रैगर वीर बढे चलो

         शान ‘रेगर’ अभिमान बचाये रखिये । हरदम सामाजिकता बनाये रखिये॥
यूँ तो चमकता है हिमालय मगर । ‘रेगर वीर’ एकता बनाये रखिये ॥
भेदभाव के काँटे जहाँ पलते है । उन पेड़ो को जड़ से मिटाये रखिये॥
सुलग न जाये आग बँटवारे की । बढ़ने से पहले बझाये रखिये॥
अँधियारा चाहे हो जाये कितना । मन बाती मे दिया जलाये रखिये॥
छूट न जाये राहो मे कारवाँ । ‘रेगर’ विकास की ओर कदम रखिये॥
धन-दौलत नहीं भाईचारा बढ़ाइये । होठों पर पावन दुआएँ रखिये॥
अपने समाज हित कुछ करना है । रेगर वीर मन को जरा समझाये रखिये ॥

लेखक

हरीश सुवासिया

एम. ए. [हिंदी] बी. एड. (दलित लेखक,संपादक)

देवली कला जिला- पाली मो॰ 09784403104

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