समाज के रत्‍न

Raigar Dimond

 

रैगर समाज में ऐसी अनकों दिव्‍य व्‍यक्तित्‍व की धनी महानात्‍माओं का जन्‍म हुआ । जिन्‍होंने हमारे समाज को विकास की एक नई राह दिखाई ऐसी महान आत्‍माओं को हम कोटी-कोटी प्रणाम करते हुए उनके आभारी है जिनके सदकर्मों से समाज गोरवान्वित हुआ है । ये ही हमारे समाज के कोहीनूर के हीरे है अथात् हमारे समाज के ‘रत्‍न’ है । समाज के इन रत्‍नों ने हमारी आने वाली भवी पीढ़ि के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा स्‍त्रोत बनकर समाज को और गौरवशाली बनाते हुए एक आदर्श व अनुपम उदाहरण प्रस्‍तुत किया है । समाज में अनेको ऐसी विभुतियों हुई है जिन्‍होंने समाज के साथ-साथ देश के लिए भी अपना बलिदान दिया है । धर्मदास जी शास्‍त्री, सेठ श्री भंवर लाल जी नवल एवं श्री एस.के. दास साहब हमारे समाज के ऐसे रत्‍न है जिनका समाज हमेशा आभारी रहेगा इनके सदकर्मों एवम् महान कार्यों ने समाज का मान-सम्‍मान बढ़ाया है ओर समाज को एक नई दिशा और प्रगति प्रदान की है जैसे धर्मदास जी शास्‍त्री ने चतुर्थ अखिल भारतीय रैगर महासम्‍मेलन जयपुर में तत्‍कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को समाज के बीच लाकर समाज की अखण्‍ड एकता से अवगत कराया । सेठ भंवर लाल जी नवल ने समाज एवं गरीब वर्ग को आगे बढ़ाने के उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए आज तक 1400 जोड़ों का निशुल्‍क विवाह सम्‍मेलन के माध्‍यम से किये है एवं अनकों छात्रावास अपने खर्च से बना कर प्रदान किये तथा इनके निवास स्‍थान छोटी खाटू में एक विशाल हास्‍पिटल का निर्माण कराते हुए शासन को समर्पित किया जो समाज के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है ओर कर रहे है । श्री एस.के. दास जी ने अपनी उच्‍च शासकीय सेवाऐं देते हुए समाज के गौरव को बढ़ाया है । समाज में ऐसे अनेको रत्‍न है जिन्‍होंने अपने सदकार्मों से समाज और देश के सामने एक नई मिसाल रखी है व अपनी कार्यकुशलता, प्रतिभा, कुशल प्रशासक, नेतृत्व दक्ष, विकास के आधार पुरुष, निष्काम सेवा भावी समाज को सर्वपरी माननेते हुए समाज सेवी उच्‍च विचारों से समाज और देश को धन्‍य किया है । ऐसे दिव्य चरित्र दानवीर भामाशाह एवं उच्‍च पदो पर आशीन समाज की ये महान् विभूतियां रैगर समाज का गौरव बढ़ा रही है ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री का जन्‍म 10 मार्च, 1937 को सिंध हैदराबाद में हुआ । इनके पिता का नाम श्री नाथूरामजी खटनावलिया तथा माता का नाम श्रीमती सोनीदेवी था । श्री नाथूरामजी के 3 पूत्र तथा 2 पुत्रियाँ हैं । तीन पुत्र हैं- श्री हरदेव, श्री धर्मदास शास्‍त्री तथा श्री ईश्‍वरदास । श्री हरदेव तथा श्री ईश्‍वरदास दिल्‍ली में रह रहे हैं ।

श्री नाथूरामजी का परिवार भारत-पाक विभाजन के समय सन् 1947 में सिंध हैदराबाद से निकलकर भारत आ गया । पाकिस्‍तान से आते ही श्री धर्मदास और उनके परिवार को बिजोलिया (राजस्‍थान) में शरणार्थी केम्‍प में रहना पड़ा । बिजोलिया में करीब एक साल रहे । वर्ष 1948-49 में श्री धर्मदासजी का परिवार बिजोलिया से दिल्‍ली आ गया । श्री धर्मदासजी की शिक्षा दिल्‍ली में हुई । उन्‍होंने साहित्‍य अलंकार एवं शास्‍त्री की परीक्षा उत्‍तीर्ण की । शास्‍त्री की उपाधि के कारण ही वे धर्मदास शास्‍त्री के नाम से जाने जाते थे । उनकी उच्‍च शिक्षा भी दिल्‍ली में ही हुई । उन्‍होंने हिन्‍दी में एम.ए. किया । उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी । आजीविका का कोई साधन नहीं था । इसलिए उन्‍होंने दिल्‍ली पब्लिक कॉलेज में 10 साल तक अध्‍यापन का कार्य किया ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री का विवाह सन् 1956 में श्री भोलारामजी तोंणगरिया की सुपुत्री यशोदा के साथ हुआ । श्री भोलाराम तोंणगरिया रैगर समाज के पहले व्‍यक्ति थे जो सिंध हैदराबद के म्‍युनिसिपल कमीशनर रहे तथा अखिल भारतीय रैगर महासभा के पहले प्रधान रहे । श्री धर्मदास शास्‍त्री के 2 पुत्र एवं 4 पुत्रियाँ हैं । एक पुत्र श्री मुकेश का देहांत हो चुका है तथा दुसरा पुत्र श्री इन्‍द्रजीत शास्‍त्री दिल्‍ली में रह रहें हैं ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री का राज‍न‍ीति में पदार्पण सन् 1967 में हुआ जब वे दिल्‍ली नगर निगम के सदस्‍य चुने गए । इनके पश्‍चात् 1977 में महानगर परिषद, दिल्‍ली के सदस्‍य चुने गए और विपक्ष का नेता बनने का अवसर मिला । विपक्ष का नेता बनना एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी । वे कांग्रेस पार्टी से सम्‍बद्ध थे । वर्ष 1980 में कांग्रेस उम्‍मीदवार के रूप में करोल बाग से लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीते । वे कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता थे । वे भारत की तात्‍कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के बहुत नजदीक समझे जाते थे । दिल्‍ली की राजनीति में उनकी भूमिका प्रभावी हो गई थी । श्री सज्‍जन कुमार जैसे नेता तो श्री धर्मदास को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे । सन् 1984 में जयपुर में आयोजित अखिल भारतीय चतुर्थ रैगर महासम्‍मेलन में लाखों की भीड़ जुटा कर श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समक्ष रैगर समाज की शक्ति का शानदार प्रदर्शन किया । भारत की तात्‍कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी इस सम्‍मेलन को सम्‍बोधित करने आई थी । श्रीमती इन्दिरा गाँधी को रैगर समाज के बीच लाकर खड़ा करने की ताकत श्री धर्मदास शास्‍त्री की ही थी । यह एक ऐतिहासिक सम्‍मेलन था । इसके बाद सन् 1986 में अखिल भारतीय पंचम रैगर महा सम्‍मेलन विज्ञान भवन दिल्‍ली में आयोजित किया गया । उसमें भारत के तात्‍कालीन राष्‍ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह जी पधारे और सम्‍मेलन को सम्‍बोधित किया । विज्ञान भवन में रैगर महासम्‍मेलन आयोजित करने का रैगर समाज का सपना श्री धर्मदासजी शास्‍त्री ने पूरा किया । शास्‍त्रीजी ने उपरोक्‍त दो ऐतिहासिक रैगर सम्‍मेलन आयोजित कर रैगर समाज को अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहचान दिलाई ।

इस बीच सन् 1982 में अपनी बेटी की शादी का एक भव्‍य आयोजन कर शास्‍त्रीजी ने अपने बढ़ते राज‍नीतिक एवं सामाजिक रिश्‍तों की तरफ सबका ध्‍यान आकर्षित किया । सन् 1982 में श्री धर्मदास शास्‍त्री ने अपनी सबसे बड़ी बेटी सावित्री का विवाह दिल्‍ली के एक सम्‍मानित परिवार में किया । अपनी बेटी के इस विवाह का भव्‍य आयोजन बेमिसाल था । इस विवाह समारोह में विश्‍व स्‍तरीय शक्तिशाली नेता भारत की तात्‍कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी स्‍वयं सावित्री को आशीर्वाद देने पहुँची । श्री ज्ञानी जैलसिंहजी भी इस विवाह समारोह में पधारे । कई केन्द्रिय मंत्री और कांग्रेस तथा अन्‍य राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेता इस विवाह समारोह में पहुँचे और शास्‍त्रीजी के मेहमान बने । कई प्रदेश के मुख्‍यमंत्रियों तथा राज्‍यपालों ने भी इस विवाह समारोह में शिरकत की । रैगर समाज में इससे पहले शादी का ऐसा भव्‍य आयोजन कभी नहीं हुआ था । इस शादी की भोजन तथा ट्राफिक व्‍यवस्‍था देखने लायक थी । बेटी की शादी के भव्‍य, विशाल और विशिष्‍ट आयोजन ने श्री धर्मदास शास्‍त्री के प्रगाढ़ राजनीतिक और सामाजिक रिश्‍तों को उजागर किया । उनकी सामाजिक प्रतिष्‍ठा को इस आयोजन ने बहुत आगे बढ़ाया ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री की बढ़ती हुई राज‍नीतिक और सामाजिक ताकत ने दिल्‍ली की राजनीति में पहले से जमे हुए एच.के.एल. भगत जैसे नेताओं को हिलाकर रख दिया । वे श्री धर्मदास शास्‍त्री को अपना प्रतिद्वन्‍दी समझने लगे । शास्‍त्रीजी की छवि को धूमिल करने में लग गए । इसलिए सन् 1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्‍या के बाद दिल्‍ली में हुए सिख विरोधी दंगे भड़काने जैसे आरोज श्री धर्मदास शास्‍त्री पर लगाए गए । उनके विरूद्ध सिखों के खिलाफ दंगे भड़काने के मुकदमे भी दर्ज किए गए मगर कोई आरोज उनके खिलाफ साबित नहीं हो सका । इन झूठे आरोपों से शास्‍त्रीजी को भारी आघात लगा ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री रैगर समाज के लोकप्रिय और एक छत्र नेता थे । इसलिए वे सन् 1984 से 2000 तक अखिल भारतीय रैगर महासभा के अध्‍यक्ष रहे । उनका राजनीतिक और सामाजिक कद इतना ऊंचा था की कोई अन्‍य व्‍यक्ति अध्‍यक्ष पद के लिए उनके सामने खड़ा होने की हिम्‍मत नहीं कर सकता था । शास्‍त्रीजी धर्मगुरू स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूप शताब्‍दी समारोह एवं अखिल भारतीय रैगर महासभा स्‍वर्ण जयंति समारोह 6-7 अक्‍टूबर, 1995 के मुख्‍य संरक्षक रहे । श्री धर्मदास शास्‍त्री वह व्‍यक्ति थे जिन्‍होंने स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूपजी महाराज को सन् 1988 में सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, दिल्‍ली में भारत के तात्‍कालीन उप राष्‍ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा के हाथों से ‘धर्मगुरू’ की उपाधि दिलवाई । उन्‍होंने सन् 1986 में विज्ञान भवन दिल्‍ली में आयोजित अखिल भारतीय पंचम् रैगर महासम्‍मेलन में रैगर समाज के महात्‍माओं- स्‍वामी ज्ञानस्‍वरूपजी महाराज, स्‍वामी आत्‍मारामजी लक्ष्‍य, स्‍वामी रामानन्‍दजी महाराज तथा स्‍वामी गोपालरामजी महाराज को ‘रैगर रत्‍न’ की उपाधि तथा रैगर समाज के अन्‍य गण्‍यमान्‍य समाज सेवियों को ‘रैगर भूषण’ आदि उपाधियों से भारत के तात्‍कालीन राष्‍ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह के कर-कमलों से अलंकृत करवाया ।

श्री धर्मदास शास्‍त्री ने अपने जीवन में कई उतार-चढाव देखे । भारत-पाक विभाजन की त्रासदी भोगी तो स्‍वतंत्र भारत की संसद (लोकसभा) का सदस्‍य बने का उनका सपना भी पूरा हुआ । वे गरीब और अभावों की जिन्‍दगी जीने को मजबूर हुए तो अमीरी का आलम भी देखा । वे झोंपड़ी से उठकर बंगलों तक पहुँचे । श्री धर्मदास शास्‍त्री एक महान राजनेता तथा समाजसेवी थे । उन्‍होंने रैगर समाज को गौरव, गरिमा और ऊंचाइयाँ प्रदान की । रैगर जाति के इतिहास में उनका नाम अमर रहेगा ।

16 जनवरी, 2006 को श्री धर्मदास शास्‍त्री का दिल्‍ली में निधन हो गया । रैगर समाज का दैदीप्‍यमान सूरज हमेशा के लिए अस्‍त हो गया ।

 

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत ‘रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति’)

Bhawar lal Nawal

 

श्री भवंरलाल नवल का जन्‍म फरवरी 1947 में नागौर जिले के ग्राम छोटी खाटू में श्री हजारीमल नवल (खटनावलिया) के घर हुआ । इनकी माता का नाम श्रीमती मनोहर देवी है । श्री हजारीमल के पांच पुत्र एवं तीन पुत्रियों में से श्री भंवरलाल नवल सबसे बड़े पुत्र हैं । श्री हजारीमल की स्थिति कमजोर थी । श्री भवंरलाल नवल ने प्राथमिक एवं सैकण्‍ड्री तक की शिक्षा छोटी खाटू में ही सरकारी स्‍कूल में प्राप्‍त की । सैकण्‍ड्री स्‍कूल पास करने के बाद श्री नवल वर्ष 1964 उच्‍च शिक्षा के लिए जोधपुर गए । एस.एम.के. कॉलेज जोधपुर में दाखिला लिया । इस दौरान श्री भंवरलाल नवल रैगर समाज के श्री ज्ञानगंगा छात्रावास, नागोटी गेट में रहे । छात्रावास संस्‍थापक एवं प्रबन्‍धक स्‍वामी गोपालरामजी महाराज ने आपको भरपूर सहयोग और प्रोत्‍साहन दिया । घर की आर्थिक परिस्थितियाँ तथा पढ़ाई में कमजोर होने की वजह से वर्ष 1965 पढ़ाई छोड़ कर आप वापस अपने गांव छोटी खाटू आ गए । वर्ष 1966 में आपको अध्‍यापक की नौकरी मिल गई । प्राईमरी स्‍कूल ग्राम फरड़ौद जिला नागौर में अध्‍यापक नियुक्‍त हुए । वहाँ लगभग छ: माह नौकरी की । वहाँ से नौकरी छोड़ कर राजस्‍थान राज्‍य क्रय विक्रय संघ, जयपुर में बाबू (Clerk) के पद पर नियुक्‍त हुए । नौकरी के दौरान वे आलनियावास जिला नागौर निवासी श्री धन्‍नाराम कुरड़िया के सम्‍पर्क में आए । श्री धन्‍नाराम कुरड़िया का मुम्‍बई में चमड़े से निर्मित उत्‍पादों का बहुत बड़ा कारोबार था । उनका नाम विदेशी निर्यातकों में था । श्री भंवरलाल नवल सन् 1968 में बाबू की नौकरी छोड़कर मुम्‍बई चले गए और श्री धन्‍नाराम कुरड़िया के वहाँ सेल्‍समेन लग गए । श्री भंवरलाल नवल ने अपनी मेहनत और लगन से अपने आपको एक सफल सेल्‍समेन साबित किया । इस वजह से इन्‍हें निर्यात का कार्य भी सोंप दिया गया । श्री धन्‍नाराम कुरड़िया के वहाँ दो साल नौकरी की । वहाँ से नौकरी छोड़ने के बाद अपना स्‍वयं का इसी लाईन का व्‍यापार मुम्‍बई में शुरू किया । धीरे-धीरे निर्यात के क्षेत्र में प्रवेश किया । सन् 1977 तक अपना धन्‍धा अच्‍छा जमा दिया । सन् 1977 से 1981 तक श्री भंवरलाल नवल व्‍यापार के सम्‍बंध में अमेरिका गए और वहीं रहें । वर्ष 1982-83 में ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन किया जिसे स्‍वीकार कर लिया गया । इससे श्री भंवरलाल नवल को भारत से अमेरिका आने जाने की सुविधा मिल गई । अमेरिका में चमड़े के उत्‍पदों का व्‍यापार करते हुए उनका ध्‍यान दूसरे धन्‍धे की तरफ गया । पुराने मकानों को खरीद कर उसकी मररम्‍मत करके पुर: बेचने के धन्‍धे में रूचि ली । इसमें उन्‍हें अच्‍छा लाभ मिला । आज श्री भवंरलाल नवल की रैगर समाज में प्रतिष्‍ठा शीर्ष पर है । अमेरिका में भी बड़े व्‍यापारियों की सूची में उनका नाम जुड़ गया है । वे आज कई करोड़ों के मालिक है ।

हजारीमल मनोहरीदेवी चेरिटेबल ट्रस्‍ट- वर्ष 1994 में श्री भंवरलाल नवल ने एक ट्रस्‍ट बनाया जिसका नाम ‘हजारीमल मनोहरीदेवी चेरिटेबल ट्रस्‍ट’ रखा । ग्‍यारह सदस्‍यों के बोर्ड में श्री भंवरलाल नवल की माता श्रीमती मनोहरीदेवी अध्‍यक्ष है और ट्रस्‍ट का सारा कार्य श्री भंवरलाल नवल स्‍वयं देखते हैं । शेष सदस्‍यों की नियुक्ति अध्‍यक्ष द्वारा की जाती है । इस ट्रस्‍ट का उद्देश्‍य है समाज सुधार के कार्यों को प्रोत्‍साहन देना तथा शिक्षा को बढ़ावा देना । श्री नवल ने ज्‍यादातर धन सामूहिक विवाह तथा शिक्षा पर व्‍यय किया । सामूहिक विवाह का आयोजन 21 फरवरी, 2000 में दिल्‍ली में 21 जोड़ों से शुरू किया । इस आयोजन में दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित, श्री सुरेन्‍द्रपाल रातावाल, मीरां कंवरिया तथा मोतीलाल बाकोलिया सम्मिलित हुए । दिल्‍ली निवासी श्री ज्ञानचन्‍द्र खटनावलिया ने व्‍यवस्‍था की कमान संभाली थी । इसके पश्‍चात् 7 नवम्‍बर, 2000 को नागौर में 56 जोड़ों का सामूहिक विवाह सम्‍पन्‍न करवाया । इसमें मुख्‍यमंत्री राजस्‍थान श्री अशोक गहलोत, श्री छोगाराम बाकोलिया मंत्री राजस्‍थान सरकार तथा स्‍वामी गोपालरामजी महाराज प्रमुख रूप से शरीक हुए । 29 जनवरी, 2001 को मुम्‍बई में 20 जोड़ों का सामूहिक विवाह सम्‍पन्‍न करवाया । 27 फरवरी, 2002 को जोधपुर (राज.) में 65 जोड़ों का सामूहिक विवाह ट्रस्‍ट द्वारा सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न करवाया गया । इसमें मुख्‍य अतिथि श्री धर्मदास शास्‍त्री पूर्व सांसद थे । 17 फरवरी, 2002 को छोटी खाटू जिला नागौर में 27 जोड़ों का सामूहिक विवाह का ट्रस्‍ट द्वारा आयोजन किया गया । इसमें श्री छोगाराम बाकोलिया मंत्री राजस्‍थान सरकार मुख्‍य अतिथि थे । वर्ष 1994 में हजारीमल मनोहरदेवी चेरिटेबल ट्रस्‍ट ने गरीब और जरूरतमंद लोगों के नि:शुल्‍क इलाज के लिए ठक्‍करबापा कॉलोनी, मुम्‍बई में चिकित्‍सालय की स्‍थापना की । यह चिकित्‍सालय वर्ष 1994 से निरंतर सेवारत है । प्रतिदिन औसतन 300 बीमार लोगों को दवाइयें तथा परामर्श नि:शुल्‍क दिया जा रहा है । भवन, पूरा स्‍टाफ तथा दवाइयों का समस्‍त खर्चा ट्रस्‍ट उठाता है । इसके अलावा रैगर समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों की बेटियों की शादियों के लिए ब्‍यावर, पुष्‍कर, किशनगढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, पाली तथा चाकसू (जयपुर) आदि कई स्‍थानों पर सामूहिक विवाह का आयोजन कर पूर खर्चा ट्रस्‍ट ने उठाया । प्रत्‍येक सामूहिक विवाह में जोड़े को हजारीमल मनोहरदेवी चेरिटेबल ट्रस्‍ट की तरफ से दहेज में 1 पलंग, 2 कुर्सियाँ, 1 सेन्‍टर टेबल, पीतल-स्‍टील व कांसी के 31 बर्तन, 1 स्‍टोव, 1 सिलाई मशीन, 1 घड़ी, 2 तकिये, रजाई, गद्दा, 2 बेडशीट, दुलहन के कपड़े, डेढ तोला सोने के जेवर तथा 250 ग्राम चांदी के जेवर दिए गए । इसके अलावा समस्‍त मेहमानों का खाना, टेन्‍ट, लाईट तथा डेकोरेशन सहित तमाम खर्चा ट्रस्‍ट द्वारा वहन किया जाता रहा है । श्री भंवरलाल नवल ने लगभग 2500 जोड़ों का सामूहिक विवाह अकेले ने सम्‍पन्‍न करवाये हैं । एक व्‍यक्ति द्वारा सामूहिक विवाह सम्‍पन्‍न करवाने का यह सम्‍भवत: विश्‍व रिकार्ड है । श्री भंवरलाल नवल ने रैगर समाज के अलावा दूसरी जातियों के भी गरीब परिवारों की लड़कियों के विवाह करवाए हैं । वष 2002-2003 में श्री नवल ने नागौर तथा बिकानेर जिले में रहने वाले ब्राह्मण परिवारों की दो युवतियों का विवाह सम्‍पन्‍न करवाया । उनके विवाह का सम्‍पूर्ण खर्चा रूपये 70,000.00 श्री नवल ने उठया । वर्ष 2004 में नागौर जिले के नाथ सम्‍प्रदाय की 4 लड़कियों की शादियाँ ट्रस्‍ट द्वारा सम्‍पन्‍न करवाई गई जिसका पूरा खर्चा 1 लाख 50 हजार श्री भंवरलाल नवल ने वहन किया । इसी तरह वर्ष 2004 में 15 भंगी समाज की युवतियों की शादियाँ करवाई जिसका समस्‍त खर्चा रूपये 5 लाख 50 हजार ट्रस्‍ट ने अदा किया । इस तरह रैगर समाज के अलावा ब्राह्मण, नाथ तथा हरिजन समाज की लड़कियों के विवाह भी श्री नवल ने सम्‍पन्‍न करवाए है । एक अनुमान के अनुसार प्रत्‍येक विवाह पर रूपये 35,000.00 खर्च हुआ । इस तरह अब तक करोड़ों रूपये हजारीमल मनोहरदेवी चेरिटेबल ट्रस्‍ट ने सामूहिक विवाह पर खर्च करके गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों की मदद की है । यह सिलसिला अब भी जारी है । श्री नवल जी ने मिठूलाल जी उच्‍चैनिया (भिलवाड़ा, ग्राम आगूँचा, राजस्‍थान) की समाज सेवा से प्रभावित होकर हजारीमल मनोहरीदेवी चेरीटेबल ट्रस्‍ट, में एक ट्रस्‍टी का कार्यभार सौंप रखा है । इसका सारा लेनदेन श्री मिठूलाल जी के द्वारा ही किया जाता है ।

श्री भंवरलाल नवल ने केवल सामूहिक विवाह ही अपने खर्चे से सम्‍पन्‍न नहीं करवाए बल्कि सामाजिक सेवा के अन्‍य क्षेत्रों – शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य तथा अकाल राहत में भी खुले दिल से धन लगाकर विकास में भागीदारी निभाई है । वर्ष 2003 में मालपुरा जिला टोंक (राज.) में 101 जोड़ों का सामूहिक विवाह का भव्‍य आयोजन किया गया । यह सामूहिक विवाह का अब तक का सबसे बड़ा आयोजन है । इसका पूरा खर्चा श्री भंवरलाल नवल ने उठाया । सामूहिक विवाह के अतिरिक्‍त मालपुरा में स्‍कूलों में पढ़ने वाले गरीब परिवारों के 100 बच्‍चों को स्‍कूल की ड्रेसें भी वितरित की । वर्ष 2002 में अपने जन्‍म स्‍थान छोटी खाटू में श्री भंवरलाल नवल के कन्‍या सैकण्‍ड्री स्‍कूल भवन का निर्माण करवाया । इसमें 16×20 व.फु. के 16 कमरे बनवाये । इस भवन निर्माण पर रूपये 25 लाख व्‍यय हुए । वर्ष 2004 में भवन बर कर तैयार होने पर इसे शिक्षा विभाग को सुपुई कर दिया गया । अब यह स्‍कूल ‘श्री हजारीमल भंवरलाल नवल राजकीय कन्‍या सैकण्‍ड्री स्‍कूल, छोटी खाटू’ नाम से संचालित हो रही है ।

वर्ष 2002 में रूपये 11 लाख की लागत से एक बड़ा हॉल 16×12 व.फु. का राजकीय कन्‍या हायर सैकण्‍ड्री स्‍कूल, डेह जिला नागौर में बनवा कर दिया । वर्ष 2003 में एक मारूती वेन त‍था नेनरेटर राजकीय अस्‍पताल छोटी खाटू को भेंट की । श्री भंवरलाल नवल ने 14 अप्रल, 2004 को श्री ज्ञानगंगा छात्रावास नागौरी गेट, जोधपुर को 50 पलंग, 50 कुर्सियाँ तथा 50 टेबलें भेंट की । श्री नवल छात्र जीवन में एक वर्ष इस छात्रावास में रहे हैं । श्री भंवरलाल नवल ने झालावाड़ में 1000 कम्‍बलों का वितरण किया है ।

श्री भंवरलाल नवल द्वारा दिनांक 27.02.2002 को की गई घाषणा के मुताबिक खेतानाडी छात्रावास, जाधपुर में 40×70 व.फु. का एक भव्‍य सभा भवन रूपये 21 लाख की लागत से बनवा कर दिनांक 09.02.2005 को समाज को समर्पित किया गया । उद्घाटन श्रीमती मनोहरीदेवी पत्‍नी स्‍व. हजारीमल नवल के कर-कमलों से किया गया । विशिष्‍ठ अतिथि श्री भंवरलाल नवल थे । श्री नवल ने कोटा में रैगर छात्रावास निर्माण के लिए 8 लाख रूपये का आर्थिक सहयोग दिया है ।

श्री भंवरलाल नवल दया, करूणा और मानवीय संवेदनाओं की प्रतिमूर्ति है । वर्ष 2001, 2002 तथा 2003 में राजस्‍थान में पड़े भीषण अकाल में नागौर, चुरू तथा बीकानेर जिलों में श्री नवल ने जहाँ अनाज बांट कर गरीबों की मदद की वहाँ गांवों में घास (चार) पहुँचा कर हजारों पशुओं को मौत के मुँह में जाने से बचाया । अकाल राहत कार्यों में श्री नवल ने तीन वर्षों में लगभग 30 लाख रूपये व्‍यय किये ।

19 जून, 2008 को सेठ श्री भंवरलाल नवल ने दौसा में बन रहे रैगर छात्रावास का शिलान्‍यास किया और 11 लाख रूपये का आर्थिक योगदान दिया । 20 जून, 2008 को चाकसू जिला जयपुर में 29 जोड़ों का सामूहिक विवाह सम्‍पन्‍न हुआ जिसमें श्री भंवरलाल नवल ने 2 लाख रूपये विवाह समिति चाकसू को तथा 1 लाख्‍ा रूपये धर्मशाला निर्माण हेतु एवं एक-एक हजार रूपये प्रणय सूत्र में बंधने जा रहे प्रत्‍येक जोड़े उपहारस्‍वरूप भेंट किए । श्री नवल ने राजसमन्‍द, उदयपुर, चित्‍तैाड़गढ़ तथा भीलवाड़ा में रैगर छात्रावासों के निर्माण हेतु 11 लाख रूपये की राशि प्रारम्भिक तौर पर प्रदान की है । मगर निर्माण पूरा करवाने के लिए बाद में और आर्थिक सहयोग देने की अपेक्षा है ।

सेठ श्री भंवरलाल नवल द्वारा छोटी खाटू में 2 करोड़ रूपयों की लागत से हजारीमल मनोहरदेवी राजकीय चिकित्‍सालय का निर्माण करवाया जा रहा है । प्राप्‍त जानकारी के अनुसार श्री भंवरलाल नवल 2 करोड़ रूपयों की लागत से डीडवाना जिला नागौर में भी कन्‍या महाविद्यालय बनवाएंगे । सरकार द्वारा भूमि आवंटन होने पर डीडवाना में कॉलेज निर्माण का कार्य शुरू करवाने की योजना है ।

दानवीर सेठ श्री भंवरलाल नवल रैगर समाज के भामाशाह हैं तथा सादगी, शालीनता एवं विनम्रता की मिसाल है । उनमें किसी तरह का जरा-सा श्री अहम नहीं है । अमेरिका (न्‍यूयार्क) में बस जाने के बाद भी श्री नवल अपनी मातृभूमि तथा अपने समाज को नहीं भूले हैं । ऐसे दानवीर और समाजसेवी श्री नवल पर रैगर समाज को गर्व है ।

 

Viagra Jelly without prescription, buy zithromax. (साभार- चन्‍दनमल नवल कृत ‘रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति’)

S.K. Das (Mundotiya)

 

जन्‍म एवं शिक्षा – श्री एस.के. दास पुत्र श्री पन्‍नालालजी मूण्‍डोतिया का जन्‍म ग्राम नेछवा जिला सीकर (राजस्‍थान) में 9 मार्च, 1945 को रैगर समाज के एक मध्‍यवर्गीय परिवार में हुआ । श्री दास की प्रारम्‍भिक शिक्षा नेछवा में ग्राम भारती विद्यापीठ कोठ्यारी में हुई । बी.काम. की डिग्री कानोंरिया कॉलेज, मुकनदगढ जिला झुंझुन से प्राप्‍त की । उच्‍च शिक्षा के लिए जयपुर गए । राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर से आपने एम.ए. अर्थशास्‍त्र में किया ।

व्‍याख्‍याता – वर्ष 1967 में राजकीय महाविद्यालय, भीनमाल में व्‍याख्‍याता अर्थशास्‍त्र के पद पर नियुक्‍त रहे । वर्ष 1968 में राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर तथा दौसा में आपने व्‍याख्‍याता अर्थशास्‍त्र के पद पर कार्य किया ।

भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) – वर्ष 1969 में भारतीय पुलिस सेवा में आपका चयन हुआ । आपको मध्‍य प्रदेश काडर मिला । दिसम्‍बर, 1970 तक माउण्‍ट आबू एवं मसूरी में आपने आई.पी.एस. का प्रशिक्षण प्राप्‍त किया । दिसम्‍बर, 1972 तक दो वर्ष फील्‍ड ट्रेनिंग के दौरान आप सहायक महानिरीक्षक पुलिस, इन्‍दौर में नियुक्‍त रहे । इसके बाद जशपुर नगर में अनुविभागीय अधिकारी पदस्‍थापित रहे ।

मणिपुर में नियुक्‍त – जुलाई, 1973 से फरवरी, 1975 तक लगभग डेढ साल मणिपुर के करॉग जिले में नागा समस्‍या के समाधान हेतु 14वीं बटालियन विशेष शस्‍त्र बल में आपका पदस्‍थापन रहा । वहाँ आपने प्रशंसनीय कार्य किया । इसलिए वर्ष 1973 में भारत सरकार ने आपको ‘कठिन सेवा पदक’ से सम्‍मानित किया ।

जिला पुलिस अधीक्षक – फरवरी, 1975 से जनवरी, 1976 तक श्री दास मध्‍य प्रदेश के जिला मुरैना में अतिरिक्‍त पुलिस अधीक्षक नियुक्‍त रहे । मुरैना जिले में कुख्‍यात डकैत गेंगों का आतंक था । आपने अपनी नियुक्ति के दौरान नबाव कहार तथा हीरा बाबू डकैत गेंगों का सफाया किया । इसके लिए मध्‍य प्रदेश शासन ने आपको प्रशंसा पत्र प्रदान किया ।

जनवरी, 1976 से अप्रेल, 1978 तक लगभग सवा दो साल आप जिला पुलिस अधीक्षक, नरसिंहपुर तथा अप्रेल, 1978 से अप्रेल, 1980 तक दो साल जिला पुलिस अधीक्षक, भीण्‍ड नियुक्‍त रहे । भीण्‍ड जिले में नियुक्ति के दौरान आपने कुख्‍यात डकैत बलवानसिंह एं कमलाबाई गेंग का सफाया किया और मलखानसिंह गेंग से कई बार मुठभेड़ें हुईं ।

जून, 1984 से जून, 1986 तक दो साल जिला पुलिस अधीक्षक, रायपुर (अब छत्‍तीसगढ़ की राजधानी) में नियुक्‍त रहे । रायपुर आबादी की दृष्‍ट‍ि से मध्‍यप्रदेश का सबसे बड़ा जिला था । उस समय अकेले रायपुर जिले की आबादी 40 लाख थी । रायपुर जिले में 3 सांसद और 20 विधायक चुने जाते थे । तात्‍कालीन रायपुर के अब 4 जिले बन चुके हैं । श्री दास ने रायपुर में पुलिस अधीक्षक नियुक्‍त रहते हुए जिले की कानून एवं व्‍यवस्‍था को बखूबी नियंत्रण में रखा और अपनी प्रशासनिक योग्‍यता का परिचय दिया ।

उप महानिरीक्षक रेंज – आप भोपाल रेंज में दो बार उप महानिरीक्षक नियुक्‍त रहे । प्रथम बार सितम्‍बर, 1987 से जनवरी, 1988 तक तथा दूसरी बार अप्रेल, 1993 से जुलाई, 1994 तक भोपाल रेंज डी.आई.जी. पदास्‍थापित रहे । भोपाल रेंज के सभी जिले अपराध एवं साम्‍प्रदायिकता की दृष्टि से अतिसंवेदनशील हैं । श्री दासने साम्‍प्रदायिक एवं अन्‍य अपराधों पर नियंत्रण रखा ।

जनवरी, 1988 से अगस्‍त, 1988 तक आप डी.आई.जी. चम्‍बल रेंज नियुक्‍त रहे और कुख्‍यात डकैत गेंगों का सफाया करवाया । इसके बाद आप को इन्‍दौर रेंज का डी.आई.जी. बनाया गया । सितम्‍बर, 1989 से अप्रेल, 1993 तक तीन साल छ: माह आप इन्‍दौर रेंज डी.आई.जी. नियुक्‍त रहे । यह रेंज अपराध एवं साम्‍प्रदायिकता की दृष्टि से बहुत संवेदनशील है । श्री दास ने प्रभावी कार्य-योजना से सभी तरह के अपराधों पर नियंत्रण रखा और अपनी कार्यकुशलता एवं योग्‍यता का परिचय दिया ।

महा निरीक्षक, जोन- श्री दास पदोन्‍नत होने पर जुलाई, 1994 से नवम्‍बर, 1995 तक लगभग सवा साल पुलिस महानिरीक्षक भिलाई जोन नियुक्‍त रहे । भिलाई जोन का पूरा क्षेत्र नक्‍सलवाद से ग्रसित है । श्री दास ने नक्‍सवादी गतिविधियों पर नियंत्रण रखा । इसके पश्‍चात् नवम्‍बर, 1995 से जुलाई, 1998 तक करीब 2 साल 8 माह श्री दास भोपाल जोन के आई.जी. पद पर स्‍थापित रहे । अपनी नियुक्ति के कार्यकाल में श्री दास ने भोपाल जोन में अपराधों पर नियंत्रण तथा कानून एवं व्‍यवस्‍था को बनाए रखा ।

अतिरिक्‍त महानिदेशक पुलिस – पदोन्‍नत होने पर श्री दास जुलाई, 1998 से जून, 1999 तक पुलिस मुख्‍यालय भोपाल में अतिरिक्‍त महानिदेशक योजना एवं प्रबंधन नियुक्‍त रहे । इसके पश्‍चात् जुलाई, 1999 से जून, 2002 तक मध्‍य प्रदेश के एक मात्र आर्म्‍ड पुलिस प्रशिक्षण कॉलेज, इन्‍दौर में पदस्‍थापित रहे । इस कॉलेज में मध्‍य प्रदेश पुलिस की विशेष सशस्‍त्र बटालियन के अफसरों एवं कर्मचारियों को सभी प्रकार का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है । इन्‍दौर के बाद जून, 2002 से जून, 2003 तक एक वर्ष अतिरिक्‍त महानिदेशक विशेष सशस्‍त्र बल भोपाल में नियुक्‍त रहे जहाँ करीब 30 बटालियनों के प्रशिक्षण तथा कल्‍याण के कार्य कुशलतापूर्वक सम्‍पन्‍न किए ।

महानिदेशक, जेल- श्री दास जून, 2003 से दिसम्‍बर, 2003 तक महानिदेशक जेल पदस्‍थापित रहे । जहाँ मध्‍य प्रदेश की समस्‍त जेलों का पर्यवेक्षण एवं प्रबंधन का कार्य किया ।

महानिदेशक पुलिस- श्री एस.के. दास मध्‍य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक दिसम्‍बर, 2003 से 31 मार्च, 2005 तक करीब सवा साल नियुक्‍त रहे । मध्‍य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहते हुए श्री दास ने कई उपलब्‍धियाँ हासिल की । प्रदेश में कानून एवं व्‍यवस्‍था की स्थिति बेहतर बनाए रखी । इस अवधि में साम्‍प्रदायिक हिंसा गतिविधियों पर नियंत्रण रखा तथा चम्‍बल के बीहड़ों में कुख्‍यात डकैत रावत गेंग का सफाया किया । सबसे बड़ी उपलब्‍धि यह रही की उज्‍जैन में 21वी शताब्‍दी का पहला महाकुंभ अप्रेल, 2004 में आयोजित हुआ जिसमें करोड़ों की संख्‍या में श्रद्धालु दर्शनार्थ आए । आपने पुलिस की उच्‍च स्‍तरीय व्‍यवस्‍था करके कुम्‍भ मेले को शान्ति एवं सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न करवाया ।

पदक एवं प्रशंसा पत्र- श्री एक.के. दास को अपनी सेवाकाल में भारत सरकार तथा मध्‍य प्रदेश शासन द्वारा कई पदक एवं प्रशंसा पत्र प्रदान किए गए ।

1. भारत सरकार द्वारा ‘कठिन सेवा पदक’ – 1993

2. राष्‍ट्रपति द्वारा ‘पुलिस पदक’ – 1986

3. राष्‍ट्रपति द्वारा ‘विशिष्‍ठ सेवा पदक’ – 1994

4. मध्‍यप्रदेश शासन द्वारा ‘सिंहस्‍थ ज्‍योति मेडल’ – 2004

महा निदेशक – डॉ. अम्‍बेडकर राष्‍ट्रीय सामाजिक विज्ञान संस्‍थान, महू

मध्‍य प्रदेश के महामहिम राज्‍यपाल ने श्री एस.के. दा को जून, 2005 में 4 वर्ष के लिए डॉ. अम्‍बेडकर राष्‍ट्रीय सामाजिक संस्‍थान, महू का महानिदेशक नियुक्‍त किया है । यह संस्‍थान समाज की ज्‍वलंत समस्‍याओं के बारे में अध्‍ययन एवं अनुसंधान कर सिफारिशें मध्‍य प्रदेश शासन को प्रस्‍तुत करता है ।

श्री एस.के. दास रैगर समाज के पहजे और एक मात्र आई.पी.एस. अधिकारी हैं जो किसी राज्‍य के पुलिस महानिदेशक रहे हैं । आप दिसम्‍बर, 2003 से मार्च, 2005 तक मध्‍य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक नियुक्‍त रहे हैं । सराहनीय सेवाओं के लिए आपको भारत सरकार तथा मध्‍य प्रदेश शासन ने कई पदक एवं प्रशंस पत्र प्रदान किए हैं । श्री दास ने रैगर समाज का गौरव बढ़ाया है ।

 

(साभार- चन्‍दनमल नवल कृत ‘रैगर जाति : इतिहास एवं संस्‍कृति’)

hajarilal jatoliya

 

माता धन्‍या पिता धन्‍यो धन्‍यो वंश: कुलं तथा ।
धन्‍या च वसुधा देवी गुरूभक्ति: सुदुर्लभा ।।

 

यू तो इस धरा पर हर कोई जन्म लेते है, मगर जीवन के प्रबल पुरुषार्थ से अपना स्वर्णिम इतिहास रचने वाले इस धरा पर विरले ही व्यक्ति होते है । अपनी जिन्दगी की सौरभ से जो औरों को महका दे, वो इंसान हर दिल अजीज होते है । मैवाड़ उदयपुर के गांव चंगेड़ी की धरा पर जन्में समाज के प्रकाश स्तम्भ, विलक्षण प्रतिभा के धनी, धर्मनिष्ठा, उदारमान, मेवाड़ के गाधी के नाम की ख्याति प्राप्त करने वाले श्री हजारीलाल जाटोलिया जो अन्तराष्ट्रीय दक्षिण एशियाई बाल दासता विरोध संगठन के उपाध्यक्ष रहे । आप अपने जीवन काल में रैगर समाज एवं दलितों व श्रमिकों उत्थान में काला बैग लटकाएं विभिन्न राजकीय कार्यालय में सदैव नजर आते हुए अपने जीवन के 60 वर्ष इसी कार्य में गुजार कर रैगर समाज का गौरव बढ़ाया ।

आपका जन्म मार्च 1938 को निर्धन रैगर समाज में हुआ तथा स्वयं मेहनत व मजदूरी करके सीनियर स्कूल तक की शिक्षा ग्रहण की आर्थिक परिस्थितियों ने आगे न पढने पर मजबूर कर दिया । 1958 में आप राजकीय सेवा में दाखिल हुए तथा पांच वर्ष तक सेवा में गुजारने के पश्चात एकाएक अनुसूचित जाति/जन जाति दलितों पर हो रहे अत्याचार भेदभाव को सहन नहीं कर पाये व राजस्थान सरकार में ऋण इंपेक्टर की सेवा से सन् 1963 में इस्तीफा दे दिया व अपने उदेश्य दलितों की सेवा में निकल पड़े । सन् 1963 से 1998 तक कुल 35 वर्षो में आपने दलितों के उत्थान आन्दोलन के अन्तर्गत 1963 से 1974 तक पूरे राजस्थान में 11 वर्षो तक दलितों के अधिकारों को दिलाने में सघर्षरत रहे सन् 1975 में बन्धुआ मुक्ति का आन्दोलन सर्वप्रथम भारत के उदयपुर जिले के गांव चंगेड़ी से प्रारंभ किया तथा दिल्ली के राष्ट्रीय श्रम संस्थान तक आवाज पहुचाने के बाद एन.एल.आई. के सहयोग से पूरे भारत वर्ष में इस आन्दोलन को चलाया । सन् 1976-77 को राजस्थान प्रान्त में शराब बन्दी आन्दोलन की शुरुवात अपने पेतृक गांव चंगेड़ी से की । उसी के अनुसार राजस्थान सरकार ने 30 जून 1977 में आबकारी मंत्री मा. आदित्येन्द्र ने चंगेड़ी गांव में सर्वप्रथम शराब का ठेका हटाकर शराब बंदी की शुरुवात करवाई । सन् 1981 स्वामी अग्निवेश व कैलाश सत्यार्थी के साथ गैर राजनैतिक बन्धुआ मुक्ति मोर्चा का राष्ट्रीय स्तर का संगठन गठित किया उसके आप कई वर्षो तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे । दलितों के साथ अमानीय अत्याचारों की अनेक घटनाओं से 14 अप्रेल 1984 को राजस्थान में प्रण मुक्ति आन्दोलन की शुरुआत कर संघर्ष जारी रखा अपने बाल्या अवस्था में 60 वर्ष तक सदैव दलितों के उत्थान के प्रति संघर्षरत रहने से आज लगभग 5 क्विटल विभिन्न कार्यवाहीयों के कागज आपकी केतुनुमा निवास में जमा है ।

आपने दलितों उत्थान के क्रम में देश के राष्ट्रपति सहित केन्द्रीय मंत्रीयों के मंत्रालयों को अपनी दलितनुमा शैली में देश के दलितों के दुःख दर्दो को सुनाया । श्री जाटोलिया ने आन्दोलन में तीव्रता लाने के लिए देश के गैर राजनीति संगठन भारतीय किशान यूनियन, उत्तरप्रदेश शेतकार संगठन, किसान समन्वय संगठन, आस्था संस्थान, राष्ट्रीय श्रम संस्थान, भारतीय सामाजिक संस्थान आदि के सहयोग से भारत के सर्वोच्च न्यायलय में रिट दायर कर भारत सरकार के समक्ष अपनी सभी मांगों को मंजुरी दिलाते हुए भारत में कृषकों, दलितों के कर्ज की वसूली व नीलामी को निरस्त कराया एवम्ं साथ ही साथ कर्जे माफ कराते हुए देश के लाखों लोगों को लाभाविन्त किया । अपने जीवनकाल में आपने विधान सभा पंचायत प्रतिनिधि सहित कई चुनाव लड़े, परन्तु धन बल के आगे चुनाव में हार का मुह देखना पड़ा । उसी क्रम में आपने 22 से 24 अगस्त 98 को महाराष्ट्र के ओरंगाबाद में बचपन बचाओं आन्दोलन के राज्य स्तरीय समारोह के मुख्य अतिथि के रुप में हजारों लोगों को सम्बोधित किया । श्री जाटोलिया अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी होने के कारण ग्राम पंचायत चंगेड़ी के सरपंच तथा सरपंच समन्वय समिति के अध्यक्ष रहे । आप अखिल मैवाड़ रैगर महासभा के अध्यक्ष भी रहे तथा आपके कार्यकाल में 2 फरवरी 2006 में रैगर समाज के 51 जोड़ों का सामुहिक विवाह सम्पन्न करवाकर रैगर समाज का गौरव बढा है ।

17 जनवरी, 2012 को श्री हजारीलाल जाटोलिया का निधन उनके पेतृक ग्राम चंगेड़ी जिला उदयपुर में हो गया और रैगर समाज का दैदीप्‍यमान सूरज हमेशा के लिए अस्‍त हो गया ।

 

(साभार- गोविन्‍द जाटोलिया : सम्‍पादक ‘रैगर ज्‍योति’)