वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए, जो स्थिति बन रही है, उसके तहत् अखिल भारतीय रेगर महासभा के संविधान में काफी हद तक बदलाव की आवश्यकता है। आज रेगर समाज संख्याबल में ज्यादा होते हुए भी अन्य समाजों की तुलना में पिछङा हुआ है। जबकी अन्य समाज आज राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, संसाधन, एकता, धार्मिक दृष्टिकोण...Read More
समाज में दो तरह का बुद्धिजीवी वर्ग है, एक तो वो जो पढ़ लिखकर डिग्रिया हासिल कर ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठ गया जिसे बुद्धिजीवी वर्ग मान लिया गया। दुसरा वह जो पढ़ा लिखा है या नहीं चाहे डिग्री या पदधारी है या नहीं है लेकिन हर बात को तर्क की कसौटी पदर उतारता है...Read More
रैगर समाज में बच्चों और युवाओं में गजब प्रतिभा है। ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरींग, शिक्षा, उद्योग, सरकारी नौकरियों, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में रैगर प्रतिभाओं को आजादी से पहले अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर नहीं मिला था, मगर अब राष्ट्र, प्रान्त एवं क्षेत्रीय स्तर पर कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं । दिल्ली निवासी श्री अशोक...Read More
1931 की जनगणना के बाद 2011 की जनगणना में जाति के आधार पर भी जनगणना करने का मानस भारत सरकार ने बना लिया है । वसुधैव कुटुंबकम एवं 21 वी सदीं के भारत में जाति की बात करना कुछ लोगों की नजर में पुरानी विचारों वाला है। किन्तु ये लोग ही जाति के विकास एवं...Read More
भारत में सर्वप्रथम जूलाई, 1902 में कोल्हापुर की रियासत में छत्रपति साहूजी महाराज ने जनसंख्या के आधार पर जातियों को नौकरी में आरक्षण दिया था। चुकिं यह राजा का आदेश था, अतः सीधा विरोध न कर, पुरोहितों ने बकरे के खून से अपने हाथ रंग कर दीवारों-दरवाजों पर अन्धेरी रात में चिन्ह लगा दिया। फिर...Read More
रैगर समाज के समग्र विकास और सुधार पर नजर डालें तो हमने शैक्षणिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है । राजनीति में स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं जिनमें ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं, नगर परिषदों तथा नगर निगम में रैगर समाज के प्रतिनिधि पहले से कई गुना अधिक संख्या में चुन कर आए है ।...Read More
वैचारिक सांस्कृतिक क्रांति- रैगर समाज का अधोगति का मुख्य कारण वैचारिक क्रांति का अभाव रहा है। जैसा खाये अन्न वैसा दाने बने मन वाली कहावत इस समाज के साथ लागू हो गई है। हमारे समाज की 95% जन मानसिकता रूढिवादी, परम्परावादी, प्रतिबद्ध विचारों की है। समाज नयापन, खुलापन चेतनामय विचारों का दुशमन है। परिवर्तन का...Read More
साहित्य समाज का दर्पण होता है जिस समाज का साहित्य जितना विकसित होगा वह समाज उतना ही उन्नत, जाग्रत होगा। विश्र्व इतिहास में ऐसे कई उदाहरण भरे पडे है प्राचीन काल से तथा कथित उच्च वर्गों का साहित्य पर एकाधिकार होने से इर्षा वंश दलित शोषित जातियों का कोई इतिहास नहीं रचा गया। रैगर जाति...Read More
उडे जो, उन्हें भी गिराते हैं, शिकारी लोग पत्थरों से।धरा तो क्या, खाली नहीं आकाश ठोकरों से।। हमारे सुधी पाठक यह सोच रहे होंगे कि इस लेख का शीर्षक ऐसा क्यों है ?यह सत्य है कि पंचायती में जाजम के केन्द्र में और समारोह की अग्रिम पंक्ति में बैठकर अपने आपको समाज का महत्वपूर्ण व्यक्ति...Read More
रैगर जाति के महान क्रांतिकारी अमर शहीद त्यागमूर्ती स्वामी आत्माराम ”लक्ष्य” के बारे में आज भी कुछेक शिक्षित साहित्य इतिहास प्रेमी रैगर ही पूज्य स्वामी जी के बारे में जानते है। पूज्य स्वामी आत्माराम ”लक्ष्य” रैगर संस्कृति के साकार प्रतिक थे। स्वाभिमान साहस सच्चाई, निर्भिकता, सहनशीलता, कर्त्तव्य निष्ठा, संगठन शक्ति, अनुशासन एवं विनम्रता के गुण...Read More