सोरठ, मांड, काफी, खमाज तथा तिलककामोद प्रमुख है जैसे ‘गोरी थारे श्‍याम को परवाणों आयो रे, परवाणो आयो रे, संदेसो आयो रे’ ।

तीसरे भाग में अलग-अलग राग के अशुद्ध मिश्रण पाये जाते हैं जो प्राय: दुर्गा, पहाड़ी तथा भूपाली में अपने ही ढ़ंग से गाये जाते हैं । इस रीति से गाये जाने वाले गीतों की धुनों को आसानी से नहीं पकड़ा जा सकता । इन गीतों की मधुरता अपने आप में बड़ी ही मिठी होती है ।

2. भाषाओं और बोलियों पर आधारित गीत :- रैगर जाति के लोग राजस्‍थान के विभिन्‍न जिलों में निवास करते हैं अत: वहां की बोली वाले लोकगीत भी उन्‍होंने अपना लिये है । हाड़ौ‍ती, मवाड़ी, ढूंढारी, मारवाड़ी, शेखावटी, बागड़ी व बृज आदि विभिन्‍न आंचलिक भाषाओं के आधार पर इनका वर्गीकरण किया जा सकता है । हर बारह कोस पर बोली तथा पानी बदल जाता है इसीलिए रैगर जाति के गीतों के बोल तथा धुनों में भी थोड़ा अन्‍तर आ जाता है । इन गीतों में भूगोल का भी प्रभाव पड़ा है । इसके अलावा जिस स्‍थान में रैगर जाति के लोग रहते हैं वहां की महत्‍वपूर्ण घटनाओं और नये संचार साधनों को भी अपने गीतों में समावेश कर लिया गया है । राजस्‍थान में कौन-कौन से भाग में कौनसा मौसम हितकारी है के सम्‍बंध में एक दोहा प्रचलित है – सीयाले खाटू भली, उन्‍हाले अजमेर, जोधाणी नित को भलो, सावण बीकानेर । मोटे तौर पर रैगर जाति के गीतों के निम्‍न आंचलिक भेद माने जा सकते हैं :

1. ढूंढाड़ी : जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर का एक भाग ।
2. हाड़ोती : कोटा, बूंदी, झालावाड़ ।
3. मेवाड़ी : उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्‍तोड़गढ ।
4. मारवाड़ी : जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, नागौर ।
5. मेवाड़ी : अजमेर, ब्‍यावर, किशनगढ़ ।
6. सिरोही : आबू अंचल के गीत, बागड़ी भी, गुजराती भी ।
7. पूर्वाचंल के गीत : करौली, भरतपुर, धोलपुर, कोटा कुछ भाग, अलवर जिले का कुछ भाग, सवाई माधोपुर जिले का एक भाग ।
8. मेवाती क्षेत्र : अलवर जिला, भरतपुर का कुछ क्षेत्र, सवाई माधोपुर जिले का एक भाग, हरियाणा का एक भाग ।
9. उत्तर पश्चिमी राजस्‍थान : जिसमें पुराने बीकानेर डिवीजन तथा शेखावटी व तोरावटी के बीच में रहने वाले रैगर जाति के गीत : सीकर, झुंझुनूं, चूरू, बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़ तथा हरियाणा का एक भाग ।
10. दिल्‍ली के रैगर गीत : दिल्‍ली में रैगर जाति के लोग आकर बस गये थे फिर उनके गीतों में राजस्‍थानी भाषा का ही बोलबाला रहा ।
11. सिंध से आने वाले रैगर जाति के गीत :
आजादी और भारत विभाजन से पहले रैगर जाति के लोग सिंध पाकिस्‍तान में रहते थे इसलिए अनके गीतों में सिंधी भाषा के बदले राजस्‍थानी भाषा ही का पुट हुआ करता था । अब इस सम्‍बंध में कुछ भी जानकारी मिलना मुश्किल हो गया है ।
12. पंजाब के रैगर जाति के गीत : पंजाब में भी रैगर जाति के लोग रहते हैं उनके गीतों में पंजाबी भाषा का ही बाहुल्‍य है ।

3. प्राचीन गीत : रैगर समाज के प्राचीन गीतों के बारे में अब बहुत कम जानकारी उपलब्‍ध है । ये वो गीत थे जो रैगर महिलायें विभिन्‍न उत्‍सवों पर गाया करती थी । ये गीत तत्‍कालीन स्थितियों को बताते थे । मुझे अच्‍दी तरह याद है जब मेरी माताजी स्‍व. श्रीमती खेमली देवी रछोया मुझे बचपन में कई गीत सुनाया करती थी । इन गीतों में एक गीत आज भी मेरे मन: स्‍थल पर विद्यमान है :-

”पीतल की चिमनी में, मटिया को डाल्‍यो तेल ।
वा तो जूपैगी रंगमहल में, सारी रात ।।
डट जा ऐ रेल भवानी म्‍हारा मारूजी को आयो देस ।
मैं तो डाटी ना ही डटूंगी, डटूंगी अजमेर ।।

इस गीत से स्‍पष्‍ट होता था कि उस समय रेल राजस्‍थान में प्रारम्‍भ ही हुई थी परन्‍तु वह अजमेर जैसे बड़े स्‍टेशनों पर ही रूका करती थी । इसके अलावा उस जमाने में रोशनी चिमनी में मिट्टी का तेल डालकर ही की जाती थी । तब तक बिजली नहीं आई थी ।

इसी प्रकार उस जमाने में रैगर महिलायें सुबह-सुबह दो पाटों वाली पत्‍थर की चक्‍की पर आटा पीसती हुई, शाम को एकत्रित होकर शुभ अवसर पर राति जगा करते हुए मेलों आदि पर हरजस और भजन गया करती थी । मुझे मेरी सास माता जी स्‍व. श्रीमती रामदेवी खोरवाल के द्वारा गाये गये हरजस गीत आज भी याद है जो निन्‍न प्रकार से थे :

गया रे काला केश, धोळा न तज रे, थारी उम्र बीती जाये, भज्‍ये लो कद रे ।।
थारी परणी छोड़ी प्रेम कदर थारी ना ही रे, झूठ कपट ने छोड़, रा नै भज रे ।।
थारी उम्र बीती जाये, भज्‍य लो कदरे ।।
थारी बहुआ छोड़ी लाज, शर्म गई तज रे । थारो बेटा बोल्‍या बोल, मरे रो कदरे ।।
तू झूंठ कपट न छोड़, राम नै भज रे । थारी उम्र बीती जाये, भज्‍ये लो कदरे ।।

”भाई रै मत दे मायड़ ने दोष, कर्मा री रेखा न्‍यारी न्‍यारी ।
एक मायड़ रै बेटा चार, चारां ही रेखा न्‍यारी न्‍यारी…… ।।
उस जमाने में रैगर छैल छबीले नवयुवक भी मैलों में निम्‍न प्रकार गीत गाये थे :-
”टाटा गैन्‍दाला री छोरी गंगली, तूनै लेर तो चालुगो ऐ, तूनै लेर तो चालुंगो रे ।।

4. रैगर जाति में गाये जाने वाले गीत : रैगर जाति में आजकल विभिन्‍न अवसरों पर गाये जाने वाले कुछेक गीत निम्‍न प्रकार से है :-
       1. विनायक (राग:पीलू /ताल:दीपचन्‍दी) : रैगर जाति में विवाह उत्‍सव का प्रारम्‍भ गणेश जी को नौतने से प्रारम्‍भ होता है । विवाह का कार्ड अथवा हल्‍दी में किये गये पीले चावल का न्‍यौता गणेश जी को दिया जाता है । तेल की रस्‍म के दिन तेल में पुड़ी और गुड़ के मीठे पूये तल कर एक लौहे के सुये में पिरो कर घर में बनाये गये गणेश जी के सामने रखते हैं । गीतों में विवाह का कार्य निर्विघ्‍न समाप्ति की प्रार्थना की जाती है:-

‘छाजे रे छाजे नौबत बाजे, म्‍हारे घर आणंद बधावो विनायक, छाजे रे छाजे ।
कंवर लाडलड़ा रो बिड़द उपाई, रणत भंवर सूं आवो विनायक, छाजे रे छाजे ।

      भवार्थ : मरे घर के द्वार पर शहनाई व नगाड़े बज रहे हैं । हे गणेश जी ! मेर घर पर पधारे तथा कार्य साधकर लाडले कुंवर की कीर्ति बढावें ।
       2. आज बागां में रिमझिम हो रही (राग : शिवरंजनी/ताल: कहरवा) : प्रस्‍तुत गीत अलवर जिले में गया जाता है । सावन में नवविवाहित लड़की को ससुराल में चूंदड़ी भेजने का पुराना रिवाज़ है :-

आज बागां में, रिमझिम हो रही जी, आयो म्‍हारी मां को जायां बीर,
हीराबंद लियायो चूंदड़ी जी । आज ………..
जैरे पहरूं तो मोती झर पड़े, बुगचे धरूं तो तरसे जीव,
सादी क्‍यूं न लयायो चूंदडी जी ।। आज …….
थारी तो बधियों रे बीरा बेलड़ी जी, अमर रहो रे थारी काय,
पंचा में उंचा तैकरी जी ।। आज…
थारी तो बधियों रे बीरा बेलड़ी जी,
अमर रहो रे थारो मान । भायां में उजली तैं करी जी ।

      भावार्थ : आज पावन काल में मेरा भाइ्र मेरे लिये चूंदड़ी लाया है जो हीरों से जड़ी हुई है । यदि इसे पहनती हूं तो इसके हीरे झड़झड़ पढ़ते हैं । यदि उतारकर रखती हूं तो जी तरसता है कि भाई द्वारा लाई चूंदड़ी क्‍यूं नहीं पहनी । ऐ भाई, तेरी वंश बेल बढ़े तूने मेरा नाम ऊंचा रखा । तूने समाज में मेरी बात रखी है, जात विरादरी में मेरी प्रतिष्‍ठा रखी है । हे भाई तेरी काया, तेरा नाम अमर रहे ।
       3. खा गयो बैरी बीछूड़ो (राग : तिलक कामोद/ताल : कहरवा) : बचपन में यह गीत मैंने दिल्‍ली के टूंट्या में रैगर महिलाओं के मुखारविन्‍द से सुना था । यह मनमोहक भावनाओं का मोहक चित्रण है ।

”मैं तो मरी होती राज मरी होती, खा गयो बैरी बीछूड़ो,
बीछूड़ो डंक लगाय गयो सा, खा गयो बैरी बीछूड़ो,
आगे आगे चाले म्‍हारै वैद जी को लड़कों,
पाछा सूं आया म्‍हारा प्‍यारा लखपतियां, खा गयो बैरी बीछूड़ों,
वैद जी बुलाया म्‍हारे डाक्‍टर आया, पाछा सा आया म्‍हारे ससुरो सा,
पिलगां पर बैठे म्‍हारे वैद जी को लड़को,
फरसा पर बैठे म्‍हारा आलीजा, खा गयो बैरी बीछूड़ों,
नाड़ी तो देखे म्‍हारे वैद जी को लड़को, टप टप रोवै म्‍हारा आलीजा,
म्‍हारे परणेतो कब्‍जा ने लाहड़ी पहरेगी । खा गयो बैरी बीछूड़ों,

      भावार्थ : पत्‍नी को विषैले बिच्‍छू ने डस लिया है अपना मरण निश्चित समझती हुई यह कह रही है कि मैं पति, ससुर सबकी लाड़ली हूं । मुझे बचाने के प्रयत्‍नों में सम्‍मानित वैद्य, डाक्‍टर, हकीम सभी लगे हुए हैं लेकिन मेरा बचना न हो । मेरे प्रियतम को कोई बछुआ कह कर न चिढ़ावे अत: मैं उन्‍हें दूसरे विवाह की सलाह दे रही हूं तथा मेरी इच्‍छा है कि मेरी शादी के समय के वस्‍ताभूषण मेरे बाद में आने वाली पत्‍नी को पहना दे ।
       4. उड़ जाऊंगी मां पांख लगाय (राग:तिलक कामोद/ताल:कहरवा) : रैगर बालिका अपनी मां से कहती है कि मां मुझ से कोई भी ईष्‍या क्‍यों रखे क्‍योंकि हम तो परदेशी चिड़िया है, पंख लगाकर उड़ जाने वाली है ।

उड़ जाऊं ओरी मां पांख लगाय, चली जाऊंगी री मां पांख लगाय,
थोड़ा सा दणा री पावणियां, म्‍हारा दादा जी गढ़ावे सोना सांकलयां,
म्‍हारी जीजा हो राज, मूड़े तो बोल, अम्‍बर जैसी कोयलड़ी ।
म्‍हारी काकाजी गढावे, सोना बोरला,
म्‍हारी काक्‍यां हो राज, मूड़े तो बोल हें परदेशी चिड़कल्‍यां ।
म्‍हारी बीराजी मढ़ावै सोना झूठण्‍या, म्‍हारी भौजायां हो राज, मूड़े तो बोल,
अम्‍बर जैसी कोयलड़ी, म्‍हारा पड़ौसी चढ़ावै सोना टेवट्या,
म्‍हारी पड़ोसन हो राज, मूड़े तो बोल, महें परदेशी चिड़कल्‍या ।

      भावार्थ : ओ मेरी मां पंख लगा के उड़ जाऊंगी । मैं थोड़े से दिनों की मेहमान हूँ । मेरे दादाजी, काकाजी, भाईजी, पड़ोसी मेरे विवाह में देने हेतु क्रमश: सोने की जंजीर, झुठलिया आदि जेवर घड़वाये हैं लेकिन मेरी काकी, भाभी, पड़ोसिन तथा मां ने इस पर अप्रसन्‍नता प्रकट की तथा मुझ से बाली भी नहीं । ओ मेरी मां मुझसे मुंह से तो बोल मैं परदेशी चिड़िया हूं, फुर्र से उड़ जाऊंगी । गांव में कन्‍या, न केवल उसके माता पिता को सभी को प्‍यारी लगती है ।
       5. कोयल बाई सिध चाल्‍या (राग: वृन्‍दावनी सांरग/ताल: दीपचन्‍दी) : कन्‍या पक्ष की ओर से विवाह के समय स्त्रियां इस कोयलड़ी गीत को गाती है । अत: खोला भरने जाती हुई, बाइ को विदाई के समय, करूण रस से पूर्ण निम्‍न गीत गया जाता है –

म्‍हें थाने पूछा म्‍हारी कंवर बाई ओ ।
अतरो बाबा जी रो लाड़, छोड़ बाइ, सिध चाल्‍या ।
आंबो पाक्‍यो ओ, आमली, पाक्‍यो-पाक्‍यो नीबूड़ा रो रूख,
म्‍हे थाने पूछां ओ, राधा बाइ, इतरो बाबाजी रो हेत,
छोड़ री बाइ सिध चाल्‍या, हे आओ परदेशी सूवटो,
लेग्‍यो टोली में सूं टाल, कोयलड़ी अब बोलो
आपरां माउजी रो लाड़, छोड़ रे बाइ सिध चाल्‍या ।
आयो सगां रो सूवटो, ले गयो टोली में सूं टाल, कोयल बाइ सिध चाल्‍या ।

      भावार्थ : आम, इमली पक गये तथा नींबूओं में रस भर गया, अर्थात् कन्‍या युवती हो चली । ऐ बाई अपने पिता का इतना स्‍नेह छोड़ कर तुम कहां चल दी ? अपनी माता का प्‍यार छोड़कर कहां जा रही हो ? कन्‍या ने बताया कि समधाने सूवटा अर्थात पक्षी मुझ कोयल को लिवाने आया हे तथा वह पूरी टोली में से मुझे छांट कर ले जा रहा है । रैगर संस्‍कृति की यह परम्‍परागत विवशता है कि कन्‍या को विवाह के पश्‍चात ससुराल, अपरिचितों में जाना पड़ता है, चाहे माता पिता ने कितने ही लाडो से उसे पाला हो ।
6. खाटू श्‍यामजी : खाटू श्‍याम जी के मन्दिर में जात, जडेूले के लिये यहां दूर दूर से यात्री आये है ।

धन खाटू, धन सांवला नन्‍दलाल, जी परभु, धन रै ढूंढाड़ी लोग,
स्‍याम सुहावणा, बाबा स्‍याम, कै रे कोसा में थारो देवरो, बाबा स्‍याम,
जी, परभु, कै रे कौसां में जगाजोत, स्‍याम सुहावणा, बाबा स्‍याम ।
अस्‍सी ऐ कोसां में थारो देवरो, बाबा स्‍याम, जी परभु, सगली सिस्‍टी से जगाजीत,
कुण चिणयों थारो देवरो, बाबा स्‍याम, जी परभु, सेवकां दिवाइ गज नीव ।
राजाजी चिणायों म्‍हारों देवरो, बाबा स्‍याम, जी परभु, सेवकां दिवाइ गजनीव,

       7. घी ही पी : रैगर जाति में विवाह के पहले वर तथा कन्‍या को अपने-अपने घर घी तथा शक्‍कर पिलाई जाती है तथा उनकी पीठ पर थप्‍पी देते हैं ।

घी ही पी, म्‍हारा आछया लाड़ा घी ही पी,
थारी दाद्यां पावे, माया पावै, डोर हिलावै । हमसूं रलिया रंग करे ।
मंजीरा बाजै घी ही गुड़ बाजै, वेला सबद सुणावै (म्‍हारा आछया…)
थारी भुआ पावै, माम्‍या पावै, मास्‍यां पावै, डोर हिलावै ।
म्‍हांसूं रंग रलिया करै, म्‍हारा आछया लाड़ा घी ही पी ।

      भावार्थ : मेरे अच्‍छे लाड़ले तू घी ही पी, तेरी दादियां, माताजी, भुआ, मामी, मांसी घी पिला रही है तथा मनोरंजन कर रही है, हंसी मजाक किया जा रहा है । विवाह के अवसन पर यह एक सामान्‍य प्रक्रिया है । इस गीत को काफी लम्‍बे समय तक गाया जाकर घी पीलाने की रस्‍म पूरी की जाती है ।
       8. चटणी (राग : सांरग/ताल : कहरवा) : रैगर जाति में मिर्च मसाले से बनी हुई चटनी से बाजरे की रोटी स्‍वादपूर्वक खाकर वह आनन्दित हो जाया करती है ।

चटणी में इमरत घोल ल्‍याइ नार, चटणी में ।
बाजरियारी रोटी खाणे, चटणी म्‍हानै चोखी लागे ।
तरसै तरसै दोनूं म्‍हारी जाड । चटणी खाता खाता म्‍हारो मन नहीं धापै ।
म्‍हारो जीवड़ों हो रहयो निहाल । चटणी ढब सू पीसी,
ढबसूं नान्‍ही-नान्‍ही पीसी ।
जीवडा में छू की, ढब सूं राम रस भाखयौ म्‍हारा स्‍याम । चटणी में ….. ।।
छीक छीक चटणी रोटी सूं जीमी जिण में, भरियों खटरस सुवाद ।
उपर ठण्‍ड़ो नीरज पीओ, म्‍हारो हिवड़ो भयो ऐ निहाल चटणी में ….. ।

       9. छोटी सो बन्‍नो आंगणा रे गिल्‍ली खेले (ताल कहरवा) : रैगर जाति में पहले बहुत छोटी उम्र में ही विवाह हो जाया करता था । प्रस्‍तुत गीत में बनड़ा अर्थात पति तो बालक और पत्‍नी युवती है । ससुराल के घर के प्रांगल में जाकर भी बालक बन वह दूसरे बालकों के साथ गिल्‍ली डंडा खेल रहा है ।

छोटो सो बन्‍ना, म्‍ळारे आंगणिये में गिल्‍ली खेले, आंगणा में गिल्‍ली खेले, आंगणा में गुच्‍ची खोदे,
पनिया भरन जाऊं कहे मन्‍ने गोदी लेले, मारूंगी बतियन की मार बालमो बचतो डोले ।
रसोई बनवण जाऊं, यूं कहे मन्‍ने गोदी लेले, मारूंगी फुलकनि की मार, बनड़ो भगती डोले,
सेजां विछावण जाऊं यूं कहे मन्‍ने गोदी लेले, मारूंगी छतियन की मार, बन्‍नो बचतो डोले ।

      भावार्थ : छोटा सा बन्‍ना, मेरा बालक पति, मेरे घर के आंगण मे गिल्‍ली डंडा खेल रहा है । जब मैं पानी भरने जाती हूँ तो मुझे कहता है कि गोदी में उठा लो, मैं बातों बातों में उसे बहलाती हूँ । रसोई बनाने जाती हूं तो भी गोदी में लेने की रट लगाता है । मैं उसे फुलकों की ऐसी मार मारूंगी कि मेरा बालक पति भगता फिरेगा । सेज बिछावे के समय मेरा छोटा सा प्रियतम मुझ से कहता है कि गोदी मे ले लो । मेरा बालक पति नासमझ है । वह मेरे यौवन की मार भी क्‍या समझेगा या झेलेगा, वह बचता फिरेगा ।
       10. बांगा म बाजे जंगी ढोल (रागमिश्र जयवन्‍ती / झिझोड़ी : दीपचन्‍दी ) : रैगर जाति में अन्‍य जातियों की तरह भात भरने का रिवाज है । भांजी के विवाह पर भार भरने पीहर से भाई आये हुये है । अपने पीहर के प्रति स्‍नेह व प्रेम के उद्गार इस गीत में है ।

बागां में बाजे जंगी ढोल (झालर झिणका करे जी),
दरवाजे बाजे शहनाई, आयो म्‍हारी मां को जायो बीर,
चूंदड़ ल्‍यायो रेसमी जी (चूंदड़ ल्‍याओ मौज की जी),
नापूं तो हाथ पचास, तोलूं तो तोला तीस की जी, (या साठ की जी),
ओढूं तो हीरा झरपड़ै, मेलूं तो डब्‍बो भर जाय, (चूंदड़ ल्‍याओ),
ओढा म्‍हारे सुगना बाइ रे ब्‍याव जनेती देखे जीमता जी,
ओढा म्‍हारे लोडकंवर रा ब्‍याव साजन देखे मुलकता जी,
धन ये गोरी थारो भाग, बीरो तो ल्‍यायो चूंदीड़ी जी ।

      भावार्थ : मेरे घर पर शहनाई तथा ढोल बज रहे हैं । मेरी लाडो बेटी का विवाह है । मेरा भाई जो भात में रेशम की चूंदड़ी लाया है । वह बहुत महंगी है । हीरों से जड़ी है । नापती हूं तो पचास हाथ की व तोलने पर तीस तोले की है । इसे पहनकर जब इतराती फिरूंगी तो जनवासे में आये बराती इसको शान से देखेंगे तथा मेरे पति भी मुस्‍कराकर इसकी प्रशंसा करेंगे । मेरे पीह‍र वालों की इससे शान बढ़ेंगी कि सभी लोग मेरे लिये इतनी महंगी चूंदड़ी लेकर आये है ।
       11. शीतला माता : शीतला मां की पूजा के लिये शीतला अष्‍टमी प्रति वर्ष आती है । रैगर जाति में इस दिन एक दिन पूर्व पकाया हुआ (बासी), भोजन (बासोड़ा), खाया जाता है । शीतला के मन्दिर में कुम्‍हार पूजापा लेते हैं । माता जी के राबड़ी तथा ठण्‍डी रोटी आदि चढ़ाई जाती है । शीतला मां कृपाकांक्षी, मां से पूत्र, पोत्र आदि संतानोत्‍पति के आशीर्वाद की अपेक्षा रखते हैं ।

रामचन्‍द्र जी ओ, दरवाजा खोल, थां पै मेहर करे छै: माता सीतला,
थां पै लेगी गडजोड़ा री जात, थां पै मेहर करे छै: माता सीतला,
म्‍हाने के फरमावे माता सीतला, थां जेसी राबड़ी रोटिया की जेठ,
थां पै मया ये करे छै: माता सीतला, थां पै मेहर करे छै: माता सीतला,

      भावार्थ : ए भक्‍त, दरवाजा खोलो, तुम पर शीतला माता कृपा करने वाली है । तुम से केवल गडजोड़े की पूजा, बासी रोटी तथा राबड़ी के एवज में तुम्‍हारी गोद भरने हेतु बेटे देगी, पोता देगी ।
       12. रंगीलो चंग बाजणो : इस गीत में रैगर जाति का विशेष बखान किया गया है । रैगर जाति चमड़े रंगने के अलावा चंग को मढ़ने का काम भी किया करती थी । मेरे गांव रायसर में बांकी माता का बहुत पुराना मन्दिर है जहां ढोल नंगाड़े आज भी बजते हैं । इन नंगाड़ों पर चमडा मंढने का काम केवल रायसर गांव के ‘रछोया’ गोत्र वाले ही किया करते थे । इस गीत में होली पर चंग बजाने और उस पर चमड़े मंढने का विवरण है । होली का डांड बसंत पंचमी को रूपने के बाद स्‍त्री-पुरूष टोलियां बनाकर होली के गीत गाते हुये चंग नृत्‍य करते हैं तो कहीं गींदड़ खेली जाती है ।

रंगीलो चंग बाजणू, म्‍हारे बीरो जी मंडायो चंग बाजणू,
म्‍हारे रैगर मंड के लायो जी, रंगीलो चंग बाजणू,
चंग आंगलियां बाजै, चंग मूंदडिया बाजै,
चंग पूचे के बज से बाजै, रंगीलो चंग बाजणू,
म्‍हारो बीरो जी बजावै चंग बाजणू, सारा साथिड़ा मिल गावै धमाल अे ।
रंगीलो चंग बाजणू, बाजत बाजत वो गया,
कोइ गयो-गयो होलो डे रे पान ऐ, रंगीलो चंग बाजणू ।

      भावार्थ : होली आ गई, रंगीलो चंग बज रहा है । मेर भैया ने चंग मढवाया, रैगर मढ़ के लाया । चंग अंगुलियों से, उंगली में पहने हुये छल्‍लो से तथा हाथों की ताकत से बजता है । मेरा भाई अपने साथियों के साथ चंग बजाता है ।
       13. लागुंरिया (राग : पीलू / ताल : कहरवा) : राजस्‍थान के करौली क्षेत्र में देवी के सेवक या भक्‍त को लांगुर कहते हैं । कैला देवी के मेले पर लाखों स्‍त्री-पुरूष जिनमें रैगर जाति के लोग भी होते हैं लांगुरिया की धुन पर नाचते गाते देखे जा सकते हैं ।

चरखी चल रही बर के नीचे, रस पीजा लांगुरिया,
रस पीजा लांगुरिया अरे गुड़ खायजा लांगुरिया, चरखी चल रही …….
पोखरिये की पाल पै, लम्‍बो पेड़ खजूर बापै चढ़के
मेरे बलमा कित्ती दूर, चरखी चल रही ……
राम – नाम तो सब कहे, दशरथ कहे न कोय, एक बेर दशरथ कहे,
कोई अष्‍ट जज्ञ फल होय, चरखी चल रही……
चित्रकूट के घाट पर भइ सन्‍तन की भीर तुलसीदास चन्‍दन घिसे,
तिलक लेत रघुवीर, चरखी चल रही ……….
पत्ता टूट्यो डार पै, ले गई पवन उडाय,
अबके बिछुड़े नाय मिलेंगे, दूर पड़िंगे जाय, चरखी चल रही……..

      भावार्थ : नायिका कह रही है कि वटवृक्ष के नीचे गन्‍ने के रस की चरखी चल रही है, गुड़ बनाने की तैयारी है । अरे लांगुर, आकर रस पी जा और गुड़ खाले । इस पर विभिन्‍न प्रचलित दोहे गाये जाते हैं ।
       14. सात फेरे : अग्‍नि को साक्षी मान कर विवाह रैगर जाति में सम्‍पन्‍न होते हैं । हवन कुण्‍ड के चारों तरफ सम्‍तपदी की रस्‍म होती है तथा फेरे लिये जाते हैं । रैगर जाति में निम्‍नलिखित गीत फेरों के समय स्त्रियां गाती है जिसका अर्थ है कि सातवें फेरे के बाद कन्‍या मां-बाप की नहीं रह कर पराई हो जाती है । रैगर जाति में लड़की की विदाई के समय लड़की रोती है । तो औरते प्राय: उसको यह समझाती है कि राजा महाराजों के भी बेटियां पराई हो जाती है । तू तेरे ससुराल में खुशी-खशी जा और अपना नया संसार बसा ।

पहलो तो फेरो ए, लाडी बाबासा री प्‍यारी,
दूजो तो फेरो ए, लाडी दादासा री प्‍यारी,
तीजा तो फेरो ए, लाडी काकासा री प्‍यारी,
चौथो तो फेरो ए, लाडी बीरा जी री प्‍यारी,
पांचवों तो फेरो ए, लाडी मामाजी री प्‍यारी,
छठो तो फेरो ए, लाडी मावसा री प्‍यारी,
सातवों तो फेरो ए, लाडी हुइ री पराई ।
लाडी लगौ सहेलियां मय टाल, बागां मेली कोयल,
ए लाडी आयो सगा जी रे डाबरो

(साभार- डॉ. पी. एन. रछोया कृत रैगर जाति का इतिहास एवं संस्‍कृति)

भारत के प्रत्येक समाज के अलग-अलग त्योहार, उत्सव, पर्व और रीति-रिवाज़ को मनाने की परंपरा हैं । भारत संस्कृति में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही काफी महत्व रहा है । हमारे रैगर समाज की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां पर मनाए जाने वाले सभी त्योहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना को बढ़ाते हैं । यहां मनाए जाने वाले सभी त्योहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धता प्रदान करना होता है । यही कारण है कि हम अपने समाज में मनाए जाने वाले त्योहारों एवं उत्सवों में सभी रैगर समाज बंधु आदर के साथ मिलजुल कर मनाते हैं । हमारे समाज के प्रमुख त्योहारों में मानव जीवन को एक उत्सव के रूप में सभी समाज बंधु आपस में मिलकर आनंद स्वरूप मनाने की परंपरा हमें स्‍थापित करना चाहिए । समाज में प्रचलित उत्सव और त्योहार मात्र आनंद प्राप्ति के लिए ही नहीं अपितु समाज एक धारा में जोड़ने, जागृति पैदा करने व समाज के महापुरूषों के आदर्शों को अपने जीवन मे सम्मिलित करने के उद्देश्य से भी मनाए जाते हैं । जो व्यक्ति और समाज को सुख, शांति, धर्म एवं भाईचारे की ओर लें जाते हैं । हमारे अखिल भारतीय रैगर समाज के प्रमुख त्योहार इस प्रकार है: मकर संक्रांति, बाबा राम देव जयंती (भादवी बीज), रविदास जयंती, अम्‍बेडकर जयंती, रामनवमी, गुरूपुणिमा, अम्‍बेडकर निर्वाण दिवस, गंगा माता ।

ये हमारी पुरानी परम्पराएं हैं जिनको मानते हुए आज के भौतिक युग में भी हमारी अलग पहचान बनाए हुए हैं । इसलिए धार्मिक दृष्टि से हमारे सभी व्रत-त्योहार चाहे वह मकर संक्रांति हो, अम्‍बेडकर जयंती हो, रामनवमी हो या गुडीपढवा होकहीं न कहीं वे पौराणिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं और उनका वैज्ञानिक पक्ष भी नकारा नहीं जा सकता। इस लिए यह त्योहार हम सब समाज बंधु बड़े उल्लास के साथ मनाते हैं ।

बाजारीकरण ने सारी व्यवस्थाएं बदल कर रख दी हैं । हमारे उत्‍सव-त्योहार भी इससे अछूते नहीं रहे । शायद इसीलिए प्रमुख त्योहार अपनी रंगत खोते जा रहे हैं ओर लगता है कि हम त्योहार सिर्फ औपचारिकताएं निभाने के लिए मनाये जाते हैं । किसी के पास फुरसत ही नहीं है कि इन प्रमुख त्योहारों के दिन लोगों के दु:ख दर्द पूछ सकें । सब धन कमाने की होड़ में लगे हैं । गंदी हो चली राजनीति ने भी त्योहारों का मजा किरकिरा कर दिया है । हम सैकड़ों साल गुलाम रहे । लेकिन हमारे बुजुर्गों ने इन त्योहारों की रंगत कभी फीकी नहीं पडऩे दी। आज इस अर्थ युग में सब कुछ बदल गया है । कहते थे कि त्‍योहार के दिन न कोई छोटा । और न कोई बड़ा । सब बराबर । लेकिन अब रंग प्रदर्शन भर रह गये हैं और मिलन मात्र औपचारिकता । हम त्‍योहारों के दिन भी हम अपनो से, समाज से पूरी तरह नहीं जुड़ पाते । जिससे मिठाइयों का स्वाद क सैला हो गया है । बात तो हम पूरी धरा का अंधेरा दूर करने की करते हैं, लेकिन खुद के भीतर व्याप्त अंधेरे तक को दूर नहीं कर पाते । त्योहारों पर हमारे द्वारा की जाने वाली इस रस्म अदायगी शायद यही इशारा करती है कि हमारी पुरानी पीढिय़ों के साथ हमारे त्योहार भी विदा हो गये ।

हमारे पर्व त्योंहार हमारी संवेदनाओं और परंपराओं का जीवंत रूप हैं जिन्हें मनाना या यूँ कहें की बार-बार मनाना, हर साल मनाना हर समाज बंधु को अच्छा लगता है । इन मान्यताओं, परंपराओं और विचारों में हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत सरोकार छुपे हैं । जीवन के अनोखे रंग समेटे हमारे जीवन में रंग भरने वाली हमारी उत्सवधर्मिता की सोच मन में उमंग और उत्साह के नये प्रवाह का जन्म देती है । हमारा मन और जीवन दोनों ही उत्सवधर्मी है । हमारी उत्सवधर्मिता परिवार और समाज को एक सूत्र में बांधती है । संगठित होकर जीना सिखाती है । सहभागिता और आपसी समन्वय की सौगात देती है । हमारे त्योंहार, जो हम सबके जीवन को रंगों से सजाते हैं ।

हम सभी समाज बंधु यह प्रतिज्ञा लेवे कि समाज के त्‍योहार व उत्‍सवों को हम सभी एक साथ मिलकर मानवे ताकि हमारे समाज की एक अलग व उन्‍नत छबि हम प्रस्‍तुत कर सके जिससे समाज में प्रेम, एकता, त्याग, दान, दया, सेवा का भाव पैदा हो । महापुरूषों की तिथियों पर हमें सामुहिक रूप से मिलकर जुलूस निकालना चाहिए व सामुहिक विचार गोष्‍ठी का अयोजन होना चाहिए ताकि समाज उन्नत एवं समृद्ध होता है ।

गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को कहा जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की इस तिथि को ही माँ गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुँची थीं। इसलिए इस दिन को ‘गंगा सप्तमी’ के रूप में मनाया जाता है। कहीं-कहीं पर इस तिथि को ‘गंगा जन्मोत्सव’ के नाम से भी पुकारा जाता है। गंगा को हिन्दू मान्यताओं में बहुत ही सम्मानित स्थान दिया गया है।
प्रमुख त्यौहार एवं उनकी तिथियाँ

1.

बाबा राम देव जयंती भादवी बीज

2.

रविदास जयंती माघ पूर्णिमा

3.

गुरुपूर्णिमा आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा
Vigora for sale, buy dapoxetine.

4.

गंगा माता जयंती गंगा सप्तमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी

5.

मकर संक्रांति 14 जनवरी

6.

अम्‍बेडकर जयंती 14 अप्रैल

7.

अम्‍बेडकर निर्वाण दिवस 06 दिसम्बर

8.

‘धर्मगुरू’ स्‍वामी श्री ज्ञानस्‍वरूप जी महाराज जयंती दिवस 21 अक्‍टूबर 1895

9.

‘धर्मगुरू’ स्‍वामी श्री ज्ञानस्‍वरूप जी महाराज महानिर्वाण दिवस 25 फरवरी 1985

10.

‘त्‍यागमूर्ति’ स्‍वामी श्री आत्‍माराम ‘लक्ष्‍य’ महाराज जयंती दिवस 17 अगस्‍त 1907

11.

‘त्‍यागमूर्ति’ स्‍वामी श्री आत्‍माराम ‘लक्ष्‍य’ महाराज महानिर्वाण दिवस 20 नवम्‍बर 1946

12.

प्रथम अखिल भारतीय रैगर महा सम्‍मेलन – दौसा 2, 3 तथा 4 नवम्‍बर, 1944

नि:संदेह हमारे समाज के उत्‍सव व त्‍यौहार हमारी सामाजिक व सांस्कृतिक धरोहर है । … अपने उत्‍सव-त्‍यौहार यथावत् रहें ऐसी हमारी भावना है । हमारे इस प्रयास में आप भी अपना सहयोग प्रदान करने का कष्‍ट करें ।

आज लोकतन्‍त्र का जमाना है, इसमें संख्‍या बल का मूल्‍य होता है । देखा जाए तो स्‍वतन्‍त्रता प्राप्‍ति के बाद अनुसूचित जातियों को जो वांछित लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिला । आजादी के पेसठ वर्ष बीत गए है, लेकिन गरीबी और जहालत भरी जिन्‍दगी से छुटकारा नहीं मिला, दु:ख भरी जिन्‍दगी से ही पीछा नहीं छूटा, सुख-सम्‍पन्‍नता तो दूर की बात है । डॉ. अम्‍बेडकर का कथन ”हमें शासक बना है” साकार होने की दिशा में पहल जरूर दिखाई देने लगी है । यह उल्‍लेखनीय तथ्‍य है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद रैगर अपना अस्तित्‍व बचाने के लिए आदिकाल से ही आन्‍दोलित रहा है, हालांकि वर्णवादियों ने उसे पीछे ढकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन रैगर जाति की साहसिकता आज भी बरकरार है और दुनिया में होने वाले परिवर्तनों से अप्रभावित नहीं है अंधकार से प्रकाश की ओर उन्‍मुख है । लेकिन इसके साथ यह बात भी सत्‍य है कि वर्णाश्रम व्‍यवस्‍था में सबसे नीचे के पायदान पर होने के कारण हम सदियों से दमन का शिकार होते आ रहे हैं । आज हमारे समाज में इसी पीछड़ेपन के कारण अनेक ज्‍वलंत समस्‍याएँ पैदा हुई है । वैश्‍वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के चलते सार्वजनिक उद्योगों एवं शिक्षा के निजीकरण की नीति को बढ़ावा देने से अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के विकास का पहिया रूक गया है, जो थोड़ी-सी बराबरी और खुशहाली का अहसास उसे होने लगा था, वह फिर डगमगा गया है । जिन लोगों ने गरीबी झेलते हुए बड़ी मुश्‍किल से अपने बच्‍चों को पढ़ाया-लिखाया, उनके लिए शिक्षा बेमानी हो गई है ।

अनुसूचित जाति समाज के दूसरे समुदायों की अपेक्षा संख्‍या बल, बुद्धि बल और कर्मठता के बावजूद रैगर समाज आशा के अनुरूप प्रगति की ओर आरूढ़ नहीं हो पाया । नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान के अन्‍तर्गत कुछ लोगों को सरकारी नौकरी के अवसर भी मिले, हालांकि इस सुविधा का लाभ पाने वाले एक प्रतिशत से भी कम हैं और उन्‍हीं के जीवन में थोड़ी-सी बेहतरी और खुशहाली आ पाई है, जिसे देखकर दूसरे लोग ईर्ष्‍यावश कहने भी लगें कि इन्‍हें आरक्षण की जरूरत नहीं है । परन्‍तु गाँव-देहात और कस्‍बों में स्थिति जस-की-तस है और कहीं-कहीं तो पहले से भी अधिक बदतर हो गई है । इस समय की ज्‍वलंत समस्‍याएँ इस प्रकार है –

अशिक्षित होना –

शिक्षा का अभाव होना रैगरों की अवनति का एक महत्‍वपूर्ण कारण है । पहले इनके लिए हिन्‍दू शास्‍त्रों के अनुसार शिक्षा विधान ही नहीं था, लेकिन बीसवी सदी में महात्‍मा ज्‍योतिबा फुले जैसे समाज-सुधारक की वहज से उनके लिए‍ शिक्षा के द्वार खुले, लेकिन उसका लाभ तो बहुत गिने-चुने लोगों को ही मिल पाया और आजादी के बाद सरकार की ओर से जो प्रयास किये गए, उसकी भी पहुँच सक्रिय रूप से बहुत नीचे तक नहीं हो पाई, क्‍योंकि जिनके हाथों में शिक्षा के विस्‍तार कार्यक्रमों के अनुपालन का उत्तरदायित्‍व है, वे इन्‍हें बराबरी में नहीं लाना चाहते ।

वैसे दूसरों की देखादेखी थोड़ी-सी दूर की सूझबूझ रखने वाले जाति के लोगों की तरफ से जो प्रयास हुए हैं, वे भी नाकाफी है, लेकिन विकास का पहिया चल जरूर पड़ा है और शिक्षा के निजीकरण से जिस प्रकार शिक्षा महंगी होती जा रही है, इससे विकास की रफ्तार फिर से कम होने की संभावना बन रही है इस कमी को पूरा करने के लिए रैगर जाति के शिक्षित और सम्‍पन्‍न लोगों को सामूहिक प्रयास करने होंगे ।

नशा –

आज हमारे समाज में ही नहीं पूरे देश में नशे का बोलबाला है । नशा एक अभिशाप है । नशा एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है । शराब, गांजा, तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और भांग सहित हर प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन जानलेवा हो सकता है । नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ ही व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाता है । नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है । इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी बढ़ जाता है और व्यक्ति शारीरिक-मानसिक रूप से अपंग हो जाता है । इस दुर्व्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग और विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे है । इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है ।

हमारे रैगर समाज में भी इसका चलन है ओर हमे चाहिए कि इस नशे के रोग से दूर रहे इसी में हमारी, परिवार, समाज और देश की भलाई है । और अंत में मेरी ये गुजारिश है कि अपने को छोड़कर एकबारगी अपने परिवार, माता, पिता, पत्नी और बच्चों का ख्याल रखते हुए ये सोचना होगा कि कल होकर आपको कुछ हो जाता है तो उनको कितना कष्ट होगा जो पूरी तरह आप पर ही आश्रित हैं । अगर आपको उनसे वास्तव में प्यार हैं । तो आपके परिवार वालों को ये न सुनना पड़े कि आप तो कुछ दिन के ही मेहमान हैं । आपका इलाज संभव नहीं है । आपके परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या ऑपरेशन से भी ठीक नहीं होगा ? तो डॉक्टर का जवाब आता है कि कहाँ-कहाँ ऑपरेशन करेंगे पूरा शरीर खोखला हो गया है । आइये प्रण करें कि जहाँ तक संभव होगा लोगों को नशे के सेवन करने से रोकेंगे ।

अंधविश्‍वास –

रैगर जाति के लोगों में जो अंधविश्‍वास सदियों से चले आ रहे हैं, वे अभी भी बरकरार हैं । मानसिक दासता से उबरने में अभी वक्‍त लगेगा । भूत-प्रेत, जादू-टोना में विश्‍वास बराबर बना हुआ है । मृतक की मुक्ति के लिए बड़ा भोज दिया जाता है, चाहे पैसा कहीं से कर्ज में ही क्‍यों न उठाना पड़े । तेरहवीं तो अभी भी बड़े पैमाने पर प्रचलित हैं । वैसे शिक्षित समाज तो इस प्रकार के अंधविश्‍वासों से दूर होता जा रहा है, जो अच्‍छा लक्षण है, लेकिन 90 प्रतिशत से अधिक आबादी तो इस प्रकार के अंधविश्‍वासों में ग्रस्‍त है और खून-पसीने की अपनी कमाई को व्‍यर्थ में बर्बाद कर रही है । ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति हद से ज्‍यादा बत्‍तर है, वे खून-पसिना एक कर इतनी कड़ी मेहनत से दिन-रात एक कर पैसा कमाते हैं ओर इन अंधविश्‍वासों में फसकर इस कड़ी मेहतन के पैसे को बर्बाद कर देते हैं ।

फिजूलखर्ची –

यह बहुत ही दु:खद पहल है कि जिन्‍हें कमरतोड़ मेहनत के बाद आधी अधूरी मजदूरी मिलती है, लेकिन वे दूसरों की देखादेखी शादी-विवाह, जन्‍म-मृत्‍यु तथा तीज-त्‍योहारों के अवसर पर दिल खोलकर खर्चा करते हैं, जिससे उन पर अतिरिक्‍त बोझ पड़ता है । यह निश्चित है कि उन्‍हें कर्ज पर जरूर पैसे उठाने पड़ते हैं ओर इनके लिए कर्ज की दरें भी महंगी होती है, उसे सूद सहित चुकान में होने वाली परेशानियों को वह नजरअंदाज कर जाते हैं ओर इस कारण जीवन के दूसरे जरूरी काम अटक जाते हैं । आज जमाना बदल रहा है, तरक्‍की के नए-नए प्रमिान विकसित हो रहे हैं, इसलिए चाहे जैसा भी अवसर हो, अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार ही खर्च करना चाहिए, दूसरे की नकल नहीं करनी चाहिए और अपने जैसी स्थिति वालों के साथ ही संबंध बनाना अधिक उचित होगा, जिससे अपने ऊपर अनावश्‍यक बोझ न पड़े ।

गरीबी –

आंकड़े चाहे भारत को कितना भी आर्थिक रूप से मजबूत दिखाएँ, विकास दर भले ही 10 प्रतिशत से भी ऊपर चली जाए, लेकिन 40 प्रतिशत से अधिक आबादी का मूलभूत सुविधाओं से वंचित होना अपने आप में बहुत ही दु:खद पहलू है । अमीरों की संख्‍या बढ़ेगी तो गरीबों की संख्‍या भी बढ़ेगी, उस पर रोक लगाने वाली छड़ी किसी के पास नहीं है ।

इस गरीबी से कोई वर्ग और जाति अछूते नहीं है । लेकिन रैगर जाति की स्थिति इसलिए बहुत खराब है कि वह सामाजिक और आर्थिक पाबंदियों से अभी भी ग्रस्‍त है । वह अपने परम्‍परागत व्‍यवसाय को तिलांजलि देकर दूसरे कार्य की ओर अग्रसर हुआ, तो दूसरों ने उसे कहीं भी जमने नहीं दिया । खेती के अलावा कोई अन्‍य कार्य करने का उसे न तो कोई अनुभव है और न ही उसके पास कोई पूंजी है, ओर खेती करने के लिए पर्याप्‍त मात्रा में जमीन नहीं है । कोई दूसरा उसे सहारा एवं सहयोग नहीं देना चाहता ।

काम-धंधों के बारे में सरकार की जितनी भी योजनाएं है, उनकी उसे जानकारी नहीं है । यदि इस भयंकर गरीबी से निकलने की समय रहते पहल नहीं की गई, तो भूख और बीमारी से दम तोड़ने वालों की संख्‍या बढ़ती ही जाएगी । इसलिए गांव के शिक्षित बेरोजगार लोगों को ग्राम स्‍तर पर स्‍वयं सहायता समूह बनाकर सहकारिता के आधार पर कुटीर उद्योगों की शुरूआत करनी होगी । कोशिश करेंगे तो आगे का नेटवर्क भी सुलभ हो जाएगा ।

बेरोजगारी –

कहने को तो सारी दुनिया में मंदी छाई है, भारत भी इससे अछूता नहीं है, यहां भी बेरोजगारों की संख्‍या बढ़ती जा रही है । सरकारी प्रयासों के बावजूद इस पर नियंत्रण पाना कठिन हो रहा है । बहुत बाद में यहाँ पर व्‍यवसायिक प्रशिक्षण की और रुझान बढ़ा है । फिर इस दिशा में जो योजनाएं चल रही है, वे देश की आबादी के हिसाब से ना काफी है । रैगर बिरादरी के लोग इसमें भी पीछे हैं । ये नौकरी या मजदूरी के अलावा किसी भी कार्य को करने में शर्म महसूस करते है । गांव में जो कार्य संभव नहीं, उसके लिए शहर या बड़े कस्‍बे में कोशिश करनी चाहिए । सरकारी नौकरी या आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न लोग मिल-जुलकर व्‍यवसायिक प्रशिक्षण केन्‍द्र शुरू करें, तो रोजगार बढ़ने की गुंजाइश हो सकती है । आज के युवाओं को व्‍यवसायिक शिक्षा की ओर ध्‍यान देना चाहिए ताकि नौकरी ना मिलने पर भी उस शिक्षा से प्राप्‍त अनुभव के द्वारा घर पर कार्य किया जा सके ।

राजनीति में भागीदारी न होना –

हमारे समाज की राजनीति व सत्ता में भागीदारी बहुत ही कम है । इस कमी के कारण हमारे अनेक आवश्‍यक कार्य भी नहीं होते और हम मुंह ताकते ही रह जाते है । अत: अधिक से अधिक लोगों को राजनीति में भी जाना चाहिये । आप अपनी पसन्‍द की किसी भी पार्टी में सम्मिलित होकर कार्य करें । यदि आप ठोस कार्यकर्त्ता होंगे तो पार्टी आपको चुनाव में टिकिट भी देगी । वैसे मात्र चुनाव में समय टिकिट मांगने पर कोई नहीं देता । चुनाव के समय वैसे ही टिकिट मांगते व एक दूसरे की टांग खींचने कारण हमारी शक्ति क्षीण ही होती है । हमारी जाति के कई योग्‍य व्‍यक्ति चुनाव के समय ही पार्टियों से टिकिट मांगते हैं, जिन्‍हें नहीं मिलता । ऐसे लोग पहले से ही किसी भी पार्टी में जाकर सक्रिय कार्य करें तभी टिकिट व सफलता मिलेगी ।

हमें ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक सभी क्षेत्रों के चुनावों में अधिक से अधिक भाग लेना चाहिए एवम् समाज संगठन के माध्‍यम से एक पद के लिए मिलकर एक ही उम्‍मीदवार खड़ा करना चाहिये ताकि वोटों का बंटवारा न होने से हमारे उम्‍मीदवार की जीत सुनिश्चित हो जाये । प्राय: पंचायत चुनावों में यह देखा गया है कि एक सीट के लिए कई जाति बन्‍धु खडे हो जाने से हमारी 75% आबादी होने पर भी हमारे उम्‍मीदवार हार जाते है । हमारे कार्यकर्त्ताओं व राजनेताओं को इस ओर विशेष ध्‍यान देना चाहिये ।

समर्पित नेतृत्‍व –

दूसरों के मुकाबले रैगर जाति के नेताओं के बारे में यह बात ज्‍यादा सुनने को मिलती है कि पार्षद, विधायक अथवा सांसद बनने के बाद वह अपने लोगों से मिलना-जुलना एकदम कम कर देता है, अनय वर्गों के लोगों के साथ उसका बहेतर तालमेल होता है और उसके अधिकार क्षेत्र में जो कार्य अथवा योजनाएँ होती हैं, उनका लाभ भी गैर जाति के लोगों केा पहले और अधिक मात्रा में उपलब्‍ध कराता है, भले ही संख्‍या की दृष्टि से वे कम हो । इसके अलावा कुछ लोग अच्‍छे भी है जो जाति के बारे में सोचते है ।

इस तथ्‍य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वह जिस क्षेत्र का प्रतिनिधि है, सबकी तरफ ध्‍यान देना उसका दायित्‍व है, लेकिन जाति के बहुसंख्‍यक लोगों को दरकिनार करना भी अच्‍छी बात नहीं । कई नेताओं की शिकायत यह रहती है कि अपने लोग उन्‍हें उचित सम्‍मान नहीं देते । यदि कहीं ऐसी बात है तो उसे भी सुधारना चाहिए ।

वैसे तो आज के समय में राजनीति एक व्‍यवसाय बन गया है और छोटे-मोटे चुनाव में ही लाखों रूपये खर्च हो जाते हैं । इस प्रकार समाज के प्रति लगाव रखने वाले लोग इस क्षेत्र से ही बाहर हो जाते हैं, क्‍योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि चुनाव आधुनिक तरीके से लड़ सके । फिर जो इस क्षेत्र में आता है तो वह कमाने के लिए ही आता है, इसलिए वह पहले अपना पेट भरे की सोचता है और अगले चुनाव के लिए बन्‍दोबस्‍त करना चाहता है, लेकिन जिन बाबा साहब ने जन-प्रतिनिधि में आरक्षण की व्‍यवस्‍था को विधि-सम्‍मत बनाया है, उसकी Pay Back to Society वाली नसीहत को भी ध्‍यान रखना चाहिए और समाज को गरीबों की बेहतरी के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम करना चाहिए तथ बीच-बीच में मिलने-जुलने की प्रक्रिया से भी अपने लोगों का हौंसला बढ़ता है ।

पारिवारिक विघटन –

पाश्‍यात्‍य प्रभाव से पूरा भारतीय समाज ही त्रस्‍त है और संयुक्‍त परिवार टूट रहे है । माता-पिता के प्रति लापरवाही आम बात हो गई । अधिक स्‍वच्‍छंदता ने पति-पत्‍नी के रिश्‍तों में भी दरार पैदा कर दी है । बड़ों की अनुभव युक्‍त सलाह को महत्‍व देने की बात तो अलग है, उसे सनुना ही गंवारा नहीं समझा जाता है । हमारे प्राचीन ग्रंथों में वृद्धजनों को बहुत महत्व दिया गया है । उनको समाज की संचित निधि कहा गया है । वे समाज के लिए धरोहर-सदृश रक्षणीय माने गए हैं । जब हम तुलना कर देखते हैं, तो पता चलता है कि दूसरों की बजाय हमारी जाति के परिवारों में उच्‍श्रृंखलता की भयावह स्थिति है । वहाँ फिर भी रिश्‍तों का और उम्र का लिहाज किया जाता है, शिक्षा की कद्र की जाती है और यदि नइ सबके अलावा भी किसी प्रकार की कुशलता है, तो उसे भी सम्‍मान की दृष्टि से देखा जाता है, उत्‍साहवर्धन भी किया जाता है तथा जरूरत पड़ने पर प्रेरणा एवं सहयोग भी प्रदान किया जाता है ।

परिवार समाज की प्रारंभिक कड़ी है, जब यह मजबूत होती है, पारिवारिक अनुशासन होता है तो समाज भी एकजुट होता है और यह एकजुटता ही प्रगति का आधार है । जो बड़े-बड़े सम्‍मेलन, प्रदर्शन या रैलियां जातिगत बैनर तले देखी जाती हैं, उनका राज पारिवारिक अनुशासन ही है और इसका रैगर जाति में नितांत अभाव है । यदि अपने अस्तित्‍व की रक्षा करनी है, तो इस पर भी सोच-विचार करने की जरूरत है ।

सहकारिता का अभाव –

जब मनु ने सम्‍पूर्ण शुद्र वर्ग के लिए पठन-पाठन की मनाही कर दी, तब मस्तिष्‍क तो स्‍वत: ही शिथिल हो गया, केवल सेवा के अधिकार से शरीर जरूर मजबूत रहा, क्‍योंकि कभी-भी कहीं-भी जाने और कोई भी कार्य करने का आदेश पालन करना जरूरी था । लेकिन आज तो दुनिया बहुत आगे निकल गई है । बड़े-से-बड़े उद्यम सहकारिता के आधार पर खड़े हैं । दूसरी जाति के लोग मिलजुल कर रोजगार के नए-नए विकल्‍प अपनाकर आर्थिक प्रगति की ओर अग्रसर हैं, लेकिन रैगर बंधु इसमें भी बहुत पीछे हैं, एक-दूसरे पर जरा भी विश्‍वास नहीं करते । जो आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न नहीं हो, ऐसी कौम के लिए तो सहकारिता के आधार पर उद्यमिता की ओर प्रयास करना सबसे अच्‍छा विकल्‍प है । अगर हमारी बात आप तक पहुँचती है, तो इस पर भी जरूर गौर करें ।

संवेदनहीनता –

कई बार अपने लोगों की स्थिति पर विचार करते समय लगता है कि रैगर जाति के लोग तो अभी अपने प्रति भी संदेवनशील नहीं है । कोई अड़चन होती है, शरीर में दिक्‍कत होती है, तो उस पर फोरी तौर पर ध्‍यान देते हैं, थोड़ी राहत मिलते ही भूल जाते हैं । समाज के प्रति संवेदनशीलता का पाठ हम कब पढ़ेंगे, जबकि दूसरी जाति के लोग अपेन समाज के प्रति जागरूक हैं और तुरंत हरकत में आ जाते हैं । यदि उनके समाज के साथ गुजरात में कोई घटना होती है, तो राजस्‍थान और मध्‍य प्रदेश के लोग भी हरकत में आ जाते हैं और सहयोग के लिए तत्‍पर हो जाते हैं । हमें इस मामले में अन्‍यों से सीखने की जरूरत है ।

उत्‍पीड़न –

वैसे तो सामन्‍ती मानसिकता और जातीय दंभ से ओत-प्रोत दंबग उच्‍च जातियों के ऊँची नाक वाले अपने यहाँ काम करने वाले मजदूरों तथा नीच समझी जाने वाली जाति के लोगों पर समय-समय पर अत्‍याचार करते ही रहते हैं, लेकिन जिन्‍होंने इसे नियति मान लिया है, वे विरोध नहीं करते, इसकी चर्चा गली-मुहल्‍लों तक ही सीमित रहकर अपने आप कुछ समय बाद समाप्‍त हो जाती है । लेकिन रैगर, जो विरोध करते हैं, गलत बात का जवाब देते हैं और जहाँ तक संभव होता है, मरने मारने पर उतारू भी हो जाते हैं, उसके इस मनोबल को तोड़ने के लिए उत्‍पीड़न की घटनाएँ दूसरों के मुकाबले ज्‍यादा होती है और पुलिस-प्रशासन भी उसका साथ नहीं दे पाता, क्‍योंकि उनकी महदर्दी भी वर्गीय सम्‍बन्‍धों के कारण उत्‍पीड़कों के साथ ही होती हैं । अपने ही जैसे हाड़-मांस के आदमी को जिन्‍दा जलाना कितना वीभत्‍स है, कितना क्रूर है, दूसरों की बहन-बेटी की इज्‍जत से खेलना कितना शर्मनाक है । मजदूर को उसकी मजदूरी के बदले मारना-पीटना कहां का न्‍याय है ? लेकिन उत्‍पीड़न का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है । उस पर विराम कौन लगाएगा, कैसे लगेगा ?

मुसलमान का गाँव में एक घर भी होता है, तो उसे कोई छेड़ने की हिम्‍मत नहीं करता, क्‍योंकि उसकी हमदर्दी में सारे क्षेत्र के नहीं, पूरे देश के मुसलमान भाई खड़े नजर आते हैं । दूसरी तरफ रैगरों के 100 घर भी होंगे, उनका उत्‍पीड़न करने में किसी प्रकार का डर नहीं लगता है । उन्‍हें पता है कि पीड़ित के खानदान के भी सारे लोग उसके साथ खड़े नहीं होंगे । इस स्थिति में सुधार करना होगा, और दूसरों से भी सीखना होगा अन्‍यथा य समस्‍या यथावत बनी रहेगी, आँसू तथा कराहट घर की चारदीवारी की हद पार नहीं कर पाएगी । हालांकि शहरों में जागरूकता के चलते स्थिति में सुधार आया है ।

इन सब हालातों से डरने की जरूरत नहीं है, बोलने-चिल्‍लाने की भी सबको जरूरत नहीं है, बस केवल बिरादरी के दस-पांच गाँवों के हजार-पांच सौ लोगों उसके घर पर हमदर्दी के लिए इकट्ठा होने से ही बात बन सकती है । यदि वहाँ भी दबाव न बने, ता थाना-कचहरी में एक बार थोड़े से बदले तेवरों के साथ सभी लोग इकट्ठा होकर जुटने का साहस करोगे, तो तुम्‍हारी बात प्रभावी ढंग से कहने वाला कोई न कोई नेता तो अपने आप मिल जाएगा । इतना जरूर ध्‍यान रखना है कि वह नेता आपके हितों के वितरीत सौदेबाजी न कर पाए । भीड़ के हुजूम को थाना-कचहरी कोई भी नजरअंदाज नहीं कर पाएगा ।

दहेज प्रथा –

रैगर जाति में दहेज की प्रथा बिलकुल नहीं थी, हां, ऐसा करने वालों के बच्‍चों की शादियों में बाधा की संभावना बनी रहती थी, क्‍योंकि लोग ऐसा करने वालों को सम्‍मान की नजर से नहीं देखते थे । सबसे अच्‍छी बात थी कि लड़की जिसके घर पैदा होती थी, उस पर बोझ नहीं बनने दिया जाता था । अब भी कई पुराने लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि लड़की दान करने वाला ही बड़ा होता है । उधर मामा-नाना की ओर से उसका हाथ बंटाया जाता था, इधर लड़के वाला भी दहेज तो कतई मांगता ही नहीं था, बल्कि शादी के खर्चे के तौर पर निकाली जाने वाली पंचायत द्वारा निर्धारित राशि खुशी-खुशी अदा करता था, लेकिन आज के इस आधुनिक युग में दूसरों की देखादेख हमारी जाति में यह बीमारी के रूप में प्रवेश कर गई है, जिससे जाति के गरीब लोगों के लिए लड़की की शादी करना बहुत पीड़ादाई बनता जा रहा है । इस पर लगाम लगाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जो की सख्‍त आवश्‍यकता है ।

बाल विवाह –

बचपन जो एक गीली मिट्टी के घडे के समान होता है इसे जिस रूप में ढाला जाए वो उस रूप में ढल जाता है । जिस उम्र में बच्चे खेलने – कूदते है अगर उस उमर में उनका विवाह करा दिया जाये तो उनका जीवन खराब हो जाता है ! तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नही हो पा रहा है । बालविवाह एक अपराध है, इसकी रोकथाम के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना चाहिए । लोगों को जागरूक होकर इस सामाजिक बुराई को समाप्त करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए । बाल-विवाह करना सन्‍तान के विकास में अवरोध पैदा करना मूर्खता पूर्ण कार्य है । जब लड़के-लड़की युवा हो जायें तथा घर गृहस्‍थी का भार संभालने योग्‍य हो जायें तभी उनका विवाह करना चाहिये । इससे उनका भावी जीवन भी सुखी होगा । कम आयु में विवाह करने से जल्‍दी ही सन्‍तान उत्‍पन्‍न होगी जिससे माता-पिता व सन्‍तान भी अस्‍वस्‍थ्‍य व अशक्‍त ही रहेंगे । बाल विवाह का सबसे बड़ा कारण लिंगभेद और अशिक्षा है साथ ही लड़कियों को कम रुतबा दिया जाना एवं उन्हें आर्थिक बोझ समझना । क्या इसके पीछे आज भी अज्ञानता ही जिमेदार है या फिर धार्मिक, सामाजिक मान्यताएँ और रीति-रिवाज ही इसका मुख्‍य कारण है, कारण चाहे कोई भी हो इसका खामियाजा तो बच्चों को ही भुगतना पड़ता है ! रैगर समाज में शहरों में तो यह प्रथा प्रचलित नहीं पर गांवों में अभी भी समाज के बंधु अपने बच्‍चों की शादी कम उम्र में ही कर देते हैं । लेकिन गोना 17-18 वर्ष पूर्ण होने के पश्‍यात् ही करते हैं । आजकल कानून के डर से इसमें कमी जरूर आई है लेकिन फिर भी इसमें समाज को अपनी भागीदारी निभाते हुए ओर अधिक सुधार लाने की आवश्‍यकता है ।
कभी कभी तो यह भी देखने में आता है कि कम उम्र में बाल विवाह कर दिया जाता है और बाद में जाकर लड़का उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त कर लेता है और फिर वह बड़ा होकर बचपन किये गए विवाह को ठुकरा देता है और अपनी पत्‍नी से तलाक ले लेता है । क्‍योंकि विवाह के पश्‍चात् माँ – बाप कन्‍या को शिक्षा से वंचित कर देते है और उस कन्‍या के लिए जीवन नर्क के समान हो जाता है । जो भी हो इस कुप्रथा का अंत होना बहुत जरूरी है । वैसे हमारे देश में बालविवाह रोकने के लिए कानून मौजूद है । लेकिन कानून के सहारे इसे रोका नहीं जा सकता । बालविवाह एक सामाजिक समस्या है । अत:इसका निदान सामाजिक जागरूकता से ही सम्भव है । सो समाज को आगे आना होगा तथा बालिका शिक्षा को और बढ़ावा देना होगा । आज युवा वर्ग को आगे आकर इसके विरूद्ध आवाज उठानी होगी और अपने परिवार व समाज के लोगों को इस कुप्रथा को खत्‍म करने के लिए जागरूक करना होगा ।

निष्‍कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि यदि अपनी ज्‍वलंत समस्‍याओं के समाधान के लिए सक्रिय पहल नहीं करेंगे, तो इतनी बड़ी संख्‍या वाली जाति होने के बावजूद वो सम्‍मान और अधिकार प्राप्‍त नहीं होंगे, जो कम संख्‍या वाली दूसरी जाति के लोग संगठन के बल पर हाशिल कर लेंगे । संगठन के स्‍वरूप के बारे में गुरु रविदास जी ने कहा है –

”सत संगति मिलि रहिए माधउ जैसे मधुप मखीरा”

      गुरु रविदासजी ने इस पद में फरमाया है कि हम ऐसा संगठन बनाएँ, जैसे मधुमक्खियाँ बनाती हैं । वे सब एक दूसरे के साथ एक छोटे से स्‍थान पर साथ-साथ रहती हैं और दुनिया को मधु अर्थात् शहद प्रदान करती हैं, जो बहुत मीठा होता है । वे एक साथ मिलकर जो संगठन (छत्ता) बनाती हैं, उससे मिले भी लोग मधु खाते हैं, क्‍योंकि किसी के छेड़ने पर या तंग करने पर मधुमक्खियां एक साथ अपने दुश्‍मन पर टूट पड़ती हैं, ऐसे ही संगठन आज की स्थिति में कारगर हैं । समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों को दूर करें व प्रगतिशील बातों की ओर ध्‍यान देकर समाज उत्‍थान हेतु उन्‍हें क्रियान्वित करें तभी हमारे समाज की उन्‍नति सम्‍भव है ।

हमारी जाति की पूर्व में स्थिति बहुत ही दयनीय थी । इसके लिये जहां स्‍वर्ण व जागीरदार लोग दोषी थे, वहीं हममें भी कई प्रकार की कमियां होती थी । किन्‍तु अब समय बदल गया है, समाज में शिक्षा का प्रसार भी काफी हो गया है । अन्‍य जातियों के लोग भी अपनी कुरीतियों तथा अन्‍य कमियों को दूरकर समाज में आवश्‍यक सुधार कर रहे है । अत: हमारे समाज में भी प्रगति हेतु आवश्‍यक सुधार कर रहे है । अत: हमारे समाज में भी प्रगति हेतु आवश्‍यक सुधार होने चाहिए । इस विषय में मैं (लेखक:स्‍व.रूपचन्‍द जलुथरिया) अपने समाज सुधार हेतु कुछ सुझाव प्रस्‍तुत कर रहा हुँ, जो निम्‍न प्रकार है :-

(क). शिक्षा का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार :-

1. अनिवार्य शिक्षा :- समाज में 14 वर्ष तक के सभी बालक-बालिकाओं को शिक्षा अनिवार्य रूप से दिलवाई जाये । सामाजिक उन्‍नति हेतु प्रत्‍येक को शिक्षित होना अति आवश्‍यक है ।

2. बालिका शिक्षा पर जोर देना :- जैसा कि कहा जाता है कि लड़के को शिक्षा दिलाना तो उसे स्‍वयम् को ही शिक्षित करना है किन्‍तु लड़की को शिक्षा दिलाना उसके सारे परिवार को शिक्षित करना है । शिक्षित लड़की अपनी भावी पी‍ढ़ि को शिक्षा तो दिलायेगी ही उन्‍हें पूर्णत: सुशिक्षित भी बनायेगी । अत: बालिका शिक्षा पर विशेष ध्‍यान चाहिए । जो साधन सम्‍पन्‍न है वे चाहे तो उच्‍च शिक्षा व मेडिकल इंजीनियरिंग आदि की शिक्षा भी दिला सकते है । किन्‍तु उच्‍च शिक्षा दिलाते समय यह अवश्‍य विचार कर लें कि समाज में उनके योग्‍य वर तथा धर तलाशने में व रिश्‍ता करने में कुछ पेरशानियां होने लग गई है । अब अनेक जगह लड़कों की पढ़ाई का ग्राफ गिरने लग गया है, और अधिकतर पढ़े लिखे लड़के बेरोजगार भी होते है । जो रोजगार शुदा है तथा डॉक्‍टर इंजीनियर कुछ योग्‍य लड़कों को दूसरी जाति वाले उचकाकर ले जाते है ।

3. प्रौढ़ शिक्षा की ओर ध्‍यान देना :- हमारे समाज में शिक्षा का आंकड़ा बहुत कम होने के कारण जहां तक सम्‍भव हो शिक्षा में रूचि रखने वाले लोग अपने परिवार के प्रोढ़ों को भी अवश्‍य शिक्षित बनाये व अन्‍य लोगों को भी प्रेरित करें ।

4. शिक्षा में गुणात्‍मक सुधार :- हमारी जाति में शिक्षा का प्रचार-प्रसार तो ठिक ही हो रहा है । आज छोटे-छोटे गांवों में भी अनेक बी.ए., एम.ए. व अन्‍य डिग्री प्राप्‍त युवक मिल जायेंगे किन्‍तु उनमें वांछित योग्‍यता के अभाव में बेरोजगार होकर इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं । हमारे समाज में उच्‍च पदों पर बहुत ही कम व्‍यक्ति ही जाते हैं जो नगण्‍य से है । अत: शिक्षा में गुणात्‍मक सुधार की आवश्‍यकता है ताकि किसी भी प्रतियोंगिता में उत्तीर्ण होकर, उच्‍च पद पर नियुक्‍त होकर अपना व जाति का नाम रोशन कर सके ।

5. प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को प्रोत्‍साहित करना :- समाज के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को सामाजिक संगठन तथा व्‍यक्तिगत स्‍तर पर प्रोत्‍साहन हेतु छात्रवृति, पठन सामग्री व अन्‍य आवश्‍यक सामान में सहायता करें, उन्‍हें समारोह में पारितोष्‍क व मेडल दिये जाये । इससे अन्‍य छात्र-छात्रायें भी उनके जैसा बनने के लिए प्रोत्‍साहित होंगे ।

6. चारित्रिक शिष्‍टाचार की शिक्षा भी देना :- आज कल नये वातावरण, सिनेमा व टेलीविजन के कारण कुछ युवा वर्ग के पाँव फिसलने लग गये है और वे पढ़ाई लिखाई बन्‍द कर, दूर भागकर चोरी छुपे शादी विवाह रचा लेते हैं, कुछ कुसंगत के कारण चोरी, हत्‍या, बलात्‍कार व अन्‍य कई प्रकार के अनैतिक व जघन्‍य अपराधिक कार्य करने लग जाते है । अत: हर माता-पिता को चाहिये कि लड़के-लड़कियों के चरित्र व कार्यों पर पूर्ण्‍ निगाह रखें । उन्‍हें शिष्‍टाचार का पूरा-पूरा ज्ञान दें व बोलचाल तथा व्‍यवहार का भी ज्ञान दे ।

(ख). सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाना :- आज के बदलते हुये परिवेश में हर समाज अपनी प्रचीन सामाजिक कुरीतियों को शनै: शनै: समाप्‍त कर रहे हैं और आवश्‍यकतानुसार संशोधन भी कर रहे है । हमें भी हमारे समाज में व्‍याप्‍त निम्‍नलिखित कुरीतियों में सुधार करना व अंकुश लगाना चाहिए । हमारे पंच-पंचायत तथा सामाजिक संगठन इस ओर कठोर कदम उठाये –

1. मृत्‍युभोज, गंगा भोज व कोंली आदि विशाल भोज पर अंकुश लगाना :- यद्यपि दौसा व जयपुर सम्‍मेलन के समय से ही समाज सुधारक इन्‍हें कम तथा बन्‍द करने में लगे हुये है । अब इमें काफी सुधार व कमी तो हुई है फिर भी अनेक क्षेत्रों में अब भी भोज विशाल रुप में हो रहे है ऐसा भी देखा जा रहा है कि कई लोग तो अपने देवाल रिश्‍तेदारों के बल पर ही ऐसे विशाल भोज का आयोजन करते देखे गये है जो निन्‍दनीय है । इन्‍हें जहां तक हो बन्‍द किया जाना चाहिए अन्‍यथा दस्‍तूरी तौर पर बहुत ही कम मात्रा में ही किया जाय तथा देवाल भी होड़ में न पड़कर निश्चित व कम राशि ही दें ।

2. सगाई,विवाह में फिजूल खर्चें पर अंकुश लगाना :- आज कल सगाई की लेन-देन भी दो-तीन तथा कहीं-कहीं तो चार-चार स्‍टेज पर भी होने लग गई जिनमें कई तो शादी जैसी तैयारी व खर्चा करने लग गये और कुछ तो दो-तीन लाख तक भी खर्च करते देखे जा रहे है । इसे सीमित किया जाये व दस्‍तूर भी एक ही स्‍तर पर हो ।

इसी प्रकार शादी में भी बारातियों की संख्‍या बहुत अधिक होने लग गई है और कई जगह तो दोनों ओर की संख्‍या दो-तीन व चार-पॉच हजार तक होने लग गई है । इसे भी कम किया जाय । बरात का खाना एक टाईम का ही हो तथा शादी भी दिन की ही रखनी चाहिए हो सके तो विवाह भी सामूहिक विवाहों में ही करना चाहिये ।

3 दहेज व अन्‍य लेन देन भी सीमित हो :- अब लोग देखा-देखी अपनी आर्थिक दशा से अधिक भी लेन-देन व दहेज या सामान देने लग गये है उनका यह दृष्टिकोण भी होता है कि लड़के वाले खुश रहेंगें तो लड़की को ठीक रखेंगे । इस विषय में दोनों पक्षों को ही सोचना चाहिये । दहेज व लेन-देन की मात्रा सीमित रखें और व्‍यर्थ की नई लाग न लगायें ।

यह सामाजिक कुरीरियों तथा सगाई-विवाह, दहेज, बारात व जामणा, पहरावणी पर यदि कोई व्‍यक्तिगत अंकुश लगावें तो वह कारगर नहीं होता इन्‍हें तो पंचायत व समाज संगठन व्‍दारा ही समाप्‍त कर अंकुश लगाया जा सकता है क्‍योंकि पहले कुछ लोगों ने ऐसा किया था इन सुधारवादी लोगों की लड़कियों की लोगों ने कम लेन-देन के कारण सम्‍बन्‍ध ही तोड़ दिये थे ।

(ग). जन स्‍वास्‍थ्‍य सुधार कार्यों पर ध्‍यान देना :- हमें हमारे खान-पान व स्‍वास्‍थ्‍य पर भी ध्‍यान देना चाहिए तथा वासनाओं पर अंकुश लगाना चाहिए इसके लिए निम्‍न उपाय किये जाये –

1. नशा बन्‍दी पर जोर देना :- हमारे समाज में व्‍यक्तिगत और सामूहिक स्‍तर पर शराब का बहुत प्रचलन है हमारे समाज में जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक के सभी कार्यों में सामूहिक रूप से शराब का प्रयोग अवश्‍यम्‍भावी होता आया है । इससे एक ओर जहां धन की हानि तथा स्‍वास्‍थ्‍य में गरावट होती है वहीं अधिक पी लेने से कई जगह तो उधम, लड़ाई, झगड़ा व गाली-गलौच करके सामाजिक कार्य की दुर्गति ही कर देते है ।

अत: सभी प्रकार के सामाजिक कार्यों में सामूहिक रूप से शराब का प्रयोग करना तो बिल्‍कुल बन्‍द ही कर देना चाहिए तथा करने वालों को पंचायत व संगठन द्वारा दंडित कर देना चाहिए । इसके अतिरिक्‍त अन्‍य नशीली वस्‍तुयें जैसे भांग व गांजा गुटके आदि के सेवत भी बन्‍द कर दें ।

2. अंध विश्‍वासों को नहीं मानना :- अनेक लोग बीमारी तथा अन्‍य आपदाओं के समय अंध विश्‍वासियों के चक्‍कर में पड़ जाते है और स्‍याणे, भोपा, जोगी, मौलवी, झाडू-फूंक करने वाले ओझा तथा देवी-देवताओं के झूंठे चक्‍कर में पड़कर रूपये पैसे की बरबादी भी कर देते है व स्‍वास्‍थ्‍य में भी हानि करा लेते है । कई लोग तो जान भी गवां देते है । कई जगह तो लोग सामाजिक कार्यों में भी अंध विश्‍वासों में पड़कर बर्बाद हो जाते है । हमें ऐसे झूंठे व्‍यक्तियों से बचना चाहिये और बीमारी आदि में उचित निदान करवाना चाहिये ।

3. जनसंख्‍या पर नियंत्रण :- हमारे देश की जनसंख्‍या प्रतिवर्ष करोड़ों में बढ़ती जा रही है । पहले लोग कहते थे बहु परिवार सुखी, पर अब तो वह दु:खी होता है । आज अधिक सन्‍तात होने से उनका पोषण व सगाई ब्‍याह में ही गृहस्‍थी पूरी तरह दु:खी व परेशान हो जाता है । और उसकी उम्र ही पूरी हो जाती है । वह उन्‍हें भली प्रकार से न तो शिक्षित बना सकता है और न पूर्ण विकास ही । अत: सीमित परिवार रखने से सन्‍तान का पूर्ण विकास होगा व आप भी सुखी रहेंगे । आप परिवार नियोजन कर देश के विकास में भी सहयोगी होंगे ।

4. बाल विवाह पर रोक लगाना :- बाल-विवाह करना सन्‍तान के विकास में अवरोध पैदा करना मूर्खता पूर्ण कार्य है । जब लड़के-लड़की युवा हो जायें तथा घर गृहस्‍थी का भार संभालने योग्‍य हो जायें तभी उनका विवाह करना चाहिये । इससे उनका भावी जीवन भी सुखी होगा । कम आयु में विवाह करने से जल्‍दी ही सन्‍तान उत्‍पन्‍न होगी जिससे माता-पिता व सन्‍तान भी अस्‍वस्‍थ्‍य व अशक्‍त ही रहेंगे ।

(छ). आर्थिक विकास पर जोर देना :- हमारे पुश्‍तैनी धन्‍धे तो लगभग छूट ही गये, न किसी के पास कृषि करने हेतु जमीन है, और जमीन है तो पानी भी नहीं है । लड़कों के पढ़ लिख जाने से वे मेहनत मजदूरी भी नहीं कर सकते । और नौकरियां मिलता भी लगभग समाप्‍त सा हो गया । जिससे बेरोजगारी की समस्‍या अधिक उग्र हो रही है । अत: रोजगार व आर्थिक विकास हेतु निम्‍न सुझाव प्रस्‍तुत है-

1. समाज में रोजगार के नये-नये आयाम स्‍थापित किये जायें :- आज कल रोजगार के नये-नये आयाम चालू हो रहे है और कम्‍प्‍यूटर युग आ गया है । अत: हमें भी हमारे युवाओं को इस ओर प्रेरित करना चाहिये । पुरानी परिपाठी को छोड़कर इस ओर विशष ध्‍यान दे, विशेष कर कम्‍प्‍यूटर सीखने पर ।

2. रोजगार सम्‍बंधी विशेष ट्रेनिंग लेना :- जो युवक शिक्षा में कमजोर हो तो उन्‍हें उच्‍च शिक्षा यानी बी.ए., एम.ए. न कराकर सैकेण्‍डरी के बाद ही किसी भी धंधे की ट्रेनिंग में भिजवा देना चाहिये । जैसे आई.टी.आई. में ही बिजली रेडियो, टी.वी. मै‍केनिक, टाईपिंग, दर्जी व खाती का काम आदि सिखाये ।

3. कृषि व उद्योग को प्रोत्‍साहन देना :- कृषि व कुटीर उद्योग कार्यों मे भी विशेष रूचि लेकर काम करना चाहिये तथा उद्योग विभाग, सहकारी विभाग व बैंक आदि से ऋण व अनुदान प्राप्‍त कर व्‍यवसाय को बढ़ाना चाहिये । इसके अतिरिक्‍त डेयरी उद्योग पर भी ध्‍यान देकर सहभागी बने । इन कार्यों से परिवार के सभी लोगों को रोजगार मिल जाता है ।

हमारे पारस्‍परिक भेदभाव भुलाकर संगठन को सुदृढ़ बनाएं तथा संगठन रूपी छोटे-छोटे नालों को जोड़कर माहन सुरसरी प्रवाहित करें व उनकी युवा व महिला शाखायें भी खोली जाये, तथा जिला तहसील परगना आदि प्रत्‍येक क्षेत्र में शाखायें खोली जाये ।

(च). समाज की महान विभूतियों को याद किया जाये :- हमारे समाज में अनेक महान पुरूष हुये है, जैसे- स्‍वामी ज्ञानस्‍परूप जी महाराज, स्‍वामी आत्‍माराम जी लक्ष्‍य अनेक महान त्‍यागी व समाज सुधारक हुये है । इसी प्रकार अपने अड़ोस-पड़ोस में गांव व शहर में भी ऐसी विभूतियां हुई है । उनको उनके जन्‍म व निर्वाण दिवस पर तथा अन्‍य सामाजिक समारोह में याद किया जाय और उनका उचित सम्‍मान किया जाय तथा वर्तमान पीढ़ि के समक्ष उनके कार्यों का बखान किया जाये । जिससे लोगों में समाज सेवा के प्रति जागरूकता बढ़ेगी ।

(छ). महिलाओं के साथ समानता व न्‍यायोचित व्‍यवहार करना :- महिलाओं के साथ अत्‍याचार न कर समान व न्‍यायोचित व्‍यवहार करे । उनके अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा करें तथा सामाजिक संगठनों में भी उन्‍हें सम्मिलित करे । वास्‍तव में नारी सम्‍मान व श्रद्धा की पात्र है, वह पुत्री बनकर आती है तथा पत्‍नी, माँ व दादी बन कर पुरूष वर्ग की सहृदय व पूर्ण तन्‍मयता से सेवा करती है । किसी ने कहा है कि :-

नारी नर की खान है, नारी नर की शान ।
नारी से नर ऊपजै, ध्रुव प्रहलाद समान ।।

अत: महिलाओं का उचित सम्‍मान करें और उन्‍हें समान व न्‍यायोंचित अधिकार प्रदान करें । उनके उचित कार्यों में बाधक न बने ।

(ज). राजनीति व सत्ता में भागीदार होना :- हमारे समाज की राजनीति व सत्ता में भागीदारी बहुत ही कम है । इस कमी के कारण हमारे अनेक आवश्‍यक कार्य भी नहीं होते और हम मुंह ताकते ही रह जाते है । अत: अधिक से अधिक लोगों को राजनीति में भी जाना चाहिये । आप अपनी पसन्‍द की किसी भी पार्टी में सम्मिलित होकर कार्य करें । यदि आप ठोस कार्यकर्त्ता होंगे तो पार्टी आपको चुनाव में टिकिट भी देगी । वैसे मात्र चुनाव में समय टिकिट मांगने पर कोई नहीं देता । चुनाव के समय वैसे ही टिकिट मांगते व एक दूसरे की टांग खींचने कारण हमारी शक्ति क्षीण ही होती है । हमारी जाति के कई योग्‍य व्‍यक्ति चुनाव के समय ही पार्टियों से टिकिट मांगते हैं, जिन्‍हें नहीं मिलता । ऐसे लोग पहले से ही किसी भी पार्टी में जाकर सक्रिय कार्य करें तभी टिकिट व सफलता मिलेगी ।

हमें ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक सभी क्षेत्रों के चुनावों में अधिक से अधिक भाग लेना चाहिए एवम् समाज संगठन के माध्‍यम से एक पद के लिए मिलकर एक ही उम्‍मीदवार खड़ा करना चाहिये ताकि वोटों का बंटवारा न होने से हमारे उम्‍मीदवार की जीत सुनिश्चित हो जाये । प्राय: पंचायत चुनावों में यह देखा गया है कि एक सीट के लिए कई जाति बन्‍धु खडे हो जाने से हमारी 75% आबादी होने पर भी हमारे उम्‍मीदवार हार जाते है । हमारे कार्यकर्त्ताओं व राजनेताओं को इस ओर विशेष ध्‍यान देना चाहिये ।

अत: समाज के सभी युवा व प्रौढ़ बुद्धिजीवियों से मेरा यही आग्रह है कि वर्तमान परिवेश में समाज संगठन के महत्त्व को समझें और संगठित होकर समाज सुधार सम्‍बंधित सभी बातों पर पुरजोर ध्‍यान दें । समाज में व्‍याप्‍त बुराईयों को दूर करें व प्रगतिशील बातों की ओर ध्‍यान देकर समाज उत्‍थान हेतु उन्‍हें क्रियान्वित करें तभी हमारे समाज की उन्‍नति सम्‍भव है । धन्‍यवाद !

(साभार- स्‍व. श्री रूपचन्‍द जलुथरिया कृत ‘रैगर जाति का इतिहास’)