रैगर जाति का लोक साहित्य

लोक गीतों के अतिरिक्त कथायें, मुहावरे, कथावतें, पहेलियां, लोरियां, सबद, हरजस, प्रवाद, चुटकले, गाथायें आदि भी लोक साहित्य के विशिष्ट अंग है। रैगर समाज में अन्य समाजो की तरह ही लोक कथायें लोक के सम्मिलित अनुभव, ज्ञान और कल्पना का निचोड़ है। इन कथाओं में समाज के प्रत्येक वर्ग कके लिये पृथक पृथक कथायें है। बालोपयोगी कथाओं क मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति प्रंशसनीय कही जा सकती है। इन में परियों की कहानियां, बाल कल्पना को जागृत करने के लिये रची गई विलक्षण कथायें, पशु पक्षियों की नीति संबंधी कथायें और इसी प्रकार की बालकों के कोमल मन को सही दिशा में प्रेरित और प्रवाहित करने वाली कथायें आती है। प्रौढों के लिये नीति, भूत-प्रेत, चोरी-धाड़ा, हास्य व्यंग्य, विभिन्न जातियों के गुण दोष आदि विभिन्न प्रकार की कथाओं के अतिरिक्त ऐतिहासिक और रूमानी कथायें भी प्रचूर परिमाण में उपलब्ध है। ऐतिहासिक कथाओं का प्रचलन, जो बहुत कुछ प्रवादात्मक होती है, समाज के बड़े बूढों द्वारा कहे सुने जाने से होता है। वास्तव में रैगर समाज का कार्यकलाप और गतिविधियां जितनी विविधता लिये हुये हैं वही लोक कथाओं में भी प्रतिबिेम्बित होती है।

रैगर जाति में लोक कथाओं के कहने का अपना एक विशिष्ट ढंग होता है और कई लोग इस कला में बड़े ही प्रवीण होते हैं। ऐसी कथायें एक बार में पूरी न की जाकर अनेक बार में सम्पूर्ण होती है। इन कथाओं को सुनने वाला व्यक्ति हुंकारे भरता रहता है जिस से कि सुनाने वाले को यह मालुम पड़ता रहे कि सुनने वाला वयिक्त नींद में तो नही आ गया है। मुझे अच्छी तरह से मालुम है कि मेरे बचपन में रात को सोने से पहले मेरी मां श्रीमती खेमली देवी प्रायः हर रात्रि को लोक कथाये सुनाया करती थी जिन को मैं बड़े ही आनन्द से सुना करता था। ये कथाये किसी जानवर या पक्षी का उदाहरण लेकर जीवन को जीने की कला को दर्शाया करती थी। इसी प्रकार कई बार मेरी गली की कोई बुजूर्ग महिला शाम को दिल्ली के मेरे घर पर आ जाया करती थी जिस से मेरी माताश्री बाते करती रहती थी जिस को मैं बहुत ध्यान से सुनते हुये सौ जाया करता था। इन की बातो में कई बार किसी व्यक्ति के द्वारा दिये गये धोखा अथवा अनैतिक कार्य के कारण उस का जीवन का अंतिम समय दुख पूर्ण गुजरने की बाते भी हुआ करती थी। इन कथाओ में रैगर जाति के लोगो की सच्चाई से जीवन जीने की बाते अधिक हुआ करती थी। इस प्रकार रैगर जाति में लोक कथायें रात को ही साधारणतया सुनाई और सुनी जाती है। रैगर जाति में प्रचलित लोक कथाओं और साहित्य को निम्नलिखित भागों में प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1). प्रवाद: यह भी एक प्रकार की ऐतिहासिक कथा होती है जो आकार में छोटी और घटना विशेष पर ही कही और सुनाई जाती थी। प्रवाद ऐतिहासिक और काल्पनिक दोनो ही प्रकार की होती थी। अनेक प्रवादो की कहावतें भी प्रचलित थी और उन में कथा सूत्र का संकेत भी रहता था। रैगर जाति ्में प्रवादों की यह परम्परा सैंकड़ो वर्षो से चली आ रही है। इन प्रवादो में रैगर जाति के बुजूर्ग पूरूष और महिलायें अपने गोत्र की उत्पति और गोत्र में उत्पन्न महान व्यक्तियों व उन के द्वारा किये गये कार्यो के वर्णन के अलावा रैगर जाति पर हुये अत्याचारो का भी वर्णन किया करती है। इन प्रवादो में रैगर जाति के राणाओ और भाटो द्वारा कहे गये अपने गोत्रो की वीर गाथाओ और दान प्रवृतियो का भी बखान होता था। मैने मेरे बचपन में मेरी माता श्रीमति खेमली देवी से कई बार मेेरे पिताश्री कालुराम रछोया पर रायसर के ठाकुर द्वारा किये गये अत्याचारो के बारे में सुना था। मेरी माता जी कई बार बताती थी कि रायसर गांव से मेरे पिता जी रामगढ के जंगलो से ‘ढोग‘ बनाने वाले पत्ते तोड़ कर जयपुर पैदल ही गांठ बांध कर बेचने ले जाते थे। इसी प्रकार वह प्रवाद के रूप में बताती थी कि मेरे पिता श्री कालु राम रछोया कितनी कठिनाई और गरीबी में पानीे के भरे हुये दो पीपे सिर पर रख कर एक पैेसे में बांकी माता के मन्दिर में पहाड़ के उपर लेकर चढा करते थे। मुझे अच्छी तरह से याद है कि वह कहती थी कि शरीर की ‘चमड़ी‘ प्यारी नही होती बल्कि ष्शरीर से की गई मेहनत ही प्यारी होती है। इस लिये शरीर की चमड़ी के बदले शरीर से की गई मेहनत को ही प्यार करना और अपनी मेहनत से ही कमाया गया पैसा आदमी को उपर उठा सकता है।

(2). कहावतें व मुहावरे: कहावतें और मुहावरे लोक भाषा के अभिन्न अंग समझे जाते है। मुहावरों से भाषा में एक जीवन्तता और विलक्षणता आती है। जातियों, त्यौहारो, स्त्रियों, खान पान, शिक्षा, धर्म, लोक विश्वास, जीवन दर्शन, शगुन और जातिगत भेदभावों से सम्बिन्धित कहावतें भी रैगर समाज में प्रचलित रही है।

(3). पहेलियां: प्रायः रैगर जाति में बच्चों के मनोरंजन और युवा प्रेमियों तथा सखी सहेलियों के हास-परिहास के रूप में इन का प्रयोग किया जाता रहा है। जब कोई रैगर जाति का दुल्हा ससुराल में जाता था तो उस की साली या अन्य कोई बालिका द्वारा दूल्हे से पूछी जाने वााली पहेलियां उस की बुद्धि परीक्षा के लिये ही प्रयुक्त हुआ करती थी। इस प्रकार ऐसी पहेलियां के अलावा कई बार रैगर जाति में बालक बालिकाओं में खेलकूद करते समय भी कई प्रकार की पहेलियां आपस में पूछी जाती थी। पहेलियो का रैगर जाति में काफी प्रचलन हुआ करता था जिस से कि रैगर बालक बालिकाओ में बुद्वि का विकास हो सके।

(4). लोरियां: रैगर समाज में लोरियां बच्चे का सुलाने के समय में सुनाई जाती थी। ये लोरियां प्रकृति व चांद सिताारो से भी संबंधित होती थी। मुझे अभी तक एक लोरी जो मेरी माता श्रीमती खेमली देवी सुनाया करती थी वह याद है – ‘चंदा मामा दूर के, पुअे पकाये बूर के, आप खाये थाली में, मुन्ने को खिलाये प्याली में, प्याली गयी टूट, मुन्ना गया रूठ, नई प्याली लायेंगे, मुन्ने को फिर खिलायेंगे।‘ ऐसा भी देखा गया है कि कई बार रैगर महिलायें जच्चा के गीतों में ही कई लोरियों को परिणित कर लेती थी। अधिकांश तौर पर लोरियों का उपयोग रैगर जाति में रोते हुये बच्चों को सुलाने और रिझाने के कारण ही किया जाता था।

(5). हरजस: भगवान के गुणगान से संबंधित भक्ति पूर्ण पद हरजस कहलाते है। इन्हे प्रायः बड़ी बूढी स्त्रियां प्रभातकाल में पत्थर की दो पाट वाली चक्कियों पर गेहूं को पीस कर आटा बनाते तथा अन्य दैनिक कार्य करते हुये अथवा लविश्राम के क्षणों में गाती है। हरजस में जीवन की गहराईयों का वर्णान भी होता है जैसे ‘बहुत बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय। एक पलक के कारणे, क्यरें कलंक लग जाये। रैगर जाति में विवाह अथवा अन्य कोई शुभ कार्य पर ‘राती जगा‘ के समय भी हरजस गाने का रिवाज है। रैगर जाति की महिलाओ में हरजस गाने का काफी रिवाज आज भी विद्यमान है। इस में ‘भौमियां‘ का गीत गाते हुये उस के बस्ती अर्थात मौहल्ले और परिवार के सभी सदस्यों की रक्षा की विनती की जाती है। इस के बोल इस प्रकार से है – ‘बस्ती की रक्षा करो रे भौमिया……., थे गुवाड़ी की रक्षा करो रे भौमियां, बहनो की रक्षा करो रे भोमियां……….‘ इस प्रकार से कई कड़िया हरजस में जुड़ती जाती है।

Website Admin

BRAJESH HANJAVLIYA



157/1, Mayur Colony,
Sanjeet Naka, Mandsaur
Madhya Pradesh 458001

+91-999-333-8909
[email protected]

Mon – Sun
9:00A.M. – 9:00P.M.

Social Info

Full Profile

Advertise Here